भारत: भू-आकृति विज्ञान India: Geomorphology

मानव इतिहास की भांति ही भू-वैज्ञानिक इतिहास को भी विभिन्न कालों में विभाजित किया गया है। भू-आकृति विज्ञान के अंतर्गत धरातल पर पायी जाने वाली स्थलाकृतियों तथा उनकी उत्पत्ति में सहायक प्रक्रमों, बलों तथा उनके विकास का अध्ययन किया जाता है। भू-आकृति विज्ञान को प्रायः भू-विज्ञान की एक शाखा माना जाता है।

जहां तक भूतत्वीय संरचना के इतिहास का प्रश्न है तो इसे मानव के इतिहास के समान माना जा सकता है। जिस प्रकार मानव का इतिहास पाषाण युग, लौह युग, ताम्र युग आदि कई युगों से होकर गुजरा है, ठीक उसी प्रकार विश्व की भूतत्वीय संरचना को भी कई अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ा है। इसके इतिहास को करोड़ों वर्ष पुराना माना जा सकता है। करोड़ों वर्ष पुराने इस इतिहास को उनकी राशियों के अनुसार कई खण्डों में बांटा जाता है, जिन्हें समूह कहते हैं। समूह के उपभाग को क्रमशः उपसमूह, समुदाय और उपसमुदाय कहते हैं। इनसे संबंधित भू-तात्विक कालों के भाग कल्प, युग शक और काल कहलाते हैं।

भौगोलिक इतिहास एवं संरचना

वस्तुतः भू विज्ञान के अंतर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, संघटन तथा इतिहास का अध्ययन किया जाता है। भू-वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी के इतिहास के विभिन्न चरणों को भिन्न-भिन्न नाम प्रदान किए गये हैं। प्रायः कल्पों के नाम उन स्थानों के नाम पर रखे गए हैं जहां से कल्प-विशेष के शैल प्राप्त हुए हैं। महाकल्प समय का प्राथमिक अंतराल है और कल्प द्वितीय अंतराल। महाकल्प काल में बने शैलों को शैल संघ और कल्प काल में बने शैलों को शैल समूह कहते हैं। मानक भू-वैज्ञानिक महाकल्प हैं- प्राक्-कैंब्रियन (57 करोड़ वर्ष से प्राचीन), पुराजीव (24.5 से 57 करोड़ वर्ष प्राचीन), मध्यजीव (6.6 से 24.5 करोड़ वर्ष प्राचीन) तथा नूतनजीव (6.6 करोड़ वर्ष प्राचीन से लेकर अर्वाचीन काल तक)। देश की मिट्टी एवं खनिज संसाधनों पर शैलों की संरचना का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। हिमालय की तलछट चट्टानों को काटने के बाद ही नदियों ने गंगा के उपजाऊ मैदान का निर्माण किया और तलछट के जमाव से निर्मित भूमि कृषि हेतु उर्वर होती है। इसके विपरीत प्राचीन चट्टानों की भूमि पर निर्मित मिट्टी में उर्वरता कम होती है किंतु खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं, उदाहरणार्थ प्राचीन आर्कियन चट्टानें लोहे एवं सोने के भंडार हेतु सर्वोत्तम हैं। इसी तरह कार्बनीफेरस युग की चट्टानों में कोयले की प्राप्ति बहुतायत में होती है। इसी तरह सागरों के निक्षेप द्वारा निर्मित चट्टानों में खनिज तेल के भंडार प्राप्त होने की संभावना होती है। भारत में अंकलेश्वर व खंभात में इस प्रकार की चट्टानें मिलती हैं जहां से पेट्रोलियम की प्राप्ति होती है। इस प्रकार चट्टानों के समुचित अध्ययन से विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों व मिट्टियों की बनावट इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जब कोयला, लोहा इत्यादि खनिज औद्योगिक विकास का आधार हो तथा संपूर्ण कृषि-प्रणाली मिट्टी पर निर्भर होती है।

भारत के भूगर्भिक इतिहास के अनुसार यहां प्राचीनतम चट्टानों से लेकर नवीनतम चट्टानें तक पाई जाती हैं। जहां भारत में आर्कियन एवं प्री-कैम्ब्रियन युग की चट्टानें पाई जाती हैं, जिसकी प्राचीनता की समानता भारत की प्राचीनता से की जा सकती है तो दूसरी ओर क्वाटरनरी युग की नवीनतम चट्टानें कांप मिट्टी के परतदार निक्षपों के रूप में भी पाई जाती हैं। इन भूतत्वीय भिन्नताओं ने भारत के तीन स्पष्ट भागों को प्रकट किया है, जिसमें प्रथम, प्रायद्वीपीय भारत का प्राचीन भूखण्ड है, जो प्राचीनतम से लेकर प्राचीन चट्टानों से निर्मित है। यह गोंडवाना लैण्ड का भाग है। द्वितीय हिमालय पर्वत और उससे सम्बद्ध नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियां हैं। जो प्रायद्वीपीय भारत की अपेक्षा अधिक नई चट्टानों को रखती है। इस प्रकार के चट्टानों का निर्माण समुद्र की तलछट से हुआ है। तृतीय, सिंधु-गंगा मैदान है, जिसका निर्माण पर्वत श्रेणियों के निर्माण के बाद हुआ। सिंधु-गंगा मैदान का निर्माण हिमालय पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली नदियों द्वारा बहाकर लाए गए निक्षेप से हुआ है। स्पष्टतः उपर्युक्त तीनों भौतिक प्रदेशों का निर्माण क्रमिक रूप से हुआ है अर्थात् एक के बाद दूसरे का निर्माण हुआ है। इसलिए, भारत के भूगर्भिक अध्ययन का अत्यंत महत्व हैं।

भू-वैज्ञानिक कल्प व भौतिक रूप

भू-गर्भवेत्ताओं द्वारा भारत के भू-वैज्ञानिक कल्प को चार चरणों में विभाजित किया गया है:

  1. आद्य महाकल्प (पूर्व प्राक् कैंब्रियन)।
  2. पुराण महाकल्प (अपर प्राक् कैंब्रियन)।
  3. द्रविड महाकल्प ।
  4. आर्य महाकल्प ।

उल्लेखनीय है कि भारतीय उप-महाद्वीप का वर्तमान रूप विशाल शैल समूहों के संघटन का परिणाम है। इस प्रकार भारत को स्थूल रूप से मुख्यतः तीन भू-वैज्ञानिक इकाइयों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  1. प्रायद्वीपीय पठार (प्राचीनतम शैलों से निर्मित) ।
  2. हिमालय पर्वत (नवीन अवसादी शैलों से निर्मित) ।
  3. सिंधु-गंगा के मैदान (नवीन जलोढ़ के निक्षेपों से निर्मित)।

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