भारत-अमेरिका सम्बन्ध India-America Relations

पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका द्वारा भारत के खिलाफ कई आर्थिक प्रतिबंध आरोपित कर दिये गये थे। किंतु कुछ समयांतराल पश्चात् ही दोनों देशों के आपसी संबंधन केवल सामान्य बल्कि अभूतपूर्व ढंग से घनिष्ठ हो गये। मार्च 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति विल क्लिंटन द्वारा भारत को यात्रा की गयी यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने माना कि दोनों देश नई सदी की ओर समान ढंग से देखते हैं। कुछ समय बाद ही क्लिंटन प्रशासन द्वारा भारत पर आरोपित अधिकांश प्रतिबंध उठा लिए गये। भारत-अमेरिकी अंतर्निर्भरता को बढ़ाने में अमेरिका स्थित सफल भारतीय समुदाय की भूमिका अति महत्वपूर्ण रही है। दोनों देशों के मध्य विचारों के नियमित आदान-प्रदान हेतु एक संस्थागत तंत्र भी निर्मित किया गया। सितंबर 2000 में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा अमेरिका की यात्रा की गयी। उन्होंने कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित किया और सार्वभौमिक व राज्य समर्थित आतंकवाद को समाप्त करने हेतु दोनों देशों द्वारा एकजुट प्रयास करने का आह्वान किया। दोनों देशों के बीच आर्थिक-व्यापारिक कार्य-कलापों में भी कई गुना वृद्धि हुई। भारत-अमेरिका के बीच बढ़ती निकटता ने पाकिस्तान के पक्ष में मौजूद अंतरराष्ट्रीय समर्थन की अत्यंत क्षीण बना दिया है।

वर्ष 2004-05 के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में गहन क्रिया-कलाप जारी रहे जो गुणात्मक परिवर्तन की दिशा में थे। साथ ही दोनों पक्षों ने भारत और अमेरिका के बीच सामरिक भागीदारी स्थापित करने के अपने संकल्प को दोहराया। दोनों पक्षों में संबंधों को और व्यापक, गहन तथा सुदृढ़ बनाने की वचनबद्धता है। यह बात भारत सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम और जून 2004 में संसद में दिये गये राष्ट्रपति के भाषण में परिलक्षित होती है। नवम्बर 2004 में राष्ट्रपति बुश के दुबारा चुने जाने के साथ ही अमेरिकी सरकार ने भारत और अमेरिका के बीच सामरिक भागीदारी को और मजबूत बनाने की वचनबद्धता व्यक्त की।

दोनों पक्षों द्वारा सामरिक मसले, रक्षा, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुकाबला, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शांति-रक्षा, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य, मसलों पर विस्तृत बातचीत की गई। दोनों पक्षों के बीच सभी स्तरों पर क्रियाकलाप सुचारू रूप से चलते रहे। जून 2004 में विदेश मंत्री की वाशिंगटन यात्रा और 7-8 जुलाई, 2004 तक आसियान क्षेत्रीय मंच की बैठक के दौरान तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल के साथ उनकी बातचीत से राजनैतिक स्तर पर प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित हुए। अमरीकी पक्ष से 13-14 जुलाई, 2004 तक अमेरिकी विदेश उप-मंत्री ने भारत-अमेरिकी संबंधों के सतत् विकास की पुष्टि के लिए भारत की यात्रा की। जून 2004 में नई दिल्ली में हुई रक्षा नीति दल की बैठक और जून 2004 में बंगलुरू में हुए भारत-अमेरिकी अंतरिक्ष सम्मेलन से सकारात्मक संदेश मिले।

संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन के अवसर पर 21 सितम्बर, 2004 को प्रधानमंत्री ने न्यूयॉर्क में राष्ट्रपति बुश से मुलाकात की। संयुक्त वक्तव्य, अमेरिका-भारत भागीदारीः सहयोग और विश्वास में उन्होंने कहा कि आज से पहले द्विपक्षीय संबंध इतने घनिष्ठ कभी नहीं थे और इससे भारत-अमेरिका सामरिक भागीदारी और विकास की दिशा निर्धारित हुई। बैठक के दौरान राष्ट्रपति बुश ने इस बात पर बल दिया कि भारत के साथ हमारे संबंध महत्वपूर्ण और संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने की हमारी वचनबद्धता से शांति, समृद्धि और आतंकवाद मुक्त पर्यावरण के निर्माण में सहायता मिलेगी। उन्होंने सामरिक भागीदारी के अगले कदम के चरण-1 को क्रियान्वित करने, जिसमें इसरो मुख्यालय को वाणिज्य विभाग की प्रतिबंधित इकाइयों की सूची से हटा लिया गया है,को सहयोग और विकास के एक नये युग का सूत्रपात माना। विस्तारित रक्षा सहयोग को बढ़ते हुए संबंधों का एक अभिन्न पहलू माना गया।

विदेश सचिव ने अमेरिकी प्रशासन में अपने समकक्षों के साथ चर्चा करने के लिए 16-18 सितम्बर, 2004 तक वाशिंगटन डीसी का दौरा किया। उन्होंने विदेश विभाग, हाइट हाउस और पेंटागन में बैठकें कीं, परामर्श एवं एशियाई सुरक्षा वार्ताएं की गयीं। विदेश सचिव की अमेरिकी प्रशासन के उच्चाधिकारियों, मनोनीत विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस, उप-रक्षा मंत्री पाउल वोल्फोविच, उप-विदेश मंत्री रिचर्ड आर्मिटेज एवं वाणिज्य, आर्थिक एवं कृषि मामलों के अंडर सेक्रेटरी एलन लारसन के साथ उपयोगी बैठकें हुई। विदेश मंत्री ने रक्षा अंडर सेक्रेटरी डगलस कीय, वाणिज्य अंडर सेक्रेटरी केनेथ जस्टर और उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीव हेडले के साथ भी मुलाकात की। इन बैठकों से अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मसलों पर विचारों का व्यापक उच्चस्तरीय आदान-प्रदान हो पाया। अमेरिका ने भारत-अमेरिकी संबंधों के प्रति अपनी मजबूत वचनबद्धता को दोहराया। विदेश सचिव ने 18-19 नवंबर, 2004 तक वाशिंगटन डी.सी. में हुई एचटीसीजी की तीसरी बैठक के लिए उद्योग-सरकार के एक शिष्टमंडल का नेतृत्व किया। इस बैठक के दौरान उद्योग-सरकार सत्र में डेटा प्राइवेसी तथा रक्षा प्रौद्योगिकी और सरकार-सरकार सत्र में सामरिक व्यापार और व्यापार को बनाने के संबंध में चर्चा की गयी। इस बैठक में दोनों पक्षों के औद्योगिक और सरकारी प्रतिनिधियों ने व्यापक भागीदारी की। पूर्ण अधिवेशन में लगभग 100 भागीदार थे।

जनवरी 2000 में स्थापित आतंकवाद के मुकाबले से संबद्ध संयुक्त कार्यदल एक-दूसरे की चिंताओं को और समझने के लिए एक उपयोगी तंत्र साबित हुआ। 31 अगस्त-1 सितम्बर, 2001 तक नई दिल्ली में आयोजित जेडब्ल्यूजीसीटी की छठी बैठक में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की वर्तमान प्रवृत्तियों और अफगानिस्तान की स्थिति पर चर्चा की गयी। दोनों पक्षों ने आतंकवाद का मुकाबला करने के संबंध में विधिप्रवर्तन, विधायी, वित्तीय और अन्य उपायों पर विचारों का आदान-प्रदान किया, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम पर सहमति व्यक्त की तथा आतंकवाद का मुकाबला करने के बहु-पक्षीय प्रयासों पर विचारों का आदान-प्रदान किया।

अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और अमेरिका के भागीदारों की सूची में हमारा स्थान 18वां है। अमेरिका भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत है, जिसका योगदान जनवरी 1991 और मार्च 2004 के बीच अनुमोदित विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का 21 प्रतिशत था। भारत का अमेरिका की सेवाओं का निर्यात प्रतिवर्ष 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का है। दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंधों को बढ़ाने के लिए ये तीन उपाय किये गये-सामरिक भागीदारी में वृद्धि, उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग दल और उच्चस्तरीय आर्थिक वार्ता।

वर्ष 2006 में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश भी भारत यात्रा पर आये। उनकी इस यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम मिला। उन्होंने भारत को एक महान लोकतांत्रिक देश तथा समृद्ध अर्थव्यवस्था वाला राष्ट्र बताया तथा विकास-प्रक्रिया की प्रशंसा की। वर्ष 2008 भारत तथा अमेरिका के मध्य द्विपक्षीय संबंधों के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष रहा। 10 अक्टूबर, 2008 को वाशिंगटन में भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसकी घोषणा जुलाई 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की अमेरिका यात्रा के दौरान की गई थी। गौरतलब है कि भारत ने 1 अगस्त, 2008 को अंतरराष्ट्रीय परमाणुऊर्जा एजेंसी के साथ विशिष्ट सुरक्षा समझौता किया। इस समझौते पर भारत के विदेश मंत्री एवं अमेरिका की विदेश सचिव ने 10 अक्टूबर, 2008 को हस्ताक्षर किए। इससे दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ हुए तया साथ ही आर्थिक और उच्च तकनीकी के क्षेत्र में सहयोग के नए अवसर खुले हैं।

उल्लेखनीय है कि बुश प्रशासन के समाप्त होने और प्रथम अश्वेत बराक ओबामा के अमेरिका के 20 जनवरी, 2009 से राष्ट्रपति बनने से भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया आयाम आया है। श्री बराक हुसैन ओबामा भारत के प्रति सकारात्मक रवैया रखते हैं और संबंध अधिक घनिष्ठ करने के इच्छुक हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बराक ओबामा के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के संबंधों में विशेष प्रगति होगी एवं दोनों देशों के आपसी सामरिक संबंध मजबूत होंगे। डेमोक्रेट अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान नीति में काफी बदलाव किया और बुश प्रशासन ने इसे आगे बढ़ाया और कश्मीर मुद्दे से दूरी बनाए रखने की नीति अपनाई। इसी नीति पर ओबामा को चलना होगा।

हालांकि राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान की सलाह भी दी है कि उसे वास्तविक खतरा उसके (पाकिस्तान) अंदर से है न कि भारत से। ओबामा ने हाल ही में कहा कि पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की समस्या को व्यापक संदर्भ एवं नीति के तहत देखा जाना चाहिए।

नवंबर, 2010 में दिल्ली में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा किए गए विजन के अनुपालन में भारत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी वैश्विक सामरिक भागीदारी को गहरा करना जारी रखा। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय लगावों का उच्च स्तर बनाए रखा,कई नई पहलें प्रारम्भ कीं तथा काफी विस्तृत क्षेत्र में अपने सहयोग को बढ़ाया। इन क्षेत्रों में शामिल थे- राजनीतिक एवं सामरिक शिक्षा,एवं सशक्तीकरण। नवंबर, 2011 में बाली में पूर्वी एशिया सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मुलाकात की। 19 जुलाई, 2011 को नई दिल्ली में आयोजित दूसरे भारत-अमेरिका सामरिक संवाद की सह अध्यक्षता श्रीमती हिलेरी क्लिंटन, अमेरिका सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के साथ तत्कालीन विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने की। क्षेत्रीय तथा, वैश्विक विकास के मुद्दों पर दोनों देशों ने निकटतम सलाह जारी रखी। सामान तथा सेवाओं दोनों प्रकार से भारत के सर्वाधिक बड़े व्यापारिक भागीदार भारत के साथ वाणिज्यिक संबंध तथा जन से जन संपर्क वर्ष के दौरान वृद्धि होना जारी रहा।

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