अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय International Criminal Court - ICC

मुख्यालयः हेग, नीदरलैंड 

सदस्यताः 1 मई, 2013 की स्थिति के अंतर्गत इसके 122 राष्ट्र सदस्य हैं। हालांकि चीन, भारत, रूस और अमेरिका न्यायालय के आलोचक हैं और वे इसमें शामिल नहीं हुए हैं।

उत्पति एवं विकास

1 जुलाई, 2002 को चार-सदस्यीय ढांचा (skeleton) स्टाफ द्वारा हेग स्थित कामचलाऊ कार्यालय में नवगठित न्यायालय का उद्घाटन किए जाने के साथ ही प्रथम विश्व अपराध न्यायालय अस्तित्व में आ गया।

आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिये विश्व स्तर पर स्थापित एक न्यायालय की मांग उस समय प्रारंभ हुई जब राष्ट्र संघ ने एक वैश्विक न्याय तंत्र की चर्चा की थी। 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक नरसंहार अभिसमय का प्रयोजन किया। इस अभिसमय ने आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिये एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण की मांग की। 1989 में अंतरराष्ट्रीय मादक द्रव्य तस्करी के संबंध में त्रिनिदाद और टोबैगो की शिकायत ने संयुक्त राष्ट्र संघ को अंतरराष्ट्रीय विधि सम्मेलन आयोजित करने के लिये प्रेरित किया, लेकिन न्यायालय के गठन में वास्तविक अभिप्रेरक का कार्य स्लोबोदान मिलोसेविक के नेतृत्व में बोस्निया-हर्जेगोविना के नरसंहार ने किया (मिलोसेविक पर हेग स्थित अस्थायी अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध न्यायाधिकरण में मुकदमा चल रहा है)।

17 जुलाई, 1998 को रोम में आयोजित सरकारी प्रतिनिधियों के एक कूटनीतिक सम्मेलन में आईसीसी संविधान पर 139 देशों ने हस्ताक्षर किए, सात देशों ने संविधान का विरोध किया, जबकि 22 देशों (जिसमें भारत भी सम्मिलित था) ने मतदान में भाग न लेकर तटस्थता की नीति अपनायी।

11 अप्रैल, 2002 को 10 देशों- बोस्निया-हर्जेगोविना, बुल्गारिया, कम्बोडिया, कांगो, आयरलैंड, जॉर्डन, मंगोलिया, नाइजर, रोमानिया और स्लोवाकिया, ने एक ही दिन न्यायालय के पक्ष में अपना अनुमोदन प्रस्तुत किया। इस प्रकार आईसीसी की स्थापना का अनुमोदन करने वाले राज्यों की संख्या 66 हो गयी। आईसीसी का संविधान 1 जुलाई, 2002 को प्रभाव में आया, तब तक 74 देशों ने इस संविधान का अनुमोदन कर दिया था।

आईसीसी अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। न्यायालय में न सिर्फ देशों के विरुद्ध बल्कि व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह (जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ के शांतिरक्षक बल भी सम्मिलित हैं) के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है। न्यायालय में नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध, आदि से संबंधित मुकदमे चलाये जा सकते हैं। न्यायालय में आक्रमण (aggression) के विरुद्ध भी मुकदमा चलाया जा सकता है लेकिन इसके लिये पहले आक्रमण की परिभाषा पर सदस्य राज्यों की सहमति आवश्यक है। न्यायालय का अधिकार क्षेत्र उस राज्य में होगा जहां आपराधिक घटना घटी है। उस राज्य में भी न्यायालय का अधिकार क्षेत्र होगा जहां का आरोपी व्यक्ति नागरिक है, लेकिन इसके लिए उस राज्य का न्यायालय के संविधान का एक पक्ष होना आवश्यक है। जो राज्य संविधान का सदस्य नहीं है, उसके समक्ष यह विकल्प होगा कि किसी अपराध विशेष के संबंध में वह आईसीसी को अपने राज्य में अधिकार क्षेत्र प्रदान करे या नहीं। अतः कोई भी विक्षुब्ध देश किसी मामले को न्यायालय में ला सकता है। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद किसी मामले को आईसीसी को निर्दिष्ट कर सकती है।

आईसीसी का लक्ष्य आपराधिक न्यायालयों को विस्थापित करना नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक लक्ष्य अपराधियों की सजा दिलाने में राष्ट्रीय न्यायालयों की सहायता करना है। फिर भी, अगर कोई देश किसी मामले की जांच करने में असमर्थता या अनिच्छा व्यक्त करता है तो आईसीसी उस मामले की सुनवाई कर सकता है। अनिच्छा कई प्रकार से व्यक्त की जा सकती है, जैसे- किसी व्यक्ति को आपराधिक उत्तरदायित्व से बचाना, तटस्थ या स्वतंत्र जांच का अभाव, जानबूझकर किया गया विलम्ब, आदि। लेकिन, आईसीसी का अधिकार क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय समुदाय के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराध तक ही सीमित होगा। आईसीसी केवल उन्हीं अपराधों की जांच कर सकता है, जो व्यापक प्रभाव वाले हैं या किसी नागरिक जनसंख्या पर सुनियोजित ढंग से किये गये आक्रमण के भाग हैं। आईसीसी युद्ध अपराधों की सुनवाई तभी कर सकता है जब ऐसे अपराध व्यापक स्तर पर या किसी योजना या नीति के अंतर्गत किए गए हों, लेकिन ऐसे सशस्त्र विद्रोह भी आईसीसी के अधिकार क्षेत्र में आयेंगे जो अंतरराष्ट्रीय चरित्र वाले नहीं हैं, जैसे- 1949 के जेनेवा अभिसमय की घोर अवव्हेलना।

बलात्कार, यौन दासता, आरोपित वेश्यावृत्ति, आरोपित गर्भाधान, आरोपित बन्ध्यीकरण या इस प्रकार के अन्य यौन अपराधों को भी मानवता के विरुद्ध किये गये अपराधों के रूप में स्वीकार किया गया है। आईसीसी के संविधान में पीड़ितों और कार्रवाई में सम्मिलित गवाहों की सुरक्षा के प्रावधान हैं।

सदस्य देशों की सभा के द्वारा एक न्यास कोष (Trust Fund) की स्थापना की जायेगी, जो पीड़ितों को क्षतिपूर्ति; मुआवजे, और; पुनर्वास के रूप में हरजाना प्रदान करेगा।

आईसीसी संविधान की कुछ सीमाएं हैं। न्यायालय ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर सकता, जो उसकी स्थापना से पहले घटित हुये हों। आक्रमण और आतंकवाद की स्पष्ट व सर्वसम्मत परिभाषा का अभाव इसकी एक अन्य कमजोरी है। ऐसे अपराध जो सदस्य देशों के अधिकार क्षेत्र से बाहर किये गये हैं, आईसीसी के अधिकार क्षेत्र में तब तक नहीं आते हैं, जब तक कि सुरक्षा परिषद संबंधित देश को ऐसे मामलों को आईसीसी में निर्दिष्ट करने के लिये दबाव नहीं डाले। न्यायालय ऐसे मामलों में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, जिनकी सुनवाई राष्ट्रीय न्यायालयों में हो रही है या हो चुकी है। व्यापक जनसंहार वाले हथियार से संबंधित मामले भी आईसीसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।

अभियोजक को व्यापक अधिकार प्रदान किये गये हैं। वह अपराध की सूचना के आधार पर जांच कार्य प्रारंभ कर सकता है। 2 जुलाई, 2002 तक आईसीसी संविधान की अनुमोदित कर चुके देशों को सदस्य देशों की प्रथम सभा में मतदान करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त होगा। 1 अक्टूबर, 2002 तक संविधान को अनुमोदित करने वाले देशों को न्यायालय के एक न्यायाधीश को मनोनीत करने का अधिकार होगा।

आईसीसी के सबसे मुखर विरोधी ऐसे राष्ट्र हैं, जो अपने देश में अलगाववादी शक्तियों से जूझ रहे हैं या जो संयुक्त राज्य अमेरिका या पश्चिमी देशों के दबदबे को स्वीकार नहीं करते हैं। इजरायल और चीन पहली श्रेणी के देश हैं, जबकि इराक, लीबिया और यमन दूसरी श्रेणी के। लेकिन आईसीसी को सबसे गंभीर चुनौती संयुक्त राज्य अमेरिका से मिली। यद्यपि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने दिसंबर 2000 में आईसीसी के गठन से संबंधित संधि पर हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन उन्होंने उसे अनुमोदन के लिए सीनेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया। वर्तमान राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने संधि की भर्त्सना की। मई 2002 के आरंभ में बुश प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र संघ को औपचारिक रूप से सूचित किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका आईसीसी को स्वीकार करने के लिये कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। वॉशिंगटन ने कहा कि, न्यायालय राष्ट्रीय संप्रभुता का अतिक्रमण करेगा तथा उन अमेरिकी सैनिकों या अधिकारियों को दण्डित करेगा, जो संयुक्त राज्य की सीमा से बाहर कार्यरत हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने आईसीसी के संविधान को अनुमोदित नहीं करने वाले राष्ट्रों से अमेरिकी सैनिकों पर युद्ध मुकदमा नहीं चलाने के स्थायी आश्वासन की मांग की। आरंभ में, ऐसा आश्वासन न मिलने पर संयुक्त राज्य अमेरिका ने जुलाई 2002 में बोस्निया में संयुक्त राष्ट्र संघ शांति रक्षक बल के नवीनीकरण को अवरुद्ध करने के लिये अपनी वीटो शक्ति का प्रयोग किया। वास्तव में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सैनिकों को आईसीसी के अधिकार क्षेत्र से मुक्त न किए जाने पर एक-एक करके सभी शांति रक्षा प्रयासों को अवरुद्ध करने की धमकी दे दी।

बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी मांग को थोड़ा लचीला बनाते हुये प्रस्ताव रखा कि संधि को अनुमोदित न करने वाले देशों के शांति रक्षक सैनिकों को 12 महीने की छूट दी जाये। इससे आरोपी सैनिकों की अपने गृह राष्ट्र वापस आ जाने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा तथा घर वापसी के बाद वे राष्ट्रीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आ सकेंगे। एक वर्ष के बाद किसी शांति रक्षक पर मुकदमा चलाने के लिये आईसीसी के लिये सुरक्षा परिषद, जहां संयुक्त राज्य अमेरिका को वीटो अधिकार प्राप्त है, का अनुमोदन आवश्यक हो जाएगा। संयुक्त राज्य अमेरिका ने सुरक्षा परिषद के तत्वावधान में गठित अस्थायी न्यायाधिकरणों, जैसे-द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत युद्ध अपराधों के लिए गठित टोकियो और न्युरेमबर्ग न्यायाधिकरण या रवांडा और सियेरा लियोन के मामलों में गठित न्यायाधिकरण, का समर्थन किया।

11 जुलाई, 2002 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी मांग में थोड़ी और नम्यता दिखाई। इसका कारण उसके निकटतम मित्रों द्वारा उसकी नीति की कड़ी आलोचना किया जाना था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को प्रस्तुत अपने नये प्रस्ताव में संयुक्त राज्य अमेरिका ने कहा कि आईसीसी संविधान पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों के शांति रक्षकों के मामले की 12 महीनों तक आईसीसी के द्वारा जांच नहीं की जाए। यह छूट वार्षिक आधार पर प्रदान की जाती तथा सुरक्षा परिषद सर्वसम्मति से एक वर्ष की छूट देने पर तैयार हो गयी। नवीनतम संशोधित प्रस्ताव के अंतर्गत सुरक्षा परिषद का कोई भी स्थायी सदस्य एक वर्ष की अवधि के बाद जांच को आगे बढ़ाने से संबंधित प्रस्ताव पर वीटी लगा सकता है।

सुरक्षा परिषद के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि वॉशिंगटन की यह चिंता भ्रामक थी कि उसके नागरिक या सैनिक आईसीसी की लपेट में आ जायेंगे। कारण, आईसीसी तभी सक्रिय होगा जब कोई देश जन-संहारकों पर अभियोजन चलाने में असमर्थता या अनिच्छा व्यक्त करेगा। यह स्पष्ट था कि संयुक्त राज्य अमेरिका का विरोध मात्र वैचारिक था। अन्य क्षेत्रों में भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मार्ग अपनाया है। इसने पर्यावरण पर जारी क्योटो प्रोटोकॉल के विरुद्ध मत दिया, एबीएम संधि की समाप्ति की एकतरफा घोषणा की, जैविक हथियार अभिसमय का विरोध किया, भू-सुरंगों को नष्ट करने के मार्ग को अवरुद्ध किया तथा लघु हथियारों पर नियंत्रण के मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया। अतः ऐसा लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरराष्ट्रीय आचरण के सभी मानकों के प्रतिकूल है।

संविधान पर 1998 में चर्चा के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ने आईसीसी पर सुरक्षा परिषद के व्यापक अधिकार की इच्छा व्यक्त की, ताकि वह अपने विरुद्ध उठाए गए न्यायालय के प्रयासों को सुरक्षा परिषद के माध्यम से प्रभावी न होने दे। ऐसा लगता था कि संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था कि न्यायालय में मुकदमे की पहल करने के लिए केवल सुरक्षा परिषद ही अधिकृत नहीं थी। ऐसा कोई भी देश मुकदमे की पहल कर सकता है जहां अपराध किया गया हो, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका न्यायालय में चल रहे मामलों में सुरक्षा परिषद को वीटो का अधिकार दिलाने में सफल नहीं रहा।

चीन, रूस और अरब देशों के एक गुट के कुछ अन्य देशों ने आईसीसी के गठन का विरोध किया।

फ्रांस ने इस शर्त के साथ संधि को अनुमोदित किया कि युद्ध अपराधों के लिये सात वर्षों की छूट का प्रावधान हो।

भारत भी इस संधि का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। भारत के अनुसार एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए थी, जिसमें देशों को यह निर्णय लेने का विकल्प हो कि किसी मुकदमे की सुनवाई आईसीसी कर सकता है या नहीं। भारत नाभिकीय हथियारों और रासायनिक गैसों को भी आईसीसी के दायरे में लाने का पक्षधर है, लेकिन इस मांग को अस्वीकार कर दिया गया।

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