वन संसाधन Forest Resources

वनाच्छादन Forest Cover

वन स्थिति रिपोर्ट (एसएफआर)-2011

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधीन एक संगठन, भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) समस्त देश के लिए वनाच्छादन मानचित्रण का कार्य कर रहा है। वनाच्छादन मानचित्रण का कार्य सर्वप्रथम 1987 से प्रारंभ किया गया था। वन स्थिति रिपोर्ट-2011 वनाच्छादन मानचित्रण के 12वें चक्र से संबंधित है। वनाच्छादन मानचित्रण में सुदूर संवेदन तकनीकी का इस्तेमाल किया जाता है जो इलेक्ट्रोमेग्नेटिक विकिरण का अद्वितीय स्पेक्ट्रल प्रतिबिम्बन को कैद करता है। वन स्थिति रिपोर्ट (एसएफआर)-2011 IRS P6LISS III द्वारा प्रदान किए गए आंकड़ों पर आधारित है जिसमें 23.5 मीटर का रिजोल्यूशन है। वनाच्छादन मानचित्रण 1:50000 पैमाने पर किया गया है। आकड़ों के विश्लेषण में जीआईएस प्रविधि का भी प्रयोग किया गया है। भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट के परिणाम, उपग्रह आंकड़ों (अक्टूबर 2008-मार्च 2009) की व्याख्या पर आधारित हैं। रिपोर्ट के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं-

  1. इस मूल्यांकन के अनुसार देश का वनाच्छादन क्षेत्र 78.29 मिलियन हेक्टेयर है जो कि भौगोलिक क्षेत्र का 23.81 प्रतिशत है। इसमें 2.76 प्रतिशत वृक्षावरण क्षेत्र भी शामिल है।
  2. वन एवं वृक्षावरण क्षेत्र 4,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई के देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र से 183135 वर्ग किमी. क्षेत्र के पृथक करने के बाद 25.22 प्रतिशत तक होगा, चूंकि यह क्षेत्र वृक्ष संवृद्धि के अनुकूल नहीं है।
  3. इस रिपोर्ट में वर्ष 2009 के मूल्यांकन की अपेक्षा वनावरण क्षेत्र में 367 वर्ग किमी. की कमी दर्ज की गई है।
  4. देश के पहाड़ी एवं जनजातीय जिलों में, पिछले मूल्यांकन की तुलना में वनावरण क्षेत्र में क्रमशः 548 वर्ग किमी. और 679 वर्ग किमी. की कमी दर्ज की गई।
  5. भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में देश के वनावरण क्षेत्र का एक-चौथाई है। यहां पर विगत् मूल्यांकन की तुलना में विशुद्ध 549 वर्ग किमी. वनावरण क्षेत्र की कमी हुई है।
  6. इस समय में मैंग्रोव क्षेत्र में 23.84 वर्ग किमी. तक की वृद्धि हुई है।
  7. देश में कुल बांस क्षेत्र 13.96 मिलियन हेक्टेयर अनुमानित किया गया है।
  8. देश के वनों में कुल कार्बन भंडार 6663 मिलियन टन अनुमानित किया गया है।
  9. वनों से वार्षिक काष्ठ उत्पादन 3.175 मिलियन क्यूबिक मीटर अनुमानित किया गया है।
  10. आवास निर्माण एवं फर्नीचर, औद्योगिक विनिर्माण एवं फर्नीचर तथा कृषि उपकरणों का वार्षिक उपभोग 48.00 मिलियन क्यूबिक मीटर अनुमानित किया गया है।
  11. देश की 28 प्रतिशत जनसंख्या ईधन लकड़ी जंगलों से प्राप्त करती है।

प्रवाल भित्तियां Coral Reefs

प्रवाल भितियां विविध और जोखिम भरे पारितंत्र से संबंधित हैं तथा ये पौधों और पशुओं की जटिल परस्पर निर्भरता पर आधारित हैं। ये विशाल चूने के ढांचे हैं जो पशुओं की एंथोजोआ वर्ग के निर्माण से संबंधित सिमेंटिंग प्रक्रिया और जमने की क्रिया तथा अन्य कैलशियम कार्बोनेट सिक्रेटिंग पशुओं से बनते हैं। प्रवाल भितियां कार्बन डाइऑक्सइड के निमग्न और कैल्शियम कार्बोनेट के विशाल भण्डार हैं। ये चिकित्सकीय औषधि एवं संरूपण के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं। इसके कुछ रसायनों को एच.आई. वी. एवं कैंसर जैसे रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है।

प्रवाल भितियां महासागरों के 600,000 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैली हुई हैं (कुल महासागर क्षेत्र का लगभग 0.2 प्रतिशत)। लेकिन ये मुख्य रूप से कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य पायी जाती हैं। गौरतलब है कि विश्व का सर्वाधिक बड़ा प्रवाल भिति क्षेत्र इंडोनेशिया में हैं, तत्पश्चात आस्ट्रेलिया एवं फिलीपींस में हैं। संसार के कुल प्रवाल भिति क्षेत्र का भारत में 2 प्रतिशत क्षेत्र है।

भारत में प्रवाल भित्ति अनुमानतः 2,375 वर्ग किमी. क्षेत्र में है। भारत में मुख्य रूप से मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, अंडमान एवं निकोबार द्वीप तथा लक्षद्वीप प्रवाल भिति क्षेत्र हैं। भारत की प्रवाल भिति की विविधता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसमें 200 से अधिक प्रवाल प्रजातियां पाई जाती हैं। वर्ष 2008 को अंतरराष्ट्रीय प्रवाल भित्ति वर्ष घोषित किया गया। इस वर्ष के दौरान पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एक राष्ट्रीय कार्यशाला भारत में प्रवाल भिति की स्थिति आयोजित की। केंद्र सरकार ने चिन्हित सभी चार प्रवाल भित्ति क्षेत्रों के वन विभागों को, प्रवाल के कार्यान्वयन, निगरानी, शिक्षा एवं जागरूकता संबंधी गतिविधियों के लिए वित्तीय मदद जारी की। इसके साथ-साथ प्रवाल क्षेत्र के अनुसंधान, इसके प्रबंधन, जैव-विविधता सामंजस्य एवं प्रदूषण निवारण के लिए भी सभी प्रकार का समर्थन किया। आज,प्रवाल भिति को विभिन्न प्रकार के खतरे हैं। तटीय क्षेत्रों में इसे प्रदूषकों, नदी अपरदन के अपशिष्ट, मत्स्य पकड़ने में प्रयोग डायनामाइट से फैला जहर, सीमेंट के उत्खनन से उत्पन्न प्रदूषण आदि के कारण प्रवाल भितियों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। देश में निम्नलिखित प्रवाल भितियों के सघन संरक्षण और प्रबंधन के लिए पहचान की गई है-

1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
2. मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु)
3. कच्छ की खाड़ी (गुजरात)
4. लक्षद्वीप द्वीप समूह

1998 में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि के चलते लक्षद्वीप में अधिकांश भितियों से लगभग 50 प्रतिशत प्रवाल समाप्त हो चुक हैं। इसके पश्चात् अब राष्ट्रीय महासागरीय संस्थान (National oceanography Institute—NIo) गोवा के वैज्ञानिकों द्वारा जनवरी 2009 में प्रवाल प्रत्यारोपण के माध्यम से लक्षद्वीप के कवारत्ती दीप में प्रवाल भितियों के समुत्थान में सफलता अर्जित कर ली गई है।

यह महत्वपूर्ण प्रयोग नवम्बर-दिसम्बर 2005 में आरम्भ किया गया था। लगभग 100 प्रवालों, जिनमें से अधिकांश त्वरित गति से बढ़ने वाले प्रवाल प्रजाति से सम्बन्धित हैं, पर प्रयोग किया गया। एक बार भित्ति में भली-भाँति जमने के पश्चात् उनका विकास ठीक प्रकार से हुआ। दो वर्ष के प्रयोग के पश्चात् ये 25 से.मी. तक बढ़े। कुल चार तीव्र गति से बढ़ने वाली तथा 4.5 धीमी गति से बढ़ने वाली प्रवाल प्रजातियों को 2008 में कवारती द्वीप में प्रवाल भितियों में प्रत्यारोपित किया गया।

2011 में भारत का वनाच्छादित क्षेत्र
वर्गक्षेत्र (वर्ग किमी.)भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत
वनाच्छादन
बेहद सघन वन83,7412.54
मध्यम रूप से सघन वन320,7369.76
खुले वन287,8208.75
कुल वन क्षेत्र*692,02721.05
वृक्षाधीन क्षेत्र90,8442.76
कुल वन एवं वृक्षाघीन क्षेत्र7,82,87123.81
झाड़ियां42,1771.28
गैर-वन क्षेत्र2,553,05977.67
कुल भागोलिक क्षेत्र3,287,263100.00
* मैग्रोव के अंतर्गत 4662 वर्ग किमी. क्षेत्र शामिल

वन स्थिति रिपोर्ट (एसएफआर)-2011 की नवीन विशेषताएं

एसएफआर 2011 में कुछ नई विशेषताएं शामिल की गई हैं जैसे बांस संसाधनों से संबंधित सूचना, भारत के वनों में कार्बन भंडार, लकड़ी का उत्पादन एवं उपभोग, ईंधन लकड़ी और चारा। यह भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा विगत कुछ समय से किए गए विशेष अध्ययन पर आधारित है। इसके अतिरिक्त, भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा एकत्रित प्रवाल भित्ति पर सूचना और वनाग्नि निगरानी तंत्र के बारे में भी सूचना प्रदान की गई है। नई विशेषताएं संक्षिप्त रूप में इस प्रकार हैं-

बांस संसाधन

बांस एक मुख्य गैर-काष्ठ वन संसाधन है जो वन के साथ-साथ देश के गैर-वन क्षेत्रों में भी पाया जाता है। यह पाया गया है कि भारत में 23 प्रकारों से संबंधित बांस की 125 स्वदेशी और 11 विदेशी प्रजातियां पाई जाती हैं। विश्व वन संसाधनों पर विश्व खाद्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व में बांस संसाधनों के संदर्भ में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। देश में बांस के अंतर्गत आने वाला कुल क्षेत्र 13.96 मिलियन हेक्टेयर अनुमानित किया गया है। अरुणाचल प्रदेश में बांस के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र आता है। (1.66 मिलियन हेक्टेयर) जिसके बाद मध्य प्रदेश (1.3 मिलियन हेक्टेयर), महाराष्ट्र (1.1 मिलियन हेक्टेयर) और ओडीशा (1.05 मिलियन हेक्टेयर) का स्थान आता है। राष्ट्रीय स्तर पर नालों (स्टेम) की कुल संख्या 23297 मिलियन आंकी गई है। अध्ययनों ने राष्ट्रीय स्तर पर नालों के कुल भार को 169 मिलियन टन आंका है जिसमें से पूरी तरह से हरे बांसों का योगदान 73 प्रतिशत और पूरी तरह से सूखे बांसों का योगदान 27 प्रतिशत है। वन क्षेत्र से बाहर वृक्षों के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर नालों (स्टेम) की संख्या 2127 मिलियन आंकी गई जिसका वजन 10.20 मिलियन टन था। पूर्वी क्षेत्र का मैदान नालों (स्टेम) की अधिकतम संख्या (943 मिलियन) का योगदान करता है, जिसके पश्चात् क्रमशः उत्तर-पूर्व क्षेत्र (289 मिलियन स्टेम) और पूर्वी दक्कन क्षेत्र (212 मिलियन स्टेम) का योगदान है।

भारत के वनों में कार्बन भंडार

भारतीय वन सर्वेक्षण ऐसे संस्थानों में से एक है जो वन बायोमास और कार्बन भंडार परिवर्तन का आकलन करता है। भारत के इनिशियल नेशनल कमीशन (आईएनसी) द्वारा 2004 में यूएनएफसीसी को सौंपी गई रिपोर्ट में, भारतीय वन सर्वेक्षण (एफसीआई) ने केवल लकड़ी के बढ़ते भंडार का वन कार्बन आकलित किया। वर्ष 2010 में, भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने वन कार्बन भंडार का आकलन समाप्त किया और 1994 एवं 2004 के दो समय कालों के बीच इसे परिवर्तित किया।

1994 और 2004 के बीच वन भूमि में कार्बन भंडार में परिवर्तन (मिलियन टन)
तत्त्व1994 में वन भूमि पर
कार्बन स्टॉक
2004 में वन भूमि पर
कार्बन स्टॉक
कार्बन स्टॉक में
परिवर्तन
ग्राउंड बायोमास से ऊपर17842101317
ग्राउंड बायोमास से नीचे563663100
मृत पदार्थ19256
मल-मूत्र10412117
मृदा36013753152
कुल60716663592

लकड़ी का उत्पादन एवं उपभोग: तकनीकी सलाहकारी समिति की अनुशंसाओं का अनुसरण करते हुए, भारतीय वन सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय स्तर पर लकड़ी के उत्पादन एवं उपभोग पर एक विस्तृत अध्ययन किया।

  1. वनों से लकड़ी का वार्षिक अनुमानित उत्पादन 3.175 मिलियन क्यूबिक मीटर अनुमानित किया गया है।
  2. वन क्षेत्र से बाहर वृक्षों (टीओएफ) से प्राप्त लकड़ी का वार्षिक उत्पादन 42.77 मिलियन क्यूबिक मीटर आकलित किया गया है।
  3. वनों से प्राप्त ईंधन लकड़ी का वार्षिक उत्पादन 1.23 मिलियन टन आकलित किया गया।
  4. वन क्षेत्र से बाहर वृक्षों से प्राप्त ईंधन काष्ठ का वार्षिक उत्पादन 19.25 मिलियन टन आकलित किया गया।
  5. आवास निर्माण और फर्नीचर, औद्योगिक विनिर्माण एवं फर्नीचर और कृषि उपकरणों में लकड़ी का वार्षिक उपभोग 48.00 मिलियन क्यूबिक मीटर अनुमानित किया गया है।
  6. वनों पर पूर्णतः और आंशिक रूप से चारे के लिए निर्भर रहने वाले पशुओं का प्रतिशत 38.49 है। वनों पर पूरी तरह से निर्भर रहने वाले व्यस्क पशु 22.68 प्रतिशत हैं।
  7. देश में कुल वार्षिक ईंधन लकड़ी का उपभोग 216.42 मिलियन टन आकलित किया गया है जिसमें से 58.75 मिलियन टन वनों से प्राप्त होता है।
  8. ईंधन लकड़ी का इस्तेमाल करने वाली कुल जनसंख्या का 23 प्रतिशत ईंधन लकड़ी वनों से प्राप्त करती है।

वन आग की निगरानी

भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने वेब फायर मैपर से आंकड़े इस्तेमाल करके वर्ष 2004 से जंगल की आग की निगरानी शुरू की। वर्ष 2009 से पंजीकृत यूजर्स को एसएमएस द्वारा सुचना भेजी जाती है। वर्तमान में, इन आंकड़ों की देर से उपलब्धता के कारण आग लगने के मामलों को दर्ज करने में 12 से 24 घंटे का विलम्ब होता है। इस विलम्ब को कम करने के प्रयास किए जाते हैं। वर्ष 2011-11 में भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा विभिन्न राज्यों में आग लगने के कुल 13,898 मामले दर्ज किए गए।

सुदूर संवेदन आंकड़ों के प्रयोग द्वारा प्रवाल भितियों का मानचित्रण

प्रवाल भितियों को अकसर समुद्र के वर्षा वन कहा जाता है, ये पृथ्वी पर बेहद विविध पारितंत्र बनाते हैं। प्रवाल भित्तियां,पर्यटन, मत्स्यिकी और तटरेखा संरक्षण को परितंत्र सेवा प्रदान करती हैं। हालाँकि, प्रवाल भित्तियां बेहद क्षण भंगुर परितंत्र होती  हैं। इनको जलवायु परिवर्तन, महासागर की बढती लवणता, ब्लास्ट मत्स्यिकी, साइनाइड फिशिंग और हानिकारक भूमि प्रयोग पढ़ती के कारण खतरा उत्पन्न हो गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा देश के चार क्षेत्रों में एक प्रोजेक्ट द्वारा जिसमें LISS III आंकड़े 1 : 50,000 पैमाने पर प्रयोग किए गए हैं, प्रवाल भित्तियों का मानचित्रण किया है, भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा क्विक बर्ड सेटेलाइट डाटा के इस्तेमाल से उच्च पैमाने पर अंडमान-निकोबार द्वीप के साथ प्रवाल भित्तियों का डिजिटल मानचित्र तेयार किया है।

राष्ट्रीय वन संपत्ति सूची

वनों के बढ़ते भंडार की सूचना हमेशा से वन स्वास्थ्य और उत्पादकता के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में मानी जाती रही है। वनों के बढ़ते भंडार का आवर्ती आकलन राष्ट्रीय नीतियों के विकास और वन संसाधनों के धारणीय इस्तेमाल के लिए रणनीति बनाने के लिए अपरिहार्य है। इन दिनों जब जलवायु परिवर्तन मुद्दे महत्वपूर्ण बन गए है, वनों के बढ़ते भंडार के मूल्यांकन का प्रयोग जंगलों में कार्बन भंडार के आकलन में भी प्रयोग किया जाता है। एसएफआर 2011 में, बढ़ते भंडार का आकलन वनाच्छादन, वन प्रकारों, और 2002-2008 के दौरान तैयार की गई नमूना प्लॉट सूची पर आधारित रहा है। वनों और वनों से बाहर वृक्ष क्षेत्र दोनों का देश में बढ़ता कुल भंडार 6047.15 मिलियन क्यूबिक मीटर आकलित किया गया जिसमें वनों का योगदान 4498.78 मिलियन क्यूबिक मीटर और वनों से बाहर वृक्ष क्षेत्र का हिस्सा 1548.42 मिलियन क्यूबिक मीटर है। राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों के बीच, वनों में अधिकतम बढ़ता भंडार अरुणाचल प्रदेश (493 मिलियन क्यूबिक मीटर) से दर्ज किया गया, इसके पश्चात् क्रमशः उत्तराखण्ड (460 मिलियन क्यूबिक मीटर) और छत्तीसगढ़ (334 मिलियन क्यूबिक मीटर) का स्थान आता है।


वनों का महत्व

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में वनों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यद्यपि भारत में न्यूनतम आवश्यकता से भी कम वनों की विद्यमानता है तथापि इन वनों की यहां की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है। प्रत्यक्ष लाभ के अंतर्गत वनों से हमें ईधन के लिए पर्याप्त लकड़ी प्राप्त होती है। इसके अलावा सखुआ या साल, सागवान, देवदार आदि के वृक्षों से लकड़ियां प्राप्त होती हैं, जिनका फर्नीचर, कृषि तथा मशीनरी औजार, मकान तथा रेलवे में उपयोग की दृष्टि से व्यापक आर्थिक महत्व है। उद्योगों के लिए कच्चा माल भी वनों से प्राप्त होता है। कागज, दियासलाई, कत्था, रबर, कृत्रिम रेशम आदि के उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति भी वनों से ही की जाती है। पशुओं के लिए व्यापक चारागाह का निर्माण वनों द्वारा ही संभव होता है। वनों से काष्ठ कोयला प्राप्त होता है, जो सस्ता ईंधन होने के साथ ही ऊर्जा-शक्ति का सस्ता व सुलभ स्रोत भी है। भारतीय वनों में कुछ ऐसे वृक्ष भी पाए जाते हैं, जिनके फलों, पत्तियों व वृक्ष-छालों तथा उनके रसों से अनेक प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियां तैयार की जाती हैं। वनों से रेशम और लाख भी प्राप्त होती है, जिससे वस्त्र और चूड़ी आदि का निर्माण होता है।

वनों से हमें अप्रत्यक्ष रूप से भी लाभ पहुंचता है। जलवायु को सम बनाने तथा वातावरण में नमी को बनाए रखने में वन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वनों द्वारा वर्षा करवायी जाती है। बाढ़ के पानी के बहाव तथा नदियों की जलधारा का नियंत्रण वनों द्वारा ही होता है। वनों से निकले ह्यूमस तथा जीवांश के मिलने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। वन भूमि के अपरदन तथा मरुस्थल के प्रसार को भी रोकते हैं। वनों द्वारा आंधी-तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव भी किया जाता है। कृषि और उद्योगों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक प्रमुख कारक वन ही है। वनों द्वारा भूमिगत जल का स्तर ऊपर आ जाता है, जिससे एक ओर जहां सिंचाई तथा पीने के पानी के लिए कुंआ खोदने में सुविधा होती है वहीं दूसरी ओर वर्षा-जल भी भूमि के अंदर आसानी से एकत्रित हो जाता है। वनों द्वारा कोयले और पेट्रोल के रूप में ईधन की प्राप्ति होती है। (वैसे वन जो पूर्व में भूमि के नीचे दब गए थे)।

वनों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ किसी देश या काल की सीमा से बंधे नहीं होते हैं। वनों द्वारा प्रत्यक्ष लाभ तो स्थान-विशेष के लोगों को ही होता है, परंतु अप्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ स्थानेतर लोगों को भी मिलता है।

इमारती लकड़ी वन का महत्वपूर्ण उत्पाद है, जिसका व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य और औद्योगिक कच्चे माल तथा ईधन के रूप में मुख्य रूप से किया जाता है। इसका उपयोग भारी निर्माण कार्यों में भी किया जाता है, जैसे- रेलवे के स्लीपर आदि के निर्माण में। कुछ आर्द्र-प्रतिरोधक लकड़ियां भी होती हैं, जिनका उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य में उपयोग किया जाता है। कोणधारी वृक्षों से प्राप्त लकड़ियों का उपयोग तख्ता, बोर्ड और जहाज की कड़ी बनाने में तथा घर के निर्माण कार्य में व्यापक रूप से किया जाता है। महोगनी, रोजवुड, बॉनी आदि अन्य लकड़ियां हैं, जिनका उपयोग फर्नीचर निर्माण में प्रमुख रूप से होता है। मुलायम लकड़ियों से सस्ते फर्नीचर का निर्माण होता है, यथा-चीड़ का वृक्ष (पाइन)। हालांकि सामान्य लकड़ियों को पतले, हल्के टुकड़ों में काटा जा सकता है परंतु इसका एक मजबूत प्रकार होता है, जिसे प्लाइवुड कहते हैं। इसका उपयोग किसी फर्नीचर को चिकना, खूबसूरत और मजबूत बनाने में किया जाता है।

कागज वन का एक अन्य उत्पाद है। ऐसा माना जाता है कि पेपर शब्द की उत्पत्ति मिस्र में नील नदी के किनारे पायी जाने वाली पेपीरस नामक घास से हुई। कागज बनाने की कला का आविष्कार ईसा से 300 वर्ष पूर्व चीन में हुआ था। भारत में कागज बनाने की कला का विकास आठवीं शताब्दी में हुआ। कागज बनाने में सर्वाधिक उपयोगी पदार्थ लकड़ी की लुग्दी होती है। भारत में लुग्दी बनाने वाली लकड़ी का अभाव है। यह लुग्दी मुख्य रूप से कोणधारी वृक्ष चीड़, स्प्रूस, हेमलॉक, फर आदि लकड़ियों से तैयार की जाती है। लुग्दी तैयार करने वाले अन्य वृक्ष हैं- यूकेलिप्टस, शहतूत, सलाई, वाटल और बलगम आदि, जिनसे विशेष रूप से अखबारी कागज बनाया जाता है। कागज बनाने में लकड़ी की लुग्दी के अलावा अन्य कई वन्य पदार्थ उपयोगी होते हैं, यथा-घास, बांस, जूट आदि। कागज के लिए उपयोगी घास उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश व हरियाणा में बहुतायत से मिलती है। लकड़ी की लुग्दी हिमालय के दुर्गम स्थानों से तथा कागज के लिए उपयुक्त बांस का उत्पादन महाराष्ट्र, केरल, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, ओडीशा आदि स्थानों में होता है।

रेयॉन नामक कृत्रिम वस्त्र के निर्माण में भी मुख्य तत्व लकड़ियों से मिलने वाला पदार्थ होता है। वस्त्र उद्योग में स्प्रूस नामक लकड़ी की लुग्दी अत्यधिक उपयोगी होती है, इससे सूती वस्त्र भी बनाया जा सकता है।

गोंद भी वनों पर आधारित एक तत्व है। बलाटा और गुट्टा परचा गोंद का संग्रह अभी भी किया जाता है, परंतु उनका उत्पादन अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। अन्य प्राकृतिक गोंद आज भी आवश्यक वन उत्पाद हैं।

रेजिन, पीच, टार और टरपेंटाइन आदि अन्य उत्पादक हैं, जिनका उपयोग जहाज- निर्माण में किया जाता है।

कॉक, कॉर्क ओक (क्वेरकस स्यूबर) वृक्ष के मोटे छाल से निर्मित होता है।

सिनकोना एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है और कुनैन इस पेड़ की लकड़ी और छाल से बनायी गयी दवा है। कोकार्शब के पत्तों से कोकाइन दवा बनायी जाती है। इस प्रकार के औषधीय वृक्षों का रोपण मुख्य रूप से इंडोनेशिया द्वारा किया जाता है और विश्व व्यापार में इनकी मांग बढ़ी है। कैम्फर, कैम्फर वृक्ष से निकलने वाला एक तैलीय पदार्थ है, जिसका उपयोग सौंदर्य प्रसाधनों, साबुन, विस्फोटक पदार्थ तथा प्लास्टिक के निर्माण में किया जाता है। मॉरफीन और हेरोइन का उत्पादन भी वन्य पौधों के द्वारा ही होता है।

भारत में कुल बांस उत्पादन का 70 प्रतिशत से भी अधिक होता है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, असम आदि प्रमुख बांस उत्पादक राज्य हैं। इसके अलावा विभिन्न प्रकार की घासें और चारा भारत के ऊपरी भागों में तथा महाराष्ट्र में पाया जाता है। मध्य प्रदेश व ओडीशा तेंदू पत्तों के मुख्य उत्पादक प्रदेश हैं।


भारतीय वनों के समक्ष समस्याएं

हमने परम्परागत रूप से देखा है कि वन एक प्राकृतिक रूप से पुनरुत्पादित प्रचुर या बहुतायत वाला संसाधन है। इस प्रकार का दृष्टिकोण 18वीं शताब्दी की शुरुआत तक सही था जब देश के पास प्रचुर या पर्याप्त संसाधन थे तथा जनसंख्या दबाव कम था। हालांकि, 17वीं शताब्दी के अंत में भारत में जनसंख्या तथा कृषि गतिविधियों में त्वरित वृद्धि दर्ज की गई। इसने वनोत्पाद की मांग को बढ़ावा दिया तथा वनों के विनाश का कारण बना। ब्रिटिश साम्राज्य ने, विशेष रूप से 1857 के पश्चात्, शोषणकारी और औपनिवेशिक या साम्राज्यवादी आर्थिक नीति का अनुसरण किया। देश की अर्थव्यवस्था बेहद बुरी तरह से प्रभावित थी जिस कारण 1860 से 1945 के बीच 30 मिलियन से अधिक लोग भूख से काल-कवलित हो गए।

1890 में, भारत की मात्र 61 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी जो 1931 तक बढ़कर 75 प्रतिशत हो गई तथा स्वतंत्रता के समय लगभग 90 प्रतिशत हो गई। इसे भारत में विऔद्योगीकरण कहा गया। आजीविका के अन्य साधनों से वंचित होने के कारण, स्वाभाविक रूप से लोग कृषि की ओर उन्मुख हुए, जिसके लिए उन्होंने वन भूमि को खाली किया। स्वतंत्रता के उत्तरकाल में, देश के पास अन्य विकल्प नहीं था, लेकिन उसने अपने लोगों के लिए अधिक अनाज का उत्पादन किया। खाद्य फसलों की खेती के लिए वनों को नष्ट किया गया। इस प्रक्रिया में वन एवं खनिज जैसे दो महत्वपूर्ण संसाधन मुट्ठी भर रह गए। सामाजिक, विकासपरक एवं अन्य प्रोजेक्टों के लिए भी वनों का सफाया किया गया।

भारतीय वनों की कुछ विशेष समस्याओं का उल्लेख इस प्रकार है-

वनों का असमान वितरण

विभिन्न राज्यों में वन क्षेत्रों का वितरण अत्यंत विषम है। जहां उत्तर-पश्चिम भारत में वन क्षेत्र का अनुपात 11 प्रतिशत है, वहीं मध्य भारत में यह 44 प्रतिशत है। वन क्षेत्रों की कमी को उनकी सर्वाधिक जरूरत वाले प्रदेशों में देखा जा सकता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे उच्च जनसंख्या घनत्व और विस्तृत कृष्ण भूमि वाले प्रदेशों में ईंधन लकड़ी की अनुपलब्धता के कारण गोबर के उपलों का ईंधन रूप में व्यापक उपयोग किया जाता है।

वनों की निम्न उत्पादकता: भारत में वनों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता काफी निम्न है। इसी कारण शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में वनों एवं वनोत्पादों का योगदान मात्र लगभग 2 प्रतिशत है।

निम्न उत्पादकता के कारण

भारत अपने वन संसाधनों का समुचित एवं अनुकूल ढंग से दोहन कर पाने में असमर्थ रहा है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण विद्यमान हैं-

  1. असमान वितरण तथा दुर्गम्यता के कारण दोहन में कठिनाई।
  2. क्षतिपूरक वनारोपण के माध्यम से वनावरण की पुनरुत्पत्ति किये बगैर अनियंत्रित कटाई करना।
  3. अवर्गीकृत वनों के विशाल क्षेत्र का पुनर्वास प्रक्रिया से वंचित रहना।
  4. समुचित परिवहन एवं आधारभूत सुविधाओं की कमी।
  5. अनियमित चराई के कारण अति उपयोग।
  6. आग के कारण वनों का विनाश।
  7. निकृष्ट एवं अवैज्ञानिक तरीकों द्वारा कटाई, छंटाई एवं संशोधन करना।
  8. अवैज्ञानिक आर्थिक गतिविधियां जैसे द्रुमावशेष एवं झूमिंग तरीकों से खेती करना, जो ढालों के भंगुर वनावरण को नष्ट कर देता है।
  9. प्राकृतिक विकास जैसी स्थिर संरक्षणता की धारणाओं पर निर्भरता, जिसके कारण वनारोपण गतिविधियों में पर्याप्त तेजी नहीं आ पाती।
  10. वन संसाधनों के बारे में पर्याप्त सूचनाओं का अभाव तथा अनुसंधान सुविधाओं की कमी।
  11. औद्योगिक एवं सिंचाई परियोजना के विस्तार तथा अवैध कटाई के परिणामस्वरूप वनावरण की क्षति होना। 

उपचार

वन एक पुनर्युवनीय संसाधन हैं, जिनके संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता है। निम्नलिखित उपायों द्वारा इस बहुमूल्य संसाधन को रिक्त किये बिना भारत की वन संपदा के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित किया जा सकता है-

  1. गहन विकास योजनाओं के अंतर्गत अनुकूल स्थानों पर तीव्र विकास एवं उच्च पैदावार वाली स्वदेशी या विदेशी प्रजातियों के वृक्षों का रोपण किया जाये।
  2. उच्च पैदावार वाले क्षेत्रों का चयन।
  3. वन दोहन एवं कटाई की सुधरी हुई तकनीकों का उपयोग।
  4. अभी तक दुर्गम समझे जाने वाले क्षेत्रों को खोलने हेतु वन संचार का विकास।
  5. परिरक्षण एवं संशोषण प्रक्रियाओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाय।
  6. वन कार्यक्रमों को औद्योगिक विकास योजनाओं के साथ जोड़ा जाय।
  7. दावानल जैसी घातक स्थितियों से वनों की सुरक्षा की जाय।
  8. एक विश्वसनीय अनुसंधान कार्यक्रम के माध्यम से वन संसाधनों, उनके विस्तार, स्थिति परिमाण, संघटन, मौजूदा काष्ठ परिमाण, विकास दर, विभिन्न उत्पादों की मात्रा, व्यापारिक व औद्योगिक मूल्य, घटाव के आंकड़े, रोजगार के अवसर, व्यापारिक पक्ष तथा वनोत्पादों की खपत आदि की विस्तृत सूची बनायी जाय।

कृषि एवं विकास आवश्यकताओं के कारण विनाश

बढ़ती जनसंख्या के दबाव के साथ, भूमि की मांग कई गुना बढ़ गई, जिसके परिणामस्वरूप देश के वनों में तीव्र संकुचन एवं कमी आई। वन भूमि को कृषि के लिए इस्तेमाल किया गया। वनभूमि का प्रयोग वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए भी किया जा रहा है। वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के लागू होने तक, वन भूमि का अन्य कामों के लिए इस्तेमाल हेतु परिवर्तन की वार्षिक दर 1,50,000 हेक्टेयर थी। इसके अतिरिक्त, अतिक्रमण एवं झूम कृषि ने भी कई मिलियन हेक्टेयर भूमि को प्रभावित किया।

पशु जनसंख्या में वृद्धि तथा इसके अनार्थिक प्रबंधन ने वनों की पुनर्रुत्पादन क्षमता के लिए संकट उत्पन्न किया। भारतीय वनों पर आज इनकी मांग बढ़ने के कारण बेहद दबाव है। पनविद्युत योजनाओं, सड़कों तथा शहरीकरण में वृद्धि ने भी वनों के कटान में योगदान किया है।


वन विकास एवं संरक्षण

भारत में विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा निकट भविष्य में कुल भू-क्षेत्र के 33 प्रतिशत भाग पर वनावरण का लक्ष्य रखा गया है। इसी प्रकार पश्चिमी देशों ने विशेष कार्यक्रम ग्रीन वेव्स चलाया। इस कार्यक्रम के द्वारा विशेषकर उत्तरी एवं पश्चिमी यूरोपीय देशों में वन संपदा के संरक्षण को काफी बल मिला है।

वन संरक्षण के लिए विश्व के अनेक देशों में कुछ विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। इनमें आधुनिक फायर वार्निंग सिस्टम को लगाना एवं फायर टॉवर बनाकर दूरबीन की सहायता से वनों की देखभाल मुख्य है। इससे दो लाभ हुए हैं, पहला आग पर नियंत्रण और दूसरा गैर-कानूनी कटाई पर नियंत्रण।

वृक्षारोपण: वन को लकड़ियों के लिए काटा जाता है, पर इन्हें काटने के बाद फिर से उन स्थानों की सफाई कर वृक्ष रोपे जाने चाहिए। इसके अलावा खाली स्थानों पर वृक्षारोपण करना चाहिए।

वृक्षों के काटने के तरीके में सुधार: उन्हीं वृक्षों को काटना चाहिए, जहां वन काफी घने हो गए हों, वृक्ष विकसित हो चुके हों और कमजोर या रोगग्रसित वृक्ष हो, जो खराब स्थानों में लगे हों। इस प्रकार के वृक्षों को बिल्कुल सफाई से काट देना चाहिए और उन स्थानों पर नए वृक्ष अवश्य लगाने चाहिए।

वन रक्षा: वनों को प्राकृतिक आपदा, यथा-आग और कीड़ों से बचाना चाहिए। कीड़ों से बचाने के लिए नियमित छिड़काव करना चाहिए। वन की स्थिर निगरानी के द्वारा शीघ्रता से आग पर नियंत्रण करना चाहिए।

बर्बादी कम करना: वन उत्पादों के उपयोग में आने वाले औद्योगिक पौधों की बर्बादी कम करनी चाहिए। ये कार्य लकड़ी की खपत को कम करके, अखबारी कागज या अन्य रद्दी कागजों के उत्पादन में होने वाले बर्बाद कागजों को कम करके या फिर से उपयोग में लाकर किया जा सकता है। इसी प्रकार वनों पर आधारित कई उद्योग ऐसे हैं, जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लकड़ियों की काफी मात्र में बर्बादी की जाती है, जिसे पुनः उपयोग में लाकर कम किया जा सकता है।

वन अग्नि नियंत्रण: भारत में वनों के विनाश का एक प्रमुख कारण जंगलों में लगने वाली आग है। यहां अधिकतर मामलों में आग मानव द्वारा ही लगायी जाती है। कतिपय मौकों पर ही यह दुर्घटनावश लगती है। आग की दुर्घटनाओं के कारण हैं- पशुचराई, महुआ के बीजों और पुष्पों का संचयन, तेंदू पत्तों का संचयन, गैर क़ानूनी शिकार और स्थानान्तरण कृषि आदि।

देश में आग लगने के कारणों को ज्ञात करने, नियंत्रण और निषेध के लिए महाराष्ट्र के चन्द्रपुर और उत्तराखण्ड के हल्द्वानी तथा नैनीताल में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन. डी.पी.) की सहायता से एक आधुनिक वन अग्नि-नियंत्रण परियोजना शुरू की गई है। वर्तमान में यह योजना 11 राज्यों में चलायी जा रही है। इन योजनाओं का विस्तार अन्य राज्यों में भी किया जा रहा है। 


भारतीय वन सर्वेक्षण Forest Survey of India- FSI

जून, 1981 में स्थापित भारतीय वन सर्वेक्षण देश के वन क्षेत्रों और वन संसाधनों से संबंधित सूचना एवं आंकड़े एकत्र करता है। इसका मुख्यालय देहरादून में है और चार क्षेत्रीय कार्यालय बंगलुरू, कोलकाता, नागपुर तथा शिमला में स्थित हैं। प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ क्षेत्रीय कार्यालयों में समन्वय और नियंत्रण मुख्यालय द्वारा किया जाता है। इसके अलावा वन क्षेत्रों के नक्शे तैयार करना, आंकड़े एकत्र करना और प्रशिक्षण देना अन्य प्रमुख कार्य हैं। इसके कार्यालय वओंओ के अन्दर और वनों के बाहर वृक्षों की सूची तैयार करने और मुख्यालय द्वारा सौंपी गई अन्य गतिविधियों को चलाते हैं।

भारतीय वन सर्वेक्षण के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • प्रत्येक 2 वर्ष में एक बार राष्ट्रीय वन वनस्पति मानचित्र सहित व्यापक वन स्थिति रिपोर्ट तैयार करना तथा अधिकतम 10 वर्ष में अनिवार्य तथ्यों सहित दूर संवेदी डाटा के उपयोग द्वारा थीमेटिक मानचित्र तैयार करवाना।
  • राष्ट्रीय और राज्य स्तर की योजना के लिए वानिकी से संबद्ध आवश्यक डाटा एकत्रित, संग्रहित तथा पुनः प्राप्त करना तथा कंप्यूटर पर आधारित राष्ट्रीय बुनियादी वन सूची प्रणाली का सृजन करना।
  • चुनिन्दा राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में वनसूची को उनके अपने संसाधन युक्त सर्वेक्षण यूनिटों के स्थापित होने तक तैयार करना, जो एजेंसी पर आधारित हो।
  • राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों/भारत सरकार के विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारी वहन करने वाले वनपालों के लिए आधुनिक वन सर्वेक्षण तकनीकी में प्रशिक्षण प्रदान करना।
  • राज्यों/संघ राज्य क्षेत्र वन विभागों द्वारा किए जाने वाले तकनीकी सूचना बनाने के कार्य में सहायता प्रदान करना एवं उनका पर्यवेक्षण करना।

वानिकी अनुसंधान

भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद् वानिकी अनुसन्धान प्रणालीका एक शीर्षस्थ संस्था है। परिषद् योजना आधारित अनुसन्धान की आवश्यकता, संवर्धन, कार्य संचालन और वानिकी सम्बन्धी सभी पहलुओं, अनुसन्धान, शिक्षा और उसके संवर्धन के कार्यों में समन्वय सम्बन्धी कार्य करती है।

परिषद् ने इस क्षेत्र में आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए वानिकी अनुसंधान पर आधारित समाधान खोजे हैं जिसमें जलवायु परिवर्तन, जैविक विविधता संरक्षण, मरुस्थलीकरण को रोकना और संसाधनों का स्थाई प्रबंधन और विकास भी है।

परिषद् द्वारा वन प्रबंधन और अनुसंधान के क्षेत्र में सफलतापूर्वक चुनौतियों का सामना करने पर जनता का विश्वास बढ़ा है।

देश में वन संबंधी अनुसंधान की आवश्यकता को पूरा करने के लिए परिषद् के देश के विभिन्न भौगोलिक भागों में 8 क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान और 4 अनुसंधान केंद्र हैं।

परिषद् के अधीन 6 अनुसंधान संस्थान और 4 उन्नत अनुसंधान संस्थान हैं। अनुसंधान संस्थानों में वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून; वन आनुवंशिकी और वृक्ष प्रजनन संस्थान, कोयम्बटूर; काण्ठ विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान, बंगलुरू; उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान, जबलपुर; वर्षा वन अनुसंधान संस्थान, जोरहट, शुष्क वन अनुसंधान संस्थान, जोधपुर; हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला; वन उत्पादकता संस्थान, रांची हैं।

परिषद् के अधीन उन्नत अनुसन्धान संसथान इस प्रकार हैं: सामाजिक वानिकी एवं पारिस्थितिकी पुनर्वास केंद्र, इलाहाबाद; वानिकी अनुसन्धान और मानव संसाधन विकास केंद्र, छिंदवाड़ा, वन अनुसंधान केंद्र, हैदराबाद; बांस और बेंत उन्नत अनुसंधान केंद्र, आइजोल।

वन नीति 1988

वन नीति, 1952 को वर्ष 1988 में संशोधित किया गया। संशोधित वन नीति, 1988 का मुख्य आधार वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास है। इस नीति के मुख्य लक्ष्य हैं-

  1. पारिस्थितिकीय संतुलन के संरक्षण और पुनस्र्थापन द्वारा पर्यावरण स्थायित्व को कायम रखना,
  2. प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण
  3. नदियों, झीलों और अन्य जलधाराओं के मार्ग के क्षेत्र में भूमि कटाव और मृदा अपरदन पर नियंत्रण
  4. व्यापक वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के माध्यम से वन और वृक्षों के आच्छादन में वृद्धि
  5. ग्रामीण और आदिवासी जनसंख्या के लिए ईंधन की लकड़ी, चारा तथा अन्य छोटी-मोटी वन्य उपज आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कदम उठाना,
  6. राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनोत्पादों में वृद्धि
  7. वनोत्पादों के उचित उपयोग को प्रोत्साहन देना और लकड़ी का अनुकूल विकल्प ढूंढना,
  8. वन संरक्षण हेतु जन-सहभागिता में वृद्धि के लिए उचित कदम उठाना।

इसके अतिरिक्त 1988 में ही वनों की कटाई तथा गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के प्रयोग को रोकने संबंधी फॉरेस्ट (कंजर्वेशन) एक्ट, 1980 में भी संशोधन किया गया। नियमों के उल्लंघन के लिए विभिन्न प्रकार के दंडों का प्रावधान किया गया। यू.एन.डी.पी. के सहयोग से 1984 में जंगलों को आग से बचाने के लिए एक मॉडर्न फॉरेस्ट फायर कंट्रोल प्रोजेक्ट शुरू किया गया।

1988 की वन नीति में जंगल तथा जंगल में रहने वालों के बीच प्रतीकात्मक संबंध की बात कही गई है। लेकिन, आदिवासी तथा अन्य जंगल वासियों को जंगली फलों के पेड़, चारा या इंधन-लकड़ी उगने की अनुमति नहीं है, जबकि ये सभी उनके जीवन-यापन के लिए आवश्यक हैं।

इसका कारण यह है कि नीति के तहत् इन्हें वनेत्तर प्रयोजन (नॉन फॉरेस्ट यूज़ेज) माना गया है। लेकिन, अनियंत्रित तरीके से बढ़ती जनसंख्या तथा वन भूमि के बढ़ते अतिक्रमण के चलते इस नीति की सफलता संदिग्ध है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर सिंचाई तथा खनन योजनाओं से भी वन-क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा है।

राष्ट्रीय वानिकी कार्रवाई कार्यक्रम (एनएफएपी) National Forestry Action Programme- NFAP 

राष्ट्रीय वन नीति 1988 के सामयिक एवं कुशल कार्यान्वयन हेतु सरकार ने एक राष्ट्रीय वन कार्रवाई कार्यक्रम (एन.एफ.ए.पी.) का गठन किया और इसके लिए जून 1993 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.) एवं एफ.ए.ओ. के साथ एक प्रोजेक्ट तैयार किया। एन.एफ. ए.पी. वर्ष 1999 में अस्तित्व में आया। इसके अंतर्गत अगले बीस वर्षों में भारत के वनों के सतत् विकास के लिए व्यापक कार्य योजना बनाई गई।

राष्ट्रीय वानिकी कार्रवाई कार्यक्रम का उद्देश्य है- देश के कुल क्षेत्रफल के 33 प्रतिशत को वन क्षेत्र के अंतर्गत लाना एवं वनों के कटान को नियंत्रित करना। कार्यक्रम को मुख्य तत्व इस प्रकार हैं-

  1. मौजूदा वन संसाधनों का संरक्षण;
  2. वन उत्पादकता का सुधार;
  3. वनोत्पादों की कुल मांग में कमी लाना;
  4. नीति एवं संस्थात्मक फ्रेमवर्क को मजबूत करना; और
  5. वन क्षेत्र में वृद्धि करना

वन अग्नि नियंत्रण

भारत में वनों के विनाश का एक प्रमुख कारण जंगलों में लगने वाली आग है। यहां अधिकतर मामलों में आग मानव द्वारा ही लगायी जाती है। कुछेक मौकों पर ही यह दुर्घटनावश लगती है। जानबूझकर जंगलों में लगाई गई आग की दुर्घटनाओं के कारण हैं- पशुचराई, महुआ के आदि। भारत में अग्नि दुर्घटनाओं को कम करने की दिशा में वन-विभाग ने निम्नांकित कदम उठाए हैं:

  1. फायर-लाइंस का विकास, तथा;
  2. आग लगने वाले मौसम-विशेष के दौरान अग्निरक्षकों की नियुक्ति के अतिरिक्त निगरानी स्तम्भ की स्थापना।

देश में वनों में लगने वाली आग के कारणों को ज्ञात करने, नियंत्रण और निषेध के लिए महाराष्ट्र के चन्द्रपुर और उत्तराखण्ड के हल्द्वानी तथा नैनीताल में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.) की सहायता से एक आधुनिक वन अग्नि-नियंत्रण परियोजना शुरू की गई है। वर्तमान में यह योजना 11 राज्यों में चलायी जा रही है। इन योजनाओं का विस्तार अन्य राज्यों में भी किया जा रहा है। इस योजना को मॉडर्न फॉरैस्ट्रस फायर कंट्रोल प्रॉजेक्ट्रस का नाम दिया गया है।

राष्ट्रीय वन आयोग

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने फरवरी 2003 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.एन. कृपाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय वन आयोग का गठन किया। इसमें छह सदस्य और थे। आयोग ने राज्य केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य संबद्ध लोगों से विचार-विमर्श के बाद 28 मार्च, 2006 को अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी । रिपोर्ट में 23 अध्याय हैं, जिनमें वन नीति, वैधानिक ढांचा, वन प्रशासन आदि के अलावा वन और पूर्वोत्तर, कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी, प्राकृतिक संसाधनों में वन और वित्तीय समर्थन जैसे विशिष्ट मुद्दों पर अलग से विचार किया गया है।

रिपोर्ट में 360 सिफारिशें की गई हैं। इन सिफारिशों पर भारत सरकार और राज्य सरकारों को कार्रवाई करनी है। कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रीय वन नीति, 1988 में किसी परिवर्तन का सुझाव नहीं।
  • उद्देश्य की पूर्ति के वन के प्रकार और भौगोलिक विवरण के अनुसार अधिकतम वन/वृक्ष अच्छादित क्षेत्रों का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान पर बल।
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 में संशोधन।
  • वन विभाग द्वारा जैव-विविधता अधिनियम, 2002 और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम का कार्यान्वयन।
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में और संशोधन तथा ढिलाई नहीं।
  • मानव-पशु संघर्ष आदि से बचने के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत प्रजातियों को पुनः अनुसूचित करना।
  • 1988 की राष्ट्रीय वन नीति में कोई बदलाव नहीं है।

सामाजिक वानिकी

राष्ट्रीय वन नीति, 1988 विनष्ट या कम महत्व के वनों को ईंधन लकड़ी, चारा और थोड़ी मात्रा में लकड़ी की स्थानीय समुदाय की जरूरतों को पूरा करने का संसाधन बेस बनाने तथा इसके विकास एवं संरक्षण में लोगों की सहभागिता पर बल देती है तथा साथ ही वनों को पर्यावरण सुधार हेतु विकसित करने की बात कहती है। इसलिए सामाजिक वानिकी योजना प्रारंभ की गई जिसने हरित आवरण में वृद्धि की, वनोत्पाद एवं ईंधन लकड़ी की आपूर्ति की तथा थोड़ी लकड़ी और थोड़ा बहुत वनोत्पाद ग्रामीणों तक पहुंचाया। साथ ही शहरी जनसंख्या की ईंधन आवश्यकता को पूरा किया और माचिस उद्योग के लिए कच्चा माल उत्पादित किया।

भारत सरकार के राष्ट्रीय कृषि आयोग ने वर्ष 1973 में सर्वप्रथम सामाजिक वानिकी शब्द का इस्तेमाल किया। यह महसूस किया गया कि बढ़ती जनसंख्या के कारण वन दबाव में थे तथा भूमि मानव गतिविधियों के कारण विनष्ट हो रही थी। सामाजिक वानिकी को कुछ मुख्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लोगों को शामिल करने हेतु अपनाया गया।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भूमिका एवं महत्व: वास्तविक तौर पर भारत में वन 64 मि. हे. (कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 19.47 प्रतिशत) की परिधि में आच्छादित हैं, जो कि 47,500 हेक्टेयर प्रतिवर्ष की गति से ह्रासमान हो रहे हैं। भारत के वनों की उत्पादकता 0.5 मी.3 प्रति हेक्टेयर है जो विश्व औसत (2.1 मी.3 प्रति हेक्टेयर) से काफी नीचे है। भारत के प्राकृतिक वनावरण में तेजी से कमी आती जा रही है। अतः पारिस्थितिक संतुलन को कायम रखने की दृष्टि से सामाजिक वानिकी का महत्व काफी बढ़ जाता है। एक जनान्दोलन के रूप में सामाजिक वानिकी को 20 सूत्रीय कार्यक्रम में भी शामिल किया गया है। सामाजिक वानिकी के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:

1. वन क्षेत्र में वृद्धि करना तथा पारिस्थितिक तंतुलन को कायम रखना: इसे नमी एवं मृदा तथा प्राकृतिक अधिवासों के संरक्षण उपायों द्वारा पूरा किया जाता है।

2. आधारभूत ग्रामीण जरूरतों की पूर्ति करना: सामाजिक वानिकी द्वारा ग्रामीणों की पांच मूल आवश्यकताओं- ईंधन, खाद्य, चारा, उर्वरक एवं रेशा की पूर्ति की जाती है। भारत में ईंधन लकड़ी एवं चारे की उपलब्धता कुल मांग की तुलना में क्रमशः एक-चौथाई एवं आधी है, जिसे सामाजिक वानिकी के माध्यम से ही बढ़ाया जा सकता है।  इसके अतिरिक्त इमारती लकड़ी, बांस, गोंड, महुआ, औषधीय घास, लाख इत्यादि लघु वनोत्पादों के माध्यम से ग्रामीण कुटीर एवं लघु उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति भी होती है।

3. बेहतर मूमि उपयोग को सुनिश्चित करना: सामाजिक वानिकी मृदा अपरदन के नियंत्रण, सीमांत भूमि के पुनरुद्धार, जलाक्रांति के निरोधक प्रयासों तथा कृषि-वन-पशुपालन के एकाश्मक समेकन के माध्यम से संतुलित एवं जीवक्षम भूमि उपयोग की उपलब्धि में सहायता करती है।

4. रोजगार निर्माण: सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों द्वारा ग्रामीण बेरोजगारी (विशेषतः गैर-कृषि मौसम में) की स्थिति में संतोषजनक कमी लायी जा सकती है। यह समाज के कमजोर वगों की आय के स्थिरीकरण में सहायक होती है।

5. प्रदुषण नियंत्रण: वृक्षों द्वारा हानिकारक गसों का अवशोषण ऑक्सीजन का उत्सर्जन किया जाता है। इस रूप में वे वायु प्रदूषण को घटाने (विशेषतः शहरी क्षेत्रों में) में सहायक होते हैं।

6. सामान्य पर्यावरण का सुधार एवं मनोरंजन राष्ट्रीय कृषि आयोग द्वारा 1976 में सामाजिक वानिकी के मूल उद्देश्य निरूपित किये गये जो इस प्रकार हैं:

  • ईंधन लकड़ी की आपूर्ति, ताकि गाय के गोबर को ईंधन के बजाय प्राकृतिक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सके।
  • लघु इमारती लकड़ी की आपूर्ति।
  • वायु अपरदन से कृषि भूमियों का बचाव।
  • चारा आपूर्ति
  • मनोरंजन जरूरतों की पूर्ति

दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में सामाजिक वानिकी की भूमिका: एक अध्ययन

अरावली के टूटे हुए कटक के कारण दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान ऊंचा उठा हुआ है। इसके अंतर्गत उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, चित्तौगढ़, भीलवाड़ा, कोटा बूंदी, सवाई माधोपुर, जयपुर, अजमेर आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं।

एक समय यह सघन वन आच्छादित क्षेत्र था, किंतु पिछले 50 वर्षों में इसमें तीव्र निर्वनीकरण हुआ। उन्नीस सौ अड़तालीस में राज्य में कुल क्षेत्र का 18% वन आच्छादित था, जो कि अब घटकर मात्र 3% रह गया है। इस अवक्रमण के लिए उत्तरदायी कारक हैं-

1. पालतू पशुओं की विशाल संख्या द्वारा बारम्बार चराई;
2. ग्रामीण ईधन की लकड़ियों का अनियमित शोषण तथा;
3. संगमरमर, बालू पत्थर, चूना-पत्थर, जिप्सम आदि का खनन।

इस क्षेत्र में 32,000 वर्ग किलोमीटर के कुल वनों में से 22,000 वर्ग किलोमीटर के लगभग अवक्रमित या बंजर है। अवक्रमित वनों के लगभग आधे वृक्षों की जड़ें स्वस्थ हैं, जो कि थोड़े-से संरक्षण से ही पुनर्जीवित हो सकती हैं। थार मरुस्थल की सीमा पर स्थित इस अर्द्ध-शुष्क प्रदेश में कांटेदार एवं झाड़ीयुक्त सवाना वनस्पति पाई जाती है। इस प्रदेश में मुख्यतः छोटे और सीमांत किसान और भूमिहीन श्रमिक निवास करते हैं। यहां मोटे अनाज, गेहूं, तिलहन आदि की कृषि होती है। यह प्रदेश सूखा प्रभावित पेटी का भाग है। सामाजिक वानिकी इस प्रदेश में भूमि अवक्रमण, ईंधन की लकड़ी एवं चारे की समस्या को रोक सकती है। यह क्रियाएं न केवल इस प्रदेश के निर्धनों के लिए अतिरिक्त आय उत्पादित करते हैं, अपितु, पारिस्थितिकीय संतुलन की पुनप्राप्ति में भी सहायता करती हैं।

अप्रैल 1991 में, प्रत्येक राजस्व ग्राम में एक ग्राम वन संरक्षण और प्रबंध समिति (Village Forest Protection and Management Committees) की स्थापना के लिए एक योजना आरम्भ की गयी। ये समितियां अतिक्रमण, अवैध कटाई, वनाग्नि, अनियमित चराई से वनों की रक्षा के लिए, सहयोग पर आधारित सूक्ष्म नियोजन, उत्पादन और प्रबंध के लिए उत्तरदायी थी। इस योजना के लाभ अंशतः ग्राम समुदाय को, अंशतः राजकोष और अंशतः वन विकास में पुनर्निवेशित किये जाते हैं।

सामाजिक वानिकी की योजना

यह योजना 1980-81 में ईंधन लकड़ी की कमी वाले 101 जिलों में आरंभ की गयी थी। इसके तहत ग्रामीण ईंधन काष्ठ पौधरोपण तथा प्रत्येक बच्चे हेतु एक वृक्ष कार्यक्रम भी शामिल था। यह एक केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम था, जिसे कनाडा एवं स्वीडन द्वारा वित्तीय व तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी गयी थी। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, प. बंगाल, ओड़िशा, गुजरात एवं तमिलनाडु में सफलता प्राप्त हुई है।

सामाजिक वानिकी की एक मुख्य विशेषता स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी रही है, जिनमे ग्रामीण गरीब, भूमिहीन, श्रमिक, स्वयंसेवी संगठन, महिला मंडल, ग्रामीण युवा, स्कूल शिक्षक इत्यादि शामिल हैं। वन विभाग द्वारा पौध प्रजातियों के चयन में सहायता दी जाती है। तथा उत्पाद को स्थानीय समुदाय में बांट दिया जाता है। सामुदायिक स्थलों, नहर बंधों, तालाब बन्धों, सडकों व रेलमार्गों के किनारे, पंचायती भूमियों, व्यर्थ व् दलदली भूमियों, जलाक्रन्तिग्रस्त क्षेत्रों, निम्न वनों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्कूल व् कालेज परिसरों, अस्पतालों, स्मारकों एवं ऐतिहासिक स्थलों इत्यादि पर वृक्षारोपण किया जाता है।

सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का आलोचनात्मक मूल्यांकन

1. कृषिवानिकी में सफलता कितु ग्राम वानिकी की उपेक्षा: सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के दो मुख्य घटक हैं- पहला, ग्रामीण भूमियों का वनीकरण, तथा; दूसरा, निजी भूमियों पर वृक्षारोपण, जिसे कृषि वानिकी कहा जाता है। वृक्षों के तीव्र उत्पादन की दृष्टि से कृषि वानिकी अत्यंत सफल रही है। गुजरात एवं कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में तो यूकेलिप्टस वृक्षों का आधिक्य स्थापित हो चुका है। दूसरी ओर ग्राम या सामुदायिक वानिकी असफल हुई क्योंकि स्थानीय लोगों द्वारा इसमें प्रभावी सहभागिता नहीं निभाई गयी। ग्राम प्रायः विजातीय होते हैं, जिनमें समन्वय की भावना का अभाव पाया जाता है। ग्राम परिषदें भी अनेक ग्रामों से बना निकाय होती हैं तथा जो प्रत्येक सदस्य ग्राम को विश्वास में नहीं ले पाती हैं। इसके अतिरिक्त सामान्य भूमि के प्रबंधन की कोई परंपरा भी मौजूद नहीं होती।

2. बाजारोन्मुखी वृक्षों को वरीयता तथा ईंधन काष्ठ व चारा वृक्षों की उपेक्षा: यह सामाजिक वानिकी के उद्देश्यों के प्रतिकूल ही नहीं था बल्कि वन भूमि पर बढ़े दबाव का कारण भी था। किसानों द्वारा वनों से लकड़ी, पत्तियां, घास इत्यादि एकत्रित करना पहले की भांति जारी रखा गया।

3. कोष की कमी: विदेशी योगदान की तुलना में सरकारी कोष की कमी के कारण वन भूमियों पर चलायी जा रही सामाजिक वानिकी परियोजनाओं को पूंजी के अभाव का सामाना करना पड़ा। आधे-अधूरे रूप में संचालित ये परियोजनाएं अपेक्षित परिणाम देने में असफल रहीं।

त्रुटिपूर्ण प्रजाति चयन तथा अवैज्ञानिक पद्धतियां

वृक्षों की प्रजातियों के चयन तथा वृक्षों के बीच स्थानांतर पर सावधानीपूर्वक विचार नहीं किया गया। मध्यवर्ती उत्पाद देने वाली प्रजातियों को समुचित प्रोत्साहन नहीं दिया गया। इसके अतिरिक्त घास, फली, चारा, फल एवं अन्य गौण वनोत्पादों की भी उपेक्षा की गयी। पौधरोपण लागत तथा कर्मचारी पर्यवेक्षण समय में कटौती करने और मध्यवर्ती प्रबंधन कार्यों से बचने के लिए वृक्षों के बीच स्थानांतर को घटाया गया। यूकेलिप्टस एवं टीक जैसे इमारती काष्ठ केन्द्रित वृक्षों के रोपण पर अत्यधिक जोर दिया ही न्यूनतम संभव समय में चारा व ईंधन लकड़ी प्राप्त करने हेतु झाड़ियों व घासों जैसे जरूरी अनुपूरक उपायों पर भी अधिक ध्यान नहीं दिया गया।

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