भौतिक विज्ञान के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य Important Facts Of Physics

अतिचालकता Superconductivity

अतिचालकता ऐसी धातुओं अथवा वस्तुओं के संयोग से जनित भौतिक गुण हैं, जो विद्युत् प्रवाह में किसी प्रकार का प्रतिरोध उत्पन्न न करें तथा विद्युत् संचार के कारण उनमे तापीय ऊष्मा का उत्सर्जन न हो। ऐसा चालक व्यवहारिक अनुप्रयोग में निम्न तापमान पर अतिचालकता को प्रदर्शित करने लगता हैं। राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने डोप्ड बेरियम कॉपर ऑक्साइड सिस्टम में अतिचालकता ऋण स्थान में प्राप्त करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की है। भारत सरकार ने उच्च स्तरीय समिति का गठन करके अतिचालकता के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न संस्थानों के शोध कार्य में सामंजस्य एवं समन्वय बनाये रखा है। इस संयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य एक प्रकार का स्क्यूड (SQUIDS- Superconducting quantum interference devices) बनाने का है, जो की द्रव नाइट्रोजन में 77K तापक्रम पर अतिचालकता प्रावस्था उत्पन्न कर सके\ इस सन्दर्भ में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ने ऐसे पदार्थों का संश्लेषण किया है, जो -40°C के ताप पर ही अतिचालकता के रूप में कार्य करने लगते हैं। यह एक महत्वपूर्ण खोज है।

अतिचालकता कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय वैज्ञानिक निम्नलिखित सामग्री उत्पादन करने का प्रयास कर रहे हैं-

1. किस प्रक्रिया द्वारा उच्च तापक्रम पर अतिचालकता सामग्री का उत्पादन हो।

2. किस विशेष प्राविधिकी अतिचालक का उपयोग करके उच्च क्षेत्रीय चुम्बकों का उत्पादन हो।

3. किस विशेष प्राविधिकी की सहायता से उच्च स्तरीय क्षेत्र की विद्युत् का उत्पादन हो।

4. किस विशेष प्राविधिकी के माध्यम से सिरेमिक यौगिकों की सामग्री को तारों में खींचा जाये।

5. इस प्रकार इन मूलभूत अनुसंधानों द्वारा विद्युत, उद्योग, विद्युत संचार एवं इलेक्ट्रोनिक उद्योग में क्रांति लायी जा सकती है।


अर्धचालक Semiconductor

ये कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं, जिनकी इलेक्ट्रॉनिकीय संरचना इस प्रकार की होती है की कहीं इलेक्ट्रान मुक्त हो जाता है और कहीं रिक्ति (Hole) बन जाती है। इस प्रकार ये इलेक्ट्रॉनिक्स व ट्रांजिस्टर उपकरणों में प्रयुक्त किये जाने वाले पदार्थ हैं। ये आकार में अत्यंत सूक्ष्म होते हैं और इन्हें गर्म करना आवश्यक नहीं होता है। सुगमता से मुक्त इलेक्ट्रान उपलब्ध होने से विद्युत् धारा उत्पन्न कर सकते हैं। जर्मेनियम व सिलिकॉन ऐसे मुख्य पदार्थ हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इनका उपयोग बढ़ता जा रहा है। रेडियो, टेलीविज़न, कैलकुलेटर, विडियो गेम, मोबाइल फोन आदि अनेक उपकरण बनाने में इन अर्धचालक पदार्थों का उपयोग होता है, जो मानव जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं।

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को छोटे से छोटा बनाने के लिए अनेक प्रकार की तकनीकों का उपयोग किया गया, परन्तु उनमे सर्वाधिक उल्लेखनीय अर्धचालक है। अर्धचालक की विद्युत् चालकता, सुचालक पदार्थ की चालकता से कम और कुचालक की चालकता से अधिक होती है।

सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिकी टेक्नोलॉजी द्वारा निर्मित सूक्ष्म कणों ने इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों में कर्न्तिकारी परिवर्तन ला दिए हैं। इस युक्तियों में प्रयुक्त होने वाली बड़ी-बड़ी ट्यूबों  का स्थान इन उपकरणों ने लेकर इन्हें आश्चर्यजनक रूप से छोटा बना दिया है। इन आधुनिक उपकरणों ने चिकित्सा शिक्षा संचार व्यवस्था और वस्तुतः जीवन के प्रत्येक पहलू में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिए हैं।


नया सुपरकंडक्टर New Superconductor

हल में ही जापान के राष्ट्रीय धातु अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक नया उच्च-ताप अतिचालक (सुपरकंडक्टर) विकसित किया है। यह अतिचालक बिस्मिथ-स्ट्रोंशियम-कैल्शियम-कॉपर ऑक्साइड मिश्र धातु से तैयार किया गया है। इसकी विशेषता यह है की इसके निर्माण में किसी दुर्लभ मृदा (Rare Earth) तत्व का प्रयोग नहीं किया गया है। अब तक जो भी उच्च ताप अतिचालक विकसित किये गए हैं, उनमें यूट्रियम और लेंथेनम जैसे दुर्लभ मृदा तत्वों का उपयोग किया गया है। दुर्लभ मृदा तत्व बहुत दुर्लभ न होने के बावजूद काफी महंगे होते हैं।

इस नये अतिचालक (Bi, Sr, Ca, Cu2O3) को कई घंटों तक 900°C से कुछ ही कम ताप पर एनिल करने से 120K पर इसके प्रतिरोध में कमी आनी शुरू हो जताई है और 79K पर उसका प्रतिरोध शून्य हो जाता है। वैसे इसके प्रतिरोध में 107K के आस-पास एकाएक कमी आ जाती है। इसका रंग काला है, पर अब तक इसकी क्रिस्टलीय संरचना ज्ञात नहीं की जा सकी है।


फाइबर ऑप्टिक्स Fibre Optics

दूर संचार के क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन ला देने वाली यह एक नवीनतम तकनीक है। कांच के बने अत्यंत बारीक़ तंतु (Fibres)  का उपयोग संचारी तारों (Cables) के रूप में किया गया है। इन बारीक़ सूत्र तंतुओं ने संचार माध्यमों की परम्परागत विधियों-  तांबे के तार, माइक्रोवेव आदि को कहीं पीछे छोड़ दिया है और इनसे सैकड़ों गुना अधिक कार्य बहुत कम समय में और बहुत कम लगत पर संपन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए- बाल ले समान महीन फाइबर तकनीक से टीवी, कंप्यूटर तथा कार्यालयों के टेलेफोनों से संपर्क किया जा सकता है। एक सामान्य तांबे के तार की तुलना में इस पर 500 गुना संचार भार आरोपित कर सकते हैं। जो सन्देश एक तांबे के तार द्वारा काफी देर में पहुंचाए जाते हैं, वे इस फाइबर तकनीक द्वारा केवल एक सेकंड में पहुँच जाते है तथा इसके द्वारा दुसरे स्थान तक पहुँचने वाले संकेत बिलकुल शुद्ध व स्पष्ट होते हैं। इस प्रकार प्रकाश की गति से सन्देश संकेतों को स्पष्ट व शुद्ध रूप से तत्काल संचालित करने की यह एक सस्ती और उपयोगी तकनीक है।

1960 में अमेरिका में न्यूजर्सी स्थित बेल लेबोरेटरी में विकसित इस युक्ति का प्रयोगात्मक परिक्षण शिकागो में सन 1973 में किया गया। इसके अविष्कारक डॉं. फिलिप एंडरसन को उनके अध्ययन, ‘कांच की इलेक्ट्रॉनिक संरचना में प्रकाशिक अध्ययन’ के लिए 1977 में नोबेल पुरुस्कार प्राप्त हुआ। अब इसके प्रयोग से सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में तथा दूर संचार युक्तियों में चमत्कारिक प्रगति हुई है। कंप्यूटर टेलीप्रिंटर, टीवी, टेलीफोन रोबोट आदि उपकरणों का आकार अब सूक्ष्मतम और सरल बनाया जा सकेगा तथा सन्देशवाहन की लगत को बहुत कम किया जा सकेगा।


इलेक्ट्रॉनिकी Electronics

इलेक्ट्रॉन किसी तत्व के नाभिक में उपस्थित वह सूक्षम व ऋण आवेशित कण है जो नाभिक के चारो ओर एक नियत कक्ष में चक्कर लगाता है।

इलेक्ट्रॉन जब क्वार्टज़ क्रिस्टलों के भीतर एक नियत पथ पर गति करता है, तो उससे उत्पन्न प्रभावों को इलेक्ट्रॉनिकी के अंतर्गत रखा जाता है। सबसे पहले यंत्रों में निर्वात ट्यूबों का प्रयोग किया जाता था, जो काफी स्थान घेरते थे। इसी कारण प्राचीन समय में बड़े-बड़े रेडियोग्राम देखने को मिलते थे। धीरे-धीरे  निर्वात ट्यूबों का स्थान ट्रांजिस्टरों व अर्द्ध-चालकों (semi-conductors) ने ले लिया। ये अपेक्षाकृत बहुत कम स्थान घेरते थे, लागत में कम थे तथा बहुत सरल थे। अब इनका स्थान इंटिग्रेटेड सर्किट्स के द्वारा किया जा रहा है। सबसे आधुनिक तकनीक माइक्रोप्रोसेसर या माइक्रोचिप्स की है। माइक्रोचिप्स सिलिकॉन के बने होते हैं तथा इनकी लगत काफी कम होती है।

इलेक्ट्रॉनिकी का आज कृषि संचार, चिकित्सा, रक्षा, उद्योग, अन्तरिक्ष अनुसंधान, इंजीनियरिंग, शिक्षा घरेलु उपयोग के यंत्रों आदि विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ़ इण्डिया की स्थापना 1967 में की गई। प्रौद्योगिकी विकास परिषद् एवं राडार परिषद् भी इलेक्ट्रॉनिकी दिशा में कार्यरत है।

इलेक्ट्रॉनिकी के उपयोग Uses of Electronics

1. उद्योगों में विभिन्न इकाइयों का एक साथ संचालन करने के लिए।

2. दूरस्थ विधि से किसी वस्तु का संचालन करने के लिए, जिसे रिमोट कंट्रोल भी कहा जाता है।

3. खतरे के समय इलेक्ट्रॉनिक अलार्म का उपयोग।

4. इलेक्ट्रॉनिक रोबोटों द्वारा अस्पतालों, होटलों व अन्य विशाल संस्थाओं में कार्यभार कम करने के लिए।

5. टेलीकम्युनिकेशन या दूरसंचार के क्षेत्र में।

6. उपग्रह संचालन के लिए।

7. दूरदर्शन के संचालन में।

8. राडार, मिसाइल, वायुयान, जलयान, अवाक्स व अन्य रक्षा उपकरणों के संचालन में।

9. कंप्यूटर निर्माण में

10. चिकित्सा उपकरणों व निदान सम्बन्धी उपकरणों के निर्माण में।

11. इसका उपयोग घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने में भी किया जाता है, क्योंकि ऐसी वस्तुएं जहाँ जगह कम घेरती हैं वहीँ इनमे कम उर्जा खर्च होती है एवं सस्ती भी पड़ती है।

इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्त्व Significance of Electronics

1. इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण अपेक्षकृत कम स्थान घेरते हैं।

2. इनके उत्पादन की लागत वे रख-रखाव का व्यय बहुत ही कम होता है।

3. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की निर्माण प्रक्रिया बहुत ही सरल है।

4. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खराबियों व बारीकियों को दूर करना बहुत ही आसान है, क्योंकि ये अधिक सरलीकृत हैं।

5. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उर्जा का व्यय बहुत ही कम है। जटिल से जटिल उपकरण अधिकतम 12 वोल्ट विद्युतधारा पर कार्य कर सकता है।

6. इन्हें बैटरी व विद्युत् (D.C. and A.C.) दोनों से चलाया जा सकता है। अतः अचानक बिजली चले जाने पर भी कोई समस्या नहीं होती है।

7. इनकी कार्य प्रणाली अधिक सरल व कम समय लेने वाली होती है, इसलिए ट्रैफिक सिग्नल आदि के क्षेत्र में इनका उपयोग बढ़ रहा है।

8. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दृश्य व श्रव्य (Visual & Audio) दोनों प्रकार के संकेत लिए जा सकते हैं।


लेसर Laser

इसका पूर्ण शब्द विस्तार लाइट एम्पलीफिकेशन बाई स्टीमुलेटेड एमिशन ऑफ रेडिएशन (light amplification by stimulated emission of radiation)। इसकी खोज डॉ. चार्ल्स एच. टॅावेन्स और आर्थर लियोनार्ड शैलो (Charles Hard Townes and Arthur Leonard Schawlow) ने 1960 में की थी। इस प्रक्रिया द्वारा शक्तिशाली मोनोक्रोमेटिक प्रकाश किरण प्राप्त की जाती है जो वायु, गैस एवं कुछ द्रवों के पारदर्शी माध्यम मेँ चल सकती हैं एवं बिना किसी परिवर्तन (Defraction) के लंबी दूरी तक भेजी जा सकती हैं। यह पारदर्शी खिड़कियोँ से प्रक्षेपित की जा सकती हैं तथा इसे एक बिंदु पर केंद्रित कर बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।

कार्यप्रणाली

यदि किसी अणु पर बाहरी ऊर्जा जैसे फोटोन आदि की बौछार की जाए तो अणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर अपनी उच्च कक्षा मेँ चला जाता है। यहाँ से पुनः काफी मात्रा मेँ ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। इसी सिद्धांत पर लेसर किरणें उत्पन्न की जाती हैं। लेसर किरणों के उत्पादन के लिए रूबी रॉड (Ruby Rod) काम मेँ ली जाती है।

लेसर किरणों के गुण

1. लेसर किरणें किसी भी पारदर्शक वातावरण मेँ गमन कर सकने मेँ समर्थ हैं।

2. ये बिना ऊर्जा का क्षय किए काफी दूर तक गमन कर सकती हैं।

3. इन्हें एक स्थान पर केंद्रित करके काफी ऊष्मा उत्पन्न की जा सकती है।

4. इनसे उत्पन्न होने वाला प्रकाश कला सम्बद्ध (cohrent) प्रकाश होता है।

लेसर का उपयोग

1. किसी ठोस कठोर पदार्थ के पिघलाने, जलाने व वेल्डिंग में।

2. किसी पदार्थ या दूरस्थ वक्त की दूरी ज्ञात करने मेँ।

3. ध्वनि व चित्रों के संकेतों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने मेँ।

4. चिकित्सा विज्ञान मेँ, विशेष रुप से बिना ऑपरेशन के शल्य चिकित्सा मेँ आजकल पथरी के निदान मेँ तथा कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए।

5. चिकित्सा विज्ञान मेँ शरीर की आंतरिक व्याधियोँ का पता लगाने के लिए।


द्रव क्रिस्टल Liquid Crystal

कैलकुलेटर, घड़ियों एवं अन्य उपकरणों में अंको को दर्शाने के लिए द्रव क्रिस्टलों का प्रयोग किया जाता है। द्रव क्रिस्टल, द्रव की संघनित अवस्था होती है। उपकरण मेँ गतिज प्रकीर्णन के समय विद्युत क्षेत्र के प्रभाव मेँ आकर ये क्रिस्टल चमककर दिखाई देते हैं।


रोबोट Robot

एक एसी स्वचालित मशीन है जो मानव की भांति काम करता है और उसके कार्यात्मक घटक भी मानव से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं लेकिन आवश्यक नहीँ है की रोबोट का वाह्य स्वरूप मानव से मिलता जुलता हो, वास्तव मेँ यह एक प्रकार की मशीन है, जिसमेँ भुजा, पैर आदि के कार्य करने के लिए अनेक घटक होते हैं। रोबोट शब्द का सर्वप्रथम उपयोग चेकोस्लोवाकिया के प्रसिद्द नाटक लेखक कारेल कापैक (Karel Čapek) ने अपने नाटक रोससम्स यूनिवर्सल रोबोट्स (Rossum’s Universal Robots) मेँ किया था। यह शब्द चेक भाषा मेँ रोबोटा से लिया गया है जिसका अर्थ है- ‘बंधुआ मजदूर’।


औद्योगिक रोबोट

आजकल अलग अलग कार्योँ के लिए अलग-अलग प्रकार के रोबोट बनने लगे हैं। कारखानो मेँ काम करने के लिए औद्योगिक रोबोट विकसित कर लिया गये हैं। ये अनेक ऐसे कार्य कर सकते हैं, जिन्हें बलवान से बलवान व्यक्ति अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण नहीँ कर सकता है। रोबोट्स सरलता से लोहे की तपती हुई छड़ को उठा सकता है, जबकि मनुष्य के लिए ऐसा करना असंभव है। रोबोट बिना थके अधिक क्षमता और तेजी के साथ काम कर सकता है। आर्थिक दृष्टि से यह अन्य मशीनों की तुलना मेँ बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है। अमेरिका, रुस, जापान, आदि विकसित देशों ने ऐसी\ रोबोट मशीनें बना ली हैं, जो वैज्ञानिक शोध कार्य भी कर सकती हैं। विश्व मेँ आज ऐसे रोबोट विकसित कर लिए गए हैं, जो सैनिक और व्यापारिक कार्यो मेँ प्रयोग किए जा रहे हैं। लगभग एक वर्ष पूर्व ‘कनिष्क यान’ के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उसके ब्लैक बॉक्स को समुद्र की विशाल गहराइयों निकालने के लिए नाम स्कारैब नामक रोबोट (स्वचालित पनडुब्बी) का इस्तेमाल किया गया था। वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए ऐसे रोबोट विकसित हो गए हैं। जो रेडियोधर्मी वातावरण मेँ सरलता से काम कर सकते हैं। नाभिकीय भट्टियोँ मेँ भी रोबोटों का विकास कर लिया गया है। अंतरिक्ष अनुसंधानों के लिए अनेक प्रकार के रोबोट बना लिए गए हैं। जो दूरस्थ ग्रहों से धरती के वैज्ञानिकों को सूचनाएं भेजते हैं।

आज वैज्ञानिक और इंजीनियर अधिक से अधिक परिष्कृत रोबोटों का निर्माण करने का प्रयत्न कर रहे हैं, इनकी कार्यक्षमता मनुष्य से कहीँ अधिक है ही, मानसिक क्षमता मेँ भी ये मनुष्य को पीछे छोड़ते जा रहे हैं।

जापान की राजकीय संस्थान ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया है, जो दूरसंवेदी युक्तियोँ की सहायता से दीवार पर भी चढ़ाया जा सकता है। यह रोबोट मकड़ी की भांति दीवार पर चढ़ जाता है। इसका नाम स्पाइडर मार्क-111 रखा गया है। समझा जाता है कि इसका प्रयोग उन स्थलों पर किया जाएगा जो मनुष्य के लिए खतरनाक समझे जाते हैं। यह ऊंची दीवारो मेँ आने वाली दरारों का पता लगा सकेंगा तथा सफाई भी कर सकेगा।


कैट स्कैनर  CAT Scan

CAT शब्द कंप्यूटराइज्ड एक्सियल टोमोग्राफी (computerized axial tomography) का संक्षिप्त रुप है। इसका उपयोग केवल रोग के निदान के लिए ही नहीँ बल्कि उसके सही इलाज का पता लगाने के लिए भी किया जाता है। कैट स्कैनर का आविष्कार ब्रिटिश भौतिकशास्त्री डॉ. हाउसफील्ड और अमेरिकी भौतिकशास्त्री कोरमैक (Godfrey Hounsfield of EMI Laboratories, England and by South Africa-born physicist  Allan McLeod Cormack of Tufts University, Massachusetts) मेँ सन 1972 मेँ किया था, जिस पर उन्हें 1979 मेँ आयुर्विज्ञान (Medicine) का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इस यंत्र के आविष्कार से पहले रोग का पता लगाने के लिए कई प्रकार से शरीर के एक्स-रे कराने पड़ते थे तथा ऐसे परीक्षणों मेँ शारीरिक कष्ट के साथ-साथ खतरा भी होता था। कैट-स्कैनर से केवल एक ही परीक्षण से रोगोँ का पता चल जाता है और सफल इलाज किया जा सकता है। इसमेँ न शारीरिक कष्ट होता है और न खतरा।

कैट स्कैनर वास्तव मेँ एक्स-रे उपकरण का ही एक विकसित रुप है जिसमे तीन विमाओं वाले त्रि-आयामी चित्र प्राप्त होते है, अर्थात चित्र लंबाई, चौड़ाई के साथ ही गहराई या मोटाई या ऊंचाई को दर्शाते हैं। इस उपकरण मेँ एक एक्स-रे स्रोत होता है, बीच मेँ रोगी के लिए मोटर चालित स्ट्रेचर होता है और उसके दूसरी और एक डिटेक्टर नामक यंत्र होता है। डिटेक्टर एक कंप्यूटर से सम्बद्ध होता है और कंप्यूटर एक टीवी स्क्रीन से जुडा होता है। कंप्यूटर के गणित सूत्र और चित्र टीवी स्क्रीन पर चित्रित होते रहते हैं। स्कैन हो रहे क्षेत्र से गुजर कर एक्स-रे डिटेक्टर तक पहुंचती हैं। डिटेक्टर इन्हें विद्युत संकेतों के रुप मेँ कंप्यूटर तक पहुंचाता है। कंप्यूटर प्राप्त संकेतो को गणित सूत्र का प्रयोग करते हुए चित्र का रुप देखकर टीवी स्क्रीन पर उभारता है। भिन्न-भिन्न उतक अपने घनत्व (लंबाई, चौड़ाई, मोटाई) के अनुसार स्पष्ट रुप से स्क्रीन पर दिखाई देते हैं।

कैट स्कैनर दो प्रकार के होते हैं। पहला हेड स्कैनर, जो मस्तिष्क मेँ ट्यूमर, सर की चोट की वजह से रक्त स्राव या ब्रेन हैमराज की आदि मेँ प्रयोग में आता है। दूसरा बॉडी स्कैनर होता है, जो अपेक्षाकृत बहुत बड़ा होता है तथा शरीर के अन्य भागोँ का परीक्षण करने के लिए प्रयोग किया जाता है।


इलेक्ट्रान तथा कैथोड किरणें

सामान्य दाब पर गैसे प्रायः विद्युत् कुचालक होती (Non Conductor of Electricity) हैं। परन्तु यदि गैस का दाब काफी कम कर दिया जाए तो उनमेँ विद्युत धारा प्रवाहित हो सकती है। एक बंद नली जिसे विसर्जन नली (discharge tube) कहते हैं, में न्यूनीकृत दाब पर विद्युत विसर्जन (Electric discharge) करने पर नली के ऋणोंद (Cathod) से नीली दीप्ति के रुप मेँ एक प्रकार के कणों का पुंज निकलता है। 1876 में गोल्डस्टाइन (Eugen Goldstein Kathodenstrahlen) ने इसका नाम कैथोड किरणें रखा। वास्तव में इन किरणों को पहली बार 1869 में जर्मन भौतिकशास्त्री जोहान हित्तार्फ़ (Johann Hittorf) द्वारा देखा गया था। ये किरणें कैथोड से एनोड की ओर सीधी रेखा मेँ चलती हैं तथा काँच, जिंक सल्फाइड अथवा बेरियम प्लेटिनो साइनाइड के पर्दे पर पड़ने से चमक उत्पन्न करती हैं। उच्च गलनांक के धातु से कैथोड किरणें टकराने से एक्स-किरणें उत्पन्न होती हैं।


रेडियोऐक्टिवता Radioactivity

कुछ तत्व स्वतंत्र अवस्था मेँ अधिक समय तक नहीँ रह सकते वह धीरे धीरे अन्य तत्वों में बढता जाते हैं। हेनरी बेकुरल (Antoine Henri Becquerel) ने पता लगाया था कि युरेनियम धातु और उसके लवणों से एक विशेष प्रकार की अदृश्य किरणें निकलती हैं। ये किरणें धातुओं की पतली चादर से पार निकल जाती हैं। गैस को आयनित कर देती हैं, जिंक सल्फाइट में प्रदीप्त उत्पन्न कर देती हैं। इन किरणों को बेकुरल किरणें कहा गया। मैडम क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने देखा कि इस प्रकार का गुण यूरेनियम के खनिज पिच ब्लेण्ड से प्राप्त तत्व रेडियम तथा पॉलोनियम बहतु अधिक है। बेकुरल किरणों को उत्सर्जित करने वाले तत्वों को रेडियोएक्टिव तत्व कहा गया। इस गुण को रेडियोऐक्तिवता कहते हैं।

1902 मेँ लार्ड रदरफोर्ड ने बेकुरल किरणों का अध्यन किया। उन्होंने शीशे के चौकोर बर्तन मेँ रेडियोएक्टिव पदार्थ का एक टुकड़ा रखा। इससे निकलने वाली सभी किरणों को एक विद्युत क्षेत्र मेँ से गुजरने दिया। कुछ किरणें ऋण आवेशित प्लेट की ओर मुड़ जाती हैं (β-किरणें), कुछ धन आवेशित प्लेट की ओर मुड़ती हैं (α-किरणें) और कुछ सीधी चली जाती हैं (γ-किरणें)। प्रत्येक रेडियोएक्टिवता न्यूक्लीय गुण है। प्रत्येक पदार्थ से ये तीनों किरणें नहीँ निकलतीं। कुछ पदार्थों से केवल α-अल्फा और γ-गामा किरणें ही निकलती हैं जबकि कुछ से केवल बीटा- β और गामा- γ किरणें ही निकलती हैं।

अल्फा किरणें α-Rays

रेडियोएक्टिव पदार्थ से निकली ऋण आवेशित प्लेट की और मुड़ने वाली किरणें अल्फा किरणें हैं। इनके निम्नलिखित गुण हैं-

1. ये चुंबकीय तथा विद्युत क्षेत्र से विक्षेपित हो जाती हैं इनके विक्षेप की दिशा से ज्ञात होता है कि यह धनावेशित हैं।

2. इन किरणों के प्रत्येक कण पर आवेश दो इलेक्ट्रानों के आवेश के बराबर धन आवेश होता है तथा द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु या प्रोटोन के द्रव्यमान का चौगुना होता है| अर्थात प्रत्येक कण दो प्रोटोन तथा दो न्यूट्रान का बना होता है अतः अल्फा कण हीलियम नाभिक के अनुरूप होते है।

3. इन किरणों की भेदन क्षमता बहुत कम होती है।

4. इन किरणों में गैसों को आयनीकृत करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।

5. ये किरणें कुछ पदार्थ जैसे हीरे, जिंक सल्फाइड आदि पर पड़कर प्रदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

6. इनका वेग प्रकाश के वेग के 1/10 के क्रम का होता है।

बीटा किरणें β-Rays

रेडियोएक्टिव पदार्थ से निकली हुई धनावेशित प्लेट की ओर मुड़ने वाली किरणें β-किरणें कहलाती हैं। इनके निम्नलिखित गुण हैं-

1. कैथोड किरणों के समान ये किरणें इलेक्ट्रानों से बनी होती हैं।

2. ये किरणें चुम्बकीय तथा विद्युतीय क्षेत्र में विक्षेपित हो जाती हैं।

3. ये किरणें न्यूट्रान के टूटने से बनती हैं। β-कण के रूप में इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते हैं तथा प्रोटान बचा रहता है।

4. इनमे गैसों को आयनित करने की क्षमता अल्फा (α) किरणों से कम होती है।

5. इनका वेग प्रकाश के वेग के क्रम का होता है।

गामा किरणें γ-Rays

चुम्बकीय क्षेत्र में विक्षेपित न होकर सीधी जाने वाली किरणें गामा किरणें हैं। इनके निम्नलिखित गुण हैं-

1. इनका स्वरुप तरंगों के समान होता है। इनमे द्रव्यमान होता है और न ही आवेश।

2. ये किरणें विद्युत् तरंगों के समान दूरभेदी होती हैं। इनकी भेदन क्षमता अल्फा और बीटा किरणों की अपेक्षा तीव्र होती है। ये लोहे की 30 सेमीं तक की तह को भेद देती हैं।

3. ये किरणें विद्युत् क्षेत्र या चुम्बकीय क्षेत्र में विपेक्षित नहीं होती है। इनमे गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

4. इन किरणों का वेग प्रकाश के वेग के बराबर होता है।


अवरक्त किरणें Infrared Rays

सूर्य के प्रकाश मेंसात रंगों के अतिरिक्त अन्य किरणें जो अदृश्य होती हैं, अवरक्त किरणें कहलाती हैं। ये अवरक्त किरणें लाल रंग से अधिक तरंगदैर्ध्य वाली होती हैं। इनके निम्नलिखित गुण होते हैं-

1. इनका तरंगदैर्ध्य दृश्य क्षेत्र की तरंगदैर्ध्य से अधिक होता है।

2. इन किरणों का तापीय प्रभाव अधिक होता है।

3. इन किरणों में उर्जा अधिक होती है।


एक्सिऑन- नया परमाण्विक कण

नये क्वांटम डायनामिक्स सिद्धांत तथा विद्युत् चुम्बक के पुराने क्वांटम सिद्धांत की अंश क्रिया के फलस्वरूप 1970 के दशक में भौतिक शास्त्रियों ने गणनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकला था की परमाणु में एक नया प्राथमिक अं और उपस्थित होना चाहिए। यह भी अनुमान लगाया गया कि यह कण अत्यंत हलके इलेक्ट्रान से भी कहीं हल्का पर अत्यंत तीव्र प्रवेशन क्षमता वाले, न्यूट्रानों से भी अधिक क्षमता वाला होना चाहिए। इसका नाम एक्सिऑन रखा गया।

यद्यपि अभी तक वैज्ञानिकों को अपने प्रयोगों में एक्सिऑन नहीं मिला है पर उनका मत है ब्रह्माण्ड के लुप्त द्रव्य का कारण एक्सिऑन है। उनके इस प्रकार सोचने का कारण कदाचित यह है कि ब्रह्माण्ड में उपस्थित कुल द्रव्य उसके प्रसार, जो उसके निर्माण के तुरंत बाद आरम्भ हो गया था, को रोकने में असमर्थ रहा।

पहले यह समझा जाता था की ब्रह्माण्ड का लुप्त द्रव्य न्यूट्रिनो कण के रूप में मौजूद है। इस बारे में वैज्ञानिकों का यह भी मत था की वास्तव में न्यूट्रिनो इतने भार हीन नहीं हैं जितना समझा जाता है, परन्तु अब ये न्यूट्रिनो के स्थान पर एक्सिऑन  को लुप्त द्रव्य का कारण मानने लगे हैं।


पराश्रव्य ध्वनि Ultrasonic Sound

यह ध्वनि उर्जा का रूप है जो किसी पिंड में आवर्ती कम्पन से उत्पन्न होती है और तरंग गति के रूप में विचरण करती है। इसके संचरण के लिएऐसे द्रव्यात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है, जो अवतरित और प्रत्यास्थ (Elastic) हो। प्रश्रव ध्वनि विज्ञान (Acoustics) की वह शाखा है, जिनमे उन ध्वनि आवृतियों (Sound Frequencies) पर विचार किया जाता है जी श्रव्य परास से ऊँची हो, अर्थात जिनकी आवृत्ति 20 किलो साइकिल या उससे अधिक हो।

1935 से पूर्व इस विषय का नाम साधारण रूप से पराध्वनिक (Supersonic) था, लेकिन बाद में उच्च आवर्ती ध्वनि के लिए पराश्रव्य (Ultrasonic) शब्द अधिक प्रचलित हो गया, क्योंकि सुपरसोनिक शब्द को अनेक अर्थों में इस्तेमाल किया जाने लगा। सुपरसोनिक शब्द को उस गति के लिए काम में लाया जाता है जो ध्वनि के वग से अधिक हो।

पराश्रव्य के जनन के लिए मुल्ता एक ट्रांसड्यूसर (Transdusar) और निवेश (Input) के लिए उपयुक्त वोल्टता पूर्ति की आवश्यकता पड़ती है। ट्रांसड्यूसर एक ऐसी युक्ति है, जिसके द्वारा के विभिन्न रूपों को उच्च आवर्ती ध्वनि तरंगों में परिवर्तित किया जाता है। आजकल क्वार्टज़ और रोशेल लवण के क्रिस्टल सर्वाधिक विख्यात और सबसे अधिक काम में लाये जाते हैं। यदि क्रिस्टल पर प्रत्यावर्ती विद्युत् क्षेत्र का प्रभाव डाला जाए, तो क्रिस्टल विकृत हो जाता है और इसलिए वह प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति को उन्मुक्त करने लगता है, जोकि क्रिस्टल की प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर होती है। अनुनाद (resonance) के कारण यह उच्च दोलन आयाम (Vibration amplitude) प्रेषित करता है।


होलोग्राफी Holography

होलोग्राफी का शाब्दिक अर्थ सम्पूर्ण रिकॉर्ड है। इस तकनीक से किसी वस्तु का न केवल सच्चा प्रतिविम्ब रिकॉर्ड होता है, वरन वह मूल वस्तु का अत्यधिक सटीक चित्र भी होता है।साथ ही होलोग्राफी से फोटोग्राफिक प्लेट पर वस्तु का स्थायी चित्र बन जाता है। निश्चय ही यह प्रचलित फोटोग्राफी तकनीक से एकदम भिन्न है। यह एक महँ खोज थी। व्यतिकरण द्वारा त्रिविमीय प्रतिविम्ब करने की सफलता लेसर किरणों के संसक्त प्रकार के उपलब्ध हो जाने पर ही मिली। पर आजकल साधारण (असंसक्त) प्रकाश से ही होलोग्राफ प्राप्त कर लिए जाते हैं, यद्यपि इनके लिए जटिल उपकरणों की आवश्यकता होती है।

यद्यपि त्रिविमीय होलोग्राफी अभि तक अपनी आरंभिक अवस्था में है पर उसे अनेक कामों के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। इन्टरफेरोमेट्री (Interferometry)  में उसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता रहा है। इन्टरफेरोमेट्री में व्यतिकरण (interference) की सहायता से ठोस द्रव और गैसीय पदार्थों के गुणों का अध्ययन किया जाता है। इस तकनीक से होलोग्राफी के इस्तेमाल से इतने सटीक नतीजे प्रप्थोते हैं, जो किसी अन्य विधि से प्राप्त नहीं होते है। होलोग्राफी और इन्टरफेरोमेट्री का उपयोग करके विस्फोट, क्षरण प्लाज्मा अवस्था आकदी का अध्ययन किया जा सकता है। लेसर किरणों के उपयोग से अत्यंत कम समय (सेकेण्ड के अरबवें भाग से भी कम समय) में होलोग्राम प्राप्त हो जाता है, इसलिए होलोग्राम की मदद से उन क्रियाओं का भी भली-भांति अध्ययन किया जा सकता है जो अत्यंत तीव्र गति से चलती हैं। होलोग्राफी से संभाव्य बहुत अधिक हैं। इसकी मदद से कंप्यूटर की (key) में, प्रकाश पैटर्नों के रूप में जानकारी भरी जा सकती है।


हाईजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत Heisenbarg’s Uncertainity Principle

इस सिद्धांत के अनुसार किसी छोटे कण या इलेक्ट्रान का स्थान (Position) तथा संवेग (Momentum) दोनों का वास्तविक ज्ञान असंभव है, क्योंकि जब इलेक्ट्रान कण के समान व्यवहार करता है, तो इसके स्थान का निर्धारण किया जा सकता है, परंतु वेग व संवेग अनिश्चित होता है। जब यह एक तरंग के रूप में व्यवहार करता है, तब इसका वेग व संवेग निर्धारित किया जा सकता है, परन्तु तब इसका स्थान अनिश्चित होगा। इसे निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त लिया जा सकता है-

(Δx) (Δp) = h/2π

जबकि Δx के स्थान सम्बन्धी अनिश्चितता तथा Δp संवेग सम्बन्धी अनिश्चितता है।

इसी प्रकार Δx कम हो तो इलेक्ट्रान के स्थान का निर्धारण किया जा सकता है, परन्तु संवेग सम्बन्धी अनिश्चितता बढ़ जाएगी और संवेग निर्धारण के स्थान में निर्धारण की अनिश्चितता बढ़ेगी।


अनुगमन वेग Drift Velocity

जब चालक को सेल या बैटरी के सिरे से जोड़ दिया जाता है, तो विद्युत् वाहक बल (वि.वा.ब. Electro Motive force) के कारण चालक के प्रत्येक बिंदु परएक समान विद्युत् क्षेत्र स्थापित हो जाता है और तब स्वतंत्र इलेक्ट्रान पर बल लगता है। इलेक्ट्रान रहित परमाणु (धन आयन) अपनी संतुलित स्थिति के इधर-उधर कम्पन करने लगते हैं तथा स्वतंत्र इलेक्ट्रान इनसे टकराते रहते हैं। विद्युत् क्षेत्र लगाने से इलेक्ट्रानों की अनियमित गति के साथ-साथ विद्युत् क्षेत्र की विपरीत दिशा में इनका अनुगमन होने लगता है। अयन से टकराने से पहले इनका वेग अधिकतम तथा टकराने के ठीक बाद, क्षण भर के लिए इनका वेग शून्य हो जाता है। इस प्रकार की टक्करों को अप्रत्यास्थ टक्कर (inelastic collision) कहते हैं। विद्युत् क्षेत्र लगाने के बाद क्षेत्र किम दिशा के विपरीत दिशा में स्वतंत्र इलेक्ट्रानों का औसत वेग अनुगमन वेग (drift velocity) कहलाता है। इसे ‘u’ से प्रदर्शित करते हैं तथा इसका मान 1 सेमी. प्रति सेकंड या इससे भी कम होता है। जिस प्रकार सामान्यतः वायु के कण अनियमित रूप से गतिमान रहते है, परन्तु दबांतर के कारण परस्पर टकराते हुए भी इनका अनुगमन होता है, जिसके फलस्वरूप वायु प्रवाह होता है। ठीक इसी प्रकार स्वतंत्र इलेक्ट्रान अनियमित रूप से गतिमान रहते है, परन्तु विभवान्तर के कारण परस्पर टकराते हुए भी इनका अनुगमन होता है, जिसके फलस्वरूप धारा का प्रवाह होता है। अतः बैटरी का विभवान्तर इलेक्ट्रानों को त्वरित गति नहीं प्रदान कर पाता, वरन यह उन्हें तार की लम्बाई की दिशा में एक छोटा नियत वेग (अनुगमन वेग) ही दे पाता है, जो की इलेक्ट्रानों की अनियमित गति के ऊपर आरोपित रहता है। इस अनुगमन वेग के कारण ही धारा का प्रवाह, उर्जा का स्थानान्तरण तथा चुम्बकीय क्षेत्र की उत्पत्ति होती है।


उभय वर्तन Double Refraction

जब प्रकाश की किरणें कैलसाइट अथवा क्वार्ट्ज (Calcite or Quartz Crystal) तब दो किरणों में विभाजित हो जाती। अतः यदि किसी बिंदु को इन क्रिस्टलों में सी होकर देखा जाए हैं, तो उसके दो प्रतिविम्ब प्राप्त होंगे, प्रकाश की एक किरण के किसी विशेष क्रिस्टल में जाने पर दो भागों में वोभाक्त होना उभय वर्तन (Double Refraction) कहलाता है। इसके अतिरिक्त इन निर्गत किरणों के अध्ययन से यह पता लगता है कि, इनमे से एक किरण अपवर्तन के नियम का पालन करती है परन्तु दूसरी नहीं। जो किरण अपवर्तन के नियम का पालन करती है उसे साधारण तथा जो अपवर्तन के नियम का पालन नहीं करने वाली किरण को असाधारण (Extraordinary) किरण कहते हैं।


प्रत्यावर्ती धारा Alternating Current, A.C.

यदि किसी कुंडली को एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में एक कोणीय क्षेत्र में घुमाया जाए, तो कुंडली में आधे चक्कर के लिए धारा एक दिशा में तथा शेष आधे चक्कर के लिए धारा विपरीत दिशा में बहती है। इसके अतिरिक्त धारा का मान भी स्थिर नहीं रहकर बदलता रहता है। पहले धारा शून्य से बढ़कर अधिकतम (धनात्मक दिशा में)फिर वह अधिकतम से घटकर शून्य और अब पुनः शून्य से अधिकतम (ऋणात्मक दिशा में)

तथा पुनः अधिकतम से शून्य हो जाती है। ऐसे विद्युत् वाहक बल (Electromotive force, e.m.f.) जिसका परिमाण तथा दिशा समय के साथ बदलें तथा एक निश्चित समय के बाद पुनः उसी दिशा में उसी परिमान के साथ प्रारंभ हो जाए, प्रत्यावर्ती वि.वा.ब. (Alternating e.m.f.) कहते हैं। इसी प्रकार ऐसी विधुत धारा को, जिसका परिमाण और दिशा समय के साथ बदले  तथा एक निश्चित समय के बाद एक निश्चित दिशा में उसी परिमाण के साथ प्रारंभ हो जाये, प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current, A.C.)  कहते हैं।


नाभिक का प्रभावी आकार Effective Size Of Nucleus

रदरफोर्ड का माडल α कणों के प्रकीर्णन को समझाने में अत्यधिक सफल रहा है। इस माडल के अनुसार परमाणु का धन आवेश तथा लगभग समस्त द्रव्यमान नाभिक में केन्द्रित होता है, जिसके चरों ओर इलेक्ट्रान स्थित होते हैं। नाभिक का आकार परमाणु के आकार से बहुत कम होता है। नाभिक का आकार चाहे जितना भी छोटा क्यों ना हो, शून्य ना होकर परिमित (Finite) होगा। नाभिक का प्रभावी आकार α कण के नाभिक के पास पहुँचने की निकटतम दूरी के बराबर होगा। यदि α कण अपनी उर्जा के अनुसार नाभिक से कुछ दूर पहुंचकर उसी मार्ग से वापस लौट जायेगा अर्थात प्रकीर्णन कोण 180° होगा। इस अवस्था में कूलाम के व्युत्क्रम-वर्ग नियम (coulomb’s inverse square law) का पालन होगा। यदि α कण की उर्जा बढ़ाते जाएँ, तो यह अब नाभिक के अधिक पास जाकर लौटेगा तथा अब भी कूलाम के व्युत्क्रम-वर्ग नियम का पालन करेगा। α कण की उर्जा बढ़ाने पर एक ऐसी स्थिति आयेगी कि कूलाम का व्युत्क्रम-वर्ग नियम सत्य नहीं रहेगा। नाभिक से जितनी दूरी तक कूलाम का व्युत्क्रम वर्ग नियम सत्य रहता है तथा अधिक पास आने पर यह सत्य नहीं रहता है, उस दूरी को नाभिक का प्रभावी आकार (Effective Size Of Nucleus) कहते हैं।

प्रयोगों द्वारा यह पाया जाता है कि नाभिक 10-12 सेमी. दूरी तक यह नियम सत्य रहता है। अतः नाभिक का आकार 10-12 सेमी. की कोटि का होता है। स्पष्ट है कि α-कानों के प्रकीर्णन का प्रयोग नाभिक के प्रभावी आकार को ज्ञात करने की एक उत्तम विधि है।


आयनों की अभिधारणा Concepts of Ions

जिस प्रकार विद्युत् धारा कुछ ठोस (धातुओं) में होकर प्रवाहित होती है, उसी तरह अनेक द्रवों (पारा, पिघली हुई धातुएं, विभिन्न लवणों के घोल, विभिन्न क्षार तथा अम्ल) में भी विद्युत् चालकता का गुण होता है जिन्हें सुचालक द्रव कहते हैं\ जिन द्रवों की विद्युत् चालकता शून्य होती है अर्थ जो अपने में विद्युत् धारा प्रवाहित नहीं होने देते हैं (जैसे-शुद्ध जल, कार्बनिक द्रव तेल आदि) उन्हें कुचालक द्रव कहते हैं\ परन्तु ठोसों और द्रवों की चालकता में एक अंतर है, जब किसी तार में होकर धारा प्रवाहित की जाती है, तो वह गर्म हो जाता है, अर्थात भौतिक परिवर्तन तो होता है, परन्तु रासायनिक परिवर्तन नहीं होता है। इसके विपरीत सुचालक द्रव दो तरह से व्यवहार करते हैं। कुछ द्रव तो ऐसे होता हैं जो विद्युत् धारा को निकल जाने देते हैं, परन्तु उनमे रासायनिक क्रिया नहीं होती है, जैसे- पारा, पिघली हुई धातुएं आदि। कुछ द्रव ऐसे होता है जो विद्युत् धारा प्रवाहित होने पर धन तथा ऋण आयनों में विघटित (decompose) हो जाते हैं। इनके उदाहरण हैं- नमक का घोल, सोडियम हाइड्राक्साइड (NaOH), सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3), कॉपर सल्फेट (CuSO4) तथा गंधक का अम्ल (H2SO4) के पानी में घोल आदि।

वे सुचालक द्रव जिसमे विद्युत् धारा प्रवाहित करने पर रासायनिक क्रिया होने लगती है अर्थात वे धन और ऋण आयनों (Ions) में टूट जाते हैं, विद्युत् अपघट्य (Electrolytes) कहलाते हैं। इस रासायनिक अभिक्रिया को विद्युत् अपघटन कहते हैं\ वह बर्तन जिनमें विद्युत् अपघटन की क्रिया होती है, वोल्टामीटर (Voltameter) कहलाता है। वोल्टामीटर के अन्दर पड़ी हुई धातु की दो प्लेटें इलेक्ट्रोड (Electrode) कहलाती हैं। जिस इलेक्ट्रोड पर धारा प्रवेश करती है, उसे एनोड (Anode) कहते हैं तथा जिससे होकर बाहर निकलती है, उसे कैथोड (Cathode) कहते हैं। अतः एनोड पर वे आयन एकत्रित होंगे जिन पर धन आवेश होगा। इसी कारण एनोड पर एकत्रित होने वाले आयन को ऋणायन (Anions) तथा कैथोड पर एकत्रित होने वाले आयनों को धनायन (Cations) कहते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है की विद्युत् अपघट्य में धारा धन तथा ऋण दोनों प्रकार के आयनों के कारण बहती है, जबकि ठोसों में धारा केवल इलेक्ट्रानों के कारण बहती है।


ब्लैक होल Black Hole

किसी तारे से प्रकाश, ताप आदि के रूप मेंनिकलने वाली उर्जा उस तारे पर बहार की ओर एक दबाव उत्पन्न करतीहै और दबाव उस तारे के द्रव्यमान द्वारा केंद्र की ओर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित रखता है, परन्तु जब उस तारे के द्रव्यमान द्वारा केंद्र की ओर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित रखता है, परन्तु जब उस तारे के ताप-नाभिकीय उर्जा (Thermo-Nuclear Energy) का भंडार समाप्त हो जाता है, तब वह स्वयं को गुरुत्वाकर्षण मृत्यु (Gravitational Collapse) से बचा नहीं सकता। यदि उस तारे का भार सूर्य के भार से 1.6 गुना अधिक हो, तो यह तारा केंद्र की ओर लगने वाले स्वयं के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सिकुड़ने लगेगा और इसका आकार क्रमशः लगातार छोटा होता चला जायेगा, इसकी त्रिज्त्य लगातार छोटी होती चली जाएगी, परन्तु भीतर की ओर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल निरंतर बढ़ता चला जायेगा, छोटी होने की इस प्रक्रिया में त्रिज्या जब एक विशेष लम्बाई की रह जाएगी, जिसे स्वाशीज त्रिज्या (Shwarzschild radius) कहते है, तब इसका  गुरुत्वाकर्षण बल अनंत हो जायेगा, जो तारे के समस्त पदार्थ को चरों ओर से दबाकर केंद्र पर ले जाकर तारे को विलीन कर देगा, केंद्र का आयतन तो नगण्य रहता है, परन्तु घनत्व अनंत हो जाता है। इस प्रकार उस तारे की मृत्यु हो जाती है। स्वाशीज त्रिज्या से निर्मित अनंत शक्ति वाले इसी गोले को ब्लैक होल कहते हैं। ब्लैक होल के भीतर कोई भी चीज जा सकती है, परन्तु उसके बाहर किसी भी हालत में नहीं निकल सकती। ब्लैक होल के भीतर विज्ञान के सभी नियम विफल हो जाते हैं, उदाहरण के लिए, पदार्थ और उर्जा की अविनाशिता का नियम, ब्लैक होल के भीतर पदार्थ और उर्जा दोनों का नाश हो जाता है।

अनेक प्रयोगों में यह सिद्ध हो चुका है कि आकाश में भरी संख्या में ब्लैक होल हैं। नन्हें ब्लैक होलों (Mini Black Holes) की संख्या काफी अधिक है यदि कोई बड़ा ब्लैक होल पृथ्वी के सामने आ जाये, तो सम्पूर्ण पृथ्वी उसके पेट में समाकर तत्काल गायब हो जायेगी। ब्लैक होल तारों की ही तरह अन्तरिक्ष में चलते रहते हैं। यदि कोई ब्लैक होल पृथ्वी के निकट से गुजर रहा हो तो वह पृथ्वी के बहुत सारे पदार्थ को नोचता हुआ, जैसे महासागरों को या किसी महाद्वीप को, निकल सकता है।

जब विद्युत् चुम्बकीय तरंगे (प्रकाश अथवा रेडियो तरंगे) वैज्ञानिकों द्वारा भेजी जाती हैं और वे किसी स्थान में अकारण मुड़ जाती हैं, तो वैज्ञानिक सतर्क हो जाते हैं। की उस अमुक स्थान में ब्लैक होल है। ब्लैक होल के स्थान का यही आखिरी तरीका है। ब्लैक होल न तो आँखों से देखा जा सकता है और न ही किसी यंत्र से, क्रोंकी ब्लैक से सूचना लाने लाने के लिए भेजी गयी प्रकाश और रेडियो तरंगें ब्लैक होल में समा जाती हैं, वे सूचना लेकर वापस नहीं आती हैं।


चुम्बकीय तूफान Magnetic Storm

चुम्बकीय तूफान धरती के चुम्बकीय क्षेत्र में एक बड़ा व्यवधान है, जिसके कारण भू-चुम्बकीय क्षेत्र अस्त-व्यस्त हो जाता है। यह पृथ्वी पर चुम्बकीय सौर-फ्लेयर के कारण उठता है। सौर-फ्लेयर सूर्य के धरातल पर होने वाली उथल-पुथल है, जो सूर्य के धब्बों की गतिविधियों से सम्बद्ध। सौर-फ्लेयर सौर-अंधी को शक्तिशाली बना देता है। सौर-आंधी सूर्य के धरातल से उठकर चारों ओर आकाश में फैलने वाली वह आंधी है। जिसमे इलेक्ट्रान और प्रोटॅान नामक अवशित कण होते हैं और जो 700 किमी. (400 मील) प्रति सेकेण्ड की गति से चलती है। यही आंधी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश कर इसे अस्त-व्यस्त कर देती है।

इसी चुम्बकीय आंधी के कारण चुम्बकीय कम्पस गलत ढंग से कम करने लगता है। इससे रेडियो प्रसारण में बाधा पड़ जाती है। सौर आंधी के आवेशित कण (इलेक्ट्रान और प्रोटान) पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर एकत्रित हो जाते हैं और ध्रुवों के आस-पास आकाश में सुन्दर रंगों का निर्माण करते हैं, जिन्हें औरोरा (Aurora) कहते हैं।


रमन प्रभाव Raman Effect

भारतीय वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकटरमण को इस खोज के कारण नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। यह खोज क्वांटम मैकेनिक्स पर आधारित है। यह क्लासिकल भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती है। जिसके अनुसार अणु किसी भी आवृत्ति के प्रकाश तरंगों का उत्सर्जन (Emission) या अवशोषण कर सकते हैं।

क्वांटम भौतिक के अनुसार अणु विभिन्न (discrete) आवृत्तियों के प्रकाश-तरंगों का उर्सर्जन या अवशोषण कर सकते हैं, यदि किसी निश्चित आवृत्ति का प्रकाश परमाणु पर आपतित होता है तो उस प्रकाश तरंग की उर्जा का एक अंश ग्रहण करके वह परमाणु उत्तेजित अवस्था में अ जाता है, इस प्रकार आपाती प्रकाश तरंग की उर्जा का कुछ भाग उस अणु को मिल जाता है। उत्तेजित अणु अपनी उर्जा का कुछ भाग आपति प्रकाश को दे देता है। अणुओं के साथ संघट्ट के परिणामस्वरूप आपाती प्रकाश के कुछ फोटानों की उर्जा में कमी आ जाती है और कुछ की उर्जा में वृद्धि हो जाती है। अधिकांश फोटानों की उर्जा में न तो वृद्धि होती है और न वे अपनी उर्जा अणुओं को देते हैं। इसलिए जब एकवर्णी प्रकाश का किरण पुंज अणुओं से संघट्ट करता है, तब यह एकवर्णी नहीं रह जाता है। प्रकीर्णित किरणों में आपाती किरणों से ऊँची आवृत्तियां (एंटी स्ट्रोक रेखाएं) तथा उससे नीची आवृत्तियां (स्ट्रोक रेखाएं) भी प्रकट हो जाती हैं।


आवर्त सारणी में हाइड्रोजन का स्थान The Position Of Hydrogen In The Periodic Table

हाइड्रोजन को अवर्त सारणी के IA वर्ग और प्रथम आवर्त में रखा गया है, क्योंकि यह IA वर्ग की क्षारीय धातुओं के गुणों से समानता रखता है, परन्तु इसका व्यवहार VIIB वर्ग के हैलोजेनों से समानता रखता है। इसी कारण इसका स्थान आवर्त सारणी में विवाद का विषय है|

क्षार धातुओं और हाइड्रोजन में समानता

1. क्षार धातुओं और और हाइड्रोजन दोनों के बाहरी कक्ष में केवल एक इलेक्ट्रान होता है। जिसे खो देने की प्रवृत्ति दोनों में होती है।

2. दोनों ही सरलता से इलेक्ट्रान त्याग सकते हैं और धन आयन बनाते हैं। दोनों ही प्रबल धन-विद्युती हैं।

3. हाइड्रोजन और क्षार धातुएं दोनों अधात्विक तत्वों के प्रति बंधता रखते हैं।

हैलोजेनों से समानता

1. हैलोजन और हाइड्रोजन दोनों ही प्रारूपी अधातुएं हैं।

2. हैलोजन और हाइड्रोजन दोनों के अणु द्विपरमाण्विक (Diatomic) होते हैं।

3. हैलोजन और हाइड्रोजन दोनों की संयोजकता 1-1 होती हैं।

4. दोनों ही इलेक्ट्रान ग्रहण कर रिनयन बनाते हैं।

5. दोनों ही धातुओं के प्रति बंधुता प्रकट करते हैं।

6. धातुओं और अधातुओं दोनों से क्रिया करके ये समान सह-संयोजक यौगिकों का निर्माण करते हैं।

7. कार्बनिक यौगिकों में हाइड्रोजन के स्थान पर हैलोजेनों  का प्रतिस्थापन दोनों के समान स्वरूप को प्रकट करता है।

हाइड्रोजन का विशिष्ट स्थान

हाइड्रोजन का आवर्त सारणी में विशिष्ट स्थान है, क्योंकि यह क्षार धातुओं और हैलोजेनों दोनों से भिन्न है। उदाहरण के लिए –IA वर्ग की धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय (Na2O) आदि होते हैं, जबकि हाइड्रोजन का ऑक्साइड (H2O) उदासीन होता है। अतः हाइड्रोजन को आवर्त सारणी में एक विशिष्ट स्थान दिया गया है।


परमाणु घड़ी Atomic Clock

परमाणु घड़ियाँ परमाणुओं अथवा अणुओं के कम्पन के आधार पर चलती हैं। दुनिया में अब तक सभी घड़ियों में परमाणु घडियां सबसे अधिक शुद्ध समय बताने वाली घड़ी है। एक लाख वर्षों में इसमें केवल कुछ ही सेकेंडों का अंतर आता है।


इंद्र धनुष Rainbow

प्रायः वर्षा होने के पश्चात् सूर्य की ओर पीठ करके आकाश की ओर देखने परएक चमकीला वर्णक्रम दृष्टिगोचर होता है। इस प्राकृतिक दृश्य का कारण वायुमंडल में उपस्थि पानी छोटी बूंदों द्वारा सूर्य के प्रकाश का विक्षेपण है। इस प्रकार प्राप्त वर्णक्रम एक वृत्तिय चाप पर व्यवस्थित होता है, जिसके आतंरिक किनारे पर पर बैंगनी वर्ण तथा वाह्य किनारे पर लाल वर्ण मिलता है। इसे प्रथम इन्द्रधनुष कहते हैं। कभी-कभी इस वृतांश चाप के बाहर एक अन्य चाप भी दृष्टिगोचर होता है। जो अपेक्षाकृत कम चमकीला और इसके वर्णों का क्रम प्रथम धनुष के क्रम की अपेक्षा उल्टा होता है। इसे द्वितीय इन्द्रधनुष (secondary rainbow) कहते हैं।

जब सूर्य की किरणें किसी बूंद पर पड़ती हैं, तो वह बूंद से अपवर्तित होकर विभिन्न अवयव वर्णों में विभाजित हो जाति हैं। ये अपवर्तित किरणें बूंद के अन्दर पूर्ण परावर्तित होकर पुनः वायु में निकल जाती है, विभिन्न वर्णों की निर्गत किरणों में विचलन का मान भिन्न भिन्न होता है, जिससे विक्षेपण उत्पन्न हो जाता है।


तरल दिक् सूचक Liquid Compass

शुष्क दिक् सूचक में एक डिबिया के भीतर चूल (PIvot)  पर स्थित चुम्बकीय सुई हवा में घुमती है। इसमें द्रव पदार्थ नहीं होता है। यही कारण है कि इसे शीषक दिक् सूचक कहते हैं। इसमें डायल को रोकने के लिए एक चेक स्प्रिंग लगी होती है। सूचक को हिलने डुलने से रोकने के लिए स्टॉप स्टड लगा होता है। इस दिक् सूचक से दिक् मान को निश्चित करने में कठिनाई होती है, क्योंकि डायल को स्थिर होने में कुछ समय लगता है।

तरल दिक् सूचक में इस कमी को दूर किया गया है। इसमें एक डिबिया के भीतर सुई या डायल किसी तरल पदार्थ के भीता घूमता रहता है। यह कभी भी न जमने वाला तरल पदार्थ अल्कोहल और स्रावित जल (distilled water) का मिश्रण होता है। इससे दिक् मान लेने में अधिक समय नहीं लगता है। रीडिंग भी शुद्धता से प्राप्त होती है।

सेना में तरल दिक् सूचक का ही प्रयोग होता है, शुष्क दिक् सूचक का नहीं।


डॅाप्लर प्रभाव Doppler’s Effect

प्रकाश में डॅाप्लर के प्रभाव का उपयोग तारों तथा गैलेक्सी के वेग को ज्ञात करने में, कृत्रिम उपग्रह के ट्रेकिंग में, विमान तथा पनडुब्बी का वेग ज्ञात करने में, सूर्य की घूर्णन दर ज्ञात करने में तथा वर्ण पटीय रेखाओं की मोटाई ज्ञात करने में होता है।

यदि कोई प्रकाश स्रोत पृथ्वी पर खड़े प्रेक्षक की ओर आ रहा है, तो प्रेक्षक को प्रकाश की आवृत्ति बढ़ी हुई अथवा तरंगदैर्ध्य घटी हुई प्रतीत होगी तथा वर्णपटीय स्पेक्ट्रमी रेखा स्पेक्ट्रम के बैंगनी सिरे (Violet End) की ओर विस्थापित होगी। इसके विपरीत, यदि प्रकाश उद्गम प्रेक्षक से दूर जा रहा है, तो वर्णपटीय रेखाएं स्पेक्ट्रम के लाल सिरे (Red End) की ओर विस्थापित होंगी। तरंगदैर्ध्य में यह विस्थापन डॅाप्लर विस्थापन (Doppler shift) कहलाता है।

ध्वनि तथा प्रकाश के डॅाप्लर प्रभावों में एक मुख्य अंतर है। ध्वनि के लिए डॅाप्लर प्रभाव , केवल ध्वनि स्रोत तथा श्रोता के मध्य आपेक्षिक गति पर ही निर्भर नहीं करता है, बल्कि इस तथ्य पर भी निर्भर करता है की ध्वनि-स्रोत तथा श्रोता दोनों में कौन चल रहा है। उदाहरण के लिए, यदि श्रोता स्थिर हो तथा स्रोत उसकी ओर जा रहा हो तब डॅाप्लर प्रभाव से उत्पन्न ध्वनि आवृत्ति में परिवर्तन उस प्रभाव से भिन्न होगा, जब स्रोत स्थिर स्थिर हो तथा श्रोता उसी वेग से स्रोत से दूर जा रहा हो। इसके विपरीत, प्रकाश में डॅाप्लर प्रभाव, केवल प्रकाश-स्रोत तथा प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति पर निर्भर करता है, इस बात पर नहीं की दोनों में कौन गतिशील है। प्रकाश के लिए डॅाप्लर प्रभाव की गणना आइन्स्टीन के सापेक्षिकतावाद के सिद्धांत (Einstein’s theory of relativity) के आधार पर की जाती है।

डॅाप्लर प्रभाव का कृत्रिम उपग्रह के ट्रेकिंग (Tracking of artificial satellite) में महत्वपूर्ण उपयोग है। कृत्रिम उपग्रह एक नियत आवृत्ति का रेडियो संकेत पृथ्वी की ओर भेजता है। पृथ्वी स्थित ट्रैकिंग केंद्र पर रेडियो संकेत को स्थानीय रेडियो संकेत से मिलाकर श्रव्य विस्पंद (Audible Beats) उत्पन्न किये जाते हैं, जैसे ही उपग्रह ट्रैकिंग केंद्र से गुजरता है, विस्पंदों का तारतत्व (Pitch) घट जाता है।

डॅाप्लर प्रभाव के द्वारा विमान तथा पनडुब्बी के वेग ज्ञात किया जाता है। जब कोई विमान या पनडुब्बी राडार स्टेशन की ओर जाती है, तो विमान या पनडुब्बी में परावर्तित राडार (विद्युत् चुम्बकीय) तरंगों की तरंगदैर्ध्य घट जाती है। इसके विपरीत जब विमान, राडार स्टेशन से दूर जाता है, तब परावर्तित तरंगों की तरंगदैर्ध्य बढ़ जाति है। इन प्रेक्षणों से विमान या पनडुब्बी का वेग ज्ञात कर लिया जाता है। इसका युद्ध के दिनों में बहुत उपयोग है। वायुयानों को दुर्घटना से बचाने के लिए भी उसका उपयोग किया जाता है।

डॅाप्लर प्रभाव से सूर्य की घूर्णन दर (spin-rate of the sun) भी ज्ञात करते हैं, जो पृथ्वी के सापेक्ष होती है। इसके लिए सूर्य के दोनों सिरों से आने वाले प्रकाश की तरंगदैर्ध्य ज्ञात करते हैं। इस प्रेक्षणों से सूर्य की घूर्णन दर ज्ञात हो जाती है। प्रयोगों से यह दर लगभग 2 किमी./सें पाई गयी है तथा वह पूर्व से पश्चिम की ओर है।

तारों तथा आकाशगंगाओं के वेग को ज्ञात करने में भी डॅाप्लर प्रभाव का उपयोग किया जाता है। तारे तथा आकाशगंगा दैदीप्यमान होने के कारण प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इनके वेग का अनुमान लगाने के लिए इनसे प्राप्त आकाश के वर्णपद का फोटोग्राफ खींचा जाता है। वर्णपद में कुछ तत्वों जैसे हाइड्रोजन, हीलियम, पारा इत्यादि की रंगीन रेखाएं दिखाई पड़ती हैं, जिनकी तरंगदैर्ध्य ज्ञात कर ली जाती है। ये रेखाएं प्रयोगशाला में भी इस तत्व का स्पेक्ट्रम लेकर देखी जा सकती हैं तथा इनकी तरंगदैर्ध्य निश्चित होती है। इन स्पेक्त्रमों की तुलना करने पर ज्ञात होता है की तारे के स्पेक्ट्रम में किसी रेखा का तरंगदैर्ध्य, प्रयोगशाला में लिए गए स्पेक्ट्रम में उसी रेखा के तरंगदैर्ध्य से अधिक है, तो तारा पृथ्वी से दूर जा रहा है और यदि कम है तो, तो तारा पृथ्वी की ओर आ रहा है। विभिन्न आकाशगंगाओं पर लिए गए प्रेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि ये हमसे दूर भाग रही हैं। यह भी ज्ञात हुआ है जो आकाश गंगा हमसे जितनी दूर है, उतनी ही अधिक चाल से वह दूर जा रही है। इन प्रेक्षणों से प्रसारी विश्व सिद्धांत (Theory of Expanding universe) की पुष्टि होई है।


उर्जा Energy

उर्जा ब्रह्माण्ड का अवयव है, किसी वस्तु में कार्य करने की क्षमता को उर्जा कहते हैं। प्रत्येक द्रव्य (Matter) में एक निश्चित उर्जा होती है। उर्जा के कारण ही द्रव्य में परिवर्तन होता है। उर्जा में न तो भार होता है, न ही आकार। ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हम उर्जा के प्रभाव का अध्ययन करते हैं। प्रकाश, ऊष्मा, विद्युत्, चुम्बकत्व ध्वनि आदि उर्जा के विभिन्न रूप हैं। जो परस्पर एक दुसरे में परिवर्तित किये जा सकते हैं। द्रव्य (Matter) तथा उर्जा (energy) का विनाश नहीं होता है। दोनों एक दूसरे से किसी ना किसी रूप में सम्बंधित होते हैं। आइन्स्टीन (1905 ई.) के अनुसार द्रव्यमान को उर्जा में समीकरण E = ΔmxC2 के अनुसार परिवर्तित किया जा सकता है।

परमाणु उर्जा Atomic Energy

वह उर्जा जो किसी रेडियो एक्टिव तत्व के परमाणु को कृत्रिम रूप से विखंडित करने से प्राप्त की जाती है, परमाणु उर्जा कहलाती है। परमाणु में  प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान नियमित संख्या और’ अनुपात में व्यवस्थित रहते हैं। इस व्यवस्थित संरचना को विखंडित करने से परमाणु उर्जा प्राप्त होती है। इसका उपयोग ध्वंसात्मक प्रयोजनों की अपेक्षा उपयोगी प्रयोजनों में किया जा सकता है।


श्रृंखला अभिक्रिया Chain Reaction

यूरेनियम-235 के परमाणु पर मंदगति वाले न्युत्रनों से प्रहार किये जाने पर यूरेनियम परमाणु लगभग दो भागों में विभाजित हो जाता है। फलस्वरूप उर्जा और नए न्यूट्रान विमुक्त होते हैं। इस प्रकार विमुक्त नये न्यूट्रान यूरेनियम-235 के अन्य परमाणुओं से टकराते हैं और पुनः उसका विखंडन करते हैं, जिससे अतिरिक्त उर्जा और न्यूट्रान उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार नाभिकीय उर्जा की एक श्रृंखला बन जाती है, जो अपरिमित उर्जा विमुक्त करती है। इसे श्रृंखला कहा जाता है। नाभिकीय संलयन (Nuclear Fussion) में भी इसी प्रकार की श्रृंखला बनती है।


भारी हाइड्रोजन Heavy Hydrogen

हाइड्रोजन के समस्थानिकों, ड्यूटीरियम और ट्राइट्रियम को भारी (Heavy) हाइड्रोजन कहा जाता है। परमाणु का द्रव्यमान, नाभिक अर्थात प्रोटानों और न्यूट्रानों पर निर्भर करता है। नाभिक में न्यूट्रानों की संख्या बढ़ा देने पर इसका केवल द्रव्यमान बढ़ता है। परमाणु संख्या नहीं। हाइड्रोजन के परमाणु के नाभिक में केवल एक प्रोटान रहता , उसमे एक न्यूट्रान बढ़ा देना पर है इसका भार दोगुना हो जाता है, परन्तु परमाणु संख्या में अंतर नहीं पड़ता है। हाइड्रोजन के इस समस्थानिक को भारी हाइड्रोजन (Heavy हाइड्रोजन) कहा जाता है।


आपेक्षिक घनत्व (Relative Density)- किसी वस्तु का घनत्व उसके एकांक आयतन के द्रव्यमान को कहा जाता है। विशिष्ट परिस्थितियों में किसी पदार्थ का घनत्व सर्वदा समान रहता है। फिर भी किसी पदार्थ का घनत्व उसका लाक्षणिक गुण (Characteristic feature) होता है। यह भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए भिन्न भिन्न होता है। उदाहरणस्वरूप, सोने (Gold, Au) का घनत्व 19300 kg/m3 है, जबकि पानी का 1000 kg/m3 है।

घनत्व, जिसका SI मात्रक (Unit) किलोग्राम प्रति घनमीटर है, पदार्थ की शुद्धता की जाँच में सहायक होता है। प्रायः किसी पदार्थ के घनत्व को पानी के घनत्व की तुलना में व्यक्त करना सरल होता है। किसी पदार्थ का आपेक्षिक घनत्व उस पदार्थ का घनत्व तथा पानी के घनत्व का अनुपात होता है जिसे निम्न सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

आपेक्षिक घनत्व = किसी पदार्थ का घनत्व / पानी का घनत्व

आपेक्षिक घनत्व का कोई भी मात्रक नहीं होता, क्योंकि यह एक अनुपात है।

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