जलमण्डल Hydrosphere

भूमण्डल के 70.8% भाग पर जल या जलमण्डल और 29.2% भाग पर स्थल है। सम्पूर्ण भूमण्डल का क्षेत्रफल 51.00 करोड़ वर्ग किमी है, जिसके 36.17 करोड़ वर्ग किमी पर जल और 14.89 करोड़ वर्ग किमी पर स्थल का विस्तार पाया जाता है।

इस जलमण्डल के अन्तर्गत महासागर (Oceans), सागर (seas), खाड़ियाँ, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। महासागरों में प्रमुख हैं-

  1. प्रशान्त महासागर, 16.5 करोड़ वर्ग किमी
  2. अन्ध महासागर, 8.2 करोड़ वर्ग किमी
  3. हिन्द महासागर, 7.3 करोड़ वर्ग किमी
  4. आर्कटिक महासागर, 140 करोड़ वर्ग किमी

यह जलराशि इतनी अधिक है कि यदि इसे धरातल पर समतल रूप में फैला दिया जाए तो उसके ऊपर सर्वत्र ही लगभग 4.8 किलोमीटर गहरा सागर लहराने लगेगा। जल के विस्तार में अधिकता के कारण पृथ्वी को जल गोलार्द्ध (Water Hemisphere) और स्थल गोलार्द्ध (Land Hemisphere) में विभाजित किया जाता है। एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में 81% जल और 19% स्थल, उत्तरी गोलार्द्ध में 40% जल और 60% स्थल भाग है।

महासागर नितल Ocean Floor

महासागरों की तली, भूमि के धरातल की भाँति, ऊँची-नीची है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि भूमि की ऊँचाई की अपेक्षा महासागरों की गहराई अधिक है जहाँ उच्चतम शिखर एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848 मीटर है, वहाँ महासागर की अधिकतम गहराई प्रशान्त महासुगर में मेरियना खाई की 11,022 मीटर है। महासागर और स्थल की औसत गहराई और उंचाई क्रमश: 4,781 मीटर और 866 मीटर है। प्रो. मरे के अनुसार, “3,500 मीटर से अधिक ऊँचा भाग समस्त भूमण्डल का केवल 1 प्रतिशत है, जबकि समुद्रों में 3,500 मीटर से अधिक गहरा भाग है।

महासागरीय नितल Oceanic Bottom

महासागर के नितल का ढाल सर्वत्र एकसा नहीं है। कहीं यह बहुत तीव्र है तो कहीं बहुत ही मन्द और कहीं यह आकस्मिक है। महासागरों के तलों पर महाद्वीपों की भाँति अनेक द्रोणियाँ, पठार, मैदान और खड्ड (gorge) पाए जाते हैं, किन्तु समुद्री तली पर अपरदन का प्रभाव कम होने से ये स्वरूप स्थिर होते हैं। ढाल के आधार पर समुद्रों के नितलों को मोटे तौर पर निम्न भागों में बाँटा जाता है :

1. महाद्वीपीय मग्नतट Continental Shelf

2. मघद्वीपीय मग्नढाल Continental Slope

3. गंभीर सागरीय मैदान Deep sea Plain

4. महासागरीय गर्त Ocean Deep

महाद्वीपीय मग्नतट Continental shelf

मग्नतट का अर्थ डूबे हुए तट से होता है, अतः महाद्वीपीय मग्नतट निश्चित ही स्थल के डूबे हुए भाग ही हैं। महाद्वीपों के तट के समीप जो भूमि जलमग्न हो जाती है, वह मग्नतट कहलाती है। दूसरे शब्दों में, यह समुद्र के नितल का अति मन्द टालयुक्त वह भाग है जो महाद्वीपों के चारों ओर फैला हुआ है, अतः यह छिछले एवं प्रायः 200 मीटर तक गहरे होते हैं।

मग्नतट की औसत चौड़ाई 48 किलोमीटर है। पश्चिमी आयरलैण्ड में ये तट 80 किलोमीटर चौड़े व साइबेरिया में ये 150 किलोमीटर तक चौड़े हैं। प्रशान्त महासागरीय मग्नतट सबसे कम 16 किलोमीटर, उत्तरी अमरीका के पूर्वी तट पर 96 से 120 किलोमीटर, इण्डोनेशिया में कई सौ किलोमीटर तथा आर्कटिक सागर में 160 से 480 किलोमीटर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं।

समस्त महासागरीय नितल के क्षेत्रफल में से 8.2% भाग पर ऐसे तट पाए जाते हैं। अटलाण्टिक महासागर के पूर्ण क्षेत्रफल के 13.3%, प्रशान्त महासागर के 5.7%, तथा हिन्द महासागर के 4.2% भाग पर ये तट पाए जाते हैं।

सूर्य प्रकाश और गर्मी के फलस्वरूप यहाँ समुद्री वनस्पति और जीवों की बहुलता रहती है। नदियों द्वारा लायी हुई कॉप मिट्टी भी वहाँ बराबर बिछती रहती है। यह समुद्री जीवजन्तुओं की वृद्धि करने में सहायक होती है। इस प्रकार भोजन (प्लेंकटन) की प्रचुरता, सूर्य का प्रकाश और कम गहरे जल के कारण मग्नतट मछलियों के घर बने हुए हैं। डागर बैंक, ग्राफ बैंक आदि विश्व के मछली पकड़ने के बृहत् क्षेत्र इन्हीं पर स्थित हैं। यहीं पर अनेक प्रकार की सागरीय वनस्पति पौधे तली में विस्तृत हैं। अतः मानव उपयोग की दृष्टि से ये क्षेत्र अत्यन्त उपयोगी हैं। इन तटों की उत्पति तल के उत्थान, धंसाव, लहरों द्वारा अपरदन अथवा नदियों या अन्य साधनों द्वारा जमाव के कारण होती है।

महाद्वीपीय मग्नढाल Continental Slope

महाद्वीपीय मग्नतट की अन्तिम सीमा से ही मग्नढाल का प्रारम्भ होता है, क्योंकि इसके बाद से ही महासागरों में आकस्मिक रूप से गहराई बढ़ जाती है। कहीं ढाल कम और कहीं अधिक होता है। औसत ढाल का होता है, किन्तु कहीं-कहीं यह 40° तक पहुँच जाता है। इसकी गहराई 200 से 2,000 मीटर तक मानी जाती है, किन्तु चौड़ाई कम है। समस्त महासागरीय क्षेत्रफल के केवल 8.5% भाग पर ही मग्नढाल पाए जाते हैं। अटलाण्टिक महासागर में 12.4%, प्रशान्त महासागर में 7% तथा हिन्द महासागर में 6.5% भाग पर मग्नढालों का विस्तार पाया जाता है। वर्तमान में की गई नवीन खोज के अनुसार महाद्वीपीय मग्नढाल एवं अन्तसागरीय मैदान के बीच कहीं-कहीं आश्चर्यजनक रचनाएँ अर्थात् खड़े ढाल वाली अन्तःसागरीय कन्दराएँ (submarine canyon) मिलती हैं। इन पर विशेष खोज की जा रही है।

गम्भीर सागरीय मैदान Deep Sea Plain

महाद्वीपीय मग्नढाल के पश्चात् गहरे सागरीय तल का आरम्भ होता है। समुद्र के नितल का अधिकांश भाग इसी से घिरा है। अगाध तल प्रायः ऊँचे-नीचे और ऊबड़-खाबड़ होते हैं। इसी से इनकी गहराई भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न पायी जाती है, फिर भी इनका ढाल बहुत क्रमिक होता है अतः इनको धरातल के मैदानों के अनुरूप माना जा सकता है। यह 2,500 मीटर से 6,000 मीटर तक गहरे पाए जाते हैं। समस्त महासागरीय क्षेत्रफल के लगभग 2.5% भाग पर इनका विस्तार पाया जाता है। इस प्रकार के गम्भीर सागरीय मैदान में पंक (ooze) कीचड़, आदि के निक्षेप पाए जाते हैं। यहाँ ज्वालामुखी से सम्बन्धित लाल मिट्टी भी पायी जाती है।

इन गम्भीर सागरीय मैदानी भागों के तल से कई श्रेणियाँ व पठार सभी महासागरों में उभार के रूप में पाए जाते हैं। इसी से ऐसे मैदान या बेसिन कई उपभागों में बंट गए हैं।

महासागरीय गर्त Ocean Deeps

समुद्र के नितल में यत्र-तत्र खाई की भाँति गहरे कई खड्ड मिलते हैं, जिन्हें महासागरीय गर्त कहा जाता है। ये गहरे गर्त घोर अन्धकार और अत्यन्त ठण्डे जल से पूर्ण रहते हैं। इनके किनारे प्रायः तेज ढालू होते हैं, परन्तु क्षेत्रफल में ये बहुत कम हैं। जिन समुद्र तटों के भागों में प्रायः भूकम्प के धक्के आते हैं अथवा ज्वालामुखी का प्रकोप रहता है वहाँ ये बहुतायत से मिलते हैं। प्रशान्त महासागर के तटीय क्षेत्रों में ऐसे कई महासागरीय गर्त हैं। अभी तक 60 गर्तों का पता चल सका है, जिसमें से 32 केवल प्रशान्त महासागर में पाए जाते हैं जिनमें निम्न मुख्य हैं-

गर्त गहराई (मीटर में)
मेरियाना गर्त 11,033
टोंगा गर्त 10,800
क्यूराइल गर्त 10,542
फिलिपीन गर्त 10,497
करमोडक गर्त 10,047
दक्षिणी सोलोमन गर्त 9,140
जापान गर्त 8,412
अल्युशियन गर्त 7,600

अन्ध महासागर का नितल  Bottom Relief Of Atlantic Ocean

इस महासागर का क्षेत्रफल 8.24 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इसकी औसत गहराई 900 मीटर है, और सर्वाधिक चौड़ाई 5,920 किलोमीटर 35° दक्षिणी अक्षांश पर है। इसका विस्तार S आकृति का है। यह दक्षिण की ओर अधिक चौड़ा तथा उत्तर की ओर संकरा है। इस महासागर की तलहटी अत्यन्त विषम और असमान है। इसके जलमग्न महाद्वीपीय तट कहीं-कहीं अधिक चौड़े हो गए हैं, जैसे- उत्तरी अमरीका और पश्चिमी यूरोप के समीप।

इसके नितल की मुख्य विशेषताएँ हैं-

  1. पोटींरिको गर्त में सर्वाधिक गहराई 8,605 मीटर है।
  2. इसके तल की प्रमुख विशेषता मध्य अटलाण्टिक कटक (Ridge) है, जो उत्तर से दक्षिण तक चला गया है। उत्तर में डालफिन कटक और दक्षिण में चैलेंजर कटक कहते हैं। यह श्रेणी सामान्यतः समुद्र तल से 4,000 मीटर से अधिक गहरी नहीं है। यह महासागर उत्तर से दक्षिण तक 14,400 किलोमीटर लम्बाई और 800 किमी चौड़ाई में है।
  3. सामान्यतः इसमें गर्त कम पाए जाते हैं।
  4. महाद्वीपीय मग्नतट यहाँ विस्तृत है।
  5. इसके तट पर खईयां (बैफिन,हडसन और मेक्सिको) तथा सागरों (बाल्टिक सागर, उत्तर सागर, कैरिबियन सागर तथा भूमध्य सागर) अधिकता होने से तट रेखा विषम है।

प्रशांत महासागर का नितल Bottom Relief of Pacific Ocean

इसका क्षेत्रफल 16.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर और औसत गहराई 4,315 मीटर है। इसकी आकृति विशाल एवं त्रिभिजाकर है। यह विषुवत रेखा के निकट सबसे चौड़ा (16,785 किलोमीटर) यह भूतल पर सबसे विशाल एवं सबसे गहरा महासागर है। इस महासागर के नितल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं-

  1. इसका महाद्वीपीय एशिया मग्नतट पूर्वी एशिया के किनारों के अतिरिक्त उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर सँकरा है।
  2. इसके पूर्वी भाग में मेरियाना, टोंगा, क्यूराइल, फिलिपीन, करमोडक जैसे गहरे गर्त पाए जाते हैं। सबसे गहरा मेरियाना गर्त है।
  3. इसमें कटकों का अभाव सा है, किन्तु गोल पठारों के रूप में ऊँचे चबूतरे मिलते हैं जो द्वीप समूहों का निर्माण करते हैं।
  4. इस महासागर के किनारों पर बड़ी-बड़ी खाड़ियाँ और सागरों का अभाव है।
  5. इस महासागर के मध्य पूर्व में अनेक द्वीप समूह मिलते हैं।

हिन्द महासागर का नितल Bottom Relief Indian Ocean

इस महासागर का क्षेत्रफल 7.3 करोड़ वर्ग किलोमीटर, औसत गहराई 3,600 मीटर और विस्तार उत्तर में कम, किन्तु दक्षिण में अधिक है। इसके नितल की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

  1. इसका महाद्वीपीय मग्नतट अत्यन्त संकरा है, किन्तु पूर्व की ओर यह चौड़ा हो गया है।
  2. यह कम गहरा है और मध्यवर्ती भाग छिछला है जिसके दोनों ओर गहरे सागरीय गर्त पाए जाते हैं, जो 3,400 मीटर हैं।
  3. मध्यवर्ती क्षेत्र में चैगोस कटक उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली है जिसके उभरे भूगों पर श्रीलंका, मालदीप, सुलावेसी, आदि द्वीपू स्थित हैं। ये द्वीप सामान्यतः प्रवाल और ज्वालामुखी द्वारा निर्मित हैं। इसकी तट रेखाएँ कटी-फटी हैं और किनारों पर छोटी बड़ी खाड़ियाँ और वन्द सागर (बंगाल की खाड़ी, फारस की खाड़ी, अरब सागर, लाल सागर आदि) पाए जाते हैं।

महासागरीय जल का तापमान Temperature of The Ocean Water

सागर जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक Factors Affecting The Temperature of Ocean Water

महासागरों का जल मुख्यतः सूर्यताप से गरम होता है। सामान्यतः खुले समुद्रों और स्थल से घिरे समुद्रों के तापमान वितरण स्वरूप में भिन्नता मिलती है। समुद्र की सतह के तापमान पर निम्नलिखित घटकों का प्रभाव पड़ता है-

  1. अक्षांशीय स्थिति- विषुवत् रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ने पर समुद्री धरातल का तापमान घटता जाता है। विषुवत् रेखा के समीप समुद्र-जल का तापमान 26.6°  सेण्टीग्रेड के आसपास रहता है, 20°  अक्षांशों के निकट 23°  सेण्टीग्रेड, 40°  अक्षांशों के निकट यह 15°  सेण्टीग्रेड और ध्रुवों के निकट 5°  सेण्टीग्रेड ही मात्र रह जाता है। ध्रुवों पर शीतकाल में समुद्र तल 3 से 5 माह तक हिम से ढका रहता है।
  2. प्रचलित पवनें- नित्यवाही पवनों के कारण जल में निरन्तर गति होती रहती है जिससे ठण्डा जल व गरम जल मिलते मिश्रित होते रहते हैं। इससे तापमान में समरूपता बनी रहती है। पवनों के कारण विभिन्न स्थानों पर विपरीत तापमान का जल पहुँचने से वहां का तापमान नियंत्रित रहता है।
  3. महासागरीय धाराएँ- जहाँ गर्म धाराएँ बहती हैं वहाँ के जल का तापमान ऊँचा हो जाता है और जहाँ ठण्डी धाराएँ बहती हैं वहाँ का तापमान गिर जाता है। उदाहरणार्थ, गल्फस्ट्रीम के कारण उत्तरी यूरोप के पश्चिमी भाग के समुद्री जल का तापमान बढ़ जाता है, जबकि लैब्राडोर धारा के कारण ग्रीनलैण्ड व लैब्राडोर के तटीय सागर का तापमान गिर जाता है।
  4. महासागरीय स्थलखण्डों की स्थिति- स्थलखण्डों से घिरे हुए और खुले समुद्रों के जल के तापमान में भारी अन्तर मिलता है। इसका कारण महासागरीय नितलों की वे पहाड़ियाँ हैं जो जल के स्वतन्त्र बहाव को रोकती हैं। अन्ध महासागर और भूमध्य सागर की सतह पर जल का तापमान 18°  सेण्टीग्रेड रहता है। जबकि अन्ध महासागर का 300 मीटर की गहराई पर यह 13° सेण्टीग्रेड और 4,200 मीटर की गहराई पर अन्ध महासागर में 2° सेण्टीग्रेड ही रह जाता है, वहीं भूमध्य सागर का तापमान सभी गहराइयों पर लगभग 14° सेण्टीग्रेड ही रह जाता है।
  5. स्थानीय मौसम का प्रभाव भी समुद्र जल के तापमान को घटानेबढ़ाने में सहायक होता है।
  6. समुद्र की गहराई- समुद्र की गहराई के अनुसार भी तापमान में अन्तर पाया जाता है, किन्तु तापमान में कमी होने की गति गहराई के अनुपात में नहीं होती। ऊपरी सतह पर समुद्र जल का तापमान  26.6° सेण्टीग्रेड होता है, किन्तु1 ,098 मीटर की गहराई 4.5° सेण्टीग्रेड और 3,600 मीटर की गहराई पर केवल 1.5° से 2° सेण्टीग्रेड होता है। बाद में चाहे कितनी ही गहराई बढ़ती जाए. तापमान 1.6° सेण्टीग्रेड से कभी नीचे नहीं जाता।

उल्लेखनीय है कि-

  1. जलमग्न तटों पर तापमान की विभिन्नताएँ मौसम परिवर्तन एवं धाराओं के प्रभाव से पायी जाती हैं।
  2. ध्रुवों पर धरातल का तापमान अधिक गिर जाता है।
  3. स्थलों से घिरे हुए सागरों में तापमान की विभिन्नताएँ अपेक्षाकृत अधिक पायी जाती हैं।
  4. सागरीय जल का तापमान भूमध्य रेखा के ध्रुवों की ओर कम होता है।
  5. अधिक खारे जल का तापमान कम खारे जल की अपेक्षा ऊँचा होता है।
  6. सागरीय जल का तापमान गहराई बढ़ने के साथसाथ तीव्रता से कम होता जाता है, किन्तु अधिक गहराई पर जाकर यह लगभग स्थिर हो जाता है।

महासागरों के तापीय कटिबन्ध Thermal Zones of Oceans

सागर के तल के तापमान के आधार पर निम्न तीन स्पष्ट क्षेत्र किए जा सकते हैं-

  1. उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र- जहाँ अधिक तापमान पाए जाते हैं तथा ताप-परिसर की मात्रा कम होती है, औसत तापमान कहीं-कहीं 30° से 35° सेण्टीग्रेड तक हो जाता है। लाल सागर में एवं फारस की खाड़ी का तापमान 39° सेण्टीग्रेड से भी ऊँचा हो जाता है।
  2. शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र- जहाँ का सागर का तापमान ग्रीष्मऋतु में कम, किन्तु शीत में अधिक रहता है ताप परिसर सामान्यत: ऊँचा रहता है।
  3. शीत कटिबन्धीय क्षेत्र- जहाँ का तापमान बहुत ही कम (प्रायः 10° सेण्टीग्रेड से भी नीचे) रहता है, फलत: ताप-परिसर भी अधिक नहीं रहता।

तापमान का वितरण Distribution of Temperature

सामुद्रिक तापमान को इस प्रकार समझाया जा सकता है-

तापमान का लम्बवत वितरण Vertical Distribution of Temperature

सागरों में सर्वाधिक तापमान उसकी सतह पर पाया जाता है। सतह से गहराई की ओर जाने पर तापमान कम होता जाता है क्योंकि ताप का स्रोत सूर्य है। महासागरों में सूर्य की किरणें 183 मीटर की गहराई तक ही जा सकती हैं, अतः इस गहराई तक तापमान में परिवर्तन होता रहता है।

सागरीय जल का तापमान सतह से लेकर बहुत गहराई तक परिवर्तनशील रहता है। विषुवत रेखा पर समुद्र की सतह का तापमान 27° सेण्टीग्रेड रहता है, परन्तु 1097 मीटर की गहराई  पर 4.4° सेण्टीग्रेड तथा 1829 मीटर की गहराई पर 3.3° सेण्टीग्रेड तथा 3658 मीटर की गहराई 1.6° सेण्टीग्रेड रहता है। इस प्रकार महासागरीय जल के तापमान के लम्बवत् वितरण का विवरण निम्न प्रकार है-

  1. महासागरों में गहराई पर तापमान का गिरना एक समान नहीं है। 2000 मीटर की गहराई तक तापमान शीघ्रता से कम होता है, उसके बाद तापमान का घटना नगण्य-सा हो जाता है।
  2. गहराई में तापमान का गिरना उष्ण कटिबन्धों तथा ध्रुवों पर समान नहीं है। उष्ण कटिबन्धों में सतह पर तापमान अधिक पाया जाता है, इसलिए ताप के गिरने की दर भी अधिक है जबकि ध्रुवों पर तापमान गिरने की दर कम है किन्तु अत्यधिक गहराई पर तापमान दोनों ही क्षेत्रों में एक समान होता है।
  3. विषुवत रेखीय प्रदेश में अत्यधिक वर्षा के कारण सतह का जल कम गर्म होता है। कुछ गहराई पर ताप ऊँचा मिलता है किन्तु अधिक गहराई में तापमान अधिक गिरा मिलता है।
  4. कुछ विशिष्ट सागरों जैसे सारगैसो सागर, लाल सागर तथा भूमध्यसागर आदि में गहराई पर भी ताप अधिक मिलता है। सारगैसो सागर में वातानर्त धाराओं के कारण निकटवर्ती सागरों का ठण्डा जल मिलने नहीं पाता है जिससे तापमान ऊँचा रहता है।
  5. उच्च अक्षांशों में घिरे सागरों में तापीय उत्पुण मिलता है। स्वच्छ जल की प्राप्ति के कारण सतह का तापमान कम होता है। गहराई पर अधिक घनत्व तथा अधिक तापयुक्त जल मिलता है अत्यधिक गहराई पर पुनः कम ताप वाला जल पाया जाता है।

महासागरीय तापमान का क्षैतिज वितरण Horizontal Distribution Temperature

महासागरीय जल के तापमान का क्षैतिज वितरण अक्षांशों के आधार पर ही अंकित किया जाता है। क्षैतिज वितरण पर विषुवत रेखा से दूरी का विशेष प्रभाव पड़ता है। विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ने पर तापमान घटता जाता है। निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर तापमान घटने का क्रम दोनों गोलाद्धों में पाया जाता है किन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में ही अधिक तापमान अंकित किया जाता है। महासागरों की सतह का अधिकतम तापमान उत्तरी गोलार्द्ध में 5° उत्तरी अक्षांश-पर तथा न्यूनतम तापमान 80° अक्षांश उत्तरी गोलार्द्ध में व 75° अक्षांश दक्षिणी गोलार्द्ध में अंकित किया जाता है।

तापमान के वितरण को समताप रेखाओं द्वारा आसानी से दिखाया जा सकता है। समताप रेखाओं की रचना पर महाद्वीपों की रूपरेखा, पवनों की दिशा, समुद्री धाराओं के मार्ग, सागर का खुला या बन्द होना आदि का प्रभाव पड़ता है। हिन्द महासागर में 15° सेण्टीग्रेड की समताप रेखा अधिकतम तापमान के स्थानों को घेरती है। समताप रेखाएँ अरब सागर में उत्तर की ओर मुड़ जाती हैं। ये भारतीय प्रायद्वीप के सहारे दक्षिण की ओर मुड़ती हैं।

अटलाण्टिक महासागर में गर्म व ठण्डी धाराओं का प्रभाव समताप रेखाओं के वितरण पर विशेषतः पड़ता है। उत्तरी अटलांटिक महासागर में पश्चिम की ओर समताप रेखाएँ एक-दूसरे के बहुत ही निकट स्थित हैं क्योंकि दक्षिण-पश्चिम से गल्फस्ट्रीम गर्म धारा तथा उत्तर-पश्चिम से लैब्राडोर की ठण्डी धारा मिलती है। इस महासागर में तापमान गर्म धाराओं के मिलने के कारण उत्तरी अक्षांशों में भी जल महासागरों से अधिक पाया जाता है, लेकिन फिर भी प्रशान्त महासागर के जल की सतह का तापमान अन्य महासागरों की अपेक्षा अधिक रहता है, उदाहरणार्थ प्रशान्त महासागर का तापमान 19.1° सेण्टीग्रेड रहता है। हिन्द महासागर की सतह का तापमान बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का तापमान 25° सेण्टीग्रेड पाया जाता है, किन्तु हिन्द महासागर के सीमान्त सागरों का तापमान और भी अधिक पाया जाता है, उदाहरणार्थ लाल सागर तथा फारस की खाड़ी का उच्चतम तापमान क्रमश: 32.3° सेण्टीग्रेड तथा 34° सेण्टीग्रेड अंकित किया जाता है। चारों ओर से घिरे सागरों का उच्चतम तापमान (कैस्पियन सागर व काला सागर) इन सागरों के तापमान से कम होता है। तापमान के क्षैतिज वितरण पर सूर्य का प्रत्यक्ष प्रभाव रहता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है उस समय उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अधिक तापमान वाली तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में कम तापमान वाली समताप रेखाएँ होती हैं तथा सूर्य की दक्षिणायन स्थिति होने पर विपरीत स्थिति पाई जाती है।

महासागरीय जल का खारापन Salinity Of The Ocean Water

महासागरीय जल में नमक की मात्रा

जल में प्राय: सभी चीजों को घुला देने का गुण है। नदियों के स्वच्छ जल में सदैव ही कुछ न कुछ मात्रा में लवण पदार्थ घुले हुए होते हैं। नदियाँ जब सागर में प्रवेश करती हैं तो इन पदार्थों को लगातार सागर में पहुंचाती रहती हैं। सागरों में वाष्पीकरण की क्रिया में जल सदा वाष्प बनकर उड़ता रहता है, किन्तु जल में धुले हुए ठोस पदार्थ (लवण) वहीं छूट जाते हैं। इसी कारण सागर घीरे-घीरे अधिक खारे होते जा रहे हैं। अतः “महासागरीय लवणता उस अनुपात को कहते हैं जो समुद्री जल तथा उसमें घुले हुए पदार्थों (लवण) के बीच होता है।”

विभिन्न विद्वानों द्वारा महासागर में नमक की मात्रा लगभग 2.7 अरब टन (क्लार्क के अनुसार) से लगाकर 5 अरब टन (मरे के अनुसार) तथा 50 अरब टन (जौली के अनुसार) अनुमानित की गयी है।

समुद्री जल में घुले लवण और उनकी मात्रा

लवण मात्रा प्रतिशत में जल में प्रति 1000 ग्राम में
सोडियम क्लोराइड NaCl 77.75 27.213
मैग्नीशियम क्लोराइड MgCl2 10.88 3.807
मैग्नीशियम सल्फेट MgSO4 4.74 1.658
कैल्शियम सल्फेट CaSo4 3.60 1.260
पोटैशियम सल्फेट K2SO4 2.46 0.863
कैल्सियम कार्बोनेट CaCO3 0.35 0.123
मैग्नीशियम ब्रोमाइड MgBr2 0.22 0.076
कुल 100.0 35.00

विश्व के विभिन्न महासागरीय क्षेत्र में जल का खारापन भिन्न-भिन्न होता है। अयन रेखाओं के पास खारापन 38 से 41% मिलता है। 21° से 40° अक्षांशों के बीच यह 36% जबकि विषुवत् रेखा के निकट यह 345, मिलता है। वन्द सागरों में अधिक तथा खुले सागरों में लवणता कम मिलती है।

सागरीय जल के खारेपण का कारण Causes Salinity of Ocean Water

  1. मीठे या शुद्ध जल की प्राप्ति- जब किसी सागर में वर्षा अथवा नदियों द्वारा मीठा जल बड़ी मात्रा में पहुँचता है तो वहाँ जल का खारापन घट जाता है, जैसे, विषुवत रेखीय प्रदेशों में भारी वर्षा एवं नदियाँ गिरने के कारण जल का खारापन कम रहता है। बंगाल की में नदियों के अधिक गिरने के कारण खारापन कम 8% जबकि भूमध्य सागर एवं फारस की खाड़ी में नदियाँ कम गिरने के कारण खारापन अधिक मिलता है। अयन रेखाओं पर कम वर्षा के कारण खारापन अधिक मिलता है।
  2. वाष्पीकरण की मात्रा- स्वच्छ आकाश और अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में नमक की मात्रा अधिक पायी जाती है (जैसे, अयनवृतीय क्षेत्रों में), किन्तु जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ खारापन कम मिलता है।
  3. पवनों और धाराओं का प्रभाव- जिन समुद्रों से होकर स्थायी पवनें या चक्रवात गुजरते हैं वहाँ पवनों के वेग से पानी मिश्रित होता रहता है। इसी प्रकार समुद्री धाराएँ भी विभिन्न क्षेत्रों का पानी मिश्रित करती हैं अत: इन क्षेत्रों में लवणता कम तथा इसके विपरीत दशाओं के क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।
  4. समुद्री जीवजन्तु भी अपने ढाँचे से कैल्सियम कार्बोनेट की मात्रा मिलाते हैं। इससे कैल्सियम कार्बोनेट में स्थानीय वृद्धि होती है। जैसे- प्रवाल या मूंगा, आदि

विभिन्न सागरों में जल की लवणता Salinity In Different Seas

खुले सागरों में जल का खारापन Salinity in Open Seas

अयनवृत्तीय सागर- धरातल पर सागर-जल का सबसे अधिक खारापन कर्क और मकर रेखाओं के समीप पाया जाताहैLयहाँ के सागरों में 38% खरापन पाया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि ये प्रदेश उच्च की मेखलाओं में स्थित हैं, जहाँ आकाश सदा स्वच्छ रहता है और सूर्य बड़ी तेजी से चमकता है, अतः वाष्पीकरण अधिक होता है। इसके विपरीत, वर्षा बहुत कम होती है तथा नदियों की संख्या कम है, अत: इन प्रदेशों के सागर सर्वाधिक खारे हैं।

भूमध्य रेखीय सागर- अयन रेखाओं की अपेक्षा भूमध्य रेखा के समीप खरापन कम 35% से 36% मिलता है। यहाँ के सागरीय क्षेत्रों में गर्मी अधिक पड़ती है, लेकिन प्रतिदिन संवाहनिक वर्षा तथा नदियों से प्राप्त जल के कारण लवणता कम हो जाती है।

ध्रुवीय सागर- ध्रुवों के समीप खारेपन का अनुपात अत्यन्त कम है। यहाँ खारापन 20% से पाया जाता है, क्योंकि वहाँ वाष्पीकरण कम होता है। हिमखण्डों के पिघलने और अनेक नदियों के इन समुद्रों में गिरने के कारण, स्वच्छ जल की अधिक प्राप्ति इसका मुख्य कारण है।

अंशतः भूमि से घिरे सागरों का खारापन Salinity in Partially Enclosed Seas

खुले महासागरों की अपेक्षा भ्रंशतः स्थल से घिरे हुए समुद्रों के खारेपन में अधिक भिन्नता पायी जाती है। जैसे- भूमध्य सागर में 37% से 39%, लाल सागर में 37% से 41% और फारस की खाड़ीमें 38% से 40% तक पाया जाता है। इन सागरों में ऊँचे तापक्रम के कारण वाष्पीकरण की अधिकता, वर्षा कम होने और नदियों द्वारा जल की मात्रा कम पहुँचने के कारण खारापन पाया जाता है। इसके विपरीत, काला सागर, (18%) वाल्टिक सागर (2%) और उत्तरी सागर (15%) में खारापन पाया जाता है। तापक्रम की न्यूनता, अधिक वर्षा तथा नदियों द्वारा जल की आपूर्ति अधिक होने से इन सागरों में लवणता की मात्रा कम पायी जाती है।

बंद सागरों में खारापन Salinity in Closed Seas

भूमि से घिरे हुए जलाशयों और झीलों का खारापन बहुत ही विविध होता है। जिन सागरों में जल का निकास नहीं होता, वे अपेक्षाकृत बहुत खारे होते हैं क्योंकि वाष्पीकरण के कारण जल वाष्प बनकर उड़ता रहता है और नमक के कण वहीं छूट जाते हैं। कैस्पियन सागर के उत्तरी भाग में खारेपन का औसत और दक्षिण में 170% है। विश्व में सबसे अधिक खारापन मृत सागर में 238% का पाया जाता था, किन्तु अब टर्की की वॉन झील का खारापन 330% अंकित किया गया है। इस अतुल खारेपन के कारण मनुष्य भी इसमें नहीं डूबने पाता साल्ट लेक में खारापन 220% है।

सागरों एवं महासागरों में समान खारेपन को मिलाकर खींची गई रेखाएं समलवणता रेखाएं कहलाती हैं।

महासागर जल की गतियाँ Movements of Ocean Water

सागर का जल कभी शान्त नहीं रहता। उसमें सदैव कुछ न कुछ गति विद्यमान रहती है। ऐसा पवनों के चलने, उसमें नदियों द्वारा जल गिराने, पृथ्वी के घूमने तथा सूर्य और चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण होता है। समुद्री जल की तीन गतियाँ हैं-

  1. सागरीय लहरें या तरंगें waves,
  2. धाराएँ Currents,
  3. ज्वर-भाटा Tides

लहरें waves

सागरीय जल हल्के से आघात के कारण विचलित हो जाता है। पवन के कारण सागरीय जल में गति उत्पन्न होती है तथा वायु के प्रवाह से सागर का जल उसके साथ-साथ आगे बहने लगता है। समुद्री धरातल पर जल के हिलने-डुलने और आगे बढ़ने तथा पीछे हटने की क्रिया को ही तरंग कहा जाता है। लहरों में धारा की भाँति जल कभी एक स्थान को छोड़कर आगे नहीं बढ़ता, इस बात की सत्यता के लिए यदि कोई कार्क या लकड़ी का टुकड़ा वहाँ छोड़ दिया जाए तो वह तरंग के साथ-साथ ऊपरनीचे होता रहेगा, किन्तु कभी भी अपना स्थान छोड़कर आगे नहीं बढ़ेगा। तरंग का ऊपर उठा हुआ भाग शिखर (Crest) और नीचे दबा हुआ भाग द्रोणी (Through) कहलाता है।

वायु के वेग के अनुसार ही तरंगों का आकार छोटा-बड़ा होता है। बन्द सागरों की अपेक्षा खुले सागरों में तरंगों की लम्वाई व ऊँचाई अधिक होती है। महासागरों में तरंगों की ऊँचाई प्राय: 1.5 से 3.0 मीटर तक पायी जाती है। भयानक तूफानों के समय इनकी ऊँचाई 15 मीटर तक हो जाती है।

महासागरीय धाराएं ocean currents

धाराएँ महासागर के जल में उत्पन्न होने वाली वह शक्तिशाली गति है, जो निरन्तर किसी दिशा में नदी की धारा की भाँति बहती है। एफ. जे. मोंकहाऊस के अनुसार, “सागर तल की विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में होने वाली सामान्य गति को महासागरीय घारा कहते हैं।“

जव धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। कभी-कभी इनका वेग 19 किलोमीटर प्रति घण्टा तक होता है, जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं।

धाराओं की उत्पत्ति का कारण Causes of Origin of currents

सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, जल के ताप और घनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा और पृथ्वी गतिशीलता आदि कारक धाराओं को जन्म देने में सहायक होते हैं।

  1. स्थायी पवने Permanent Winds- स्थायी पवनें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से धाराओं को जन्म देती हैं, क्योंकि विश्व की अधिकांश धाराएँ, प्रचलित पवनों का ही अनुगमन करती हैं। हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएँ प्रति 6 महीने पश्चात् मानसून की दिशा परिवर्तन के साथ ही अपनी दिशा बदल लेती हैं। उष्ण कटिबन्ध में सन्मार्गों पवने महासागर में पश्चिम की ओर चलने वाली धाराएँ उत्पन्न कर देती हैं। शीतोष्ण कटिबन्ध में पछुआ पवनें पश्चिम से पूरब की ओर धाराएँ प्रवाहित करती हैं।
  2. तापमान में भिन्नता Difference In Temperature- उष्ण सागरों में जल का घनत्व तापमान ऊँचा रहने पर घट जाता है तथा जल हल्का होकर फैलता है, जबकि तापमान गिरने से जल का घनत्व अधिक हो जाता है तथा जाता है। परिणामस्वरूप गरम जल धारा के रूप में ठण्डे प्रदेशों की ओर प्रवाहित होने लगता है। इसके विपरीत, ठंडे भागों का जल गरम भागों की ओर बहता है। उत्तरी ध्रुव प्रदेशों से लैब्राडोर तथा क्यूराइल की धाराएँ दक्षिण की ओर जबकि गल्फस्ट्रीम तथा क्युरोसिवो गरम जल धाराएं उत्तरी ठण्डे भागों की ओर चलती हैं।
  3. जल का खारापन Salinity of Water- खारेपन की मात्रा कहीं अधिक और कहीं कम होती है। अधिक खारे जल का घनत्व भी अधिक हो जाता है, जबकि कम खारेपन से उसका घनत्व कम रहता है। अधिक घनत्व वाला जल नीचे बैठ जाता है। फलस्वरूप अपने घनत्व को समान रखने के लिए कम घनत्व के स्थानों से जल अधिक घनत्व वाले स्थानों की ओर बहता है जिससे धाराओं की उत्पत्ति होती है।
  4. महाद्वीपों का आकार Forms of Continent- धाराओं की प्रवाह दिशा पर महाद्वीपों के आकार तथा बनावट का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधारा पश्चिम की ओर चलने की अपेक्षा सेण्ट रॉक अन्तरीप से टकराकर उत्तर तथा दक्षिण को मुड़ जाती है। इसी प्रकार अलास्का तट की स्थिति के कारण ही अलास्का धारा पश्चिम की ओर बहने लगती है।
  5. पृथ्वी की परिभ्रमण गति Rotation the Earth- सागरों में धाराओं का प्रवाह प्रायः गोलाकार देखा जाता है। धाराओं की यह प्रकृति पृथ्वी के परिभ्रमण से सम्बन्धित है। फेरेल के नियमानुसार, धाराएँ उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं। इसी कारण धाराओं का प्रवाह घीरे-घीरे गोलाकार बन जाता है।

धाराओं के प्रकार Kinds of Currents

सागरीय धाराएँ दो प्रकार की होती हैं-

  1. गर्म जल धाराएँ warm currents- जो सामान्यत: ठण्डे स्थानों की ओर चलती हैं। विषुवतरेखीय भागों से उच्च अक्षांशों (ध्रुवों) की ओर चलने वाली धाराएँ होती हैं।
  2. ठण्डी धाराएँ Coldor Cool Currents- जो सामान्य रूप से ध्रुवों की ओर से विषुवतरेखीय गर्म भागों की ओर चलती हैं।

अन्ध महासागर की धाराएँ Currents Atlantic Ocean

अन्ध महासागर की धाराओं की मुख्य विशेषता यह है कि विषुवत रेखा के दोनों ओर इन धाराओं का क्रम प्राय: समान है। अन्ध महासागर की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं-

  1. उत्तरी विषुवतरेखीय गर्म धारा North Equatorial Warm Current- अन्ध महासागर में विषुवत रेखा के उत्तर में उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनों के द्वारा एक उष्ण जलधारा प्रवाहित होती है जो विषुवत रेखा के उष्ण जल को पूर्व से पश्चिम को धकेलती है। यही उत्तरी विषुवतरेखीय गर्म जलधारा कहलाती है। कैरेबियन सागर में इस जलधारा के दो भाग हो जाते हैं, जो कि पश्चिमी द्वीपों के कारण होते हैं। एक शाखा उत्तर की ओर अमरीका के पूर्वी तट के साथ बहकर गल्फस्ट्रीम में मिल जाती है और दूसरी शाखा दक्षिण की ओर चलकर मैक्सिको की खाड़ी में पहुँच जाती है।
  2. गल्फस्ट्रीम या खाड़ी की गर्म धारा Gulf stream- इसकी उत्पति मैक्सिको की खाड़ी से होती है, इसलिए अर्थातु खाड़ी की धारा कहा जाता है। यहाँ यह लगभग किलोमीटर गहरी 49 किलोमीटर चौड़ी होती है और इसकी गति लगभग 5 किलोमीटर प्रति घण्टा तथा तापमान 28° सेण्टीग्रेड होता है। यह जलधारा फ्लोरिडा जल सन्धि से निकलकर उत्तरी अमरीका के पूर्वी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर बहती है। हैलीफैक्स के दक्षिण से इसका प्रवाह पूर्णतः पूर्व की ओर हो जाता है। वहाँ से इसे पछुआ पवनें आगे बहा ले जाती हैं। 45° पश्चिमी देशान्तर के निकट इसकी चौड़ाई बहुत बढ़ जाती है, जिससे धारा के रूप में इसका स्वरूप बिल्कुल बदल जाता है। फलतः यहाँ उसका नाम उत्तरी अटलाण्टिक प्रवाह North Atlantic drift) पड़ जाता है। यही प्रवाह फिर पश्चिमी यूरोप में नार्वे की ओर चला जाता है और उत्तरी ध्रुव सागर में विलीन हो जाता है। गल्फस्ट्रीम में दक्षिणी विषुवत रेखीय धारा के जल का एक भाग आकर मिलने से ही इसकी शक्ति क्षमता बढ़ जाती है।
  3. कनारी की ठण्डी घारा Canary Current- उतरी अटलाण्टिक प्रवाह स्पेन के निकट दो शाखाओं में बंट जाता है। एक शाखा उत्तर की ओर चली जाती है और दूसरी दक्षिण की ओर मुड़कर स्पेन, पुर्तगाल तथा अफ्रीका के उत्तरी पश्चिमी तट के सहारे बहती है। यहाँ यह कनारी द्वीप के पास जाकर निकलती है, अतः इसका नाम कनारी धारा पड़ गया है। यहाँ सन्मार्गी पवनों के प्रभाव में आ जाने से धारा पुनः विषुवतरेखीय धारा के साथ विलीन हो जाती है।
  4. लैब्राडोर की ठण्डी धारा Labrador Cold Current- ग्रीनलैण्ड के पश्चिमी तट पर बेफिन की खाड़ी से निकलकर लैव्राडोर पठार के सहारे-सहारे बहती हुई न्यूफाउलैंड गल्फस्ट्रीम में मिल जाती है। यह धारा सागरों से आने के कारण ठण्डी होती है। न्यूफाउण्डलैण्ड के निकट ठण्डे और गरम जल मिलने के कारण घाना कुहरा छाया रहता है। मछलियों के विकास हेतु यहाँ आदर्श दशाएं मिलती हैं।

सारगैसो सागर, उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्यवर्ती भाग वृत्ताकार धरा प्रवाह के कारण शांत व् प्रायः स्थिर रहता है। यहाँ कूड़ा-करकट एकत्रित होने पर उस पर सारगोसा नामक घास उगने से ही इसे सारगैसो सागर कहते हैं।

  1. दक्षिणी विषुवत रेखीय गर्म धारा South Equatorial Current- यह धारा दक्षिण-पूर्वी सन्मार्गी.हवाओं के प्रवाह के कारण पश्चिमी अफ्रीका से प्रारम्भ होकर दक्षिणी अमरीका के पूर्वी तक बहती है। सेण्ट राक्स द्वीप से टकराने के बाद यह दो भागों में बंट जाती है प्रथम शाखा उत्तरी विषुवत् रेखीय धारा में मिल जाती है तथा दूसरी पूर्वी ब्राजील तट के सहारे गुजरती हुई आगे बढ़ जाती है।
  2. ब्राजील की गर्म धारा Brazilian Warm Current- दक्षिणी विषुवत रेखीय धारा दक्षिण-अमरीका के सेण्ट राक दीप से टकराकर दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। इसकी एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चली जाती है। यह उत्तरी ब्राजील धारा (north Brazilian Current) कहलाती है जो आगे चलकर खाड़ी की धारा में मिल जाती है। दूसरी धारा ब्राजील के तट के सहारे दक्षिण की ओर चली जाती है। यह दक्षिणी ब्राजील की धारा (South Brazilian Current) कहलाती है। आगे चलकर 40° द. अक्षांश के समीप फाकलैण्ड की ठण्डी धारा से टकराकर यह दक्षिणी अन्ध महासागर के प्रवाह के रूप में पश्चिम में पूर्व की ओर बहने लगती है।
  3. फाकलैण्ड की ठण्डी धारा Falkland Cold Current- अण्टार्कटिक महासागर में पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली ठण्डी धारा प्रवाह (drift) के दक्षिणी अमरीका के केपहार्न से टकराने से उसकी एक शाखा उसके पूर्वी किनारे के सहारे उत्तर की ओर चलने लगती है। यह फाकलैण्ड धारा कहलाती है।
  4. बेंगुला की ठण्डी धारा Banguela Cold Current- दक्षिणी अटलांटिक प्रवाह दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उसके  सहारे उतर की ओर मुड़ जाती है। इसे ही बेन्गुला की ठण्टी धारा कहा जाता है।
  5. अण्टार्कटिक प्रवाह Antarctic Drift- यह प्रवाह दक्षिणी ध्रुव सागर में तीव्र पछुआ पवनों के कारण पश्चिम से पूर्व की ओर चलता है। इसे पछुआ पवनों का प्रवाह भी कहा जाता है। यह एक ठण्डा प्रवाह है और यहाँ स्थल के अभाव में बड़े वेग से सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रक्रिया करता हुआ वहता है।
  6. विपरीत भूमध्यरेखीय जलधारा Counter Equatorial Current- उत्तरी व दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधाराएँ जव दक्षिणी अमरीका के पूर्वी तट पर पहुंचती हैं तो तट से टकराकर इन धाराओं का कुछ जल पुनः विषुवत् रेखा के शान्त खण्ड से होकर अफ्रीका के गिनी तट की ओर आता है। दोनों धाराओं के बीच जल के इस उल्टे बहाव को ही विपरीत विषुवत रेखीय जलधारा कहते हैं। इसकी उत्पत्ति में पृथ्वी की परिभ्रमण गति एवं पूर्ववर्ती भाग में जल की कमी की पुनः आपूर्ति का ही विशेष कारण निहित रहे हैं।

प्रशांत महासागर की धाराएं Currents Pacific Ocean

अन्ध महासागर की अपेक्षा प्रशान्त महासागर अधिक विस्तृत है और इसके तटवर्ती प्रदेशों का आकार भी भिन्न है, अतः इसमें धाराओं के क्रम कुछ भिन्न पाए जाते हैं। प्रशान्त महासागर की मुख्य धाराएँ निम्नलिखित हैं-

  1. उत्तरी भूमध्यरेखीय गर्मघारा North Equatorial Current- मध्य अमरीका के तट से पूर्वी द्वीपसमूह की ओर बहने वाली यह गरम जलधारा है। विषुवत्रैखा के निकट जल के उच्च तापमान के कारण गरम होकर सन्मार्गी पवनों द्वारा वहाए जाने से इसकी उत्पत्ति होती है। यह प्रायः विषुवत् रेखा के समान्तर बहती है।
  2. क्यूरोसिबो गर्म जलधारा Kuroshio Wram Current- जब प्रशान्त महासागर की उत्तरी विषुवतरेखीय धारा का बड़ा भाग फिलीपीन द्वीपसमूह के निकट पहुंचती है तो सन्मार्गी पवनों के प्रवाह से उत्तर की ओर मुड़ जाती है। इसके बाद दक्षिणी मध्य चीन के सहारे बढ़ती हुई जापान के पूर्वी तट तक पहुंचती है। यह उसे क्यूरोसिवो धारा कहते हैं। इसका रंग गहरा नीला होने के कारण जापानी लोग इसे जापान की काली धारा (Black Stream of Japan) भी कहते हैं। जापानी तट के सहारे बढ़ती हुई यह क्यूराइल के पास ठण्डी धारा से मिल जाती है। यहीं यह पछुआ पवनों के प्रवाह में आ जाने से पूरब की ओर मुड़ जाती है। यहाँ से इस धारा का विस्तार बहुत अधिक हो जाता है और यह उत्तरी प्रशान्त प्रवाह (North Pacific Drift ) कहलाने लगती है। यह प्रवाह पूर्व की ओर बहता हुआ उत्तरी अमरीका के पश्चिमी तट अलास्का से जा लगता है। वेंकूवर द्वीप समूह के निकट यह दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा उत्तर की ओर अलास्का तट के सहारे बहती हुई पुनः उत्तरी प्रशान्त प्रवाह से मिल जाती है। इस उत्तरी शाखा को अलास्का की धारा (Alaskan Current) कहते हैं। दक्षिण की ओर जाने वाली धारा गर्म सागरों में शीतल होने से केलीफोर्निया की ठण्डी धारा के नाम से जानी जाती है।
  3. क्यूराइल की ठण्डी धारा Cold Current- यह एक ठण्डी जलधारा है जो बेरिंग जल संयोजकं से होती हुई दक्षिण की ओर साइबेरिया तट के साथ बहती है और क्यूराइल द्वीपसमूह के निकट क्यूरोसियो जलधारा से मिल जाती है जिससे यहाँ घना कोहरा उत्पन्न होता है।
  4. कैलीफोर्निया की ठण्डी घारा Californian Cold Current- यह एक ठण्डी धारा है। यह उत्तरी प्रशान्त प्रवाह की दक्षिणी शाखा का ही भाग है। यह कैलीफोर्निया के पश्चिम तट के साथ बहकर दक्षिण में उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा से मिल जाती है।
  5. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा South Equatorial current- सन्मार्ग पवनों के कारण उत्पन्न होती है। यह धारा दक्षिणी अमरीका के पश्चिमी तट से पश्चिम की ओर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर बहती है। न्यूगिनी द्वीप के समीप यह दो भागों में विभक्त हो जाती है एक धारा  न्यूगिनी के उत्तरी तट के सहारे बहती है और दूसरी दक्षिण की ओर बहकर आस्ट्रेलिया की पूर्वी तटीय धारा में विलीन हो जाती है।
  6. पूर्वी आस्ट्रेलिया की गर्म धारा East Australian warm current-  न्यू गिनी के समीप दक्षिण में विषुवत रेखीय धारा दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। इसी की दक्षिणी शाखा आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के साथ बहती है। आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर इसे पूर्वी आस्ट्रेलिया की गर्म घारा अथवा न्यूसाउथवेल्स की धारा कहकर भी पुकारा जाता है। आगे चलकर पवनों के प्रभाव से पूर्व की ओर मुड़ जाती है।
  7. हम्बोल्ट (Hamboldt) अथवा पेरू की ठण्डी धारा Peruvian Cold Current- दक्षिणी प्रशांत महासागर का अण्टार्कटिक प्रवाह दक्षिणी अमरीका के दक्षिणी सिरे पर पहुंचता है, तो केपहॉर्न से टकराकर उत्तर की ओर मुड़ जाता है। फिर यह पेरू देश के पश्चिमी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर प्रवाहित होता है जो आगे चलकर पूर्वी आस्ट्रेलिया की धारा से मिल जाता है। पेरू के समीप इसे पेरुवियन घारा कहा जाता है। सर्वप्रथम इसे हम्बोल्ट नामक महान भूगोलवेता ने खोजा था, अतः यह हम्बोल्ट की धारा के नाम से भी विख्यात है।
  8. अण्टार्कटिक प्रवाह Antarctic Drift- अण्टार्कटिक महासागर में प्रशान्त महासागर के जल के सम्पर्क में आकर पश्चिम से पूर्व की एक ठण्डी जलधारा बहती है। यह पूर्वार्द्ध पछुआ पवनों से प्रभावित होती है। इसी कारण इसे पछुआ पवन प्रवाह (West wind Drift) भी कहते हैं। इसका वेग कम रहता है।
  9. विपरीत भूमध्यरेखीय धारा Counter Eduatorial Current- यह धारा अन्ध महासागर की विपरीत धारा के समान प्रशान्त महासागर दोनों भूमध्य रेखीय गर्म धातुओं के मध्य पूर्व की ओर बहती हैं।

हिन्द महासागर की धाराएं Currents of The Indian Oceans

उत्तरी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएँ मानसून पवनों के साथ अपनी दिशा बदलती हैं। अत: हिन्द महासागर की धाराओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।

  1. परिवर्तनशील धाराएँ या मानसून प्रवाह Variable Or Monsoon Currents- विषुवत् रेखा के उत्तर की ओर हिन्द महासागर की धाराएँ मानसून पवनों के अनुसार अपनी दिशा और क्रम बदल लेती हैं, इसलिए ये परिवर्तनशील धाराएँ कहलाती हैं। इन्हें मानसून प्रवाह (Monsoon Drift) भी कहा जाता है। यह प्रवाह भारतीय उपमहाद्वीप से अरब  तट के मध्य बहता है।
  2. स्थायी धाराएँ Permanent Currents- हिन्द महासागर में विषुवत् रेखा के दक्षिण में चलने वाली धाराएँ वर्ष भर एक ही क्रम में चलती हैं, अत: इन्हें स्थायी धारा कहते हैं। इन धाराओं में दक्षिणी विषुवत्रेखीय जलधारा, मोजाम्बिक धारा, पश्चिमी आस्ट्रेलिया की जलधारा और अगुलहास धारा मुख्य हैं।

हिन्द महासागर की निम्नलिखित धाराएँ हैं-

  1. दक्षिण विषुवतीय गर्म धारा South Equatorial Warm Current- दक्षिण पूर्वी सन्मार्गी पवनों के प्रवाह से ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट से पूर्व की ओर चलती हैा पूर्वी अफ्रीका के निकट मेडागास्कर के तट पर दो शाखाओं में बँटकर के समीप यह दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। इसकी पश्चिमी शाखा ही मोजाम्विक धारा कहलाती है।
  2. मोजाम्बिक की गर्म धारा Mozambidue Hot Current - अफ्रीका के पूर्वी तट मेडागास्कर के समीप बहती है। मेडागास्कर के पूर्वी तट पर वाली शाखा को मेडागास्कर धारा भी कहते हैं। यह दोनों ही शाखाएँ मिलकर अगुलहास की धारा कहलाती है।
  3. अगुलहास की गर्म धारा Agulhas Warm Current- अफ्रीका के दक्षिण में अगुलहास अन्तरीप से पछुआ पवनों के प्रवाह द्वारा पूर्व को एक धारा चलने लगती है। इसी धारा को अगुलहास की गर्म धारा कहते हैं।
  4. पश्चिमी आस्ट्रेलिया की ठण्डी धारा West Australian Cold Current- अण्टार्कटिक प्रवाह की एक शाखा आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पश्चिमी भाग से मुड़कर उत्तर की ओर आस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ-साथ वहने लगती है। यहीं यह पश्चिमी आस्ट्रेलिया की ठण्डी जलधारा कहलाती है।
  5. ग्रीष्मकालीन मानसून प्रवाह Summer Monsoon Drift- ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों के प्रभाव से एशिया महाद्वीप के पश्चिमी तटों में उष्ण प्रवाह पवनों की ओर चलने लगता है। उत्तरी विषुवत्रेखीय धारा भी मानसून के प्रवाह से पूर्व की ओर बहकर मानसून प्रवाह के साथ ग्रीष्मकाल की समुद्री धाराओं का क्रम बनाती है
  6. शीतकालीन मानसून प्रवाह Winter Monsoon Drift- शीत-ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसूनी पवनों के प्रभाव से एशिया के दक्षिणी तटों से एक धारा प्रवाहित होती है, जो पूर्व से पश्चिम को बहती है। यह विभिन्न देशों के तटों के साथ-साथ बढ़ती हुई पूर्वी अफ्रीका के समीप पूर्व की ओर मुड़ जाती है और पूर्वी द्वीपसमूह को चली जाती है।

धाराओं का मानव-जीवन पर प्रभाव Effects Currents on Human Life- जिन सागरीय तटों से होकर जलधाराएँ बहती हैं, वहाँ के निवासियों पर इनका बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है। धाराओं का यह प्रभाव कई प्रकार से होता है-

  1. तापमान पर प्रभाव- धाराओं का जलवायु पर सम (Equable) और विषम (Extreme) दोनों ही प्रकार का प्रभाव होता है। ठण्डी धाराओं के समीप के तट महीनों हिम से जमे रहते हैं, किन्तु जिन भागों में गर्म धाराओं का प्रवाह वहता है, वहाँ इनका बहुत ही उत्तम और सम प्रभाव होता है। गर्म धाराएँ उष्ण प्रदेशों की गर्मी को उच्च अक्षांशों के शीतल प्रदेशों को पहुंचाकर वहाँ की जलवायु को सम शीतोष्ण बनाए रखती हैं। उप ध्रुवीय ध्रुव प्रदेश में फसलें पैदा की जाती हैं। उत्तरी पश्चिमी यूरोप (नार्वे, स्वीडेन, इंग्लैण्ड, आदि) और पूर्वी जापान की उन्नति का कारण ये गर्म धाराएँ भी हैं।
  2. वर्षा पर प्रभाव- गर्म धाराओं के ऊपर होकर बहने वाली पवनों में काफी नमी होती है। यही वाष्प भरी पवनें उच्च अक्षांशों में पहुंचने पर अथवा अधिक ऊँचाई पर उठने पर वर्षा कर देती हैं। उत्तर-पश्चिमी यूरोप और अमरीका के पश्चिमी किनारे पर इसी प्रकार से वर्षा नियमित रूप से होती है। इसके विपरीत अफ्रीका में कालाहारी और दक्षिणी अमरीका में आटाकामा मरुस्थलों का अस्तित्व तटीय ठण्डी धाराओं के कारण कम वर्षा का परिणाम हैं।
  3. वातावरण पर प्रभाव- जिन स्थानों पर गर्म और शीतल धाराएँ परस्पर मिलती हैं वहाँ धना कुहरा उत्पन्न हो जाता है। न्यूफाउण्डलैण्ड के समीप गल्फस्ट्रीम की गर्म धारा और लैब्राडोर की ठण्डी धारा के मिलने से तथा जापान तट पर क्यूरोसिवो और क्यूराइल धाराओं के मिलने से घना कुहरा उत्पन्न हो जाता है।
  4. सामुद्रिक जीव-जन्तुओं पर प्रभाव- धाराएँ सामुद्रिक जीवन का प्राण हैं, सामुद्रिक जीवन को बनाए रखने और उसको प्रश्रय देने में धाराएँ महत्वपूर्ण योग देती हैं। धाराओं के कारण ही सागरों में आवश्यक जीवन-तत्व (ऑक्सीजन) एवं प्लेंकटन का सन्तुलित वितरण होता है। कई जीवों के लिए भोजन का आधार भी ये धाराएँ ही हैं।
  5. नौसंचालन (Shipping) पर प्रभाव- डीजल से चलने वाले अति आधुनिक शक्तिशाली जहाज धाराओं के प्रभाव से मुक्त जान पड़ते हैं, किन्तु प्राचीनकाल में जब जहाज पालदार होते थे, धाराओं का नौसंचालन पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता था।
  6. व्यापार पर प्रभाव- धाराओं के कारण सागरों की गति बनी रहती है। यह गति सागरों को जमने से बचाती है। जिन तटों पर गरम धाराएँ बहती हैं वहाँ के बन्दरगाह वर्ष भर खुले रहते हैं, जैसे-नार्वे तथा जापान के बन्दरगाह। बन्दरगाहों के खुले रहने से उन प्रदेशों में वर्ष भर व्यापार बना रहता है।

ज्वारभाटा Tides

ज्वारभाटा समुद्र जल की एक महत्वपूर्ण गति है, इस गति के माध्यम से सागर में जल-स्तर की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। अतः सागर की इस गति के परिणामस्वरूप जल के स्तर में सदैव परिवर्तन होता रहता है। महासागरीय जल सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से ऊपर उठता है और आगे की ओर बढ़ता है। इस अवस्था को ज्वार कहते हैं। जल के नीचे उतरने अथवा पीछे हटने को भाटा कहा जाता है।

ज्वारभाटा के अन्तर्गत सागरीय जल-स्तर के उस परिवर्तन को ही सम्मिलित किया जाता है जो सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति द्वारा होते हैं। सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी की स्थिति ज्वार के समय निम्नवत होती है-

महासागरीय जल में सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के फलस्वरूप ही ज्वार की उत्पत्ति होती है। चन्द्रमा के ठीक सामने का पृथ्वी का धरातल चन्द्रमा से सबसे नजदीक होता है, जबकि चन्द्रमा के धरातल से पृथ्वी का केन्द्र एवं उसका पृष्ट भाग कहीं अधिक दूर होते हैं। गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव की गणना में यह दूरी विशेष महत्वपूर्ण है। अत: पृथ्वी का वह भाग जो चन्द्रमा के सामने पड़ता है, चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से सर्वाधिक प्रभावित होता है तथा इसके ठीक पीछे वाले भाग सबसे कम प्रभावित होता है। सामने पड़ने वाले भाग का जल आकर्षित होकर ऊपर की ओर उठता है, जिससे सागर में ज्चार आता है। यही स्थिति पृथ्वी के इस भाग के बिल्कुल पीछे वाले भाग में भी होती है। पीछे के भाग में जल के पीछे रहने एवं केन्द्र प्रसारी दल के सम्मिलित प्रभाव से उबर आता है। इस प्रकार एक ही समय में पृथ्वी पर दो ज्वार उत्पन्न होते हैं, एक तो चन्द्रमा के सामने व दूसरा उससे ठीक पीछे के भाग में। चन्द्रमा के सामने व उसके विपरीत भागों के बीच पर दो स्थान ऐसे भी होते हैं जहाँ से जल खिंचकर ज्वार वाले स्थान पर आ जाता है। अतः इन स्थानों पर जल सतह से नीचा रहता है। इसे भाटा कहते हैं। पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण प्रत्येक स्थान पर में दो बार ज्वार एवं दो बार भाटा आता है।

ज्वार भाटा समय और चन्द्रमा की स्थिति का प्रभाव

ज्वार प्रत्येक स्थान पर प्राय: दो बार आता है, लेकिन ज्वार के आने का समय नियमित रूप से एक ही नहीं रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि पृथ्वी 24 घण्टे में अपनी भी अपनी धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी का चक्कर लगाता है अतः चन्द्रमा अगले एक दिन में अपने निश्चित ज्वार केन्द्र से कुछ आगे बढ़ जाता है। इस कारण ज्वार केन्द्र को चन्द्रमा के इस नवीन केन्द्र के ठीक नीचे तक या चन्द्रमा के सामने पहुँचने में 52 मिनट का समय अधिक लगता है। इस प्रकार प्रति अगले दिन ज्वार केन्द्र को चन्द्रमा के सामने आने में कल 24 घण्टे 52 मिनट लगते हैं। इसी कारण अगला ज्वार ठीक 12 घण्ट वाद न आकर 12 घण्टे 26 मिनट बाद दोनों ओर आता है।

ज्वर भाटा के प्रकार Types of  Tides- ज्वारभाटा मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

  1. बृहत् अथवा दीर्घ ज्वार Spring Tide- ज्वार उत्पन्न करने में चन्द्रमा की भूमिका महत्वपूर्ण है, परन्तु सूर्य का प्रभाव भी ज्वार उत्पन्न करने में सहायता है। जव सूर्य, पृथ्वी चन्द्रमा तीनों एक सीध में होते हैं तो सूर्य और चन्द्रमा की संयुक्त आकर्षण शक्ति से वृहत अथवा दीर्घ ज्वार उत्पन्न होता है। यहाँ सूर्य का प्रभाव कम दिखायी देती है, क्योंकि सूर्य पृथ्वी से औसतन 14 करोड़ 85 लाख किलोमीटर दूर है जबकि चन्द्रमा केवल 4,04,800 किलोमीटर है। चन्द्रमा की निकटता का प्रभाव ज्वार में स्पष्ट दिखायी देता है। सूर्य, चंद्रमा तथा पृथ्वी एक सीघी रेखा में प्रत्येक पूर्णमासी तथा अमावस्या को होते हैं। इस स्थिति को सिजगी कहते हैं। इन दिनों में बृहत् ज्वार की ऊंचाई सामान्य दिवसों की अपेक्षा 20 प्रतिशत अधिक होती है।
  2. लघु ज्वार NeapTide- पूर्णमासी तथा अमावस्या के मध्य कृष्ण पक्ष और शुक्लु पृक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी की तिथियों में सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण बनाते हैं। समकोणीय स्थिति के द्वारा सूर्य और चन्द्रमा, महासागरीय जल को अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस कारण महासागरों में इस दिन पानी का उतार व चढ़ाव सवसे कम रहता है। अतः इसे लघु ज्वार कहते हैं। यहाँ भी चन्द्रमा के नीचे जल-तल सापेक्षतः ऊँचा रहता है।
  3. दैनिक ज्वारभाटा Diurnal Tide- एक ही स्थान पर जब एक ज्वार और एक भाट आता है, तव इसे दैनिक ज्वार-भाटा कहते हैं। इन ज्वारों में 24 घण्टे 52मिनट का अन्तर होता है।
  4. अर्द्धदैनिक ज्वारभाटा Semi Diurnal Tide- एक ही स्थान पर जब दो बार ज्वार आते हैं तब एक ज्वार और दूसरे ज्वार में 12 घण्टे 26 मिनट का अन्तर रहता है। अर्द्धदैनिक ज्वार तथा भाटा में ऊँचाई तथा निचाई क्रमशः समान रहती है।
  5. मिश्रित ज्वारभाटा Mixed Tide- अर्द्धदैनिक ज्वार में असमानता को प्रकट करने की स्थिति को मिश्रित ज्वारभाटा कहते हैं। मिश्रित ज्वारभाटा में दोनों ज्वार और दोनों भाटों के बीच में और अन्तर पाया जाता है जैसे इंग्लैण्ड के दक्षिण-पूर्वी तट पर चार बार ज्वार व चार बार भाटा आता है।

ज्वार-भाटा और मानव जीवन Tides and Human life-  ज्वारभाटा मानव जीवन को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करता है-

  1. ज्वार के कारण छिछले बन्दरगाहों में जल की गहराई बढ़ जाती है, जिससे ज्वार के साथ बड़े-बड़े जलयान बन्दरगाहों में प्रवेश कर लेते हैं। इस कारण ज्वारभाटा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाए रखने में सहायता करता है।
  2. भाटा अपने साथ नदियों के मुहानों पर एकत्रित कूड़ा-करकट तेजी से बहाकर ले जाता है जिससे समुद्र तट साफ रहता है।
  3. ज्वारभाटा से जलविद्युत भी उत्पन्न की जा सकती है।
  4. ज्वारभाटा के कारण महासागरों के जल में निरन्तर हलचल रहती है जिससे शीतोष्ण प्रदेशों में बन्दरगाहों के निकट समुद्री जल जमने नहीं पाता है।
  5. ज्वार के कारण समुद्री तटों में परिवर्तन होता रहा है। ज्वार तरंगें जल की सहायता से तट पर अनेक कन्दराओं, आदि का निर्माण करती हैं जिनसे तटों पर कन्दराएँ तथा मेहराब बन जाते हैं।
  6. ज्वार-भाटा कभी-कभी समुद्री तटों पर कंकड़ और बालू के टीले जमा कर देते हैं, जिनसे समुद्र कम गहरा होता जाता है।
  7. ज्वार भाटे से समुद्रफेन, सीपियाँ तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं जिन्हें एकत्र कर तटवर्ती निवासी आजीविका प्राप्त करते हैं।

One thought on “जलमण्डल Hydrosphere

  • May 21, 2016 at 12:18 pm
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