फाह्यान Fa-Hien

फाह्यान का यात्रा-विवरण

चीनी यात्री फाह्यान ने चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्यकाल में सन् 400-411 ई. के बीच भारत का भ्रमण किया था। उसका जन्म शान सी प्रदेश के ग्राम वु-यंग में हुआ था। कांनसू, तुन-हुआॉग नगर की यात्रा कर वह शेनशेन और कारा शहर होता हुआ खोतान के दक्षिणी भाग तक जा पहुँचा। भारत में वह मथुरा एवं संकिशा गया। वहाँ से श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनारा एवं वैशाली होता हुआ पाटलिपुत्र पहुँचा। उसने राजगृह, सारनाथ, बोधगया, वाराणसी की भी यात्रा की। वापसी में वह चम्पा, ताम्रलिप्ति के बंदरगाहों से होता हुआ जहाज द्वारा सिंहल (लंका) गया। वहीं से अनेक कष्ट सहता हुआ जल मार्ग से दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों तक गया। वहीं से चीन वापस लौट गया। इस यात्रा-विवरण में उसने बहुत से दिलचस्प पक्षों को उजागर किया है। दुर्भाग्य से उसने धार्मिक स्थिति की ही अधिक विवेचना की है, राजनैतिक तथ्यों व घटनाओं की उपेक्षा की है। यहाँ भारतवासियों के रहन-सहन के बारे में उसने अवश्य लिखा है। इसके अतिरिक्त बहुत सी सूचनाएँ उसके यात्रा-विवरण से प्राप्त होती हैं। फाह्यान ने मध्य देश के बारे में लिखा है- लोग प्रभूत तथा प्रसन्न हैं। उन्हें व्यवहार के लिए लिखा पढ़ी तथा पंचायत इत्यादि नहीं करनी पड़ती। केवल वह लोग जो राज्य की भूमि में खेती करते हैं उससे प्राप्त लाभ का कुछ अंश देते हैं। रहने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने की स्वतंत्रता है।

फाह्यान लिखता है कि भारतीय शाकाहारी थे। मध्य देश में पशुवध, मद्यपान, प्याज, लहसुन का प्रयोग नहीं होता था। लोगों के वस्त्रों के सम्बन्ध में संकेत मिलता है कि ऊनी, सूती और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। हवनों और पताकाओं में रेशम का प्रयोग किया जाता था। फाह्यान के अनुसार भारतीय पुष्पों और सुगंधियों के शौकीन थे। शारीरिक पवीत्रता के साथ-साथ लोगों की धर्मपरायणता भी उच्चकोटि की थी। लोग पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे और पाप कर्म करने को बुरा मानते थे। अपने वचन के पक्के होते थे। भारतीयों के आचरण को फाह्यान ने आदर्श एवं अत्यन्त उच्च कोटि का कहा है। अपने स्वास्थ्य के प्रति भी सजग थे। देश के सभी छोटे-बड़े नगरों में औषधालयों की सुन्दर व्यवस्था थी। औषधालयों में नि:शुल्क भोजन, औषधि आदि की पूर्ण व्यवस्था थी। सामान्यत: मध्यम वर्ग और वैश्य वर्ग के लीग औषधालयों को मुक्त हाथों से दान दिया करते थे। प्राणदण्ड या अन्य शारीरिक दण्ड के बिना ही राजा राज्य करते थे। अपराधियों पर उनके अपराध की परिस्थिति के अनुसार भारी या हल्का जुर्माना लगाया जाता था। फाह्यान के यात्रा-विवरण से चन्द्रगुप्तकालीन शान्तिपूर्ण व सुखी जीवन की झांकी प्राप्त हो जाती है। फाह्यान के अनुसार भारतीय नागरिक सदाशय एवं अतिथि परायण थे। उसने भारतीयों की दानपरायणता व उत्सव प्रेम की प्रचुर मात्रा में प्रशंसा की है।

फाह्यान के यात्रा-विवरण से तत्कालीन धार्मिक जीवन की महत्त्वपूर्ण जानकारी भी मिलती है। लोगों में धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। फाह्यान के अनुसार नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों में राजकीय हस्तक्षेप नहीं होता था। तत्कालीन नगरों में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन देवालय विद्यमान थे। फाह्यान की यात्रा विवरण से गुप्त युग में बौद्ध धर्म की प्रचुरता ही दिखायी देती है। ताम्रलिप्ति में फाह्यान ने 24 संघाराम देखे थे। कपिलवस्तु, वैशाली, श्रावस्ती, कान्यकुब्ज आदि में भी धर्म का प्रचार था। फाह्यान के विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म पालन की पूर्ण स्वतंत्रता थी, राज्य की से उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होता था। फाह्यान के विवरण में जैन धर्म का उल्लेख नहीं है। बौद्ध धर्म की दोनों शाखाएँ हीनयान व महायान उत्तरी भारत में विद्यमान थीं। बौद्ध विहारों को राजा व अन्य धनी व्यक्तियों द्वारा अनुदान प्राप्त होते रहते थे। फाह्यान ने बौद्धों के धार्मिक कार्य-कलापों का उल्लेख किया है। उसने भिक्षुणियों के द्वारा आनन्द के स्तूप के पूजन का उल्लेख किया है। बौद्धों द्वारा मूर्तियों का भी जुलूस निकाला जाता था। फाह्यान ने पाटलिपुत्र में स्वयं विशाल रथ पर बुद्ध एवं बोधिसत्व की मूर्तियों का प्रदर्शन देखा था।

भारतीय आंतरिक व विदेशी व्यापार का संकेत भी फाह्यान की यात्रा विवरण में मिलता है। ताम्रलिप्ति उस समय प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था जहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापारिक गतिविधियाँ सम्पन्न की जाती थीं। यहीं से जहाज सिंहल (लंका) और हिन्देशिया की ओर आते-जाते रहते थे। वापस जाते समय फाह्यान ने इसी मार्ग को अपनाया था। फाह्यान ने भारतीय जहाजों की प्रशंसा की है। ये विशालकाय होते थे और भयंकर तूफान का सामना करने में सक्षम थे। इनमें छोटी-छोटी किश्तियाँ भी साथ होती थीं जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग में लाया जाता था।

फाह्यान ने विनिमय के सन्दर्भ में लिखा है कि भारतीय क्रय-विक्रय में कौड़ियों का उपयोग करते थे। इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि भारतीय मुद्रा प्रणाली अविकसित थी। वरन् यह कहा जा सकता है कि कौड़ियों का उपयोग भी क्रय-विक्रय में होता था। खासतौर से ग्रामीण इलाकों में वस्तुएँ बहुत सस्ती थीं व अदल-बदल की प्रथा भी प्रचलित थी।

पाटलिपुत्र में मौर्य प्रासाद, जो अब तक निर्जन हो चुका था, के निर्माण को देख कर वह स्तब्ध था। वह यह कहने से अपने आप को नहीं रोक सका कि- वह प्रासाद देवताओं द्वारा निर्मित था। मनुष्यों में इतनी कुशलता नहीं आ सकती। फाह्यान ने नगरों के भवनों, मन्दिरों, साधारण आवास-गृहों पर कम प्रकाश डाला है। उसने एक गुहा का विस्तृत विवरण दिया है जो पाँच मंजिल ऊँची थी और पत्थरों को काटकर बनाई गयी थी। तीन मजिलों पर तो क्रमश: पाँच सौ, चार सौ और सौ कोठरियों का निर्माण हुआ था और सर्वत्र जल की विशेष व्यवस्था थी।

फाह्यान ने तत्कालीन-शासन व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला है। उसके अनुसार भारतीय सम्राट् की शासन-व्यवस्था उच्च कोटि की थी। स्वयं ब्राह्मण धर्मावलम्बी होते हुए भी उसका धार्मिक दृष्टिकोण उदार था। देश में चारों ओर सुख, शान्ति व समृद्धि थी। फाह्यान ने कोई भी दुर्भिक्ष नहीं देखा। लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे। स्पष्ट है कि चोर व डाकुओं का आतंक कम था। अपराध कम होते थे। दण्ड-व्यवस्था सरल थी। सामान्यत: अर्थ दण्ड ही दिया जाता था, प्राणदण्ड की व्यवस्था न थी। एक ही अपराध को बार-बार करने तथा राजद्रोह जैसे अपराधों में हाथ काट लिए जाते थे।

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