मनुष्य का पाचन तंत्र Human Digestive System

भोजन में उपस्थित जटिल पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट, वसा व प्रोटीन) का निर्माण पोषक पदार्थों के बड़े-बड़े अणुओं के समायोजन से होता है और उन पोषक पदार्थों की इकाइयाँ आपस में निर्जलीकरण बंधों से जुड़ी होती हैं। वे जल से प्रतिक्रिया कर छोटी-छोटी इकाइयों में टूट जाती हैं और शरीर उन्हें खपने योग्य दशा में परिवर्तित कर लेता है। यही समस्त क्रिया पाचन कहलाती है। अतः ठोस, जटिल, बड़े-बड़े अघुलनशील भोजन अणुओं का विभिन्न एन्जाइमों की सहायता से तथा विभिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा तरल, सरल और छोटे-छोटे घुलनशील अणुओं में निम्नीकरण को पाचन (Digestion) कहते हैं। पाचन क्रिया में भाग लेने वाले तंत्र को पाचन तंत्र (Digestive system) कहते हैं।

मनुष्य का पाचन तंत्र (Human digestive system): मनुष्य के पाचन तंत्र को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. आहार नाल (Alimentary canal) एवं
  2. सम्बद्ध पाचन ग्रंथियां (Associated digestive glands)
  3. आहारनाल (Alimentary canal): मनुष्य या किसी भी कशेरुकी जन्तु की आहारनाल एक लम्बी, कुण्डलित नलिका होती है जो मुख (Mouth) से शुरू होती है और गुदा (Anus) में समाप्त हो जाती है।

मनुष्य के आहारनाल के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं-

(a) मुखगुहा (Buccal cavity), (b) ग्रास नली (Oesophagus), (c) अमाशय (Stomach), (d) आंत (Intestine)

(a) मुखगुहा (Buccal cavity): मुखगुहा आहारनाल का पहला भाग है। मनुष्य का मुख एक दरार के समान होता है जो दोनों जबड़ों के बीच में स्थित एक गुहा में खुलता है, जिसे मुखगुहा कहते हैं। मुखगुहा के ऊपरी भाग को तालू कहा जाता है। मनुष्य का मुखगुहा ऊपरी तंथा निचले जबड़े से घिरी होती है। मुखगुहा को बन्द करने के लिए दो (ऊपरी तथा निचले) होंठ होते हैं। मुखगुहा में जीभ तथा दाँत होते हैं।

जीभ मुखगुहा के फर्श पर स्थित एक मोटी एवं मांसल रचना होती है। इसका अगला सिरा स्वतंत्र तथा पिछला सिरा फर्श से जुड़ा होता है। जीभ के ऊपरी सतह पर कई छोटे-छोटे अंकुर (Papillae) होते हैं, जिन्हें स्वाद कलियाँ (Tastebuds) कहते हैं। इन्हीं स्वाद कलियों द्वारा मनुष्य को भोजन के विभिन्न स्वादों जैसे-मीठा, खारा, खट्टा, कड़आ आदि का ज्ञान होता है। जीभ के अग्रभाग से मीठे स्वाद का, पश्च भाग (कठ के निकट के भाग) से कड़वे स्वाद का तथा बगल के भाग से खट्टे स्वाद का आभास होता है। जीभ अपनी गति के द्वारा भोजन की निगलने में मदद करता है।

मुखगुहा के ऊपरी तथा निचले दोनों जबड़ों में दाँतों की एक-एक पंक्तियाँ पायी जाती हैं। मनुष्य के दाँत गर्तदन्ती (Thecodont), द्विवारदन्ती (Diphyodont) तथा विषमदंती (Heterodont) प्रकार के होते हैं। गर्तदन्ती से तात्पर्य है कि ये जबड़े की हड्डियों में धंसे होते हैं, द्विवारदन्ती से तात्पर्य है कि ये जीवन में दो बार निकलते हैं। जबकि विषमदन्ती से तात्पर्य है ये एक से अधिक प्रकार के होते हैं। मनुष्य के एक जबड़े में 16 तथा कुल 32 दाँत होते हैं। जबड़े के आधे दाँत दायीं ओर तथा आधे बायीं ओर स्थित होते हैं। जबड़े के प्रत्येक ओर दो कृन्तक (Incisors), एक रदनक (Canine), 2 अग्रचवर्णक (Premolars) तथा 3 चवर्णक (Molars) दाँत पाये जाते हैं। कृन्तक (Incisors) सबसे आगे, चपटे व धारदार होते हैं जो भोजन को काटने का काम करते हैं। रदनक (Canine) नुकीले होते हैं, जो भोजन को फाड़ते हैं। अग्रचवर्णक (Premolars) तथा चवर्णक (Molars) भोजन को पीसने का काम करते हैं। मनुष्य के दाँत दो बार निकलते हैं। पहले शैशव अवस्था में जिनकी संख्या 20 होती है। शैशवावस्था के दाँत दूध के दाँत (Milky tooth) कहलाते हैं। वयस्कावस्था में निकले दाँत स्थायी दाँत (Permanent tooth) कहलाते हैं।


 

मनुष्य का दन्त-सूत्र (Dental formula of human beings):

I\frac { 2 }{ 2 } ,\quad C\frac { 1 }{ 1 } ,\quad PM\frac { 2 }{ 2 } ,\quad M\frac { 3 }{ 3 } \quad =\quad \frac { 8 }{ 8 } \quad \times \quad 2=\quad \frac { 16 }{ 16 } \quad =\quad 32

मनुष्य के दाँत के तीन भाग होते हैं- (i) ऊपरी भाग- शिखर (Crown), (ii) मध्य भाग- ग्रीवा (Neck) तथा (iii) निचला भाग-जड़ (Root)। दाँत का वह भाग जो मसूढ़े के ऊपर निकला होता है, शिखर (Crown) या सिर कहलाता है। जड़ (Root) तथा शिखर के बीच का भाग ग्रीवा या गर्दन (Neck) कहलाता है। दाँत का वह भाग जो मसूढे में धंसा होता है, जड़ (Root) कहलाता है। प्रत्येक दाँत के भीतर एक गुहा होती है जिसे मज्जा गुहा (Pulp cavity) कहते हैं। इसके ऊपर दंतास्थि या डेटाइन (Dentine) होती है, जो दाँत का अधिकांश भाग तैयार करती है। यह हड्डी से अधिक कड़ी तथा पीले रंग की होती है। दाँत के ऊपरी हिस्से या शिखर में ईनामेल (Enamel) का चमकीला स्तर पाया जाता है जो दाँत को सुरक्षा प्रदान करती है। ईनामेल (Enamel) मानव शरीर का सबसे कठोर भाग है।

मुखगुहा का पिछला भाग ग्रसनी (Pharynx) कहलाता है। इसमें दो छिद्र होते हैं- (i) निगल द्वार (Gullet) जो आहारनाल के अगले भाग अर्थात् ग्रासनली में खुलता है, तथा (ii) कण्ठद्वार (Glottis) जो श्वासनली (Trachea) में खुलता है। कण्ठद्वार से आगे एक पट्टी जैसी रचना होती है जो एपिग्लोटिस (Epiglottis) कहलाता है। मनुष्य जब भोजन करता है तो यह पट्टी कण्ठद्वार को ढंक देती है जिससे भोजन शवासनली में नहीं जा पाता है।

(b) ग्रासनली (Oesophagus): मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगल द्वार (Gullet) के द्वारा ग्रासनली में पहुँचता है। ग्रासनली एक लम्बी नली होती है जो आमाशय में खुलती है। इसकी दीवार पेशीय तथा संकुचनशील होती है। भोजन के पहुँचते ही ग्रासनली की दीवार में तुरंग की तरह संकुचन या सिकुड़न और शिथिलन या फैलाव शुरू होता है जिसे क्रमाकुंचन (Peristolsis) कहते हैं। इसी प्रकार की गति के कारण भोजन धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकता है। ग्रासनली में किसी भी प्रकार की पाचन क्रिया नहीं होती है। ग्रासनली से भोजन आमाशय में पहुँचता है।

(c) अमाशय (Stomach): अमाशय उदरगुहा (Abdominal Cavity) में बायीं ओर स्थित होता है। यह द्विपालिका थैली (Bilobed sac) जैसी रचना होती है। इसकी लम्बाई लगभग 30 cm होती है। आमाशय का अग्र भाग कार्डिएक (Cardiac) तथा पिछला भाग पाइलोरिक (Pyloric) कहलाता है। कार्डिएक तथा पाइलोरिक के बीच का भाग फुण्डिक (Fundic) कहलाता है। आहार-नाल के अन्य भागों की तरह आमाशय की भीतरी दीवार पर स्तम्भाकार एपिथोलियम (Columnar epithelium) कोशिकाओं का यह स्तर होता है। कोशिकाओं का यह स्तर जगह-जगह अंदर की ओर धंसा रहता है। इन धंसे भागों की कोशिकाएँ आमाशय ग्रन्थि या जठर ग्रन्थि (Gastric glands) का निर्माण करती है। ये ग्रन्थियाँ आमाशय में जठर रस (Gastric juice) का स्रावण करती है। जठर ग्रन्थियों की कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं-

(i) श्लेष्मा कोशिकाएं (Mucous cells)

(ii) भित्तीय या अम्लजन कोशिकाएं (Parietaloroxyntic cells) तथा

(iii) मुख्य या जाइमोजिन कोशिकाएँ (Chief or Zymogen cells)। इन तीनों प्रकार की कोशिकाओं के स्राव का सम्मिलित रूप जठर रस कहलाता है। जठर रस में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, श्लेष्मा या म्यूकस तथा निष्क्रिय पेप्सिनोजेन (Pepsinogen) होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्राव अम्लजन कोशिकाओं (Oxyntic cells) से होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल निष्क्रिय पेरिसनोजेन की सक्रिय पेप्सिन (Pepsin) नामक एन्जाइम में परिवर्तित कर देता है। पेप्सिन भोजन के प्रोटीन पर कार्य करके उसे पेप्टोन में बदल देता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल जीवाणुनाशक की तरह भी कार्य करता है तथा भोजन के साथ आने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। म्यूकस का स्राव म्यूकस कोशिकाओं से होता है। म्यूकस आमाशय की दीवार तथा जठर ग्रन्थियों को हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं पेप्सिन एन्जाइम से सुरक्षित रखता है। काइम (Chyme) आमाशय के पाइलोरिक छिद्र के द्वारा छोटी आँत में पहुँचता है।

(d) ऑत (Intestine): मनुष्य के सम्पूर्ण ऑत को दो भागों में विभाजित किया गया है-

(i) छोटी आंत (Small intestine) तथा (ii) बड़ी आंत (Large intestine)

(i) छोटी आंत (Small intestine): इसका प्रारम्भिक भाग जो अंग्रेजी के अक्षर 'U' की तरह मुड़ा रहता है, ग्रहणी या पक्वाशय (Duodenum) कहलाता है। ग्रहणी की लम्बाई लगभग 25 cm होती है जबकि शेष 30 crn लम्बा भाग इलियम (Ileum) कहलाता है। इलियम की दीवार की भीतरी सतह पर अंगुलियों के समान रचनाएँ पायी जाती हैं जिन्हें आन्त्र रसांकुर (Intestinal villi) कहते हैं। ये रसांकुर आँत की दीवार के अवशोषण सतह को बढ़ाते हैं। ग्रहणी तथा आमाशय के मोड़ के मध्य अग्न्याशय पाया जाता है। पित्त वाहिनी (Bile duct) तथा अग्न्याशय वाहिनी (Pancreatic duct) मिलकर एक सामान्य वाहिनी (Commonduct) का निर्माण करती है। यह सामान्य वाहिनी ग्रहणी में खुलती है। छोटी आँत पीछे की ओर बड़ी आँत में खुलती है। छोटी आँत भोजन के पाचन में सहायता करती है तथा पचे हुए भोजन का अवशोषण (Absorption) करती है। छोटी आँत आहारनाल का सबसे लम्बा भाग होता है। आहारनाल के इसी भाग में पाचन की क्रिया पूर्ण होती है। मनुष्य में इसकी लम्बाई लगभग 6 मीटर तथा चौड़ाई 2.5 सेमी होती है।

(ii) बड़ी आँत (Large intestine): छोटी आँत आहारनाल का अगला भाग बड़ी आँत में खुलता है। बड़ी आँत भी दो भागों में विभक्त होता है। ये भाग कोलोन (Colon) तथा मलाशय (Rectum) कहलाते हैं। छोटी ऑत तथा बड़ी आँत के जोड़ पर एक छोटी-सी नली होती है, जो सीकम (Caecum) कहलाता है। सीकम के शीर्ष पर एक अंगुली जैसी रचना होती है, जिसका सिरा बन्द रहता है। यह रचना ऐपेन्डिक्स कहलाती है। मनुष्य के आहारनाल में ऐपेन्डिक्स का कोई कार्य नहीं होता है। यह एक अवशेषी अंग (vestigial organ) है।

कोलन तीन भागों में विभाजित होता है। ये भाग हैं- उपरिगामी कोलन (Ascending colon) अनुप्रस्थ कोलन (Transverse colon) तथा अधोगामी कोलन (Descending colon)| अधोगामी कोलन मलाशय (Recturn) में खुलता है जो अंत में मलद्वार (Anus) के द्वारा शरीर के बाहर खुलता है। इलियम एवं कोलन के जोड़ पर एक वाल्व (valve) पाया जाता है जिसे इलियोसीकल वाल्व कहते हैं जो भोजन को वापस छोटी आंत में जाने से रोकता है।

  1. सम्बद्ध पाचक ग्रंथियां (Associated digestive glands): आहारनाल (Alimentary canal) से सम्बन्धित वे ग्रन्थियाँ जो भोजन के पाचन में मदद करती हैं, पाचक ग्रन्थियाँ (Digestive glands) कहलाती हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं-

(a) आन्तरिक पाचक ग्रंथियां (Internal digestive glands): वे पाचक ग्रंथियां जो आहारनाल की दीवार में उपस्थित होती हैं, आन्तरिक पाचक ग्रन्थियाँ कहलाती हैं। इस श्रेणी में समस्त श्लेष्म ग्रन्थियाँ (Mucous glands), आमाशय की दीवार, जठर ग्रन्थियाँ (Gastric glands) एवं आंत की दीवार की ब्रूनर्स ग्रंथियां (Brunner's glands) आती हैं।

(b) वाह्य पाचक ग्रंथियां (External digestive glands): आहारनाल के अतिरिक्त शरीर के अन्य भागों में पायी जाने वाली पाचक ग्रन्थियाँ बाह्य पाचक ग्रन्थियाँ कहलाती हैं। मनुष्य में निम्नलिखित तीन बाह्य पाचक ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं-

(i) लार ग्रन्थियाँ (salivary glands): मनुष्य में तीन जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। पहली जोड़ी लार ग्रन्थि जिह्वा के दोनों ओर एक-एक की संख्या में उपस्थित होती है जो sublingual glands के नाम से जानी जाती है। दूसरी जोड़ी लार ग्रन्थियाँ निचले जबड़े के मध्य में मैक्जिला अस्थि के दोनों ओर एक-एक की संख्या में उपस्थित होती हैं जो  Submaxillary glands के नाम से जानी जाती है। तीसरी जोड़ी लार ग्रन्थियाँ दोनों कानों के नीचे एक-एक की संख्या में उपस्थित होती है, जो Parotid glands के नाम से जानी जाती है।

मनुष्य के लार (saliva) में लगभग 99% जल तथा शेष 1% एन्जाइम होता है। लार में मुख्यतः दो प्रकार के एन्जाइम पाये जाते हैं। ये हैं- टायलिन (Ptylin) एवं लाइसोजाइम (Lysozyme)। ये दोनों एन्जाइम पाचन में सहायता करते हैं।

(ii) यकृत (Liver): यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इसका वजन 1.5 से 2.0 किग्रा के मध्य होता है। यह उदर गुहा (Abdominal cavity) के ऊपरी भाग में दाहिनी ओर स्थित होता है। यह गहरे धूसर रंग का होता है। यह एक गहरे गर्त द्वारा दो खण्डों में विभाजित रहता है। इसके निचले भाग में नाशपाती के आकार की एक छोटी-सी थैली होती है जिसे पित्ताशय (Gal-bladder) कहते हैं। यकृत द्वारा स्रावित पित्त रस (Bile) पित्ताशय में ही संचित होता है। यह पित्त आंत में उपस्थित एन्जाइमों की क्रिया को तीव्र कर देता है। इसके अतिरिक्त यकृत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा (Lipid) के उपापचय (Metabolism) में सक्रिय भाग लेता है तथा शरीर में उत्पन्न जीवविषों (Toxins) को प्रभावहीन कर इसकी रक्षा करता है।

यकृत के कार्य:

  • यकृत कार्बोहाइड्रेट उपापचय (Carbohydrate metabolism) के अन्तर्गत ग्लाइकोजन (Glycogen) का निर्माण एवं संचय करता है।
  • यकृत भोजन में वसा की कमी होने पर कार्बोहाइड्रेट का कुछ भाग वसा में परिवर्तित कर देता है।
  • यकृत प्रोटीन उपापचय (Protein metabolism) में सक्रिय रूप से भाग लेता है। शरीर के अवयवों में प्रोटीन विघटन (Protein decomposition) के फलस्वरूप अन्य वस्तुओं के साथ-साथ जल, CO2 और अन्य नाइट्रोजनीय पदार्थ जैसे अमोनिया (Ammonia), यूरिया (Urea), यूरिक अम्ल (Uric Acid) इत्यादि उत्पन्न होते हैं। अमोनिया एक विषैला पदार्थ है जिसे यकृत (Liver) यूरिया में परिवर्तित कर देता है। इसके अतिरिक्त यकृत प्रोटीन के अधिकांश मात्रा को कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित कर देता है।
  • सामान्यतः बड़ी आँत में प्रोटीन के पूतीभवन (Putrefication) के कारण कुछ विषैले पदार्थ उत्पन्न होते हैं जिन्हें रक्त निर्वाहिका शिरा को माध्यम से यकृत में ले आता है। यकृत इन विषैले पदार्थों को अविषैले यौगिकों में परिवर्तित कर प्रभावहीन कर देता है, जो मूत्र (Urine) के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाता है।

पित्ताशय (Gall bladder): पित्ताशय नाशपाती के आकार की एक थैली होती है, जो यकृत के नीचे स्थित होती है। पित्त नलिका (Bile duct) यकृत से जुड़ी होती है। यकृत में जो पित (Bile) बनता है वह पित्त-नलिका के माध्यम से पक्वाशय में आ जाता है। पित्त का पक्वाशय में गिरना प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex action) द्वारा होता है।

पित्त (Bile): यह पीले रंग का क्षारीय द्रव होता है। इसका pH मान 7.7 होता है। इसमें 85% जल, 12% पित्त वर्णक, 0.7% पित्त लवण, 0.28% कोलेस्ट्रॉल, 0.3% मध्यम वसाएँ तथा 0.15% लेसीथिन (Lacithin) होते हैं। पित्त में कोई एन्जाइम नहीं पाया जाता है। इसकी प्रकृति क्षारीय होती है। यह काइम की चर्बी को जल के साथ मिलाकर इमल्शन बनाने में सहायता करता है। मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 700-1000 मिली लीटर पित्त बनता है। पित्त भोजन के साथ आये हानिकारक जीवाणुओं को भी नष्ट करता है। पित्त में उपस्थित अकार्बनिक लवण आमाशय से आये भोजन का माध्यम क्षारीय कर देता है जिससे कि अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) क्रिया कर सके। पित्त आँत की क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है जिससे भोजन में पाचक रस अच्छी तरह मिल जाते हैं। पित्त अनेक उत्सर्जी एवं विषैले पदार्थों तथा धातुओं के उत्सर्जन का कार्य करता है। यह वसा के अवशोषण में भी सहायक होता है। यह विटामिन K तथा वसाओों में अन्य विटामिनों के अवशोषण में सहायक होता है। यदि यकृत कोशिकाएँ रुधिर से विलिरुबिन लेना बन्द कर दे तो रुधिर द्वारा सम्पूर्ण शरीर में विलिरुबिन फैल जाता है। इसे ही पीलिया (Jaundice) कहते हैं।

(iii) अग्न्याशय (Pancreas): यह मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक साथ अन्तःस्रावी (नलिकाविहीन) और बहिःस्रावी (नलिकायुक्त) दोनों प्रकार की ग्रन्थि है। यह छोटी ऑत के 'U' आकार वाले भाग में स्थित होती है। यह आमाशय के ठीक नीचे तथा ग्रहणी को घेरे हुए पीले रंग की एक ग्रन्थि है। अग्नाशय में अनेक पतली-पतली नलिकाएँ होती हैं जो आपस में जुड़कर एक बड़ी अग्न्याशयी वाहिनी (Pancreatic duct) बनाती हैं। अग्न्याशयी वाहिनी तथा मूल पित्तवाहिनी मिलकर एक बड़ी नलिका बनाते हैं, फिर यह नलिका एक छिद्र के द्वारा ग्रहणी में खुलती है। अग्न्याशय एक प्रकार का क्लोम रस (Pancreatic juice) स्रावित करता है जो नलिका के माध्यम से पक्वाशय में आ जाता है। अग्न्याशय का एक भाग लैंगरहैंस की द्विपिका (Islets of Langerhans) कहलाता है। लैंगरहैंस की द्धिपिका के β-कोशिका से इन्सुलिन (Insulin), α-कोशिका से ग्लूकेगॉन (Glucagon) एवं γ-कोशिका से सोमेटोस्टेटिन (somatostatin) नामक हार्मोन निकलता है। इन्सुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा को निर्धारित करने का काम करता है। इन्सुलिन के अल्पस्रवण से मधुमेह (Diabetes) नामक रोग हो जाता है ।

अग्न्याशयी रस (Pancreatic juice): यह अग्न्याशयी कोशिकाओं से स्रावित होता है। इसमें 98% जल तथा शेष 2% भाग में लवण एवं एन्जाइम होते हैं। यह क्षारीय द्रव होता है जिसका pH मान 7.5-8.3 होता है। अग्न्याशयी रस में तीनों प्रकार मुख्य भोज्य पदार्थों को पचाने के एन्जाइम होते हैं। इस कारण इसे पूर्ण पाचक रस कहा जाता है। इसमें मुख्यतः पाँच एन्जाइमट्रिप्सिन, एमाइलेज, काबॉक्सिपेप्टिडेस, लाइपेज तथा माल्टेज पाये जाते हैं। इसमें माल्टेज एवं एमाइलेज कार्बोहाइड्रेट का, ट्रिप्सिन प्रोटीन का तथा लाइपेज वसा का पाचन करता है।

मनुष्य में पाचन क्रिया (Process of digestion in human beings): मनुष्य में भोजन का पाचन मुख से ही प्रारम्भ हो जाता है और यह छोटी ऑत तक जारी रहता है। भोजन के मुख में अन्तग्रहण (Ingestion) के बाद उसको दाँतों के द्वारा अच्छी तरह पीसा एवं चबाया जाता है जिससे वह महीन कणों में विभक्त हो जाता है। मुख में स्थित लार ग्रन्थियों (salivary Glands) द्वारा स्रावित लार (saliva) से दाँतों द्वारा पीसा भोजन अच्छी तरह मिल जाता है। लार में दो एन्जाइम टायलिन एवं लाइसोजाइम पाये जाते हैं। इनमें से टायलिन भोजन में उपस्थित मंड (स्टार्च) को माल्टीज शर्करा में अपघटित करता है, फिर माल्टेज नामक एन्जाइम माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है। लाइसोजाइम नामक एन्जाइम भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने का काम करता है। इसके अतिरिक्त लार में उपस्थित शेष पदार्थ बफर (Buffer) का कार्य करते हैं। अब यह भोजन जीभ द्वारा ग्रसिका में ठेल दिया जाता है जहाँ से यह आमाशय में पहुँच जाता है। आमाशय में भोजन के पहुँचने पर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) भोजन से मिलकर टायलिन को निष्क्रिय कर देता है। साथ ही-साथ यह भोजन को अम्लीय बना देता है। इसके अतिरिक्त हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को भी नष्ट कर देता है। आमाशय में पहुँचा भोजन जठर रस से मिलकर अर्द्धतरल लुगदी के रूप में परिवर्तित हो जाता है। जठर रस में पेप्सिन, रेनिन तथा म्यूसिन नामक एन्जाइम उपस्थित होते हैं। पेप्सिन भोजन में उपस्थित प्रोटीन को पहले प्रोटियोजेज तथा फिर पेप्टोन में परिवर्तित करता है। रेनिन दूध में घुलनशील प्रोटीन केसीन (Casein) को कैल्सियम पैराकैसिनेट में बदलकर दूध को दही में परिवर्तित करता है। म्यूसिन जठर रस के अम्लीय प्रभाव को कम करता है। यह भोजन को चिकना बनाने का काम करता है तथा श्लेष्मा झिल्ली (Mucous membrane) पर एक रक्षात्मक आवरण बनाता है जिससे पाचक एन्जाइमों का प्रभाव आहारनाल पर नहीं पड़ता है। आमाशय में इसके पश्चात भोजन काइम (Chyme) कहलाता है। आमाशय से काइम ग्रहणी (Duodenum) में पहुँचता है। यहाँ इसमें सबसे पहले यकृत से स्रावित पित्त रस (Bile juice) मिलता है। पित्त रस में किसी भी प्रकार का एन्जाइम नहीं पाया जाता है। यह क्षारीय होता है तथा काइम की प्रकृति को भी अम्लीय से क्षारीय बना देता है। यह काइम की चबों को जल के साथ मिलाकर इमल्शन (Emulsion) बनाने में मदद करता है। यहाँ अग्न्याशय से स्रावित अग्न्याशय रस (Pancreatic juice) भी आकर काइम में मिलते हैं। अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिन, (Trypsin), लाइपेज (Lipase), एमाइलेज (Amylase) कोर्बोक्सिपेप्टिडेस (Carboxypeptidase) तथा माल्टेज नामक एन्जाइम होते हैं। ट्रिप्सिन प्रोटीन एवं पेप्टोन को पॉलीपेप्टाइड्स एवं ऐमीनो अम्ल में परिवर्तित करता है। एमाइलेज मंड (स्टार्च) को घुलनशील शर्करा में परिवर्तित करता है। लाइपेज इमल्सीकृत वसाओं को ग्लिसरीन तथा फैटी एसिड्स (Fatty acids) में परिवर्तित करता है। इन एन्जाइमों की क्रिया काइम पर होने के फलस्वरूप काइम काफी तरल हो जाता है और अब यह इलियम (neum) में पहुँचता है। यहाँ आन्त्ररस (Intestinal juice) की क्रिया काइम पर होती है। आन्त्र रस क्षारीय (pH-8) होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 2 लीटर आन्त्र रस स्रावित होता है। आन्त्ररस में निम्नलिखित प्रकार के एन्जाइम उपस्थित होते हैं-

(i) इरेप्सिन (Erepsin): यह शेष प्रोटीन एवं पेप्टोन को ऐमीनो अम्ल में परिवर्तित करता है।

(ii) माल्टेज (maltase): यह माल्टोस को ग्लूकोज शर्करा में परिवर्तित करता है।

(iii) सुक्रेस (sucrase): यह सुक्रोस को ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज में परिवर्तित करता है।

(iv) लेक्टेस (Lactase): यह लैक्टोज को ग्लूकोज एवं ग्लेक्टोस में परिवर्तित करता है।

(v) लाइपेज (Lipase): यह इमल्शीकृत वसाओं को ग्लिसरीन एवं फैटी एसिड्स में परिवर्तित करता है।

अवशोषण (Absorption): छोटी आँत तक भोजन का पूर्ण पाचन हो जाता है अर्थात् भोज्य पदार्थ यहाँ इस रूप में परिवर्तित हो जाता है कि आहारनाल की दीवार उसे अवशोषित कर सके। काइम के अवशोषण की मुख्य क्रिया छोटी आँत में ही होती है। छोटी आँत में स्थित रसांकुर (villi) की कोशिकाएँ अवशोषित योग्य तरल काइम को अवशोषित करने के पश्चात् रुधिर एवं लसीका में पहुँचा देती है। इस प्रकार पचे हुए काइम को ग्लूकोज तथा ऐमीनो अम्ल रुधिर कोशिकाओं में अवशोषित होकर रुधिर मिश्रित हो जाते हैं। लेकिन वसा अम्ल एवं ग्लिसरीन लसीका में अवशोषित होते हैं। इसके बाद ये पदार्थ रुधिर भ्रमण द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों में पहुँच जाते हैं।

बिना पचा काइम (Undigested chyme) छोटी ऑत से बड़ी आँत में पहुँच जाता है। बड़ी आंत काइम से जल को अवशोषित कर लेती है। शेष काइम मल के रूप में मलाशय (Recturn) में एकत्रित होकर गुदा (Annus) द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

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