शंघाई सहयोग संगठन Shanghai Cooperation Organisation - SCO

शंघाई सहयोग संगठन 6 मध्य एशियाई देशों द्वारा गठित एक क्षेत्रीय सुरक्षा मंच है।

मुख्यालय: सेंट पीटर्सबर्ग

सदस्य: चीन, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तजाकिस्तान एवं उज्बेकिस्तान।

पर्यवेक्षक: भारत, ईरान, मंगोलिया, पाकिस्तान

संवाद सहयोगी: श्रीलंका, बेलारूस

उत्पति एवं विकास

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शंघाई-पांच के रूप में 1996 में अस्तित्व में आया, जब शंघाई (चीन) में चीन और चार पूर्व सोवियत गणतत्रों-कजाकस्तान, किरगिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान, ने सीमा विवादों को सुलझाने के लिये एक संधि पर हस्ताक्षर किए। चीन और पूर्व सोवियत संघ के बीच 4,000 मील लंबी सीमा है।

उज्बेकिस्तान 2000 में एक पर्यवेक्षक सदस्य के रूप में समूह का सदस्य बना। वर्ष 2001 में छठे सदस्य के रूप में उज्बेकिस्तान को शामिल किया गया तथा इस संगठन का नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन कर दिया गया।

उद्देश्य

सदस्य देशों के मुख्य लक्ष्य हैं-

  1. सामूहिक सीमा पर अपनी-अपनी सशस्त्र सेनाओं की संख्या को कम करना;
  2. एक-दूसरे के विरुद्ध बल-प्रयोग से दूर रहना, तथा;
  3. क्षेत्रीय स्थिरता के लिए

खतरा उत्पन्न करने वाले तत्वों (नस्लवादी और धार्मिक अलगववादी सहित) के विरुद्ध लड़ने के प्रयासों में समन्वय स्थापित करना।

शंघाई सहयोग संगठन के कार्यक्षेत्र का विस्तार कर इसमें आतंकवाद तथा सुरक्षा की चुनौतियों के साथ आर्थिक सहयोग की गतिविधियों को भी शामिल कर लिया गया। वास्तव में शंघाई सहयोग संगठन मध्य एशिया में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् उत्तर शीत युद्ध काल में सुरक्षा व राजनीतिक स्थिरता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संगठन है। इसका कारण यह भी है कि इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्व दोनों क्षेत्रीय शक्तियां चीन व रूस शामिल हैं। फिर भी वर्तमान में इस संगठन का मुख्य ध्यान आतंकवाद की समस्या को लेकर है, क्योंकि राजनितिक स्थिरता व अफगानिस्तान की समस्या के चलते या क्षेत्र आतंकवाद के खतरे के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता है।

गतिविधियां

आरंभ में शंघाई-पांच सामूहिक सीमा विवादों को सुलझाने पर केंद्रित रहा। शंघाई (1996) और मास्को (1997) में हुई संधियों के अंतर्गत सामूहिक सीमा पर सैनिकों की संख्या कम कर दी गयी और सैनिक गतिविधियां सीमित कर दी गयीं। अन्य सैनिक विश्वासोत्पादक उपायों पर भी सहमति हुई, जैसे- एक-दूसरे के विरुद्ध सैनिक अभ्यास करने पर रोक, सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिक गतिविधियों (सैन्य अभ्यास और तैनाती सहित) के संबंध में आकड़ों का वार्षिक आदान-प्रदान, आदि। लेकिन बाद में शंघाई-पांच के लक्ष्य सीमा विवाद को सुलझाने से हटकर क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक सहयोग हो गये। 1998 में हुई अल्माटी बैठक में सदस्यों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, अवैध होकर लड़ने का निर्णय लिया। क्षेत्र में पनप रहे धार्मिक अतिवाद पर चिंता व्यक्त की गयी। सदस्य देशों ने पारस्परिक निवेश, क्षेत्रीय व्यापार, परिवहन संपकों, पाइप लाइनों और पॉवर ग्रिडों के सामूहिक निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिये भी अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

शंघाई सहयोग का चार्टर जून 2002 के सेण्ट पीटर्सबर्ग सम्मेलन में स्वीकार किया गया था। इस संगठन के 6 सदस्य देशों का भू-क्षेत्रफल यूरेशिया के कुल क्षेत्रफल का 60 प्रतिशत है। विश्व की कुल जनसंख्या में इसके सदस्यों की जनसंख्या 25 प्रतिशत है। अतः यह मध्य एशिया का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है।

शंघाई सहयोग संगठन में चार संगठनात्मक संस्थाएं हैं। प्रथम, सदस्य देशों के राष्ट्रध्यक्षों की परिषद्, जोकि इसकी सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था है। दूसरा, सदस्य देशों के शासनाध्यक्षों की परिषद् जो दूसरी शीर्ष संस्था है तथा सहयोग को कार्यक्रमों का निर्धारण करने के साथ-साथ संगठन का बजट भी पारित करती है। इन दोनों परिषदों के शिखर सम्मेलन प्रतिवर्ष संपन्न होते हैं। निष्कर्षतः इसके शीर्ष नेता वर्ष में दो बार अलग-अलग शिखर सम्मेलनों में विचार-विमर्श करते हैं। तीसरी संस्था विदेश मंत्रियों की है, जिसके सम्मेलन आवश्यकतानुसार समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं। चौथी संस्था राष्ट्रीय समन्वयकों की परिषद् है, जिसमें सदस्य देशों के शीर्ष अधिकारी शामिल होते हैं। इसका मुख्य कार्य सहयोग के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सदस्य देशों के मध्य समन्वय स्थापित करना है।

शंघाई सहयोग संगठन द्वारा अन्य पड़ोसी देशों को भी इसकी गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इसके लिए पांच देशों-अफगानिस्तान, भारत, ईरान, मंगोलिया तथा पाकिस्तान को पर्यवेक्षक देशों का दर्जा प्रदान किया गया है। साथ ही तीन देशों-बेलारूस, श्रीलंका तथा तुर्की को वार्ताकार भागीदार देश का दर्जा प्रदान किया गया है। ये दोनों श्रेणी के देश भी इसके सम्मेलनों व बैठकों में भाग लेते हैं।

आरम्भ में शंघाई सहयोग संगठन का ध्यान मुख्यतः सुरक्षा संबंधी मुद्दों तक ही सीमित था। सुरक्षा में भी यह आतंकवादरोधी गतिविधियों पर केंद्रित था। जून 2004 में ताशकंद में हुए सम्मेलन में एक क्षेत्रीय आतंकवादरोधी ढ़ांचे (रीजनल एंटी टेरोरिज्म स्ट्रक्चर) की स्थापना का निर्णय लिया गया था। वर्तमान में इस संगठन में यह ढांचा आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में एक शीर्ष व्यवस्था है। अप्रैल 2006 में इस क्षेत्र में दवाओं के अवैध व्यापार से संबंधित अपराधों से निबटने के लिए एक कार्यवाही योजना की घोषणा की गई। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई की तैयार हेतु सदस्य देशों द्वारा संयुक्त सैन्य अभ्यासों की भी व्यवस्था की गई है। अब तक इस तरह के संयुक्त सैन्य अभ्यास 2003, 2005, 2007, 2009 व 2011 में आयोजित किए जा चुके हैं। सितंबर, 2003 में सम्पन्न हुए सम्मेलन में पहली बार आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए सदस्य देशों के मध्य एक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब से यह संगठन सुरक्षा संबंधी मुद्दों के साथ-साथ आर्थिक सहयोग की दिशा में भी कार्य कर रहा है। इसी सम्मेलन में चीन के प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ द्वारा सदस्यों के मध्य एक मुक्त व्यापार क्षेत्र की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा गया था, लेकिन अन्य सदस्य इस बात से आशंकित है कि मुक्त व्यापार क्षेत्र की स्थापनासै व्यापार में चीन का प्रभुत्व बढ़ जाएगा। इसलिए मुक्त व्यापार क्षेत्र की दिशा में अभी तक प्रगति नहीं हो पाई है। आर्थिक सहयोग के उक्त प्रयासों के बावजूद शंघाई सहयोग संगठन अब भी मुख्य रूप से सुरक्षा तथा आतंकवाद संबंधी मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके अब तक (मई 2014 तक) 13 शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। शंघाई सहयोग संगठन के देशों का 13वां शिखर सम्मेल्न किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 13 सितंबर, 2013 को संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में 2014 में अमेरिकी व नाटो सेनाओं की वापसी के बाद अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिरता व ईरान के आणविक कार्यक्रम के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई। इसमें की गई घोषणा के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आधारभूत परिवर्तन हो रहे हैं, जिससे अनिश्चितता व अस्थिरता की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। इसलिए यूरेशिया क्षेत्र में स्थिरता पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। शिखर सम्मेलन में संगठन की सदस्यता के विस्तार के मुद्दे पर भी चर्चा की गई। वर्ष 2010 में नए सदस्यों के प्रवेश के लिए आवश्यक तकनीकी व कानूनी मापदण्डों का निर्धारण किया गया था। इन्हीं नियमों के अंतर्गत नए देशों को सदस्यता प्रदान की जाएगी। अभी तक पाकिस्तान तथा ईरान ने ही सदस्यता हेतु अपना प्रस्ताव दिया है। साथ ही यूरेशियन क्षेत्र में आतंकवाद, अलगाववाद तथा संगठित अपराधों की चुनौतियों से निबटने के लिए सदस्य राष्ट्रों के मध्य कानूनी सहयोग को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।

भारत को 2005 में शंघाई सहयोग संगठन में पर्यवेक्षक देश का दर्जा प्राप्त हो गया था। तभी से भारत शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग ले रहा है। यद्यपि इसके सम्मेलनों में भारत की भागीदारी विदेश मंत्री के स्तर की रही हैं, लेकिन 2009 में संपन्न हुए येकैटरिनबर्ग शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भाग लिया था। इसके अतिरिक्त भारत के गृहमंत्री, परिवहन मंत्री, सांस्कृतिक मामलों के मंत्री, व्यापार मंत्री आदि भी इसके सम्मेलनों व विचार-विमर्श में भाग लेते रहे हैं। भारत ने शंघाई सहयोग संगठन के बैनर तले गठित व्यापार मंच तथा ऊर्जा क्लब आदि की गतिविधियों में भी रुचि दिखाई है। फिर भी आरंभिक दौर में भारत की रुचि इसकी आतंकवादरोधी गतिविधियों में ही मुख्यतः केंद्रित रही है।

शंघाई सहयोग संगठन मध्य एशिया का क्षेत्रीय सहयोग व सुरक्षा संगठन है। भारत इस क्षेत्र के पांच देशों- कजाखस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज्बेकिस्तान के साथ द्विपक्षीय व बहुपक्षीय संबंधों को विकसित करने का पक्षधर है। भारत ने विगत् 20 वर्षों में इन देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के प्रयास भी किए हैं।

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