हुमायूं द्वारा पुनः राज्य-प्राप्ति Humayun's Re-Acquisition of State

इस अव्यवस्थित दशा से हुमायूं को लगभग 15 वर्षों के बाद अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा करने करने में प्रोत्साहन मिला।

वह चरों ओर आश्रय एवं सहायता के लिए भटकता रहा। उसके भाइयों की विशेषतः कामरान की इर्ष्या प्रचंड थी कि अफगानों के विरुद्ध अपने साधनों को इकट्ठा करना तो दूर रहा, उन्होंने विपत्ति के इन दिनों तक में उसके प्रति घोर निर्दयता प्रदर्शित की। सिंध के शासक शाह हुसैन की शत्रुता उसके अनुगामियों में, जिनकी संख्या बहुत-से भगोड़ों के आ जाने से बढ़ थी, भोजन की सामग्री का अभाव होने के कारण सिंध में सेना एकत्रित की हुमायूँ की चेष्टा असफल रही। इसी प्रकार सिंध की मरुभूमियों में के क्रम में 1542 ई. के प्रारम्भ में उसने अपनी भाई हिन्दाल के गुरु शेख अली अम्बर जैनी की पुत्री हमीदा बानू बेगम से विवाह किया। राजपूत राजाओं शरण देने का साहस नहीं हुआ। तब वह अमरकोट गया, जहाँ के हिन्दू राणा प्रसाद ने उसे थट्टा एवं भक्कर जीतने में सहायता देने का वचन पर अन्त में उसे निराश कर दिया। यहीं 23 नवम्बर, 1542 ई. को उसके अकबर का जन्म हुआ। हुमायूँ भक्कर नहीं जीत सका तथा वह अपने भाई

कामरान के यहाँ शरण पाने में भी असफल रहा। इस प्रकार अनाश्रित दशा में पड़कर हुमायूँ ने भारत छोड़ दिया और अपने को शाह तहमास्प की उदारता पर छोड़ दिया। हुमायूँ के शिया धर्म स्वीकार करने, अपने खुतबा में शाह का नाम घोषित करने तथा सफल होने पर उसे कंधार सुपुर्द करने का वचन देने पर फारस के युवक शासक ने उसे चौदह हजार सैनिकों की एक फौज से सहायता की। इस प्रकार फारस की सहायता पाकर, जिससे एक बार बाबर के पूर्वी आक्रमण की सफलता सुगम हुई थी, इस समय उसका उत्तराधिकारी अपने खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने में समर्थ हुआ। इसी से हुमायूँ ने 1545 ई. में कंधार एवं काबुल पर अधिकार कर लिया। पर कधार पारसियों को नहीं दिया गया तथा यह तब से उनके तथा मुगलों के बीच युद्ध का कारण बन गया। कामरान बंदी बनाया गया और उसे चक्षुहीन कर मक्का भेज दिया गया। यह भी हुमायूँ ने अत्यन्त अनिच्छा से स्वीकार किया, यद्यपि अपने पहले के व्यवहार के कारण उसका भाई दयापूर्ण बर्ताव के योग्य नहीं था। अस्करी भी मक्का चला गया, पर हिन्दाल रात्रि के समय युद्ध करता हुआ मारा गया।

उत्तर-पश्चिम में अपने निर्दय भाईयों की शत्रुता को परास्त कर हुमायूँ नवम्बर, 1554 ई. में हिन्दुस्तान को पुन: विजय करने के लिए सेना लेकर चला। सूरों के बीच गृह-युद्धों के कारण उसे अपने इस कार्य के लिए उत्तम अवसर मिला। फरवरी, 1555 ई. में उसने लाहौर पर अधिकार कर लिया। पंजाब के बागी सूबेदार सिकन्दर सूर को जो अफगानों द्वारा सुल्तान घोषित किया गया था, सरहिन्द के निकट युद्ध में पराजित कर उसने उसी वर्ष जुलाई महीने में दिल्ली एवं आगरे पर अधिकार कर लिया। सिकन्दर शिवालिक पहाड़ियों में जा छिपा। इस प्रकार भाग्य के अनुकूल परिवर्तन से हुमायूँ अपनी दुर्बलता एवं निर्णय के कारण खोये हुए साम्राज्य का एक अंश पुनः प्राप्त करने में सफल हुआ। परन्तु वह अधिक समय तक नहीं बचा, जिससे पता चले कि दुर्भाग्य ने उसके चरित्र पर कोई हितकर प्रभाव डाला या नहीं) दिल्ली में अपने पुस्तकालय की सीढ़ी से अचानक गिर जाने के कारण 24 जनवरी, 1556 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। लेनपुल ने कहा है कि- वह जीवन भर ठोकर खाता रहा और अंत में ठोकर खाकर ही उसकी मृत्यु हो गई।

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