प्रथम गोलमेज सम्मेलन First Round Table Conference

नवंबर 1930 से जनवरी 1931 तक

सरकार ने 12 नवंबर 1930 को साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा करने के निमित्त, लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया। ब्रिटिश सरकार एवं भारतीयों के मध्य समान स्तर पर आयोजित की गयी यह प्रथम वार्ता थी। जहां कांग्रेस एवं अधिकांश व्यवसायिक संगठनों ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया, वहीँ मुस्लिम लीग, हिन्दू मह्रासभा, उदारवादियों, दलित वर्ग तथा भारतीय रजवाड़ों ने इस सम्मलेन में भाग लिया। इस सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधि मुख्यतः तीन भागों में विभक्त किये जा सकते हैं।

  1. तीनों ब्रिटिश दल-लिबरल, कंजरवेटिव और श्रमिक दल के प्रतिनिधि।
  2. ब्रिटिश भारत से ब्रिटिश सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य।
  3. भारत के राज्यों से राजकुमार या उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि।

सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों के चयन का मापदण्ड असमान था। ब्रिटेन की तीनों पार्टियों का प्रतिनिधित्व अलग-अलग प्रतिनिधि कर रहे थे, जबकि भारतीय प्रतिनिधियों में से कुछ वायसराय द्वारा मनोनीत थे तथा कुछ का मनोनयन भारतीय रजवाड़ों ने किया था। इस सम्मेलन में राज्य लोक संगठन का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। प्रतिनिधियों के मनोनयन का मुख्य आधार ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा तथा उनके स्वशासन संबंधी विचार थे।

इस सम्मेलन में सम्मिलित सभी दलों के प्रतिनिधि केवल अपने व्यक्तिगत हितों के पक्षपोषण में प्रयासरत रहे। सम्मेलन के दौरान केवल समस्यायें व विचारार्थ विषय ही प्रस्तुत किये गये लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ सका। वैसे भी भारत के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन ‘कांग्रेस’ के सम्मेलन में भाग न लेने से यह सम्मेलन अधूरा सा हो गया था। अंततः 19 जनवरी 1931 को बिना किसी वास्तविक उपलब्धि के यह सम्मेलन समाप्त हो गया।

गांधी-इरविन समझौता

25 जनवरी 1931 को गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य सभी प्रमुख नेता बिना शर्त कारावास से रिहा कर दिये गये। कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने गांधीजी को वायसराय से चर्चा करने के लिये अधिकृत किया। तत्पश्चात 19 फरवरी 1931 को गांधीजी ने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन से भेंट की और उनकी बातचीत 15 दिनों तक चली। इसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन समझौता कहा जाता है। इस समझौते ने कांग्रेस की स्थिति को सरकार के बराबर कर दिया। इस समझौते में सरकार की ओर से लार्ड इरविन इस बात पर सहमत हुये कि-

  1. हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त सभी राजनैतिक कैदी छोड़ दिये जायेंगे।
  2. अपहरण की सम्पत्ति वापस कर दी जायेगी।
  3. विभिन्न प्रकार के जुर्मानों की वसूली को स्थगित कर दिया जायेगा
  4. सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे चुके भारतीयों के मसले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार-विमर्श किया जायेगा।
  5. समुद्र तट की एक निश्चित सीमा के भीतर नमक तैयार करने की अनुमति दी जायेगी।
  6. मदिरा, अफीम और विदेशी वस्तओं की दुकानों के सम्मुख शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की आज्ञा दी जायेगी।
  7. आपातकालीन अध्यादेशों को वापस ले लिया जायेगा। किन्तु वायसराय ने गांधीजी की निम्न दो मांगे अस्वीकार कर दी-
    1. पुलिस ज्यादतियों की जांच करायी जाये।
    2. भगत सिंह तथा उनके साथियों की फांसी की सजा माफ कर दी जाये।

कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने आश्वासन दिया कि- (i) सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थापित कर दिया जायेगा। तथा (ii) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में इस शर्त पर भाग लेगी कि सम्मेलन में संवैधानिक प्रश्नों के मुद्दे पर विचार करते समय परिसंघ, भारतीय उत्तरदायित्व तथा भारतीय हितों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिये अपरिहार्य मुद्दों पर विचार किया जायेगा। (इसके अंतर्गत रक्षा, विदेशी मामले, अल्पंसख्यकों की स्थिति तथा भारत की वित्तीय साख जैसे मुद्दे शामिल होगे)।

सविनय अवज्ञा आदोलन का मूल्यांकन

क्या गांधी-इरविन समझौता अपने उद्देश्यों से पीछे हट गया था?

गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन की स्थगित किये जाने के निर्णय से यह बात रेखांकित होती है कि गांधी-इरविन समझौता अपने उद्देश्यों से पीछे नहीं हटा था क्योंकि-

  1. किसी भी जनआंदोलन के लिये आवश्यक है कि उसका कार्यकाल छोटा ही अर्थात उसे ज्यादा लंबा न खींचा जाये।
  2. कार्यकर्ताओं या सत्याग्रहियों के विपरीत, जनसामान्य की त्याग करने की क्षमता सीमित होती है।
  3. 1930 के पश्चात, आंदोलन में विरक्तता के लक्षण परिलक्षित होने लगे थे। विशेषरूप से उन दुकानदारों एवं व्यापारियों में, जिनमें आंदोलन के प्रति अभूतपूर्व उत्साह था।

निःसंदेह युवा भी निराश हो चुके थे। उन्होंने बड़ी तत्परता एवं गर्मजोशी से आंदोलन में सहभागिता निभायी किंतु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। गुजरात के किसानों में भी निराशा का वातावरण व्याप्त था क्योंकि उन्हें उनकी भूमि वापस नहीं लौटायी गयी थी। (वास्तव में गुजराती काश्तकारों को उनकी जमीन वापस तभी मिली, जब सूबे में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ)। किंतु इसके पश्चात भी अधिकांश भारतीय इस बात से प्रसन्न थे कि उपनिवेशी सरकार ने उनके आदोलन साथ समझौते पर दस्तखत किये। आंदोलनकारियों को जब जेल से रिहा किया गया तो जनता ने किसी नायक की तरह उनका स्वागत किया।

सविनय अवज्ञा आदोलन की असहयोग आंदोलन से तुलना 

  1. इस आंदोलन ने ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया, जबकि असहयोग आंदोलन का लक्ष्य ‘स्वराज्य’ था।
  2. आंदोलन में कानून की अवज्ञा को मुख्य हथियार के रूप में प्रयुक्त किया गया, जबकि असहयोग आंदोलन का मुख्य उद्देश्य उपनिवेशी शासन से असहयोग था।
  3. बुद्धिजीवी वर्ग के सहयोग में थोड़ा गिरावट आयी तथा विरोध प्रदर्शन में उसने वह तत्परता नहीं दिखाई, जैसा कि असहयोग आंदोलन के दौरान था। जैसे- वकीलों द्वारा वकालत छोड़ना एवं छात्रों द्वारा सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार कर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेना।
  4. इस आंदोलन में मुसलमानों की सहभागिता असहयोग आंदोलन के समान नहीं थी।
  5. आंदोलन में कोई बड़ा मजदूर विद्रोह परिलक्षित नहीं हुआ।
  6. किंतु सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसानों एवं व्यावसायिक वर्ग की व्यापक भागेदारी ने अन्य वर्गों की क्षति की पूर्ति की।
  7. इस आंदोलन में राजनीतिक बदियों की संख्या असहयोग आदोलन की तुलना में लगभग तीन गुनी अधिक थी।
  8. सांगठनिक रूप से कांग्रेस ज्यादा सशक्त थी।

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