अंतर्राज्यीय जल बंटवारा विवाद Inter-State Water Sharing Disputes

देश की अधिकांश नदियां अंतर्राज्यीय हैं। जल की मांग बढ़ने से जल के बंटवारे को लेकर अंतरराज्यीय विवाद उत्पन्न हो गये हैं।

अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 का संशोधित एक्ट 6 अगस्त, 2002 से लागू हो गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत जब दो या दो से अधिक राज्य सरकारों के बीच जल विवाद पैदा होता है, तो अधिनियम की धारा 3 के तहत् कोई भी नदी घाटी राज्य केंद्र सरकार को इस संबंध में अनुरोध भेज सकता है।

उक्त अधिनियम के अंतर्गत, विवाद के बातचीत के जरिए न सुलझ पाने के प्रति संतुष्ट होने की स्थिति में केंद्र सरकार उस विवाद को पंचाट को सौंप सकती है।

कावेरी जल विवाद

कावेरी बेसिन का कुल क्षेत्र 87,900 वर्ग किलोमीटर है। यह समूचे भारतीय भू-भाग का 2.7 प्रतिशत है। इस नदी का बेसिन तमिलनाडु में 48,730 वर्ग किलोमीटर है, जबकि यह कर्नाटक में48,730 और केरल में 2,930 वर्ग किलोमीटर है। कावेरी में मिलनेवाली नदियों में प्रमुख हैं- हेमवती, हरांगी, काबिनी, स्वर्णवटी और भवानी। भौगोलिक दृष्टि से कावेरी को तीन हिस्सों में बांटा गया है- पश्चिमी घाट, मैसूर का पठार और डेल्टा। अनुमान है कि, इस बेसिन में औसत वार्षिक सतही जल क्षमता 21.4 घन किलोमीटर है, जबकि 19 घन किलोमीटर पानी ही इस्तेमाल हो रहा है। इस बेसिन का कृषि क्षेत्र लगभग 58 लाख हेक्टेयर है। यह देश के कुल कृषि क्षेत्र का 3 प्रतिशत है। कावेरी नदी का उद्गम स्थल कर्नाटक होने के कारण कावेरी के जल पर संपूर्ण नियंत्रण उसी का है। कर्नाटक से निकलकर यह नदी तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के कई क्षेत्रों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

कावेरी विवाद सर्वप्रथम 1837 में मैसूर और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच वन और सिंचाई के मुद्दों को लेकर उठा। 1892 में अंग्रेज शासकों ने इस पर एक समझौता किया, किंतु कुछ दिनों बाद ही इस समझौते पर विवाद खड़ा हो गया। 1924 में ब्रिटिश शासन की मध्यस्थता से पुनः 50 वर्षों के लिए एक समझौता हुआ । इस समझौते की अवधि समाप्त होते ही सत्तर के दशक में यह समस्या पुनः उठ खड़ी हुयी।

70 के दशक में समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने 1972 में गठित एक तथ्य अन्वेषी दल की रिपोर्ट के आधार पर 1976 में एक समझौता किया। किंतु दुर्भाग्य से समझौते के दौरान तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन था। इसका परिणाम यह हुआ कि, तमिलनाडु की अगली चुनी सरकार ने इसे मानने से इंकार कर दिया। बाद में दोनों राज्यों के बीच बातचीत जारी रही लेकिन उसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला। 1986 में तमिलनाडु ने केंद्र सरकार से 1956 में पारित अंतरराज्यीय जल विवाद कानून के अंतर्गत एक न्यायाधिकरण के गठन की मांग की। 2 जून, 1990 को कावेरी जल न्यायाधिकरण का गठन किया गया।

न्यायाधिकरण का फैसला आने तक तमिलनाडु ने उससे अपने लिए आवश्यक पानी की व्यवस्था करने की अपील की किंतु न्यायाधिकरण ने उसकी अपील को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। फिर उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर न्यायाधिकरण ने 1991 में एक अंतरिम आदेश जार किया। इसके अंतर्गत कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु और पुदुचेरी को क्रमशः 205 और 6 अरब घनफुट पानी छोड़ा जाना था लेकिन अपने किसानों के हितों का तर्क देकर कर्नाटक ने इसे निरस्त कर दिया।

1995-96 में सूखे के कारण पानी की कमी से जब समस्या बढ़ गयी तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मामले में हस्तक्षेप कर तमिलनाडु के लिए आवश्यक पानी की मात्रा छोड़ने के लिए कर्नाटक को राजी किया व सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर कावेरी जल प्राधिकरण (सी.आर.ए.) का गठन किया। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले इस प्राधिकरण में तमिलनाडु, कर्नाटक, पुदुचेरी व केरल के मुख्यमंत्री सदस्य हैं। अंतरिम आदेश को लागू करवाने में प्राधिकरण भी कारगर नहीं हो सका। 2003 में तमिलनाडु की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के लिए 1.25 अरब घनफुट पानी छोड़ने का कर्नाटक को आदेश दिया। बाद में प्राधिकरण की बैठक में प्रधानमंत्री ने उसे कम करके 8.0 अरब घनफुट कर दिया। कर्नाटक ने इसे स्वीकार करते हुए पानी छोड़ना भी शुरू किया किंतु कर्नाटक के किसानों के तीखे व हिंसक विरोध के बाद सरकार ने उसे रोक दिया। तमिलनाडु सरकार ने उच्चतम न्यायालय में इसके विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की, जिसे संज्ञान में लेते हुए अदालत ने कर्नाटक सरकार को नोटिस भी जारी किया, किंतु कर्नाटक ने इसकी अवहेलना कर दी।

कावेरी जल विवाद पंचाट ने 25 जून, 1991 को अंतरिम आदेश पारित किया, और फिर अप्रैल 1992 और दिसंबर 1995 में स्पष्टीकरण आदेश जारी किए। बाद में 5 फरबरी. 2007 को पंचाट ने अंतरराज्यीय नदी विवाद अधिनियम 1956 की धारा 5(2) के अंतर्गत अपनी रिपोर्ट और फैसला दिया। इस रिपोर्ट और निर्णय सुनाए जाने के पश्चात् केंद्र और राज्य सरकारों ने अधिनियम की धारा 5(3) के तहत् पंचाट के स्पष्टीकरण और निर्देश के लिए अनुरोध किया है। मामला पंचाट के विचाराधीन रहा। मामले के संबद्ध राज्यों ने पंचाट के 5 फरवरी, 2007 के निर्णय के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की।

कावेरी नदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने 5 फरवरी, 2007 को अपना अंतिम निर्णय घोषित किया। इस निर्णय के अनुसार, तमिलनाडु को 419 बिलियन घन फीट (12 घन किमी.) कावेरी जल दिया गया जबकि कर्नाटक को 270 बिलियन घन फीट (7.6 घन किमी.) जल प्राप्त हुआ। कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को विमुक्त वार्षिक रूप से वास्तविक जलराशि 192 बिलियन घन फीट एवं पुदुचेरी को 7 बिलियन घन फीट जलराशि प्राप्त होगी। तमिलनाडु एवं कर्नाटक, इस निर्णय से संतुष्ट नहीं थे, और उन्होंने ट्रिब्यूनल के सम्मुख समीक्षा याचिका दायर की।

19 सितंबर, 2012 को, 9 वर्षो पश्चात् प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह तमिलनाडु को बिलिगुंडलू में प्रतिदिन कावेरी जल में से 9,000 क्यूसेक जल विमुक्त करे। कर्नाटक ने इस निर्देश की अव्यावहारिक माना और 21 सितंबर को कावेरी जल प्राधिकरण के सम्मुख इस निर्णय के खिलाफ एक समीक्षा याचिका दायर की। 28 सितंबर, 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक सरकार की कावेरी नदी प्राधिकरण के निर्देशों का पालन न कर पाने के लिए कड़ी निंदा की। किसी अन्य विकल्प के न रहने पर कर्नाटक ने जल विमुक्त करना प्रारंभ कर दिया। इससे कर्नाटक में बड़ी हिंसा एवं व्यापक विरोध हुआ।

15 नवम्बर 2012 को कावेरी निगरानी समिति ने कर्नाटक सरकार को तमिलनाडु को 4.81 टीएमसी फीट पानी छोड़ने का निर्देश दिया। 6 दिसंबर, 2012 को, सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक सरकार को तमिलनाडु को 10,000 क्यूसेक जल विमुक्त करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने केंद्र सरकार से कावेरी नदी जल विवाद ट्रिब्यूनल के अंतिम निर्णय, जो फरवरी, 2007 में दिया गया था, को एक निश्चित समयावधि के भीतर अधिसूचित करने को कहा।

20 फरवरी, 2013 को, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित, भारत सरकार ने कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल (सीडब्ल्यूडीटी) के कर्नाटक, तमिलनाडु, और केरल तथा संघ क्षेत्र पुदुचेरी बेसिन राज्यों के बीच कावेरी के जल बंटवारे पर अंतिम निर्णय को अधिसूचित किया। ट्रिब्यूनल के 2007 के निर्णय के तहत् कावेरी बेसिन में उपलब्ध कुल जल की मात्रा 740 टीएमसी फीट है, जिसमें 14 टीएमसी फीट जल पर्यावरणीय संरक्षण और समुद्र में रिसने वाले जल के तौर पर शामिल है। अंतिम निर्णय ने प्रावधान किया कि वार्षिक रूप से 419 टीएमसी फीट जल तमिलनाडु को, 270 टीएमसी फीट जल कर्नाटक को 30 टीएमसी फीट जल केरल को, और 7 टीएमसी फीट जल पुदुचेरी को प्रदान किया जाएगा।

तमिलनाडु द्वारा पूर्व में दायर स्पेशल लीव पीटीशन (एसएलपी) के प्रत्युत्तर में, सर्वोच्च न्यायालय ने 10 मई, 2013 को भारत सरकार के ट्रिब्यूनल के आदेश में कथित कावेरी प्रबंधन बोर्ड का गठन नहीं हो जाने तक कावेरी ट्रिब्यूनल के आदेश का क्रियान्वयन कराने के लिए एक अस्थायी पर्यवेक्षक समिति की स्थापना करने का अंतरिम निर्देश दिया। भारत सरकार ने 22 मई, 2013 को भारत के राजपत्र में अधिसूचना जारी करके कथित पर्यवेक्षक समिति की स्थापना की।

कृष्णा नदी जल विवाद

कृष्णा नदी का पानी आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के बीच विवाद कृा एक कारण है। यह नदी महाबलेश्वर से निकलकर महाराष्ट्र के सतारा व सांगली जिलों से होकर कर्नाटक व दक्षिणी आंध्र प्रदेश में बहती है। कृष्णा नदी कर्नाटक के 60 प्रतिशत भू-भाग को नम करते हुए राज्य के लगभग तीस लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचित करती है। स्वतंत्रता पूर्व कर्नाटक राज्य के निर्माण से पहले मैसूर राज्य कृष्णा नदी के लगभग 26 अरब घनफुट पानी का ही उपयोग कर पाता था। राज्य पुनर्गठन के बाद ज्यों-ज्यों राज्य में अधिकाधिक पानी का उपयोग शुरू हुआ आंध्र प्रदेश की ओर से विरोध के स्वर उठने लगे।

इस नदी के विवाद को निपटाने के लिए 1969 में बछावत न्यायाधिकरण का गठन हुआ, जिसने 1976 में अपना निर्णय दिया। निर्णय में कर्नाटक को 700 अरब घनफुट, आंध्र प्रदेश को 800 अरब घनफुट व महाराष्ट्र को 560 अरब घनफुट पानी के उपयोग की छूट दी गयी। किंतु न्यायाधिकरण के फैसले से भी विवाद का अंत नहीं हुआ। तटवर्ती राज्यों में सबसे निचले स्तर पर होने से आंध्र प्रदेश ने पानी का अतिरिक्त प्रयोग करते हुए तेलुगु गंगा योजना पर कार्य आरंभ कर दिया।

कृष्णा जल विवाद ट्रिब्यूनल (के.डब्ल्यू.डी.टी.) 2 अप्रैल, 2004 को गठित किया गया, ताकि अंतरराज्यीय नदी कृष्णा के जल का बंटवारा किया जा सके। अंतरराज्यीय नदी जल विवाद एक्ट, 1956 के तहत् के.डब्ल्यू.डी.टी. शब्द को 1 अप्रैल, 2009 तक विस्तृत कर दिया गया है।

कृष्णा जल विवाद पंचाट ने संबद्ध राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश द्वारा अंतरिम राहत के लिए दायर आवेदन पर 9 जून, 2006 को निर्णय सुनाया और अंतरिम राहत प्रदान करने से इंकार करते हुए पंचाट से विवाद का हल प्राप्त करने के लिए कुछ नियमों की ओर इंगित किया। पंचाट ने सितंबर और अक्टूबर, 2006 को हुई सुनवाई में अपने सम्मुख विवाद के हल के लिए 29 मुद्दों की पहचान की है। पंचाट की सुनवाई जारी है। मामले के पक्ष राज्यों ने अब तक 108 अंतर्वादी आवेदन दायर किए हैं। अब तक दायर 106 अंतर्वादी आवेदनों का आवश्यक आदेश पारित करके निपटारा कर दिया गया है। साक्षी पक्ष राज्यों के मौखिक प्रमाण शामिल किए गए हैं।

अप्रैल 2004 में, द्वितीय कृष्णा जल विवाद ट्रिब्यूनल (के.डब्ल्यू.डी.टी.-II) का गठन भारत सरकार द्वारा सभी तीनों राज्यों (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र) के निवेदन पर किया गया। 16 जुलाई, 2007 से इस ट्रिब्यूनल ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

द्वितीय कृष्णा जलविवाद ट्रिब्यूनल ने 31 दिसंबर, 2010 को अपना ड्राफ्ट निर्णय दिया। उपलब्ध जल का आवंटन 65 प्रतिशत उपलब्धता पर निर्भर तथा विगत् 47 वर्षों के जल प्रवाह के रिकॉर्ड पर मनन पर निर्भर करता है। के.डब्ल्यू.डी.टी.-II के अनुसार, आंध्र प्रदेश को 1001 टीएमसी जल, कर्नाटक को 911 टीएमसी जल और महाराष्ट्र को 666 टीएमसी जल दिया जाना निश्चित किया गया। जल आवंटन का आगामी पुनरीक्षण वर्ष 2050 के पश्चात् किया जाएगा।

आंध्र प्रदेश द्वारा दायर स्पेशल लीव पीटीशन (एसएलपी) के प्रत्युत्तर में, सर्वोच्च न्यायालय ने 15 सितंबर, 2011 को भारत सरकार को निर्देश दिया कि वह के.डब्ल्यू.डी.टी.-II के अंतिम निर्णय को तब तक स्वीकार न करे जब तक कि वह इसका इस बात के लिए पुनरीक्षण न कर ले कि कहीं अंतरराष्ट्रीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 (2002 में संशोधित) का कोई उल्लंघन तो नहीं हुआ है।

29 नवम्बर, 2013 को न्यायाधीश बृजेश कुमार ट्रिब्यूनल ने अपना अंतिम निर्णय दिया, जिसमें पूर्व के ड्राफ्ट निर्णय में राज्यों को उपयोग हेतु जल के आवंटन में कोई व्यापक बदलाव नहीं किया गया। पर्यावरणीय प्रवाह एवं नमक निर्यात के लिए उपलब्ध वार्षिक रूप से औसत जल और नमक निर्यात के.डब्ल्यू.डी.टी.-II द्वारा 171 टीएमसी तक कम किया गया है।

आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत् संसद द्वारा के.डब्ल्यू.डी.टी. को विस्तारित किया गया। यह अधिनियम भी कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड के गठन का प्रावधान करता है जिसका मुख्यालय सीमांध्र या आंध्र प्रदेश में होगा।

आंध्र प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कृष्णा नदी विवाद ट्रिब्यूनल-II के निर्णय को कर्नाटक को अलमाटी बांध की ऊंचाई 519.6 मीटर से 524.25 मीटर बढ़ाने की अनुमति के आधार पर चुनौती दी।

29 नवम्बर, 2013 को अंतिम निर्णय के अनुसार, आंध्र प्रदेश को 1005 टीएमसी फीट जल, कर्नाटक को 907 टीएमसी फीट और महाराष्ट्र को 666 टीएमसी फीट जल प्राप्ति हेतु अधिकृत किया गया।

यह निर्णय वर्ष 2050 तक बाध्य होगा। ट्रिब्यूनल ने कहा कि केंद्र सरकार कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं आन्ध्र प्रदेश और साथ ही केंद्र को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देते हुए कृष्णा जल निर्णय क्रियान्वयन बोर्ड की नियुक्ति करे।

नर्मदा नदी जल विवाद

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में अमरकंटक से निकलती है। इसकी लम्बाई 1300 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 98796 वर्ग किलोमीटर है। गुजरात, मध्य प्रदेश व राजस्थान में नर्मदा के जल को लेकर विवाद है। अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत् केंद्र सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी को इसका अध्यक्ष बनाया गया। रामास्वामी न्यायाधिकरण ने 7 दिसंबर, 1979 को अपना निर्णय दिया। इस निर्णय में नर्मदा जल विवाद से जुड़े राज्य-गुजरात को 90 लाख एकड़ फीट, मध्य प्रदेश को 182.5 लाख एकड़ फीट, महाराष्ट्र को 2.5 लाख एकड़ फीट जल उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। नर्मदा नदी पर बनने वाला सरदार सरोवर बांध भी विवादस्पद रहा है।

सोन नदी जल विवाद

सोन नदी जल विवाद तीन राज्यों-बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बीच है। 1973 में ही सोन व रिहन्द नदियों के जल विवाद के हल के लिए बाणसागर समझौता हुआ था। बिहार शुरू से ही इस समझौते के क्रियान्वयन पर आक्षेप लगाता रहा है। उल्लेखनीय है कि, समझौते के तहत् रिहन्द नदी का पूरा पानी बिहार को आवंटित किया गया था किंतु केंद्रीय उपक्रम एन.टी.पी.सी. और उत्तर प्रदेश सरकार रिहन्द जलाशय से बिहार के हिस्से का पानी इस्तेमाल करते रहे हैं। यह पानी सिंगरौली क्षेत्र के ताप विद्युत् गृहों को दिया जाता रहा, जिससे बिहार को जल की पर्याप्त मात्र नहीं मिल पायी।

बिहार का यह भी कहना है कि इंद्रपुरी बैराज पर सोन नदी के समूचे जल का 100 वर्षों से ज्यादा के उसके उपभोग के अधिकार को दरकिनार करके यह समझौता किया गया। यह विवाद सोन नदी की औसत वार्षिक जल उपलब्धि के निर्धारण पर भी केंद्रित रहा है। पहले तो इसकी वार्षिक जल उपलब्धि 123 लाख एकड़ फीट आंकी गयी, जबकि दो माह बाद ही उसे 142.50 लाख एकड़ फीट मान लिया गया। पुनः सोन नदी आयोग ने औसत जल की मात्रा को 154.80 लाख एकड़ फीट कर दिया। बिहार का कहना है कि जल उपलब्धि की मात्रा में लगातार वृद्धि दिखाकर मुख्यतः मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश को लाभ पहुंचाया गया।

यमुना जल विवाद

यमुना नदी जल के बंटवारे से संबंधित विवाद काफी पुराना है। इससे देश के पांच राज्य हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जुड़े हुए हैं। सबसे पहले यमुना जल समझौता 1954 में मात्र दो राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मध्य हुआ था, जिसके अंतर्गत यमुना जल में हरियाणा का हिस्सा 77 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश का हिस्सा 23 प्रतिशत निर्धारित किया गया था तथा राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के हिस्से का जिक्र तक नहीं आया था। इन राज्यों द्वारा भी अपने हिस्से की मांग के साथ ही विवाद गरमाने लगा।

फरवरी 1993 में हरियाणा एवं दिल्ली के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत् मुनाका से दिल्ली के लिए अतिरिक्त जल वाहक प्रणाली के निर्माण पर सहमति हुई। 12 मई, 1994 को जल संसाधन मंत्रालय और तत्कालीन जल संसाधन मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल के जोरदार प्रयासों से उक्त पांच राज्यों के बीच यमुना जल बंटवारे के बारे में एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत् हरियाणा को वर्षभर में 47.82 प्रतिशत (5.730 अरब घन मीटर), उत्तर प्रदेश को 33.65 प्रतिशत (4.032 अरब घन मीटर), राजस्थान को 9.84 प्रतिशत (1.119 अरब घन मीटर), राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को 6.24 प्रतिशत (0.724 अरब घन मीटर) तथा हिमाचल प्रदेश को 3.15 प्रतिशत (0.878 अरब घन मीटर) पानी मिलने की व्यवस्था की गयी है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि नदी के ऊपरी भाग में जब तक किसी जलाशय का निर्माण नहीं कर लिया जाता, तब तक के लिए उक्त समझौते में यमुना के जल के अंतरिम मौसमी आवंटन का प्रावधान रखा गया है। यह समझौता 2025 तक अमल में रहेगा। 2 सितम्बर, 1994 को हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में ऊपरी यमुना नदी बोर्ड के गठन के समझौते पर सहमति हुई। इस सहमति के आधार पर ही भारत सरकार ने 22 मार्च, 1995 को ऊपरी यमुना नदी बोर्ड (UYRB) का गठन किया। यह बोर्ड उक्त समझौते के सम्पूर्ण ढांचे के तहत सम्बंधित राज्यों में उपलब्ध जल प्रवाह के आवंटन का नियमन करता है।

1994 में हुए समझौते के प्रावधानों से सर्वाधिक लाभ दिल्ली को और सबसे अधिक घाटा हरियाणा को हुआ है। समझौते की धारा 7(3) में कहा गया है कि, यदि कभी भी पानी की मात्रा अनुमानित मात्रा से कम हो जाती है, तो सबसे पहले दिल्ली की पेयजल संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जायेगा, उसके बाद ही शेष पानी का बंटवारा होगा। किंतु दिल्ली में सदैव जल का अभाव बना रहता है। दिल्ली ने अपना हिस्सा बढ़ाने की मांग इस आधार पर की कि वह प्राप्त पानी का केवल 40 प्रतिशत भाग ही पीने में उपयोग करता है, शेष 8 प्रतिशत यमुना में चला जाता है, जिससे हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश लाभान्वित होते हैं अतः दिल्ली को ढाई गुणा ज्यादा पानी मिलना चाहिए। यह विवाद अभी भी जारी है।

गोदावरी नदी जल विवाद

गोदावरी प्रायद्वीप भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसका उद्गम नासिक जिले से होता है तथा इसकी लंबाई 1465 किलोमीटर है। गोदावरी का अपवाह क्षेत्र 312812 वर्ग किमी. है। गोदावरी का बेसिन क्षेत्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडीशा व आंध्र प्रदेश में फैला हुआ है। इन राज्यों के मध्य इस नदी के जल के बंटवारे को लेकर विवाद था। गोदावरी जल विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ने अप्रैल 1969 में न्यायमूर्ति बछावत की अध्यक्षता में एक न्यायाधिकरण का गठन किया। जब न्यायाधिकरण द्वारा गोदावरी जल विवाद के निपटारे के लिए कार्यवाही चल रही थी उसी दौरान 1975 में संबंधित राज्यों के बीच 1978-79 में कई सिंचाई परियोजनाओं के संबंध में द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय समझौते हुए। न्यायाधिकरण ने इन सभी समझौतों को संज्ञान में लेते हुए जुलाई 1980 में अपना अंतिम फैसला सुनाया। अंतरराज्यीय समझौतों के तहत् संबंधित राज्य गोदावरी और उसकी सहायक नदियों के जल का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र है, जबकि आंध्र प्रदेश बैठक के बाद इसके जल का इस्तेमाल कर सकता है।

इसी तरह द्विपक्षीय समझौतों में गोदावरी की कुछ निश्चित सहायक नदियों के जल के बंटवारे का उल्लेख है। समझौते में इंचामपल्ली और पोलावरम् जैसी कुछ परियोजनाओं के निर्माण का भी प्रावधान है। न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि पोलावरम् परियोजना से गोदावरी का 80 अरब घनफुट जल विजयवाड़ा तक कृष्णा नदी की ओर मोड़ा जाये। कृष्णा नदी में मोड़े गये जल का बंटवारा इस प्रकार होगा- आंध्र प्रदेश 45 अरब घनफुट तथा कर्नाटक और महाराष्ट्र 35 अरब घन फुट। इस फैसले के बाद भी गोदावरी के जल के संबंध में कई विवाद उठ चुके हैं।

1981 के समझौते का जन्म

नदी जल बंटवारे विवाद का पंजाब और इसके पड़ोसियों के बीच जन्म संभवतः राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के द्वारा हुआ, जिसके तहत् पंजाब एवं हरियाणा को दो पृथक् राज्य बनाया गया। 1966 के अधिनियम में दोनों राज्यों के भाखड़ा नांगल और व्यास प्रोजेक्ट से जल वितरण के संबंध में अधिकारों एवं दायित्वों को लेकर एक विशेष प्रावधान किया गया था। केंद्र द्वारा पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत् 1976 में अधिसूचना के द्वारा व्यवस्था स्थापित की गई जिसने विवाद को बढ़ावा दिया। इस अधिसूचना में, रावी-व्यास का 3.5 मिलियन एकड़ फीट जल हरियाणा को आवंटित किया गया। इस जल को अपनी भूमि पर लाने के लिए, एक जलवाहक का निर्माण करने पर विचार किया, जिसे सतलज यमुना लिंक (एसवाईएल) के नाम से जाना गया, जो हरियाणा तथा पंजाब दोनों में अवस्थित होगा। जबकि हरियाणा ने 1980 तक एसवाईएल का निर्माण अपनी भूमि पर कर दिया, पंजाब ने 1976 समझौते की एसवाईएल को उसकी भूमि पर जोड़ने हेतु निर्माण करने की समीक्षा की।1976 के आवंटन की समीक्षा का अनुसरण करते हुए, राजस्थान, हरियाणा तथा पंजाब के बीच रावी-व्यास जल विभाजन पर 1981 में एक त्रिपक्षीय समझौता हस्ताक्षरित किया गया।

सतलज-रावी-व्यास विवाद

सतलज, रावी और व्यास नदियों के जल बंटवारे से सम्बंधित विवाद मुख्यतया पंजाब और हरियाणा के बीच रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति और देश के विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के जल के बंटवारे के लिए एक जल समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत् सिंधु, झेलम एवं चिनाब नदियों का पानी पूरा पाकिस्तान के लिए तथा सतलज, रवि और व्यास नदियों का पानी भारत के इस्तेमाल के लिए निर्धारित किया गया। इसके अतिरिक्त इन नदियों के पानी के उपयोग के बदले भारत ने पाकिस्तान को 110 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि अदा की थी। संयुक्त पंजाब में नदी जल विवाद जैसी कोई बात नहीं थी। नवंबर 1966 में पंजाब के एक हिस्से को अलग कर नये राज्य हरियाणा की स्थापना की गयी। इसके बाद हरियाणा ने अपने हिस्से का पानी पंजाब से मांगा और यहीं से इन दोनों राज्यों के बीच नदी जल विवाद आरंभ हुआ।

अप्रैल 1970 में पंजाब एवं हरियाणा के बीच पानी के बंटवारे के लिए एक समिति बनायी गयी, जिसने अपनी रिपोर्ट में हरियाणा को 37.8 लाख एकड़ फीट पानी देने की सिफारिश की। इसके तुरंत बाद योजना आयोग ने हरियाणा को 37.4 लाख एकड़ फीट, पंजाब को, 32.6 लाख एकड़ फीट और दिल्ली को 2 लाख एकड़ फीट पानी देने की बात कही। इसके उपरांत विवाद सुलझता न देख तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 में एक पंचाट लागू किया, जिसमें हरियाणा और पंजाब का हिस्सा बराबर-बराबर (35 लाख एकड़ फीट) कर दिया और दिल्ली का हिस्सा 2 लाख एकड़ फीट रहने दिया। यह भी फैसला किया गया कि इन नदियों में 6.17 लाख एकड़ फीट पानी की उपलब्धता बढ़ायी जा सकती है। साथ ही सतलज-यमुना सम्पर्क नहर बनाने की बात हुई और 1982 में स्वयं इंदिरा गांधी ने इस नहर का शिलान्यास किया। इसके बाद दुर्गा प्रसाद धर पंचाट द्वारा भी इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की गयी, किंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

तदुपरांत पंजाब ने उक्त पंचाट के विरुद्ध और हरियाणा ने 1976 में उसके समर्थन में उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी।

केंद्र में इंदिरा गांधी के पुनः सत्तासीन होने के बाद बीच-बचाव करते हुए इन दोनों राज्यों ने न्यायालय से मामला वापस करवा लिया और दिसंबर 1981 में एक नया जल समझौता करवाया गया, जिसमें इन दोनों राज्यों के अतिरिक्त राजस्थान भी सम्मिलित हो गया। उस समय रावी-व्यास के पानी की उपलब्धता 171.7 लाख एकड़ फीट आंकी गयी। इस समझौते के आधार पर ही अप्रैल 1986 में केंद्र सरकार ने रावी-व्यास न्यायाधिकरण (इराडी आयोग) का गठन किया। इस न्यायाधिकरण ने पंजाब को 50 लाख एकड़ फीट और हरियाणा को 38.80 लाख एकड़ फीट पानी देने की सिफारिश की, जबकि हरियाणा 56 लाख एकड़ फीट की मांग कर रहा था। इसके पहले 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत् दोनों राज्यों के बीच पानी की पहले से तय मात्रा को बरकरार रखा गया था। पंजाब ने इराडी आयोग की सिफारिशों से अपनी असहमति जतायी, जबकि हरियाणा इसको लागू करने की मांग करने लगा। सतलज-रावी-व्यास नदियों के जल बंटवारे को लेकर अभी तक जितने भी समझौते हुए या न्यायाधिकरण और आयोग गठित किये गये, उन सभी में केंद्र एक मध्यस्थ के रूप में मौजूद रहा है, लेकिन अभी तक यह विवाद हल नहीं हो पाया है। जहां तक सतलज-यमुना सम्पर्क नहर का प्रश्न है वह भी इन राज्यों में हो रही पानी की राजनीति का शिकार हो गया।

अध्यक्षीय संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय को चार-बिंदुओं पर राष्ट्रपतीय संदर्भ ने इन पर मतों को प्राप्त किया-
1. क्या पंजाब समझौता उन्मूलन अधिनियम, 2004 तथा उसमें दिए गए प्रावधान भारत के संविधान के अनुरूप हैं।
2. क्या पंजाब समझौता उन्मूलन अधिनियम, 2004 और उसके प्रावधान, अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 14 के साथ, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 8 के साथ तथा उसके अधीन 24 मार्च, 1976 को जारी की गई अधिसूचना के अनुरूप हैं।
3. क्या पंजाब राज्य ने वैधतापूर्वक 31 दिसम्बर, 1981 के समझौते का उन्मूलन किया तथा रावी-व्यास जल बंटवारे से सम्बद्ध अन्य सभी समझौतों के तहत् इसके दायित्वों का निर्वहन किया गया।
4. क्या पंजाब राज्य ने, अधिनियम के प्रावधानों के संदर्भ में 15 जनवरी, 2002 को जारी निर्णय एवं डिक्री तथा 4 जून, 2004 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्णय एवं आदेश से उत्पन्न दायित्वों का निर्वहन किया।

संविधान का अनुच्छेद 143 भारत के राष्ट्रपति को निम्न परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श करने की प्राधिकृत करता है-
1. यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो किसी प्रकृति का और ऐसे व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा।
2. राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 के परंतुक में किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार के विवाद को, जो उक्त परंतुक में वर्णित है, राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और उच्चतम न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा।

One thought on “अंतर्राज्यीय जल बंटवारा विवाद Inter-State Water Sharing Disputes

  • September 30, 2016 at 8:11 pm
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    बहुत ही उत्कृष्ट लेख, विवाद के प्रमुख पहलुओं की जानकारी उल्लेखनीय है।

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