भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध India-Pakistan Relations

भारत और पाकिस्तान के संबंधों की पृष्ठभूमि भावनात्मक लगाव एवं अप्रत्यक्ष घटनाओं का इतिहास है। निकटतम पड़ोसी होने के बावजूद पाकिस्तान अपनी भारत-विरोधी एवं विधटनकारी नीतियों के कारण भारत से लगातार दूर होता गया। वर्तमान में आतंकवाद एवं कश्मीर विवाद से दोनों देशों के संबंध कड़वाहट से भर गए। भारत ने पाकिस्तान के साथ शांति, मित्रता एवं सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित करने के लिए सदैव गंभीर प्रयास किये हैं। किंतु पाकिस्तान द्वारा सदैव नकारात्मक प्रत्युत्तर दिया गया। वाजपेयी द्वारा की गयी लाहौरबस यात्रा तथा लाहौर घोषणा का जवाब कारगिल घुसपैठ के रूप में दिया गया। कारगिल प्रकरण से भारत की एक जिम्मेदार राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय छवि को और अधिक मजबूती प्राप्त हुई। कारगिल संघर्ष के बाद भी पाकिस्तान द्वारा भारत विरोधी दुष्प्रचार करना तथा सीमापार आतंकवाद को समर्थन देना जारी है समझौता एक्सप्रेस, दिल्ली-लाहौर बस सेवा के जारी रहने, तीर्थ यात्रियों तथा सांस्कृतिक कर्मियों के आवागमन से जनता के स्तर पर परस्पर सम्पर्क कायम हुआ है। पाकिस्तान के प्रति अपनायी गयी नरम नीति से सैन्य मनोबल में कमी, आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन तथा भारतीय जन-सामान्य में निराशावाद जैसे नकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं, किंतु इस नरम प्रकार की कूटनति ने पाकिस्तान के वास्तविक मंसूबों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया है। डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नयी सरकारने भी पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने पर जोर दिया। इसी संदर्भ में 24 सितम्बर, 2004 को न्यूयॉर्क में भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह व पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के मध्य शिखर वार्ता हुई। 26 नवम्बर, 2008 को मुंबई पर आतंकवादी हमलों और इस हमले में पाकिस्तान के तत्वों की संलिप्तता के कारण द्वि पक्षीय वार्ता प्रक्रिया को रोक दिया गया। 26/11 के आतंकी हमले के पश्चात् भारत-पाक संबंध अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। इस संबंध में भारत ने पाकिस्तान को स्पष्ट शब्दों में बता दिया है कि हमले में साजिश रचने वाले आतंकी समूहों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करे अन्यथा उससे कोई वार्ता नहीं की जाएगी।

भारत-पाक के मध्य मुख्य विवादित मुद्दे

सियाचीन मुद्दा

समुद्र तल से 6300 मीटर की ऊंचाई पर 76.4 किमी. लंबा सियाचीन विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है। भारत ने 1948 में सर्वप्रथम इस क्षेत्र में अपनी सेना भेजी क्योंकि पाकिस्तान इस क्षेत्र में पाना पर्वतारोहण दल हेजकर अपना दावा पेश कर रहा था। तत्पश्चात भारत ने इस दिशा में आपरेशन मेघदूत चलाया जो अब तक जारी है। इस मुद्दे पर दोनों देशों के मध्य 1986 से लेकर अब तक वार्ता के नौ असफल दौर हो चुके हैं। पाकिस्तान चाहता है कि भारत 1984 से पहले की स्थिति बहाल करे। इस समय सियाचीन का दो-तिहाई क्षेत्र भारत के अधिकार क्षेत्र में है।

सर क्रीक मुद्दा

गुजरात एवं सिंध प्रांत के मध्य अरब सागर में कच्छ में 60 किमी. क्षेत्र का एक ज्वारनदमुख है। पाकिस्तान द्वारा 1965 में कच्छ के रण के आधे भाग पर अपना दावा प्रस्तुत कर सरक्रीक का विवादित स्वरूप स्पष्ट किया। विवाद को सुलझाने हेतु स्वीडन के न्यायविद गुन्नार ग्रेन की अध्यक्षता में एक भारत-पाक पश्चिमी सीमा अधिकरण स्थापित किया गया। अधिकरण ने पाकिस्तान के इस तर्ज को ख़ारिज कर दिया कि सर क्रीक की रेखा पूर्व की ओर मुड़ती है और उसका 3500 मील का दावा खारिज हो गया। अधिकरण ने कच्छ के रन में 300 वर्गमील पर पाकिस्तान के स्वामित्व को स्वीकार किया। भारत ने यह फैसला स्वीकार किया जबकि पाकिस्तान ने इसे मानने से इंकार कर दिया। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय के प्रावधानों के अंतर्गत दोनों देशों को 2009 तक इसे सुलझाना लेना चाहिए अन्यथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र घोषित कर दिया जाएगा।

तुलबुल परियोजना मुद्दा

भारत सरकार द्वारा तुलबुल नौ परिवहन परियोजना 1984 में आरंभ की गई थी। इसके अंतर्गत जम्मू कश्मीर राज्य की झेलम नदी पर बांध निर्माण की परियोजना है। 1987 में पाकिस्तान की आपति के पश्चात् इसका निर्माण कार्य स्यगित कर दिया गया। पाकिस्तान का तर्क है की भारत बांध निर्माण के माध्यम से नदी जल का भंडारण करेगा जो कि सिंधु जल संधि, 1960 का उल्लंघन है। कई वार्ता दौरों के परिणामस्वरूप जल भंडारण एवं बांध की ऊंचाई को लेकर सहमति के बावजूद पाकिस्तान की बदनीयती के कारण निर्माण कार्य नहीं हो पा रहा है एवं यह परियोजना पिछले कई वर्षों से अधर में लटकी हुई है।

गौरतलब है कि विश्व समुदाय इस समय भारत के रूख से सहमत है एवं पाकिस्तान पर आंतकियों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने का दबाव पड़ रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस जैसे देशों ने भारतीय संयम की सराहना करते हुए उन्हें यह आश्वासन दिया कि, वे भारत की हर संभव मदद के लिए तैयार हैं। विश्व समुदाय के कड़े रुख को देखते हुए पाकिस्तान ने न चाहते हुए भी आतंकी संगठनों के खिलाफ कदम उठाए। अमेरिकी दबाव के चलते पाकिस्तान ने उत्तरी वजोरिस्तान एवं स्वात घाटी में तालिबान के विरुद्ध सैन्य अभियान भी शुरू किया है। आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान की कार्रवाई एवं प्रतिबद्धता को देखते हुए एक बार फिर भारत ने पाकिस्तान के साथ वार्ता का दौर शुरू किया। इस दिशा में 25 फरवरी, 2010को भारत-पाक विदेश सचिवों क्रमशः निरूपमा राव एवं सलमान बशीर के मध्य बातचीत हुई। इस वार्ता में मुख्य रूप से आतंकवाद, कश्मीर मुद्दे, जल-विवाद एवं बलूचिस्तान मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। हालांकि पाकिस्तान के विदेश सचिव ने कहा कि समर्थन जारी रखेगा। कुल मिलाकर उम्मीद के मुताबिक भारत और पाकिस्तान के मध्य यह वार्ता भी बेनतीजा रही। अब देखना यह है कि पाकिस्तान आतंक के विरुद्ध अपनी प्रतिबद्धता पर कहां तक कायम रहता है।

भारत पाकिस्तान के साथ एक शांतिपूर्ण संबंध चाहता है। अप्रैल, 2010 में थिम्पू में आयोजित बैठक में दोनों प्रधानमंत्रियों द्वारा दिए गए एवं विश्वास का संवर्द्धन करने के लिए कदमों पर चर्चा करने के लिए दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने मुलाकात की। फरवरी 6,2011 को थिम्पू में दोनों देश के विदेश सचिवों ने बैठक की तथा सभी मुद्दों पर संवाद प्रारंभ करने के लिए सहमत हुए।

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