होमी जहाँगीर भाभा Homi Jehangir Bhabha

(1909-1966), भौतिक विज्ञानी, भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष

होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुंबई के एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था| भाभा ने पंद्रह साल की उम्र में अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को पढ़कर स्वयं को असाधारण प्रतिभाशाली सिद्ध कर दिया था| 1930 में भाभा ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से मैकेनिकल विज्ञान (mechanical sciences) से स्नातक किया| अपने भौतिक विज्ञान के लगाव के कारण उन्होंने इसी विषय में अपनी पढाई जारी रखी| सन् 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

भाभा ने अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणों पर शोध किया और भाभा-हेटलर कास्केड थ्योरी ऑफ़ इलेक्ट्रान शावर (Bhabha-Heitler cascade theory of electron showers, 1937) दी| वह अपने कणों के घूमने के सिद्धांत (classical theory of spinning particles) के लिए भी जाने जाते हैं| 1939 में वः छुट्टी मनाने भारत आये, पर द्वितीय विश्व युद्ध चिद जाने से वह भारत रुक गए| भाभा को बंगलौर में भारतीय विज्ञान संस्थान में कॉस्मिक किरणों के अनुसन्धान के लिए प्राध्यापक पद पर नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सी वी रमन के साथ काम किया| 1940 में उन्होंने रॉयल सोसाइटी का फैलो चुना गया। सन 1944 में भाभा ने सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से संपर्क किया और उनसे मौलिक अनुसंधान के एक संस्थान के लिए सहयोग देने के लिए कहा, जो 1945 में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (Tata Institute of Fundamental Research) के रूप में मुंबई में स्थापित किया गया| टाटा ट्रस्ट को लिखे गए अपने पत्र में उन्होंने पहले ही परमाणु उर्जा के महत्त्व को लिखा था|

भाभा की प्रतिभा और दूरदृष्टि ने पं. जवाहर लाल नेहरू का ध्यान आकर्षित किया और भाभा को परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission) का अध्यक्ष बनाया गया, जिसने जल्द ही मुंबई के निकट ट्राम्बे (Trombay) में एक रिएक्टर का निर्माण शुरू कर दिया| इस प्रकार भारत के पहले परमाणु रिएक्टर अप्सरा (Apsara) ने 1955 में काम करना शुरू किया| जल्द ही कनाडा सरकार के सहयोग से सायरस' परियोजना प्रारंभ हुई जो 1960 में पूरी हुई| 1961 में जेरिलिना परियोजना भी पूरी हो गई| इन रिएक्टरों के निर्माण से देश में परमाणु उर्जा से बनने वाली विद्युत परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्‍त हुआ।

1957 में ट्राम्बे परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान (Trombay Atomic Energy Establishment) का औपचारिक रूप से उद्घाटन किया गया, परन्तु यह पहले से ही काम कर रहा था| 1967 में इसका नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre) रख दिया गया|

भाभा ने कभी भी परमाणु बम बनाने का समर्थन नहीं किया, वह महात्मा गाँधी से भी प्रभावित थे जो परमाणु बमों का विरोध करते थे| 1955 में उन्हीने नेहरु को सुझाव भी दिया की भारत को एकतरफ़ा परमाणु बम बनाने का विचार छोड़ देना चाहिए| नेहरु ने कहा की भारत के पास पहले परमाणु बम  बनाने की क्षमता होनी चाहिये, अन्यथा बम बनाने का विचार त्यागना लोगों को समझाने के लिए काफी नहीं होगा| दस साल बाद जब चीन ने 1964 में अपना परमाणु विस्फोट किया, तो लाल बहादुर शास्त्री ने उनसे पूछा की क्या भारतीय वैज्ञानिक भूमिगत परिक्षण के किये समर्थ हैं| उनकी मोंट ब्लांक, स्विट्जरलैंड में 1966 में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गयी और वह इस क्षेत्र  में हुए विकास कार्यों को नहीं देख पाए|

भाभा ने दुनिया भर के भारतीय वैज्ञानिकों से अपील की कि वे भारत लौट आयें और इन्हीं में एक थे मैनचेस्टर की इंपीरियल कैमिकल कंपनी में काम करने वाले होमी नौशेरवांजी सेठना। उन्होंने उनके इस मिशन को आगे बढ़ाया और आगे चलकर सन 1974 में शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट करके, भारत ने परमाणु शक्ति सम्‍पन्‍न राष्‍ट्र का दर्जा हासिल किया।

भाभा को सन 1943 में एडम्स पुरस्कार प्राप्‍त हुआ। इसके अलावा उन्‍हें सन 1948 में हॉपकिन्स पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्‍हें अनेक विश्वविद्यालयों ने डॉ. ऑफ सांइस की उपाधि से विभूषित किया। सन 1954 में भारत सरकार ने उन्‍हें पद्मभूषण सम्‍मान से अलंकृत किया। वे सन 1956 में जेनेवा में आयोजित 'यूएन कॉफ्रेंस ऑन एटॉमिक एनर्जी' के चेयरमैन भी चुने गये।

भाभा के प्रयासों के परिणाम से ही भारत ने वर्ष 1956 में ट्रांबे में एशिया के पहले एटॅामिक रिएक्टर की स्थापना की|

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