भारत: प्रायद्वीपीय पठार India: Peninsular Plateau

यह सोलह लाख वर्ग कि.मी. में फैला एक अत्यंत प्राचीन भू-भाग है। त्रिभुजाकार आकृति वाला यह प्रदेश उत्तर में गंगा-सतलज मैदान तथा शेष तीन दिशाओं में समुद्र से घिरा हुआ है। यह देश का सबसे बड़ा भौतिक प्रदेश है। प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश गोण्डवाना भूमि का एक अंग है। इस पठार पर अनेक पर्वत स्थित हैं, जो लाखों वर्षों की मौसम-क्रिया से पूर्णतया प्रभावित हैं। ये पर्वत कई छोटे-छोटे पठारों में विभाजित हो गये हैं। यहां पर संकरी और चौड़ी नदी घाटियां भी हैं। इस प्रकार यह अनेक धरातलीय विभिन्नताओं से भरा पड़ा है।

इन पठारों की समुद्र तल से औसत ऊंचाई लगभग 600 मीटर है। इनका विस्तार उत्तर में राजस्थान से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी अंतरीप तक 1,700 कि.मी. लंबाई में और 1,400 कि.मी. की चौड़ाई तक है। इन क्षेत्रों के अंतर्गत कई राज्यों के भू-भाग आते हैं- मध्य प्रदेश, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी विहार, महाराष्ट्र, ओडीशा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आदि। प्राकृतिक दृष्टि से इसकी उत्तरी सीमा अरावली, कैमूर तथा राजमहल पहाड़ियों द्वारा निर्मित होती है। पूरब में पूर्वी घाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट इसकी सीमा है। हालांकि इसकी सीमा के बारे में विद्वानों द्वारा समय-समय पर अनेक विचार प्रस्तुत किए गए हैं, परंतु इन नवीन अध्ययनों के आधार पर भी इस बात की पुष्टि की गई है कि यह पठार हिमालय पर्वत श्रेणी के निर्माण से पहले काफी व्यापक रूप से फैला हुआ था। इन पठारों ने हिमालय के मोड़ों को प्रभावित किया है। पठार के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व दिशा में आगे की ओर निकले हुए भाग के कारण हिमालय दक्षिण की ओर मुड़ा हुआ दिखाई पड़ता है। यह पठार कई जगहों से काफी कटा हुआ तथा अनेक छोटे-छोटे पठारों और पहाड़ियों में विभाजित हो गया है। इसलिए, इस पठारी भाग के संबंध में विस्तृत रूप से अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

नर्मदा, सोन, आदि कई नदियों द्वारा इस पठार की कई छोटे-छोटे पठारों में बांट दिया गया है। नर्मदा के उत्तर में मालवा का पठार तथा दक्षिण में दक्कन का पठार स्थित है। सोन नदी के पूर्व में छोटानागपुर पठार स्थित है। इसके अलावा विभिन्न नदियों के समीप ये पठार पाये जाते हैं।

प्रायद्वीपीय पठार से सम्बंधित प्रमुख तथ्य
1. कैम्ब्रियन कल्प से लेकर वर्तमान समय तक भारत के प्रायद्वीपीय स्थल में कोई परिवर्तन नहीं आया। कुछ समय हेतु इसके तटीय क्षेत्र समुद्र में डूब गये थे।
2. कैंब्रियन कल्प से लेकर पर्वतों के निर्माण की दीर्घ अवधि में हिमालय पर्वत समूह जल में डूबे रहे।
3. आद्य महाकल्प में पृथ्वी की सबसे पहले बनी चट्टानें शामिल हैं। प्रायद्वीप पर ये चट्टानें प्रमुखतः आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडीशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड व राजस्थान में प्राप्त होती है।
4. ठोस अवस्था में पाये जाने वाले विभिन्न खनिजों से चट्टानों का निर्माण होता है। प्रत्येक खनिज में दो या उससे अधिक साधारण रासायनिक तत्व होते हैं जिनसे सम्पूर्ण पृथ्वी का निर्माण हुआ है। लगभग 2000 खनिजों में से मात्र 12 सामान्य खनिज हैं जो प्रत्येक स्थान पर पाए जाते हैं। इन 12 खनिजों की चट्टान निर्माता खनिज भी कहते हैं।
5. विशाल मैदानों की उत्पत्ति लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व हुई।
6. भारत की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या विशाल मैदान के क्षेत्रों में निवास करती है।
7. छोटानागपुर के पठार में खनिजों की प्रचुरता है तथा इसे खनिजों का भंडार गृह भी कहा जाता है।
8. क्रिटेशियस तथा पूर्व टरशियरी काल में हुए ज्वालामुखी विस्फोट से निकले बेसिक लावा से दक्कन के पठार का निर्माण हुआ।

दक्कन का पठार

यह भारत का सबसे बड़ा पठार है। दक्कन का पठार त्रिकोणीय है तथा इसका विस्तार 7,005,000 वर्ग किमी. क्षेत्र में है। उत्तर में यह 3000 मीटर ऊंचा है तथा पश्चिम में 900 मीटर ऊंचा है। इसे महाराष्ट्र पठार भी कहते हैं। इस पठार के अंतर्गत महाराष्ट्र मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात तथा आंध्र प्रदेश राज्यों के भू-भाग आते हैं। इसकी उत्तरी सीमा ताप्ती नदी बनाती है और पश्चिम में पश्चिमी घाट। यह पठार बेसाल्ट चट्टानों से बना हुआ है। इन चट्टानों में खनिजों की प्रचुरता है तथा लोहा, अभ्रक, मैग्नेसाइट तथा बॉक्साइट इत्यादि खनिज पदार्थ पाये जाते हैं। गोदावरी नदी द्वारा इसे दो भाग में विभाजित किया गया है-तेलंगाना पठार एवं; कर्नाटक पठार।

तेलंगाना पठार गोदावरी नदी के उत्तरी भाग में स्थित वनों से आच्छादित पठार है। यहां पर वर्धा नदी बहती है दक्षिणी भाग पर उर्मिल मैदान है, जिन पर सिंचाई के लिए तालाब बनाने हेतु उपयुक्त भूमि है। इसका निचला भाग समतल है, जिनमें बड़े-बड़े नगर मिलते हैं। हैदराबाद और सिकंदराबाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

कर्नाटक पठार को 600 मीटर की ऊंचाई वाली समुच्च रेखा दो भागों में विभाजित करती है- उत्तरी भाग और दक्षिणी भाग। उत्तरी भाग पर कृष्णा व तुंगभद्रा नदियां बहती हैं। यहां घाट-प्रभा व माल-प्रभा नदियां कृष्णा नदी में उसके दाएं भाग पर मिलती हैं। कर्नाटक पठार के दक्षिणी भाग को मैसूर पठार कहते हैं। यह दक्षिण भारत का उच्च सीमा वाला पठार है। सामान्यतया इसका ढाल पूरब की ओर है, जबकि उत्तरी भाग का ढाल उत्तर की ओर है। इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूरब में पूर्वी घाट स्थित हैं। नीलगिरि पहाड़ियों द्वारा इसकी दक्षिणी सीमा का निर्माण होता है। पश्चिमी भाग मालवाड़ के नाम से जाना जाता है, जो एक पहाड़ी क्षेत्र है। इसकी औसत ऊंचाई 1000 मीटर है। इस पहाड़ी क्षेत्र में काफी कटाव हैं। ढाल काफी तेज है और नदी घाटियां गहरी हैं। यह भाग वनों से पूर्णरूपेण आच्छादित है। पूरब की ओर का भाग उर्मिल मैदानों वाला है। मैसूर पठार की प्रमुख नदी कावेरी है। यहां पर ग्रेनाइट पहाड़ियां मिलती हैं, जो नीचे धंसी हुई होती हैं।

मालवा का पठार: यह पठार लावा द्वारा निर्मित काली मिट्टी का पठार है। इसका ढाल गंगा घाटी की ओर है। इसमें पारवती, बेतवा, माहि, चम्बल एवं कलि सिंध आदि नदियाँ प्रवाहित होते हुए यमुना में मिल जाती हैं।

औसतन 250 मीटर ऊंचे इन पठारों पर कहीं-कहीं उर्मिल मैदान मिलते हैं, जिनमें चपटी पहाड़ियां भी स्थित हैं। उदाहरणस्वरूप उत्तर में ग्वालियर की पहाड़ियां प्रमुख हैं। इस पठार की उत्तरी व उत्तर-पूर्वी सीमा पर बुंदेलखण्ड व बाघेलखण्ड के पठार स्थित हैं, परंतु पठार के उत्तर भांग को चंबल और उसकी सहायक नदियों ने बीहड़ खडु में परिवर्तित कर दिया है।

छोटानागपुर का पठार

यह पठार बिहार व झारखंड के गया, हजारीबाग और रांची आदि क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 700 मीटर है। महानदी, स्वर्ण रेखा, सोन और दामोदर आदि इस पठार की मुख्य नदियां हैं, जो गहरी घाटियों में प्रवाहित होकर अलग-अलग दिशाओं में फैल जाती हैं। सोन नदी पठार के उत्तर-पश्चिम से बहकर गंगा नदी में समाहित हो जाती है। दामोदर नदी पठार के मध्य भाग में पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। महानदी इसकी दक्षिणी सीमा है, जो दक्षिण-पूर्व में प्रवाहित होती है। इस पठार की उत्तरी सीमा राजमहल पहाड़ियां हैं। छोटानागपुर का पठार कई भागों में बंटा हुआ है। दामोदर नदी के उत्तर में कई पठार और पहाड़ियों के समूह मिलते हैं, जिनमें हजारीबाग तथा कोडरमा के पठार प्रमुख हैं। दामोदर नदी के दक्षिण में रांची का पठार स्थित है। रांची का पठार सामान्यतया समतल ही है, कुछ निचली पहाड़ियों को छोड़कर यहां पर ग्रेनाइट व नीस की चट्टानें पाई जाती हैं। इस समतल भाग पर ही रांची नगर अवस्थित है। इस नगर से नदियां चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। दामोदर घाटी अब एक भ्रंश के रूप में उपलब्ध है, जिसमें गोण्डवाना काल के निक्षेप हैं। खनिज पदार्थों की दृष्टि से इस पठार को काफी धनी माना जा सकता है। यहां पर भारत के प्रमुख खनिज बॉक्साइट, अभ्रक और कोयला आदि भारी मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त टंगस्टन, क्रोमाइट, चूना-पत्थर, चिकनी मिट्टी, क्वार्टज़, इमारती पत्थर, तांबा आदि भी यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। वन संपदा की दृष्टि से इस पठार का विशेष महत्व है। यहां पर सागवान, शीशम, साल, जामुन, सेमल व बांस आदि भी बहुतायत में पाये जाते हैं। खाद्यान्नों में चावल की खेती पहाड़ी ढालों व नदी घाटियों में की जाती है।

मेघालय का पठार: इसका निर्माण गोंडवाना काल के निक्षेपों से हुआ है। मेघालय के पठार का उत्तरी ढाल लम्बवत है जहां से ब्रह्मपुत्र नदी बहती है तथा दक्षिणी ढाल धीमा है।

बुन्देलखंड का पठार: यह पठार ग्वालियर पठार व विंध्याचल श्रेणी के बीच में फैला हुआ है। इसकी ऊंचाई लगभग 300-600 मीटर के मध्य है। इसे बाघेलखंड का पठार भी कहते हैं।

प्राचीनतम बुंदेलखण्ड नीस से निर्मित है और इस पर सोपानी वेदिकाएं भी मिलती हैं। इसके इर्द-गिर्द ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर के टीले एवं पहाड़ियां भी मिलती हैं।

बाघेलखण्ड का पठार विंध्यन श्रेणी के कैमूर और भारनेर पहाड़ियों के पूर्व में स्थित है। इसके उत्तर में सोनपुर पहाड़ियां तथा दक्षिण में रामगढ़ पहाड़ियां हैं। बाघेलखण्ड का मध्य भाग क्रमशः ऊंचा होता हुआ पूरब से पश्चिम की ओर फैल गया है। यहां पश्चिमी भाग में बलुआ पत्थर व चूने का पत्थर तथा पूर्वी भाग में ग्रेनाइट की चट्टानें पाई जाती हैं।

प्रायद्वीपीय पठार की पर्वत श्रेणियां

प्रायद्वीपीय पठार की पर्वत श्रेणियों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है-

विंध्याचल: विंध्याचल श्रेणी का विस्तार अव्यवस्थित रूप में है। यह नर्मदा नदी के साथ-साथ पश्चिम की ओर गुजरात से आरंभ होकर उसके समानांतर पूर्व दिशा में बढ़ती हुई उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती है तथा अंततः उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर तक अपना विस्तार प्राप्त करती है। विंध्याचल पर्वतमाला-विंध्याचल, भारनेर, कैमूर तथा पारसनाथ की पहाड़ियों का सम्मिलित रूप है। विंध्याचल पर्वत में परतदार चट्टानें (लाल व बलुआ पत्थरों से युक्त) मिलती हैं। विंध्याचल पर्वत ही उत्तरी और दक्षिण भारत को एक-दूसरे से स्पष्ट रूप से अलग करता है। इस पर्वत की औसत ऊंचाई 900 मीटर है।

सतपुड़ा: यह पर्वतमाला नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच पश्चिम में राजपीपला की पहाड़ियों से आरंभ होकर छोटानागपुर के पठार तक विस्तृत है। महादेव और मैकाल पहाड़ियां भी सतपुड़ा पर्वतमाला के अंतर्गत ही हैं। सतपुड़ा पर्वतमाला का भौगोलिक विस्तार 21° से 24° उत्तरी अक्षांश के बीच है और इसकी औसत ऊंचाई 760 मीटर है। 1350 मीटर ऊंची धूपगढ़ चोटी सतपुड़ा की सबसे ऊंची चोटी है। यह चोटी महादेव पहाड़ी पर स्थित है। सतपुड़ा की अमरकंटक चोटी (1,066 मीटर) से ही नर्मदा नदी का उद्गम होता है। सतपुड़ा पर्वतमाला के अंतर्गत जबलपुर के समीप धुंआधार जल-प्रपात सर्वाधिक प्रसिद्ध है। सतपुड़ा से संगमरमर की चट्टानें प्राप्त होती हैं।

अरावली: अरावली पर्वत श्रेणी अहमदाबाद के समीप राजस्थान के मरुस्थल की पूर्वी सीमा से लेकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम तक विस्तृत है। अरावली पर्वतमाला की कुल लंबाई लगभग 880 किलोमीटर है। आबू के निकट गुरुशिखर (1,772 मी.) अरावली की सबसे ऊंची चोटी है। अरावली की औसत ऊंचाई 300 से 900 मीटर के बीच है। अरावली श्रेणी जल विभाजक के रूप में कार्य करती है। इसके पश्चिम की ओर माही तथा लूनी नदियां निकलती हैं, जो अरब सागर में गिरती हैं। पूर्व की ओर मुख्य रूप से बनास नदी निकलती है, जो चंबल की सहायक नदी का कार्य करती है। ये सभी नदियां अस्थाई (मौसमी) हैं।

पशिचमी घाट या सह्याद्री

पश्चिमी घाट, दक्कन पठार की पश्चिम सीमा से पश्चिमी तट के समानांतर विस्तृत है। यह उत्तर में ताप्ती नदी घाटी से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक 1,600 कि.मी. की लंबाई में विस्तृत है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से पश्चिमी घाट को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है-

  1. उत्तरी सह्याद्री
  2. मध्य सह्याद्री
  3. दक्षिण सह्याद्री

उत्तरी सह्याद्री: ताप्ती नदी से शुरू होकर मालप्रभा नदी के उद्गम स्थल तक 650 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत है। उत्तरी सह्याद्री की औसत ऊंचाई 550 मीटर है। यहीं से गोदावरी, भीमा, कृष्णा एवं उर्रा नदियों का उद्गम होता है। कलसुबाई (1,646 मीटर), सालहेर (1,567 मीटर) तथा महाबलेश्वर (1,438 मी.) उत्तरी सह्याद्री की प्रमुख चोटियां हैं। थालघाट (581 मीटर) और भोरघाट (680 मीटर) उत्तरी सह्याद्री के दो प्रमुख दर्रे हैं। मुम्बई से कोलकाता का मार्ग भोरघाट दर्रे से ही बनता है।

मध्य सह्याद्री: मालप्रभा नदी के उद्गम स्थल से लेकर पालघाट दर्रे के बीच 650 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत है। यह भाग काफी उबड़-खाबड़ धरातल वाला है तथा वनों से आच्छादित है। मध्य सह्याद्री की औसत ऊंचाई 1,220 मीटर है। कुद्रेमुख (1,892 मीटर) और पुष्पगिरि (1,794 मीटर) यहां की प्रमुख चोटियां हैं। मध्य सह्याद्रि की चट्टानें ग्रेनाइट और नीस प्रकार की हैं। इसके पूर्व की ओर तुंगभद्रा और कावेरी नदियाँ प्रावधि होती हैं।

दक्षिण सह्याद्री नीलगिरि पहाड़ियों से लेकर कन्याकुमारी तक 290 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत है। इस भाग में नीलगिरि पहाड़ी के साथ-साथ अन्नामलाई की पहाड़ी भी हैं। अन्नाईमुड़ी (2,695 मीटर) दक्षिणी सह्याद्री की सबसे ऊंची चोटी है। दक्षिणी सह्याद्री के उत्तर-पूर्व में पालनी की पहाड़ियां हैं तथा दक्षिण में इलायची की पहाड़ियां हैं।

पूर्वी घाट: पूर्वी घाट का विस्तार 1,300 किलोमीटर की लंबाई में महानदी से लेकर नीलगिरि की पहाड़ियों तक है। पूर्वी घाट की औसत ऊंचाई 615 मीटर है। पूर्वी घाट के के अंतर्गत दक्षिण से उत्तर की ओर पहाड़ियों को निल्गीती, पल्कोंदा, अन्नामलाई, जावदा और शिवराय की पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा के बीच पूर्वी घाट का स्तर समान हो गया है। विशाखापट्टनम (1,680 मीटर) पूर्वी घाट का सबसे ऊंचा स्थल है और इसके बाद महेंद्रगिरि (1,501 मीटर) सबसे ऊंची चोटी है। पूर्वी घाट का निर्माण चार्कोनाइट्स और खोंडालाइट्स चट्टानों से हुआ है। पूर्वी घाट में चंदन के वन भी मिलते हैं। कावेरी नदी द्वारा निर्मित होजेकल जल-प्रपात पूर्वी घाट में ही है।

पश्चिमी एवं पूर्वी घाट के मध्य विभिन्नताएं
पश्चिमी घाटपूर्वी घाट
यह तापी नदी से कन्याकुमारी तक उत्तर-दक्षिण दिशा में पश्चिमी किनारे के समानांतर फैला हुआ है।यह ओडीशा से नीलगिरी पहाड़ियों तक पूर्वी किनारे के समानांतर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैला हुआ है।
यह पूर्वी घाट के मुकाबले संकीर्ण है, तथा इसकी औसत चौड़ाई 50-80 किलोमीटर है।पश्चिमी घाट से अधिक चौड़ा है, तथा इसकी औसत चौड़ाई 100-200 किलोमीटर है।
यहां पर उच्चावच समुद्र स्तर से 900 से 1,100 मीटर ऊपर हैयहां पर औसत उच्चावच समुद्र स्तर से 600 मीटर हैं।
इसमें दर्रों से होकर निरंतर जाया जा सकता है।इसे बड़ी नदियों द्वारा विभिन्न भागों में विभाजित किया जाता है।
इसमें संरचनात्मक एकबद्धता है।यहां पर संरचनात्मक एकबद्धता नहीं है।
पश्चिमी घाट कई बड़ी नदियों का उद्गम है।पूर्वी घाट में किसी बड़ी नदी का उद्गम नहीं होता।
अरब सागर से आने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के लंबरूप दिशा में पश्चिमी घाट आता है, जिस कारण पश्चिम तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है।पूर्वी घाट बंगाल की खाड़ी से आने वाले मानसून के बेहद समानांतर दिशा में होता है, इसलिए यहां पर अधिक वर्षण नहीं होता है।

प्रायद्वीपीय भूखंड भूगर्भिक रूप से अत्यंत समृद्ध हैं तथा यहां अनेक प्रकार के धात्विक व अधात्विक खनिज पाये जाते हैं। खनिजों का सबसे बड़ा अंश छोटानागपुर पठार में पाया जाता है।

प्रायद्वीपीय पठार के महत्व Importance of Peninsular Plateau

प्रायद्वीप की बेसाल्ट चट्टानों से प्राप्त होने वाली काली मिट्टी कपास और गन्ना की फसलों के लिए अत्यंत लाभदायक होती है। प्रायद्वीप स्थलाकृति जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन हेतु भी अनुकूल मानी जाती हैं, क्योंकि अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियां अपने प्रवाह मार्ग में अनेक प्रपात बनाती हैं। किंतु इन नदियों की मौसमी प्रकृति के कारण जल-विद्युत उत्पादन की क्षमता काफी सीमित हो जाती है।

विन्ध्य पहाड़ियां उत्तर एवं दक्षिण भारत के मध्य एक प्राकृतिक जल विभाजक का कार्य करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप विंध्याचल के दक्षिण में स्थित भू-भाग के लोगों ने अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान (क्षेत्रीय विभेदों सहित) विकसित की है।

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