भारत पर मुस्लिम आक्रमण के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव Social And Cultural Impact of Muslim Invasion on India

अरबों और तुर्कों के भारत विजय से महत्त्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़े। देश में पहले भी कई आक्रमण हुये थे पर यह एक अलग किस्म का आक्रमण था। पुरानी भारतीय सभ्यता की पचाने की शक्ति इतनी विशाल थी कि इस देश पर प्रारम्भ में आक्रमण करने वाले यूनानी, शक तथा हूण इसकी जनसंख्या में विलीन हो गये तथा अपना व्यक्तित्व पूर्णत: खो बैठे। पर भारत के तुर्क-अफगान आक्रमणकारियों के साथ ऐसा नहीं हुआ। मुस्लिम आक्रमणों के साथ इस देश में ऐसे निश्चित सामाजिक एवं धार्मिक विचारों ने प्रवेश किया, जो मौलिक रूप में हिन्दुस्तान के विचारों से भिन्न थे तथा आक्रमणकारियों का मूल निवासियों में पूर्णत: विलीन होना सम्भव नहीं हुआ। कभी-कभी नवागन्तुकों एवं देशवासियों के बीच राजनैतिक सम्बन्ध नहीं हुआ। कभी-कभी नवागन्तुकों एवं देशवासियों के बीच राजनैतिक सम्बन्ध बुरी तरह शत्रुतापूर्ण हो जाता था। पर जब कभी दो प्रकार की सभ्यताएँ सदियों तक एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ सम्पर्क में आती हैं, तब दोनों का एक-दूसरे से प्रभावित होना अनिवार्य हो जाता है। इस प्रकार लम्बी अवधि तक संसर्ग, स्वधर्म छोड़ मुसलमान बनने वाले भारतीयों की संख्या-वृद्धि तथा भारत में अनेक उदार आन्दोलनों के प्रभाव के कारण हिन्दू तथा मुस्लिम समुदायों ने एक-दूसरे के विचारों तथा रीति-रिवाजों को अपना लिया। तूफान और दबाव के आंदोलित धरातल के नीचे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक एकता एवं सहिष्णुता की सुखदायी धारा बहने लगी। वास्तव में इस्लाम के भारत में प्रवेश करने के प्रारम्भिक काल से ही हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों एक-दूसरे की संस्कृति की प्रशंसा करते थे तथा मुस्लिम रहस्यवाद का एक स्त्रोत भारतीय था। प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान् एवं संत मध्ययुग में भारत में रहे तथा उन्होंने इस देश में इस्लामी दर्शन एवं रहस्यवाद के विचारों के प्रचार में सहायता की। पारस्परिक सहिष्णुता की स्वास्थ्यकर प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति मुस्लिम संतों- विशेष कर रहस्यवादी विचारधारा के संतों-के प्रति हिन्दुओं की बढ़ती हुई श्रद्धा एवं उसी के समान हिन्दू संतों के प्रति श्रद्धा दिखलाने की मुसलमानी प्रथा के रूप में हुई तथा इससे अन्त में सत्यपीर की सम्मिलित पूजा का आरम्भ हुआ। शायद इसी मित्रता की भावना के कारण इस युग में तथा आगे चलकर मुसलमानों का हिन्दू धर्म-ग्रहण तथा हिन्दुओं का अपने मूलधर्म में प्रत्यागमन सम्भव हुए। आपसी मेल की इच्छा के कारण ही हिन्दू (संस्कृत) धार्मिक साहित्य का कश्मीर के जैनुल आबेदीन तथा बंगाल के हुसैन शाह के मुस्लिम राजदरबारों में अध्ययन और अनुवाद या संक्षिप्तीकरण हुआ। और भी, मुस्लिम राजदरबार तथा मुस्लिम उपदेशक एवं संत भारतीय दर्शन (यथा योग और वेदांत), चिकित्सा-शास्त्र एवं ज्योतिष-शास्त्रविद्या के अध्ययन की ओर आकृष्ट हुए। उसी प्रकार हिन्दू ज्योतिषियों ने मुस्लिमों से पारिभाषिक शब्द, अक्षांश एवं देशान्तर की मुस्लिम गणना, पंचाग (ज़िच) के कुछ विषय तथा ताजिक नामक जन्मपत्र-सम्बन्धी विद्या की एक शाखा ली। चिकित्सा-शास्त्र में उन्होंने धातु सम्बन्धी तेजाबों का ज्ञान लिया और रसायन-शास्त्र की कुछ प्रक्रियाएँ सीखीं। उर्दू का विकास, फारसी, अरब तथा तुर्की शब्दों एवं विचारों का संस्कृत से उत्पन्न भाषाओं एवं धारणाओं के साथ मिलने का विकास,  हिन्दुओं एवं मुसलमानों के भाषा-सम्बन्धी समन्वय का एक प्रमाण है। कुछ मुसलमानों ने देशीय भाषाओं में हिन्दू जीवन एवं परम्परा-संबंधी विषयों पर लिखा। उदाहरणार्थ, मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्यिनी पर लिखा। हिन्दू लेखकों ने फारसी भाषा में मुस्लिम साहित्यिक परम्पराओं पर लिखा। उदाहरण के लिए, राय भानमल ने अपने इतिहास को फारसी में लिखा। अनेक मुसलमान कवियों ने हिन्दी में तथा हिन्दू कवियों ने उर्दू में रचनायें की। अमीर खुसरो कुछ हिन्दी ग्रन्थों का लेखक जाना जाता है। दो संस्कृतियों के बीच इस मिलावट से कला, वास्तुकला एवं संगीत में नयी शैलियाँ भी उत्पन्न हुई, जिनमे मूल तत्व पुराना हिन्दू रहा, पर समाप्ति तथा बाह्य रूप फारसी हो गया। तथा उद्देश्य मुस्लिम दरबारों का पूरा होता था। कुछ मुसलमानों ने, जो पहले कुलीन हिन्दू वंश के थे अथवा हिन्दू वातावरण में रहते थे, सती एवं जौहर के हिन्दू रिवाजों को अपना लिया। दोनों जातियों के शासक सदस्यों के बीच हुए अनेक पारस्परिक विवाहों से इस मेल-मिलाप में सहायता मिली तथा कुछ विवाह इस मेल-मिलाप के परिणाम स्वरूप भी हुए। इन अन्तर्जातीय विवाहों ने (यद्यपि इन में कुछ विजय की एक शर्त के रूप में थे और इसलिए उन पर बल-प्रयोग का धब्बा लगा हुआ था), दोनों जातियों के बीच के कड़वे मतभेदों को कम करने तथा एक के रिवाजों को दूसरे समुदाय में बोने में सहायता करने में, बहुत योगदान दिया।

राजनैतिक क्षेत्र में भी मेल एवं सहकारिता की भावना का अभाव नहीं था। गाँवों के हिन्दू मुखियों तथा मुनीमों के समान स्थानीय प्रशासन के मौजूद यंत्र को आवश्यकता के कारण बनाये रखने के अतिरिक्त, मुस्लिम राज्य अधिक संख्या में हिन्दुओं को नियुक्त करता था, जो शासन की विभिन्न शाखाओं में प्रधान बन जाते थे। उस प्रकार चदेरी के मेदिनी राय तथा उसके मित्र मालवा में उच्च पदों पर थे। बंगाल में हुसैन शाह ने हिन्दू अधिकारियों को नियुक्त किया, जिनमें सबसे अधिक प्रमुख पुरन्दर खाँ, रूप तथा सनातन थे। गोलकुंडा के सुल्तानों ने हिन्दुओं को मंत्रियों के रूप में नियुक्त किया। बीजापुर के युसूफ आदिल शः ने हिन्दुओं को उत्तरदायित्व के पद सौंपे तथा उसके राज्य के सरकारी कागज साधारणतः मराठी भाषा में रखे जाते थे। अकवर की हिन्दूपक्षीय उदार नीति के आने से पहलेही कश्मीर के सुलतान जैनुल आबेदीन ने यही चीज करके दिखला दी। बीजापुर के सुलतान इब्राहीम आदिल शाह की मुसलमान प्रजा, उसके अपने राज्य के हिन्दुओं के संरक्षण के कारण, उसका वर्णन जगदगुरु के रूप में करती थी। मुसलमानों के प्रति राजपूतों की शूरता के दृष्टान्त अप्राप्य नहीं हैं। इस प्रकार राजपूत वीर राणा सांगा ने अपने पराजित शत्रु मालवा के महमूद द्वितीय की स्वतंत्रता का सम्मान कर अपनी शूरता का परिचय दिया। सुल्तान नसिरूद्दीन द्वारा पराजित होकर कुतलुग खाँ ने सन्तूर के राणा वनपाल के यहाँ शरण ली। यह अच्छी तरह विदित है कि किस प्रकार रणथम्भोर के हमीर देव ने सुल्तान के क्रुद्ध होने का जोखिम उठाकर भी अलाउद्दीन खल्जी के एक विद्रोही सरदार को शरण दी। विजयनगर के सम्राटों तक ने, देव राय द्वितीय के समय से, अपनी सेना में मुसलमानों को नियुक्त किया तथा अपनी महान् राजधानी के अन्दर और बाहर इस्लाम के हित का संरक्षण किया। बीजापुर का एक प्रसिद्ध मुस्लिम सेनापति असद खाँ महानवमी उत्सव देखने के लिए एक बार, विजयनगर आमंत्रित किया गया था। बाबर के साथ युद्ध करने के समय राणा साँगा की सेना में उनके अधीन एक मुस्लिम दस्ता था। एक हिन्दू बनिया हेमू, जो आदिलशाह सूर के यहाँ प्रधानमंत्री पड़ तक पहुँच गया था, 1556 ई. में मुग़ल के साथ अफगानों के अंतिम महत्वपूर्ण युद्ध में अफगान सेना का अध्यक्ष तथा नेता था। अधिकारियों की ये नियुक्तियां सुभकामना की भावना की अपेक्षा राजनैतिक आवश्यकता के कारण अधिक हुई होगी। पर इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि इनसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच मेलजोल की वृद्धि में सहायता मिली। सच तो यह है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कलाकौशल, संगीत, चित्रकला, भवनों की शैलियों, वेशभूषा और खेल-कौतुक में इन दोनों जातियों के बीच मिलावट इतनी बढ़ गयी थी कि जब बाबर भारत आया तब वह उनके विचित्र हिन्दुस्तानी तरीके पर ध्यान देने को विवश हो गया। सर जान मार्शल ने उचित ही कहा है कि- मानव के इतिहास में शायद ही दो सभ्यताओं का ऐसा दृश्य देखा गया है, जो इतनी विशाल एवं दृढ़तापूर्वक विकसित हों, फिर भी मौलिक रूप से इतनी असमान हो जैसी कि मुस्लिम तथा हिन्दू सभ्यताएँ हैं तथा आपस में मिलती तथा मिश्रित होती हों। उनके बीच जो विषमताएँ थीं उनकी संस्कृति एवं धमों में जो विशेष विभिन्नताएँ थीं- वहीं उनके समाघात के इतिहास को अदभुत रूप से उपदेशपूर्ण बनाती हैं।

धार्मिक विचार और विश्वास

तुर्कों की उत्तर भारत की विजय के समय, भारत में अनेक धमाँ और सम्प्रदायों के लोग रहते थे। हिन्दू धर्म प्रमुख धर्म था, परन्तु यह अनेक जातियों और उपजातियों में विभाजित था। बौद्ध धर्म पतनोन्मुख था। राजस्थान, मध्य भारत और दक्षिण भारत में जैन धर्म लोकप्रिय था। देश में विविध देवी-देवताओं की पूजा का प्रचलन था। मूर्ति पूजा की प्रधानता थी। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ किये जाते थे और पशुओं की बलि भी चढ़ाई जाती थी।

महमूद गजनवी के आक्रमण के समय हिन्दुओं के धार्मिक विचारों और विश्वासों का चित्रण अलबेरूनी ने किया है। अलबेरूनी लिखता है कि हिन्दू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। जब तक आत्मा का परमात्मा से मिलन नहीं होता, आवागमन का चक्र बराबर चलता रहता है। परमात्मा के साथ एकाकार हो जाने का नाम ही मोक्ष है। अलबेरूनी को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि हिन्दू बाहरी संसार से सम्पर्क नहीं रखते हैं और अपने देश, धर्म और शास्त्र और ज्ञान को ही सवोंपरि मानते हैं । वह लिखता है- हिन्दू विश्वास करते है की उनके जैसा कोई देश नहीं, उनके जैसा कोई राष्ट्र नहीं, उनके राजाओं के समान कोई राजा नहीं, उनके जैसा कोई धर्म नहीं, उनके जैसा कोई शास्त्र नहीं। स्वभावतः वे जो कुछ जानते हैं, उसे व्यक्तिगत थाती बनाकर रखने की प्रवृत्ति रखते हैं और विदेशियों की बात तो दूर, अपने ही देश के किसी अन्य जाति के लोगों से उसको छिपा रखने का प्रत्येक सम्भव प्रयत्न करते हैं।

इस्लाम के भारत में आगमन के साथ स्थिति में परिवर्तन आया। तुर्क विजेता इस्लाम धर्म के मानने वाले थे। इस्लाम राजधर्म था। हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगा दिये गये। मन्दिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा का निषेध था। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया और धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहन दिया गया। इसके साथ-ही-साथ इस्लाम धर्म की सादगी का भी प्रभाव पड़ा और निम्न वर्ग के हिन्दुओं ने, जिनकी दशा हिन्दू समाज में दयनीय थी, इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।

यद्यपि प्रारम्भ में हिन्दुओं और मुसलमानों के सम्बन्ध कटु रहे, परन्तु लम्बे समय तक एक साथ रहने के कारण सहयोग और समन्वय की भावना का उदय हुआ। समन्वय की इस भावना में इस काल के भक्ति-आन्दोलन के सन्तों ने तथा सूफी सन्तों ने महान योगदान दिया।

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