शासन व्यवस्था के महत्वपूर्ण पक्ष Important Aspects of Governance

अभिशासन एक बहुत ही विस्तृत अवधारणा है जो प्रत्येक स्तर पर संचालित होती है, जैसे घरेलू स्तर पर, ग्राम, नगरपालिका, राष्ट्र, क्षेत्र या वैश्विक स्तर पर। संयुक्त राष्ट्र ने, सु-शासन की सहस्राब्दिक विकास लक्ष्यों का एक अत्यावश्यक घटक माना है क्योंकि सुशासन गरीबी, असमानता एवं मानवजाति की अन्य अनेक खामियों के खिलाफ संघर्ष के लिए एक आधारभूमि की रचना करता है।

अभिशासन का अर्थ सरकार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि अभिशासन के तीन पहलू किसी भी समाज में परस्पर निर्भर होते हैं। वस्तुतः सामाजिक अभिशासन भौतिक आधार एवं राजनीतिक अभिशासन किसी समाज की सुव्यवस्था और एकता की गारंटी देता है।

अभिशासन के अंतर्गत जटिल रचनाओं, प्रक्रियाओं, संबंधों तथा ऐसी संस्थाओं का समावेश है जिनके माध्यम से नागरिक एवं लोक समूह अपने हितों के बारे में आवाज़ बुलंद करते हैं, अपने अधिकारों और कर्तव्यों का पालन करते हैं और अपने विभेदों की मध्यस्थता करते हैं। नागरिक समाज या निजी सेक्टर की तुलना में रॉज्ये अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह एक सामाजिक एवं आर्थिक दोनों ही प्रकार के अभिशासनों के लिए संगठनात्मक गतिशीलता और राजनीतिक तथा अधिकार क्षेत्र सम्बन्धी प्रणालियां उपलब्ध कराता है।

इस प्रकार अभिशासन का तात्पर्य इतना ही नहीं है कि कोई सरकार या सामाजिक संगठन किस प्रकार आपसी अभिक्रिया करते हैं अपितु इसका संबंध नागरिकों एवं अन्य कारकों के प्रति सेवा प्रदान करने में राज्य की क्षमता से है, साथ ही इस बात से कि जन प्रकायाँ को किस तरह पूरा किया जा रहा है, जनता के संसाधनों का प्रबंधन कैसे हो रहा है तथा लोक नियामक शक्तियों का प्रयोग कैसे किया जा रहा है। इसलिए अभिशासन की तुलना किसी राष्ट्रीय राज्य के नागरिकों को राजनीतिक वस्तु सामग्रियों के प्रबंधन, आपूर्ति एवं प्रदायन से की जा सकती है। राजनीतिक वस्तु-सामग्रियां अनेक हैं और उनमें शामिल हैं- जन सुरक्षा, कानून का शासन, राजनितिक एवं स्वतंत्रताएं, चिकित्सा एवं शिक्षा, संचार नेटवर्क, मुद्रा एवं बैंकिग प्रणाली, वित्तीय एवं संस्थात्मक संदर्भ, नागरिक समाज के लिए सहायता, या पर्यावरण के सामान्य तत्वों की साझेदारी के बारे में नियमन। अभिशासन की प्रथा सामुदायिक मूल्यों, औपचारिक परम्पराओं, स्वीकृत कार्य प्रथाओं या अलिखित आचार-संहिताओं द्वारा भी शासित होती है।

भारत में अभिशासन या अच्छा शासन की अवधारणा नई नहीं है अपितु यह रामराज्य एवं स्वराज की परम्परागत अवधारणा का नया नाम है। नैतिक मूल्यों एवं धर्म की विशद् व्याख्या से युक्त भारतीय शास्त्रों में राजा के कर्तव्यों तथा राजधर्म के बारे में विस्तृत उल्लेख मिलता है।

श्रीमद्भागवतगीता, यजुर्वेद, मनुस्मृति, महाभारत, चाणक्य का अर्थशास्त्र तथा कामण्डक के शुक्रनीति सार इत्यादि ग्रंथों में सुशासन के व्यापक नियम वर्णित किए गए हैं। बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के मूल मंत्र पर आधारित लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी अंशतः सुशासन या अच्छे शासन की दिशा में ही एक कदम है, किंतु वर्तमान में अच्छे शासन की अवधारणा बीसवीं सदी के अंतिम दशक में विश्वव्यापी आर्थिक परिवर्तनों तथा लोक प्रशासन की विफलता के क्रम में विकसित हुई है। सामान्यतः यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार तथा शासन एक ही है? वास्तव में शासन का अर्थ सरकार की उस अवधारणा से लिया जाता है जिसमें उसकी गुणवत्ता प्रकट होती है। इस प्रकार अभिशासन, सरकार की एक पद्धति या प्रणाली है। अभिशासन का प्रचलन सर्वप्रथम 1628 में इंग्लैंड में हुआ। भारत के संदर्भ में अभिशासन की दिशा में प्रथम प्रयास राजीव गांधी के शासनकाल में शुरू हुआ जब इस विषय पर पांच क्षेत्रीय कार्यशालाएं आयोजित की गई।

भारत की संवैधानिक प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को कानून के सामने समानता एवं संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। कानून द्वारा स्थापित प्रविधि के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में बहुमत की यह राय प्रकट हुई थी कि कानून का शासन और लोकतंत्र  भारतीय संविधान की धारा-368 के अधीन वर्णित संशोधन प्रक्रिया के अनुसार उनमें संशोधन नहीं किया जा सकता।

भारत में लोक सेवा प्रदायन को बेहतर बनाने की दिशा में जिन तीन संस्थाओं ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है, वे हैं-

  1. न्यायपालिका
  2. मीडिया, और
  3. नागरिक समाज

सुशासन के समक्ष खाड़ी केन्द्रीय चुनौती का सम्बन्ध सामाजिक विकास से है। सु-शासन का अपरिहार्य उद्देश्य सामाजिक अवसरों का विस्तार और गरीबी उन्मूलन होना चाहिए। संक्षेप में, सु-शासनका अर्थ है-न्याय, सशक्तीकरण, रोजगार एवं क्षमतापूर्वक सेवा प्रदायन सुनिश्चित करना।

न्याय सुनिश्चित करने से जुड़े कई पहलू हैं, जैसे जान-माल की सुरक्षा, न्याय तक लोगों की पहुंच होना और कानून का शासन। सबसे महत्वपूर्ण जन-कल्याण है- सुरक्षा, खासतौर पर जान-माल की सुरक्षा। विशेष रूप से आतंकवाद (जम्मू-कश्मीर), विद्रोह (उत्तर-पूर्वी राज्य) एवं नक्सलवादी हिंसा से प्रभावित 150 भारतीय जिलों में लोगों की जान-माल की हिफाजत करने का भारतीय राष्ट्र-राज्य का दायित्व चुनौतियों से घिरा हुआ है।

न्याय तक पहुंच होना इस मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है कि लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों से अवगत होना चाहिए तथा कानून की गरिमा में उनका दृढ़ विश्वास होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता में मामला इसके उलट है। कुछ नागरिकों को तो अपने अधिकार ही मालूम नहीं है और अधिकतर लोग वकीलों की क़ानूनी फ़ीस नहीं चुका सकते। सबसे गंभीर चुनौती है न्याय की जटिलता क्योंकि कानूनी प्रक्रियाएं लम्बी और महंगी है और न्यायपालिका के पास इन मामलों के निराकरण के लिए कर्मचारियों और भौतिक ताम-झाम की कमी है। भारत में उच्च एवं निचली अदालतों में लाखों मुकदमे लंबित पड़े हैं और न्याय में देरी होती है।

हालांकि भारतीय राजनीति के सम्मुख सु-शासन की दिशा में अभी विविध प्रकार की चुनौतियों की भरमार है जिसमें गरीबी, निरक्षता, पहचान-आधारित संघर्ष, क्षेत्रीयतावाद, नक्सलवाद, आतंकवाद इत्यादि कुछ प्रबल चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों के साथ-साथ राजनीति का अपराधीकरण और भ्रष्टाचार सुशासन के पथ पर सार्थक रूप से अग्रसर होने में घातक सिद्ध हो रहे हैं। अपितु इन सबके बावजूद भारत में सु-शासन के कुछ सफल प्रयास हुए हैं। 1990 के दशक से ही, भारत में सु-शासन के आधार को व्यापक बनाने की दिशा में सरकारी एवं गैर-सरकारी एजेंसियों की ओर से प्रयास जारी हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत केंद्र और राज्यों में मुख्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की गई है। अधिकतर राज्यों में लोकायुक्त भी कार्य कर रहे हैं, तथापि राजनीतिक दलों के मध्य सहमति के अभाव में अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं नहीं हुई है। परिवहन, संचार, विधि एवं व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में कार्यरत मुख्य लोक सेवा एजेंसियों का नेटवर्क तैयार किया गया है और उन्हें उपयोगकर्ता-हितैषी बनाया गया है। जन योजना, नागरिक घोषणा, सामाजिक अंकेक्षण,जन-सुनवाई, एवं ई-शासन के क्षेत्रों में भी प्रयास किए गए हैं। शासन के महत्वपूर्ण पहलू निम्न हैं-

पारदर्शिता

नियमों एवं विनियमों का पालन करते हुए निर्णय लेना और उसे लागू करना संगठन की पारदर्शिता को बढ़ाता है। पारदर्शिता का मतलब है सरकार के कार्य-कलापों के बारे में आम जनता को जानकारी की सुस्पष्टता एवं उपलब्धता। सरकारों को न केवल जानकारी प्रदान करनी चाहिए। अपितु उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिक से अधिक नागरिकों को ये सूचनाएं उपलब्ध हो। सूचनाएं न सिर्फ सर्वग्राह्य होती हैं अपितु सरलता से समझने योग्य होती हैं। इससे जनसमुदाय प्रशासन के संबंध में अपने दृष्टिकोणों का तार्किक निर्धारण करने में सफल होता है।

भागीदारी

प्रतिभागिता या भागीदारी किसी भी कार्यरत नागरिक समाज का एक अत्यावश्यक तत्व है। सार्वजनिक क्षेत्र मीडिया की स्वतंत्रता और बहुलता को सशक्त करने वाले विधान को कार्यान्वित करके, एक स्वतंत्र निर्वाचन प्रबंधन संस्था की स्थापना करके तथा सरकारी योजनाओं और बजट निर्माण की निर्णय प्रक्रिया में लोगों के सुझावों को प्रोत्साहन देकर जन-भागीदारी का विकास कर सकते हैं।

अनुक्रियाशीलता

अच्छा अभिशासन कायम करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकारी मशीनरी या तंत्र द्वारा उपयुक्त समय के अंदर पूरी सचेतनता एवं बिना विभेद के नागरिकों को सेवा उपलब्ध कराई जाए। प्रशासनिक अनुक्रियाशीलता के अभाव में बेहतर शासन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

दायित्वशीलता

दायित्वशीलता सार्वजनिक क्षेत्र के कामकाज के मूल्यांकन के लिए संस्थापित मापदंडों पर आधारित है। इसके अंतर्गत संसाधनों के उपयोग की सक्षमता, व्यय-नियंत्रण एवं आतंरिक तथा वाह्य ऑडिट से परिघटित आर्थिक एवं वित्तीय दायित्वशीलता भी शामिल है। लोक एजेंसियों के दायित्वशीलता की पुरानी और नई दोनों ही प्रकार की संरचनाओं की सर्वव्यापक बनाया जाना चाहिए तथा आम लोगों की उनसे परिचित कराया जाना चाहिए। सार्वजनिक काम-काज की ऑडिटिंग को सर्वव्यापक बनाने का कम सुचना के अधिकार, मास मीडिया को सूचित एवं उत्तरदायी भूमिका, सामाजिक-सामुदायिक ऑडिटिंग के विकास और सबसे बढ़कर लोक सुनवाई एवं जागरूकता के माध्यम से किया जा सकता है। उत्तरदायित्व की संकल्पना में पारदर्शिता एवं भागीदारी आवश्यक घटक हैं।

प्रभावशीलता

अच्छे अभिशासन के लिए यह आवश्यक है की योजनाओं का कार्यान्वयन लागत प्रभावी हो। साथ-ही-साथ ऊर्जा संरक्षण एवं पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी प्रशासनिक गतिविधियों में दृष्टिगोचर होनी चाहिए। सक्षमता नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप सरकार की सेवाओं का सही ढंग से प्राथमिकीकरण करने से भी संबंधित है। इसके अंतर्गत सुरक्षा, स्वास्थ्यचर्या एवं शिक्षा जैसे प्रावधान आते हैं। सक्षमता की अवधारणा के प्रति व्यापक पैमाने की निगाह इस बात पर जमी रहती है कि सरकार किस हद तक उत्पादन और वितरण की आर्थिक रूप से सक्षम प्रणाली को बढ़ावा दे रही है और किस हद तक अनिश्चितता को कम कर रही है।

समता एवं समावेशन

एक समाज का कल्याण इस बात पर निर्भर करता है कि संसाधनों एवं उत्तरदायित्वों का स्वच्छ एवं निष्पक्ष वितरण किस मात्रा में हुआ है। अच्छे अभिशासन के लिए यह आवश्यक है कि समाज के हर तबके (वर्ग) के लोग विशेष तौर पर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोग, महिलाएं, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक, शारीरिक विकलांग लोग प्रशासनिक निर्णयों एवं गतिविधियों में पर्याप्त स्थान प्राप्त करें तथा उन्हें अपने विकास का पर्याप्त अवसर प्रदान हो।

जवाबदेयता

जवाबदेयता एवं मानवोन्मुखता अच्छे अभिशासन की आवश्यकता होती है। सरकारी संस्थाओं के लिए ही नहीं अपितु निजी क्षेत्रों तथा लोक समाज के संगठनों के लिए भी जनता के प्रति जवाबदेह होना आवश्यक होता है। उनके लिए यह आवश्यक है कि न सिर्फ उनके कार्यों की स्पष्ट परिभाषा हो अपितु कार्यों के क्रियान्वयन के समय मानवोचित दृष्टिकोण भी हो।

मतैक्यता

बेहतर शासन विचारों की सार्वभौमिकता एवं सर्वांगीणता का समर्थक होता है। किसी भी समाज में विभिन्न मतों के समर्थक अलग-अलग पद्धतियों का सहारा लेकर प्रशासनिक निर्णय-निर्माण को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं। सरकार के लिए यह आवश्यक होता है कि वह समेकित दृष्टिकोण अपनाकर चक्रीय व्यवहार की अवधारणा का सहारा लेकर समस्या समाधान की कोशिश में मतैक्य विकसित करने का प्रयत्न करे।

विधि का शासन

एक अच्छे शासन में स्पष्ट एवं स्वच्छ विधिक प्रारूप होते हैं और उनका बेहतर क्रियान्वयन होता है। गौरतलब है कि विधि का निष्पक्ष एवं तटस्थ लागू होना स्वतंत्र न्यायपालिका की मौजूदगी में सम्भव है। विधि का शासन तीव्र एवं बेहतर विकास का सूचक है जो स्वतंत्र न्यायपालिका के साथ-साथ दक्ष, निष्पक्ष एवं भ्रष्टाचाररहित पुलिस बल की गतिशीलता पर भी निर्भर करता है।

वैधता

वैधता एवं प्रतिभागिता का चोली-दामन का संबंध है। प्रतिभागिता के कई आयाम होते हैं। बेहतर प्रतिभागिता मीडिया की स्वतंत्रता और बहुलता को सशक्त करने वाले विधानों के कार्यान्वयन के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। इसे एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव करा सकने की शक्ति से संपन्न निर्वाचन प्रबंधन संस्था की स्थापना के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इसे स्थानीय सरकारों एवं आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के लिए समर्पित नागरिक सामाजिक संगठनों के बीच नियमित परामर्श के लिए संस्थापित युक्तियों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इसे गरीब तबके की पहुंच के दायरे में आने वाली कानूनी सहायता एवं परामर्श प्रणालियों के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इसे अक्सर संपन्न होने वाले स्थानीय चुनावों एवं रेफरेंडम इत्यादि के माध्यम से भी पाया जा सकता है। इसे पाने के लिए ई-गवर्नमेंट (ई-सरकार) और समुदाय नेटवर्को का सहारा लिया जा सकता है। इसे सरकारी योजनाओं एवं बजट सम्बन्धी निर्णय-प्रक्रिया में सुचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के उपकरणों के माध्यम से लोगों के सुझाव प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है।

भारत में सु-शासन के कुछ सफल प्रयास

  1. भागीदारी योजना: भारत में स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के दायरे में भागीदारी योजना-जिसे जन योजना के नाम से जाना जाता है- को संस्थागत रूप देने में केरल राज्य बेहद अग्रणी है। भागीदारी योजना वह प्रक्रियाहै जिसमें नागरिक अपनी आवश्यकताओं की पहचान कर सकते हैं और सामाजिक-राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बातचीत के दायरे में सक्रिय बनाए जा सकने वाले संसाधनों के अंतर्गत उन आवश्यकताओं की प्राथमिकताएं तय कर सकते हैं। यदि सही प्रबंधन किया जाए तो भागीदारी योजना सेवा-प्रदायन के क्षेत्र में मांग पर आधारित सुधारों की दिशा में ले जा सकती है और साथ ही अनुक्रियाशील स्थानीय सरकार की ओर भी।
  2. नागरिक रिपोर्ट कार्ड: सेवाओं की गुणवत्ता के बारे में लोगों के सरोकार के प्रत्युत्तर में पब्लिक अफेयर्स सेंटर द्वारा बंगलुरू में 1993 में नागरिक रिपोर्ट कार्ड विकसित किए गए। नागरिक रिपोर्ट कार्ड एक सर्वेक्षण के रूप में लोक सेवाओं के उपयोगकर्ता द्वारा सेवाओं की समीक्षा है। सेवाओं के बारे में की गई अन्य तकनीकी एवं आर्थिक समीक्षाओं से अलग हटकर नागरिकता रिपोर्ट कार्ड इस बात पर प्रकाश डालता है कि उपयोगकर्ताओं को सेवाओं का लाभ कैसे मिलता है और प्राप्त सेवाओं से वे किस सीमा तक संतुष्ट हैं। इन रिपोर्ट काडों का प्रयोग भारत के अन्य शहरों जैसे, अहमदाबाद, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली मुम्बई एवं पुणे में भी किया जा रहा है।
  3. सामाजिक अंकेक्षण: भारत में सामाजिक दायित्वशीलता संबंधी जितनी भी युक्तियों का प्रयोग किया गया, सामाजिक अंकेक्षण उनमें अनूठा था। भारंतीय प्रसंग में, सामाजिक अंकेक्षण पश्चिमी देशों में प्रयुक्त मैकेनिज्म से अलग ही परिप्रेक्ष्य और दृष्टांत पेश करता है। भारत में इसका सर्वप्रथम प्रयोग मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) द्वारा किया गया जो कि राजस्थान में मजदूरों और भूमिहीन किसानों को एकजुट करने वाली संस्था है। एमकेएसएस ने लोक दायित्वशीलता के जिस अभ्यास को आगे बढ़ाया वह बेहद लोकप्रिय हुआ और परिवर्तन एवं ऐक्शन एड जैसी अन्य संस्थाओं ने भी उसका प्रयोग प्रारंभ किया।

सामाजिक ऑडिट का आरम्भ नागरिक सामाजिक संगठनों द्वारा बुनियादी अधिकारों और विशिष्ट अधिकारों के मुद्दों के समाधान के प्रयास के रूप में तथा प्रशासन की भ्रष्ट प्रथाओं को उजागर करने के लिए किया गया था। मजदूर किसान शक्ति संगठन जैसे नागरिक समाज संगठनों दो दशकों के दौरान देश भर में सामाजिक अंकेक्षण के लिए कई अनुकूल कारक प्रकट हुए हैं- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 एवं महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, इत्यादि। अंततः यह पारदर्शिता, पूर्वानुमान, परामर्श, सहमति और दायित्वशीलता जैसे सार्वजनिक विषयों में कुछ आधारभूत नियम-कायदों को प्रोत्साहित करने का माध्यम है।

  1. जनसुनवाई: यह एक प्रकार का भागीदारीपूर्ण सामाजिक अंकेक्षण है जिसमें सार्वजानिक बहस के दौरान सरकारी अधिकारी नागरिकों के आमने-सामने पेश किए जाते है। जनसुनवाई का उद्देश्य था जनता के धन के व्यय का सामाजिक अंकेक्षण प्रस्तुत करना। जन सुनवाई की मदद से अधिक बिल आने, नकली मस्टर रॉल, कम मजदूरी के भुगतान और केवल कागज पर किए गए काम जैसी भ्रष्ट प्रथाओं की पहचान करने में मदद मिलती है। इसे सर्वप्रथम राजस्थान में शुरू किया गया।
  2. परिवर्तन: दिल्ली स्थित एक व्यक्तिगत पहल का नाम है। इसने अगस्त, 2002 में दिल्ली स्थित सुंदरनगरी और सीमापुरी क्षेत्रों में किए गए कार्यों की प्रतिलिपियां हासिल की और नुक्कड़ बैठकें करके स्थानीय लोगों को उन विस्तृत कार्यों के बारे में बताया जिन्हें दिल्ली नगर निगम द्वारा उनके ब्लॉकों में किए जाने का दावा किया गया था और यह भी कि उन पर कितना धन खर्च किया गया था। इन बैठकों से यह बात उभरकर सामने आई कि बहुत सारे कार्य या तो पूरे ही नहीं किए गए थे या उनकी गुणवत्ता सही नहीं थी।

ओडीशा में सामाजिक अंकेक्षण संबंधी पहल

वर्ष 2001 में, एक्शन एड इंडिया, मजदूर किसान शक्ति संगठन एवं जिला प्रशासनिक अधिकारियों के सहयोग से ओडीशा के बालनगीर जिले के झरनीपल्ली पंचायत में एक ग्राम सभा का आयोजन किया गया। ग्राम सभा में विगत् तीन वर्षों में ग्राम पंचायत द्वारा किए गए विकास कार्यों का एक दिवसीय सामाजिक ऑडिट किया गया। ऑडिट में पता चला कि काम पूरे नहीं किए गए लेकिन आबंटित धन का उपयोग किया गया था। हालांकि सरकार के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत ठेकेदारों पर प्रतिबंध लगाया गया था, फिर भी प्रोजेक्ट में इक्कतीस ठेकेदार कार्य कर रहे थे और इन ठेकेदारों द्वारा मस्टर रॉल का रख-रखाव नहीं किया जा रहा था। सबसे बढ़कर, सरकार के काम के बदले अनाज कार्यक्रम से, जिसका उद्देश्य गरीब लोगों को आजीविका देना था, उन्हें कोई लाभ ही नहीं मिला।

सामाजिक ऑडिट सामाजिक दायित्वशीलता का एक उभरता हुआ क्षेत्र है जिसकी अपार संभावनाएं हैं। हालांकि भारत में सामाजिक ऑडिट लंबी दूरी तय कर चुका है फिर भी इसके सामने कई प्रमुख चुनौतियां अभी भी हैं। शासन की प्रक्रिया में सामाजिक ऑडिट को एक करना आवश्यक है।

  1. सामाजिक ऑडिट के प्रयोगों के बारे में सूचना एवं ज्ञान का व्यापक प्रसारण ताकि नागरिक, सरकारें और नागरिक समाज संगठन इन प्रथाओं के बारे में जान लें।
  2. अभिशासन की कार्य प्रथाओं और विकास परियोजनाओं की पद्धतियों और उपकरणों का प्रयोग करना।
  3. सु-शासन में सामाजिक दायित्वशीलता की कार्यप्रथाओं को संस्थागत रूप देना।

पारदर्शिता एवं जवाबदेही

लोक सेवाएं वैध सत्ता पर आधारित सेवाएं हैं जिनको कार्यसंपादन हेतु यथोचित अधिकार, आवश्यक सुरक्षा एवं पर्याप्त सुविधाएं प्रदान की गई हैं। अतः इन सेवाओं में कार्यरत कार्मिकों के उत्तरदायित्व एवं जवाबदेयता भी सुनिश्चित होनी चाहिए। उत्तरदायित्व नैतिकता के भाव से परिपूर्ण है तथा जवाबदेयता में औपचारिक एवं कानूनी बाध्यताएं समाहित होती हैं। संवैधानिक प्रावधानों एवं राष्ट्रीय कानूनों के अनुसरण में संरचित प्रशासनिक संगठनों के कार्मिक संविधान एवं जनता के प्रति जवाबदेह हैं।

सरकार आज नए-नए एवं कल्याणकारी कार्यों को अपना रही है। सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में इनका दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में यह नितांत आवश्यक हो जाता है कि उन पर निरंतर निगरानी रखी जाए। कार्य किस तरीके से संपादित हो रहा है, जो नियोजित किया गया था वह उपलब्ध हुआ है अथवा इनके लिए कार्यपालिका का उत्तरदायित्व बनाए रखना आवश्यक है। कार्यपालिका का व्यवस्थापिका लेखा परीक्षा, नियंत्रण, मंत्रालयों में वित्तीय परामर्शात्मक व्यवस्था वे तत्व हैं जिनसे जवाबदेही की व्यवस्था गठित होती है। इन्हें जनसंपर्क साधनों, राजनितिक दलों, हित समूहों, राजनीतिक एवं निर्वाचन प्रक्रियाओं तथा समाज में स्थित निगरानी रखने वाले संगठनों द्वारा सबल बनाया जाता है।

जवाबदेही (अकाउंटेबिलिटी) में तीन मुख्य तत्व- जवाबदेयता, प्रवर्तन और अनुक्रियात्मकता निहित है। इन आधारभूत तत्वों में पारदर्शिता का प्रत्यय अंतर्गुथित है- जो लोगों को सूचना किस मात्रा तक उपलब्ध है और उन्हें सूचना के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम बनाता है, के तौर पर परिभाषित किया जाता है। जवाबदेही की मांग के लिए सूचना की पारदर्शिता उपकरणात्मक है क्योंकि सूचना के अभाव में कोई भी व्यक्ति राज्य द्वारा की जा रही ज्यादतियों को नहीं जाना जा सकता। इससे बढ़कर सुचना की पारदर्शिता को नागरिकों को आवाज बुलंद करने के एक महत्वपूर्ण अभिप्रेरण के तौर पर भी देखा जाता है। आवाज उठाने की शक्ति को नागरिकों का सेवाओं की प्रभावी प्रदायन के लिए उच्चाधिकारियों पर दबाव डालने की क्षमता के तौर पर परिभाषित किया जाता है।

जैसाकी विदित है की पारदर्शिता एवं जवाबदेही अंतर्संबंधित हैं और इन्हें पृथक करके नहीं देखा जा सकता, इसलिए ये दोनों ही सु-शासन के लिए अपरिहार्य तत्व हैं।

पारदर्शिता: सु-शासन का मूल तत्व

सु-शासन या अभिशासन में भागीदारी, कानून का शासन, पारदर्शिता, अनुक्रियात्मकता, समता एवं समावेशी, प्रभाविकता, दक्षता, जवाबदेही और रणनीतिक दृष्टि एवं एकमत नवोन्मेष जैसी प्रमुख विशेषताएं होती हैं। यह सुनिश्चित करता है कि भ्रष्टाचार को न्यूनतम कर लिया गया है, अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखा गया है और निर्णय-निर्माण एवं कार्यान्वयन में समाज के बेहद कमजोर वर्गों की आवाज को सुना जा रहा है। यह समाज की वर्तमान एवं भविष्य की जरूरतों के प्रति अनुक्रियात्मक भी होता है, संवृद्धि एवं वितरण के बीच संतुलन स्थापित करता है, और संसाधनों के वर्तमान एवं भविष्य में प्रयोग को भी संतुलित करता है।

पारदर्शिता का मतलब है सूचनाओं का प्रदायन और उस पर खुले तरीके से कार्यवाही करना। सुचना की मुक्त एवं सुगम प्राप्ति प्रदर्शित प्रोत्साहन का मुख्य तत्व है। सुचना, हालांकि, समयबद्ध, सम्बद्ध, सटीक एवं पूर्ण होनी चाहिए जिससे इसका प्रभावी रूप से इस्तेमाल हो सके। पारदर्शिता को सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए भी अपरिहार्य माना जाता है।

पारदर्शिता एवं नागरिक सलग्नता

नागरिक संलग्नता को नागरिकों की सार्वजनिक जीवन में सक्रिय सहभागिता एवं साझा हित के लिए उनका योगदान समझा जाता है। सरकार एवं लोक संगठनों में विश्वास का स्तर एक मुख्य कारक है जो नागरिक सलंग्नता की मात्रा एवं गुणवत्ता को निर्धारित करता है। सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास दो बातों से प्रभावित होता है-

  • सेवाओं की गुणवत्ता जिसे व्यक्ति एवं उसका परिवार प्राप्त करता है; और
  • अपने कार्य निष्पादन को लेकर संगठन कितने मुक्त एवं ईमानदार हैं जिसमें उनकी गलतियों को मानने की इच्छा एवं उनसे सीखने की मनोवृति भी शामिल है।

सूचना की पारदर्शिता एवं रहस्योद्घाटन

सुचना सु-शासन के लिए बेहद जरुरी है जैसाकि यह सरकार की गतिविधियों एवं प्रक्रियाओं को प्रतिबिम्बित एवं नियंत्रित करती है। सरकार द्वारा नागरिकों को मुहैया कराई जाने वाली सूचना का मुख्य उद्देश्य न केवल खुलेपन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही को प्रशासन में प्रोत्साहित करना है अपितु शासन से जुड़े सभी मामलों में जनता की सहभागिता को भी सुनिश्चित करना है।

अधिकतर विकसित देशों ने सूचना की स्वतंत्रता की आवश्यकता की पहचान की है और उनमें से अधिकतर ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (एफओआई) भी पारित किए हैं। अधिकतर एफओआई कानून विगत् दशक में बनाए गए हैं। भारत में, संघ सरकार तथा गोवा, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र राज्य सरकारों ने पिछले कुछ वर्षों में सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया है।

एफओआई अधिनियमों के अध्ययन एवं उनके कार्यान्वयन ने बताया है कि नागरिकों तक सूचना के निर्बाध प्रवाह में कुछ अवरोध इसके लिए आवश्यकता है-

  • महाराष्ट्र और दिल्ली के प्रारूप पर एफओआई विधानों को सशक्त करना।
  • सरकारी विभागों को उनकी वार्षिक गतिविधियों एवं निष्पादन की रिपोर्ट सिविल सोसायटी समूहों एवं लोगों को प्रदान करनी चाहिए।
  • विभागों द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं की सूचना, नियमों एवं विनियमों की जानकारी सार्वजनिक रूप से दी जानी चाहिए।
  • लोक निकायों द्वारा लोगों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण शासन के मामलों पर श्वेत पत्र का प्रकाशन करना।
  • लोक निर्माण विभागों की मेजरमेंट बुक (एम बुक) को लोगों की उपलब्ध कराने के लिए विभागीय वेबसाइट पर डाला जाना चाहिए।
  • लोग सभी बड़े एवं महत्वपूर्ण लोक निर्माणों से सम्बद्ध गुणवत्ता जांच दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं।

सिटीजन चार्टर

लोकतंत्र में सभी शक्तियां लोगों से सम्बद्ध हैं। लोग सरकार का चुनाव करते हैं, बदले में सरकार की लोगों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। इस संदर्भ में नागरिक घोषणा पत्र (सिटीजन चार्टर) का निर्माण, कार्यान्वयन, निगरानी एवं मूल्यांकन नितांत रूप से अपरिहार्य है।

लोक शिकायत निपटान

प्रत्येक मंत्रालय विभाग में लोक शिकायत निपटान तंत्र मजबूत किया जाना चाहिए और शिकायत निपटान की समय सीमा निश्चित होनी चाहिए। नागरिकों द्वारा कम्प्यूटर से ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने और उनकी प्रगति की निगरानी करने के लिए एक ऑनलाइन कम्प्यूटरीकृत लोक शिकायत निपटान एवं निगरानी तंत्र (पीजीआरएएमएस) संचालित किया जाना चाहिए। लोक शिकायत निपटान की कार्रवाई को एक स्वतंत्र प्राधिकरण देख सकेगा।

सरकार में वित्तीय पारदर्शिता

जवाबदेही एवं पारदर्शिता सुशासन के आवश्यक एवं अभिन्न स्तंभ हैं जो राज्य एवं सभ्य समाज को परिणामों, स्पष्ट उद्देश्यों, प्रभावी रणनीति के विकास, एवं निष्पादन की रिपोर्ट एवं निगरानी पर ध्यान देने के लिए बाध्य करते हैं। लोक नीति, इसके क्रियान्वयन एवं संसाधनों के दक्ष आबंटन के बीच संतुलन प्राप्त कर सकती है। वित्तीय जवाबदेही का अभाव अक्षमता, धन की बर्बादी एवं यहाँ तक की विकास को बाधित कर सकता है। वित्तीय पारदर्शिता चक्र के 3 तत्व हैं-

  • प्रबंधन का रिकार्ड
  • लेखांकन
  • बाह्य अंकेक्षण

लोक वित्त पर सूचना की लोगों तक पहुंच

लोक वित्त पर सूचना तक लोगों की पहुंच एवं पारदर्शिता में बढ़ोत्तरी विधायी जांच मुहैया कराने के लिए जरूरी है। पूरी बजट प्रक्रिया में लोगों के परामर्श या सहभागिता प्रदान करने के अवसरों की आवश्यकता हैं। संसाधनों की बर्बादी एवं कुप्रबंधन के मौकों की पहचान करने वाली शिकायतों के दर्ज करने, उन पर काम करने और उनके निपटान हेतु तंत्र की व्यवस्था एवं विकास करना जरूरी है। समय-समय पर विश्वसनीय एजेंसियों द्वारा लोक व्यय के प्रभाव एवं मितव्ययता पर अध्ययन आयोजित किए जाने चाहिए और इन्हें लोगों तक पहुंचाना चाहिए।

पारदर्शिता एवं जवाबदेही हेतु रणनीति
रणनीति विशिष्ट पहल/कदम रणनीति विशिष्ट पहल/कदम
सूचना तक पहुंच सूचना विधियों तक पहुंच

  • सूचना का अधिकार कानून
  • रिकॉर्ड प्रबंधन कानून एवं कम्प्यूटरीकरण
  • आवाज उठाने वालों (व्हीसिल ब्लोअर की सुरक्षा
  • नियमों के अधीन आय एवं संपत्ति के ब्यौरे का खुलासा
  • शिकायत एवं औम्बुड्समैन कार्यालय
  • सूचना लोगों के सम्मुख रखना
  • ‘मेजरमेंट बुक्स' को वेबसाइट पर डालना
  • वेब आधारित अनुमति को वेबसाइट पर डालना
  निम्न के माध्यम से जनसहभागिता को सुसाध्य एवं प्रोत्साहित करना-

  • जन सुनवाई
  • अध्ययन वृत
  • नागरिक परामर्श बोर्ड
  • सरकार संविदा समितियां
  • लोक निगरानी समूह
  • स्वतंत्र भ्रष्टाचाररोधी एजेंसियां
  • कार्यकारी एजेंसियों द्वारा सेवा प्रदायन हेतु लोक सेवा समझौते करना।
  • नागरिक बोडों एवं केंद्रित समूहों के गठन द्वारा सहभागी निर्णय-निर्माण में वृद्धि करना।
  • नागरिकों एवं सभ्य समाज समूहों का क्षमता निर्माण करना
नैतिकता एवं एकात्मकता
  • राजनितिक प्रतिनिधियों, लोक सेवा, न्यायपालिका, सिविल सोसायटी समूहों इत्यादि के लिए आचार संहिता प्रतिमान को विकसित करना एवं उसका क्रियान्वयन करना
  • कानून के अंतर्गत अधिकारियों को प्रदत्त सभी विवेकाधीन शक्तियों को समाप्त करना जो सरकार में अव्यवस्था फैला सकती हैं।
  • जनसुनवाई एवं जनसभा
  • प्रक्रियाओं को जनता की समीक्षा के लिए खोलकर प्रक्रियाओं एवं तंत्र में पारदर्शिता स्थापित करना।
  • जन प्राक्कलन, सामाजिक अंकेक्षण
  • नीति-निर्माण प्रक्रिया में लोगों से पूर्व-परामर्श करना
  • सहभागिता मूलक बजटिंग
  • बजट में पारदर्शिता जैसा कि कुछ राज्यों ने किया है।
  • स्वतंत्र अंकेक्षण
  • पारदर्शी एवं जवाबदेह प्रशासनिक कार्रवाई के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया विधान प्रदान करना।
विशिष्ट मुद्दों को लक्षित करना
  • लोगों तक सरकारी अधिकारियों की सुगम पहुंच
  • लोगों द्वारा शिकायतों के पंजीकरण के उद्देश्य से वरिष्ठ अधिकारियों का संपर्क सूत्र (कॉन्टेक्ट नम्बर) सुगमता से उपलब्ध होना।
  • विभागीय वेबसाइटों पर वरिष्ठ अधिकारियों के कॉन्टेक्ट नम्बर, ई-मेल एवं अन्य विस्तृत जानकारी प्रदान करना।
  • नागरिक सेवा उपलब्धता काउंटर स्थापित करना
संस्थागत सुधार
  • विभिन्न निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में विभिन्न वर्गों की सहभागिता
  • नागरिक समितियों को निर्णय निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनाना।
मूल्यांकन एवं निगरानी
  • निष्पादन मापन एवं प्रबंधन
  • निष्पादन संकेतकों द्वारा विभागीय निष्पादन की निगरानी करना
  • वार्षिक निष्पादन श्वेत पत्र
  • सभी सरकारी विभागों के सिटीजन चार्टर का विकास एवं क्रियान्वयन
  • सिटीजन चार्टर सेवा प्रदायन की समय सीमा उपलब्ध कराता है।
  • वार्षिक प्रतिवेदनों का प्रकाशन
  • श्वेत पत्रों का वितरण
  • विभागों द्वारा सामग्री के पूर्व-निर्धारित फ्रेमवर्क के साथ वार्षिक प्रतिवेदनों का प्रकाशन करना।

राजस्व उत्तरदायित्व विधान

राजस्व नीति के संव्यवहार में जवाबदेही बेहतर करने और इसमें वृद्धि हेतु राजस्व उत्तरदायित्व विधि की आवश्यकता है। अधिनियम में राजस्व प्रबंधन सिद्धांत एवं राजस्व पारदर्शिता के उपाय होने चाहिए इसके अनुरूप सरकार को सुनिश्चित करना होगा की उधारों का इस्तेमाल उत्पादक उद्देश्यों एवं पूंजीगत संपति में वृद्धि हेतु होना चाहिए न कि वर्तमान व्यय के वित्तीयन के लिए। सरकार को कर भार के स्तर में स्थिरता एवं अनुमान की सुसंगत मात्रा को सुनिश्चित करने की और विशेष

प्रोत्साहनों, रियायतों एवं चूतों को न्यूनतम करके कर व्यवस्था की एकात्मकता को बनाए रखने की भी आवश्यकता होगी।

लोक प्रापण विधानों में पारदर्शिता

सरकार में सभी प्रापण लोक प्रापण विधि में पारदर्शिता से विनियमित होने चाहिए। इसका अर्थ है की सभी लोक प्रापण को क़ानूनी रुपरेखा प्रदान करना और सरकारी विभागों, सार्वजानिक क्षेत्र उपक्रम, विश्वविद्यालय, पंचायत , स्थानीय निकाय, एवं वे जो सरकार से धन प्राप्त करते हैं, इत्यादि, सभी पर लागू होना चाहिए।

पारदर्शिता हेतु रूपरेखा विकास

सुशासन उपागम: सु–शासन उपागम द्वारा पारदर्शिता प्रोत्साहन हेतु रणनीतियों को अंतिम रूप देने से पूर्व सु-शासन संवर्द्धन में प्रमुख सहभागियों के तुलनात्मक लाभ की समीक्षा करना बेहतर होगा।

सरकार: सरकार, जो कि लोगों के प्रति जवाबदेह होती है और देश के कानूनों से सीमित होती है, लोगों की तरफ से काम करने का दावा कर सकती है। नेतृत्व की, इसलिए, सरकार के सुशासन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका है। यह नेतृत्व विशेष रूप से लाभों के समान वितरण के सुनिश्चितिकरण और विकास के लिए एक दक्ष एवं सक्षम रूपरेखा सृजन करता है। इस प्रकार सरकार की रणनीति में कानून बनाना, लोक सेवा में सुधार, और आर्थिक उदारीकरण को बढ़ावा देना शामिल होंगे, और साथ ही विशेष मुद्दों पर लोगों की जागरूकता बढ़ाना भी शामिल होगी। एक खुली सरकार का उद्देश्य होना चाहिए कि गोपनीयता की अपेक्षा पारदर्शिता शासन का मानदंड होना चाहिए।

निजी क्षेत्र: निजी क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण भूमिका है जैसाकि यह नौकरी एवं रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है जिसके परिणामस्वरूप करों द्वारा राजस्व की प्राप्ति होती है। इन करों का प्रयोग सरकार द्वारा विभिन्न सामाजिक कार्यक्रम बनाने में किया जाता है जिससे नागरिकों को लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार, निजी क्षेत्र एवं सरकार को मिलकर सौहार्दपूर्ण तरीके से कार्य करने की जरूरत है और नागरिकों के लिए बेहतर अवसरों को मुहैया कराने को समझना होगा। जिम्मेदार निजी क्षेत्र के लिए पारदर्शी कॉर्पोरेशन अभिशासन बेहद जरूरी है।

गैर-सरकारी एवं समुदाय आधारित संगठन

एनजीओ एवं सीबीओ नागरिकों के हितों को प्रोत्साहित करते हैं विशेष रूप से वंचित समूहों जैसे महिलाऐं एवं निर्धन। इनकी वैधता का एक अन्य पहलू इनका स्पष्ट रूप से गैर लाभकारी होना है। पारदर्शिता, हालाँकि, इन संगठनों के लिए भी बेहद जरूरी है, जिस प्रकार यह सरकार एवं निजी क्षेत्र के लिए है। आंतरिक अलोकतांत्रिक संरचना द्वारा इनके विकासपरक भूमिका को निरुत्साहित किया जा सकता है जो इनके उद्देश्यों या इनके गैर लाभकारी प्रस्थिति को लेकर शंका उत्पन्न कर सकता है।

मीडिया: सु-शासन के संवर्द्धन में मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी भूमिका को भ्रष्टाचार के उद्घाटन एवं पहचान तक तौर पर भी इसे मान्य एवं विस्तृत करना चाहिए। परिवर्तनों को लाने एवं स्थापित करने में मीडिया की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। गैर-सरकारी संगठनों की तरह, हालांकि, गैर-पेशेवर व्यवहार द्वारा उनकी विश्वसनीयता को हतोत्साहित किया जा सकता है जो उनकी निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़ा कर सकता है।

पेशेवर संगठन: इन संगठनों की वैधता उनके द्वारा व्यवस्थित पेशेवर मानकों पर आधारित होती है। सु-शासन के प्रोत्साहन और भ्रष्टाचार से लड़ने के संदर्भ में उनकी जिम्मेदारी उनके मानकों का प्रचार-प्रसार करती है और उन सदस्यों पर प्रतिबंध लगाती है जो इनका उल्लंघन करते हैं जिसमें आचार संहिता या भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान शामिल होते हैं। ये एक बेशकीमती माध्यम के तौर पर कार्य कर सकते हैं जो भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु संस्कृति के सृजन में योगदान करते हैं।

नागरिक: वैयक्तिक प्रतिबद्धता के अभाव में सु-शासन सफल एवं कायम नहीं हो सकता। जब भ्रष्टाचार का मुद्दा आता है तो वैयक्तिक अधिकारों पर व्यापक चर्चा की जाती है, नागरिकों पर सु-शासन के संवर्द्धन की भी जिम्मेदारी है: जानकारी हासिल करके और उनके जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में सक्रिय भागीदारी करके वे ऐसा कर सकते हैं। नेतृत्व की भूमिका को लेकर भी व्यक्ति का दायित्व भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। पदाधिकारी को एकात्मकता के साथ उनकी तरफ से कार्य करना चाहिए जो विश्वासपूर्ण कार्य करते हैं। व्यक्तियों की तरफ से एकात्मक सुधार बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सु-शासन अपेक्षा करता है कि शासन प्रक्रिया में संलग्न सभी करता सुपरिभाषित आचार संहिता का पालन करें उनके सार्वजानिक कार्य वैधानिक रूप से नियत प्रक्रियाओं के तहत लोगों द्वारा जांच का विषय हों।

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