संसदीय लोकतांत्रिक एवं पंथनिरपेक्ष गणराज्य Establishment Of Parliamentary Democratic And Secular Republic

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत संविधान सभा द्वारा भारत के लिए एक उपयुक्त शासन प्रणाली के चयन हेतु व्यापक विचार विमर्श और परिचर्चा की गई। अंतिम निष्कर्ष के रूप में संसदीय लोकतंत्र को भारतीय परिस्थितियों के सर्वाधिक अनुकूल माना गया तथा भारत में संसदीय लोकतांत्रिक पद्धति स्थापित करने का निर्णय लिया गया। भारत में संसदीय लोकतंत्र स्थापित करने के पृष्ठ में निम्न कारण विद्यमान थे-

  1. भारत की प्राचीन शासन प्रणाली आधुनिक विश्व के परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक, अधूरी तथा कमजोर साबित होती जबकि संसदीय लोकतंत्र तथा उसकी संस्थाओं के संचालन में भारतीय अनुभव एक सीमा तक परिपक्व हो चुका था, जो आधुनिक विश्व तथा भारतीय जनइच्छाओं की मांग को काफी हद तक पूरा कर सकता था।
  2. आधुनिक संसदीय लोकतांत्रिक गणराज्य के अंतर्गत ही गरीबी, अशिक्षा, रूढ़िवाद जैसी बुराइयों का उन्मूलन किया जा सकता था।
  3. भारतीय समाज की प्राचीन शासन प्रणाली या शासन की किसी अन्य पद्धति को अपनाने पर निरंकुशतंत्र या अधिनायकवाद की स्थापना का खतरा पैदा हो सकता था।
  4. बहुसंख्यक लोगों की गरीबी या निरक्षरता के आधार पर संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार न करना जनसामान्य में क्षोभ, निराशा तथा राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति अविश्वास व दुर्भावना पैदा कर सकता था।
  5. शासन तंत्र में जनसामान्य की अधिकतम भागीदारी के माध्यम से ही सामाजिक-आर्थिक न्याय को सुनिश्चित किया जा सकता था।
  6. विभिन्न जातियों, धमों, भाषाओं में बंटे भारतीय लोगों में राष्ट्रीय  एकता की भावना को कायम रखने के लिए संसदीय लोकतंत्र ही सर्वाधिक उपयुक्त शासन प्रणाली थी।

इस प्रकार उपर्युक्त कारकों के परिप्रेक्ष्य में भारत ने स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया।

सदीय लोकतंत्र की संस्थात्मक व्यवस्थाएं- इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित हैं-

निर्वाचन एवं सार्वभौमिक मताधिकार

भारत के लोगों को, 1909 के भारतीय शासन अधिनियम के बाद से ही चुनाव प्रणाली व मताधिकार का अनुभव प्राप्त हो चुका था, किंतु 1909, 1919 तथा 1935 के अधिनियमों के अंतर्गत चुनाव प्रणाली गैर-लोकतांत्रिक तथा मताधिकार अत्यंत सीमित था। भारतीय संविधान द्वारा पहली बार व्यापक जनसमूह को मताधिकार प्रदान किया गया जिसमें अशिक्षित, पिछड़े, गरीब, दलित तथा स्त्री जैसे सभी कमजोर सामाजिक वर्ग शामिल थे। मतशक्ति के आधार पर बहुसंख्यक गरीब तथा वंचित जनसामान्य को राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर प्राप्त हुआ। ये वर्ग अपनी संख्यात्मक शक्ति से सरकार पर अपने हितों की पूर्ति हेतु दबाव डाल सकता था। इस प्रकार शांतिपूर्ण समाजिक आर्थिक परिवर्तनों का मार्ग प्रशस्त किया गया।

संसद एवं मंत्रिमंडलीय सरकारः भारतीय संविधान द्वारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित संसदीय एवं मंत्रिमंडलीय व्यवस्था का प्रावधान किया गया। विधिनिर्माण शक्ति, वाद-विवाद मंच, निंदा व अविश्वास प्रस्ताव आदि के माध्यम से संसदीय सर्वोच्चता की स्थापना की गई। बहुदलीय प्रणाली के द्वारा विभिन्न मत-मतांतरों को मुखरित करने की आजादी तथा लोकतान्त्रिक ढांचे के अंतर्गत सरकारों के विल्कल्पों को सुनिश्चित किया गया। इस प्रणाली में राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रमुख होने के बावजूद मंत्रिमंडल के परामर्श अनुसार ही कार्य करता है क्योंकि प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल का स्वरूप उसके पद की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक होता है। मंत्रिमंडल अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी बनाया गया क्योंकि संसद में ही संपूर्ण देश के जनप्रतिनिधित्व का संघटन होता है।

इस प्रकार सरकार के ढांचे में उसके संस्थात्मक एवं प्रशासनिक लक्षणों तथा नागरिकों के साथ उसके संबंधों दोनों विशेषताओं को समाहित किया गया।

पंचायती राज

संसदीय लोकतंत्र में पंचायती राज प्रणाली को ‘मूलभूत लोकतंत्र' के रूप में मान्यता दी गयी। पंचायती राज प्रणाली के आधार पर, स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय संस्थाओं का गठन, स्थानीय अधिकारियों के कामकाज की देखभाल तथा विकेंद्रीकरण को सुनिश्चित किया गया। भारत में त्रिस्तरीय पंचायत राज प्रणाली की स्थापना की गई। इस प्रकार ग्रामीण जन समूह को स्थानीय प्रशासन की स्वायत्तता, स्थानीय नीति निर्धारण की आत्मनिर्भरता तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्थक भागीदारी प्रदान की गई।

मूल अधिकार व स्वतंत्रताएं: संविधान में विधि के समक्ष समानता, नियोजन के समान अवसर की समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संघ बनाने की स्वतंत्रता इत्यादि मानवीय एवं मौलिक अधिकार प्रदान किये गये। अस्पृश्यता उन्मूलन, मानवीय तथा बाल शोषण की समाप्ति के लिए राज्य को बाध्य करने की शक्ति भी मूल अधिकारों के रूप में प्रदान की गई। संवैधानिक उपचार के मूल अधिकार के अधीन व्यक्ति को सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। इस प्रकार शासन की किसी भी संभावित दमनकारी कार्यवाही के प्रति नागरिकों को लोकतान्त्रिक सुरक्षा कवच उपलब्ध कराया गया एवं साथ ही सामाजिक कल्याण एवं राष्ट्रहित को दृष्टि में रखकर व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध भी आरोपित किये गये ताकि नवीन लोकतंत्र को संकीर्ण स्वार्थों के चंगुल से सुरक्षित रखा जा सके।

इसके अतिरिक्त नीति निर्देशक सिद्धांतों के प्रावधान द्वारा राज्य को ऐसे कानूनों के निर्माण का गैर-बाध्यकारी निर्देश दिया गया, जो सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण की अधिकाधिक विस्तार दे सकें।

पंथनिरपेक्षता

भारतीय संविधान में भारत को एक ‘पंथनिरपेक्ष' गणराज्य की मान्यता दी गई। संविधान के 42वें संशोधन (1976) द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़कर धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को पूर्णतः स्पष्ट रूप दे दिया गया है।

भारत में पंथनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता को अपनाने के पृष्ठ में निम्न कारण विद्यमान थे-

  1. राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही भारत में साम्प्रदायिक कटुता का विस्तार हो चुका था तथा देश का विभाजन इसकी चरम परिणिति थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवजात लोकतंत्र को सम्प्रदायवाद के घातक प्रभावों से मुक्त रखने के लिए यह आवश्यक समझा गया कि धर्म या पंथ की राजनीति से पृथक रखा जाय।
  2. देश के विभाजन के उपरांत भी भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 12 करोड़ थी। साथ ही पारसी, सिख, ईसाई, बौद्ध तथा जैन मतावलम्बियों की मौजूदगी के कारण पंथनिरपेक्षता को आवश्यक सिद्धांत माना गया ताकि अल्पसंख्यकों के हितों को पर्याप्त संरक्षण मिल सके।
  3. लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाये जाने के कारण पंथनिरपेक्षता को स्वीकारना स्वाभाविक था, क्योंकि धार्मिक या सामुदायिक भेदभावों की उपस्थिति में समानता, न्याय, स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक आदशों को व्यावहारिक रूप नहीं दिया जा सकता था।
  4. व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता लोकतंत्र द्वारा प्रदत्त एक मानवीय अधिकार है। मानवीय अधिकारों के बिना लोकतंत्र अस्तित्वहीन होता है अतः भारतीय संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय एकीकरण, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों तथा समग्र

संविधान सभा
16 मई, 1946 को केबिनेट मिशन द्वारा प्रस्तुत योजना के अंतर्गत संविधान सभा का प्रारूप तय किया गया। इस संविधान सभा का गठन वयस्क मताधिकार की बजाय प्रांतीय विधायिकाओं के प्रतिनिधित्व के आधार पर किया गया।संविधान सभा में कुल 389 सदस्यों का प्रावधान था जिसमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 मुख्य आयुक्त क्षेत्रों के प्रतिनिधि तथा 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि शामिल थे।प्रत्येक प्रांत के प्रतिनिधियों की संख्या उसकी जनसंख्या के आधार पर तय की गयी। सामान्यतः 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि को चुना गया।प्रमुख जातियों को उनकी संख्या के अनुपात में अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया। साधारण वर्ग, मुसलमान तथा सिख (मात्र पंजाब में) तीन मतदाता वर्ग थे।

देसी रियासतों के प्रतिनिधियों को संविधान सभा की ‘समझौता समिति तथा रियासतों की संयुक्त समिति के परस्पर विचार-विमर्श के पश्चात चयनित किया जाना था।

जुलाई 1946 में प्रांतों के 296 सदस्यों के निर्वाचन के लिए संविधान सभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में मुस्लिम लीग को 73, कांग्रेस को 208 तथा अन्य दलों को 15 स्थान प्राप्त हुए। मुस्लिम लीग ने अपनी कमजोर स्थिति के कारण 9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन का बहिष्कार किया तथा पाकिस्तान के लिए पूर्णतः पृथक संविधान सभा की मांग की।

देश के विभाजन के उपरांत सिंध, बलूचिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांत संविधान सभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर चले गये तथा प्रांतों के प्रतिनिधियों की संख्या 229 रह गयी।

देशी रियासतों का प्रतिनिधित्व भी 93 से घटकर 83 हो गया। संविधान सभा का पुनर्गठन करते हुए पश्चिम बंगाल एवं पूर्वी पंजाब के प्रतिनिधियों की संख्या में 6 की वृद्धि की गयी किंतु पूर्वी पंजाब के 4 मुस्लिम सदस्यों ने संविधान सभा की कार्यवाही में भाग नहीं लिया। इसी प्रकार हैदराबाद रियासत ने भी अपने 16 प्रतिनिधियों को संविधान सभा में नहीं भेजा।

अतः 31 अक्टूबर, 1947 को संविधान सभा के पुनःसमवेत होने पर उसके सदस्यों की कुल संख्या 299 थी जिसमें 232 प्रांतों तथा 67 रियासतों के प्रतिनिधि थे। प्रांतों के 232 प्रतिनिधियों में 197 सामान्य, 4 सिख तथा 31 मुस्लिम सदस्य थे। 26 नवंबर, 1949 को पारित संविधान पर अतिम रूप से 284 प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षर किये गये।

संविधान सभा की महत्वपूर्ण समितियां

  1. संघ शक्ति समिति की सदस्य संख्या 9 थी तथा जवाहरलाल नेहरू इसके अध्यक्ष थे।
  2. मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति में 54 सदस्य थे तथा सरदार वल्लभभाई पटेल इसके अध्यक्ष थे।
  3. कार्य संचालन समिति में तीन सदस्य थे तथा कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी इसके अध्यक्ष थे।
  4. प्रांतीय संविधान समिति की सदस्य संख्या 25 थी तथा सरदार बल्लभभाई पटेल इसके अध्यक्ष थे।
  5. संघ संविधान समिति में 15 सदस्य थे तथा जवाहरलाल नेहरू इसके अध्यक्ष थे।
  6. प्रारूप समीक्षा समिति में 7 सदस्य थे और इसके अध्यक्ष सर अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर थे। इस समिति ने संविधान सभा के सलाहकार बी.एन. राव द्वारा तैयार संविधान के प्रारूप की समीक्षा की। डा. भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के सदस्य तथा भारत सरकार के विधिमंत्री थे। डा. अम्बेडकर द्वारा ही संविधान सभा में सविधान के प्रारूप को प्रस्तुत किया गया।

26 नवंबर, 1946 को संविधान के पारित होने के बाद नागरिकता, निर्वाचन, अंतरिम संसद से जुड़े उपबंध तथा अस्थायी व संक्रमणकारी उपबंध तुरंत उसी दिन से प्रभावी हो गये। शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ और इसी को संविधान के प्रारंभ की तिथि माना जाता है।

राष्ट्रीय विकास की प्राप्ति के लिए भी पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया जाना विवेकसंगत समझा गया।

भारत के संविधान में पंथनिरपेक्षता का अर्थ धर्म विरोध या अधार्मिकता न होकर सर्वधर्म समभाव है। राज्य का अपना कोई धर्म या पंथ नहीं है और वह धर्म या पंथ के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है। भारतीय संविधान में पंथनिरपेक्षता संबंधी प्रावधान निम्न प्रकार से हैं-

अंत:करण धार्मिक प्रचार तथा आचरण की स्वतंत्रताः संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य व सदाचार के उपबंधों के अधीन अंतःकरण, धर्म को अबाध रूप से मानने, उसका आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। लेकिन इस अनुच्छेद द्वारा किसी भी ऐसी वर्तमान विधि के प्रवर्तन या राज्य द्वारा किये जाने वाले किसी विधि के निर्माण में बाधा नहीं आती, जो राज्य की धार्मिक आचरण से सम्बद्ध आर्थिक वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लोकिक क्रियाओं के विनियमन या निर्बधन से रोकती हो अथवा सामाजिक कल्याण व सुधार को अवरुद्ध करती हो अथवा निषेधित करती हो।

धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता

संविधान के अनुच्छेद 26 के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य व सदाचार के युक्तियुक्त निर्बधनों के अधीन सभी धार्मिक सम्प्रदायों या उनके किसी विभाग को धार्मिक प्रयोजन से धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने व उनका पोषण करने, अपने धार्मिक कार्यो का प्रबंधन करने, चल व अचल सम्पत्ति का अर्जन व स्वामित्व रखने तथा ऐसी सम्पत्ति का विधि अनुरूप प्रशासन करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

धार्मिक करों के संदाय सम्बंधी स्वतंत्रता

अनुच्छेद 27 किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष की अभिवृद्धि हेतु कर देने की बाध्यताओं का निषेध करता है।

धार्मिक शिक्षा या उपासना की स्वतंत्रताः संविधान के अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा का निषेध किया गया है। राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या वित्तपोषित किसी भी शिक्षा संस्थान में धर्म विशेष की शिक्षा पाने के लिए किसी भी व्यक्ति को बाध्य नहीं किया जा सकता। कोई भी व्यक्ति या अवयस्क क्रमशः अपनी और संरक्षक की सहमति से ही किसी धार्मिक शिक्षण संस्था द्वारा आयोजित उपासना में भाग ले सकता है।

इसके अतिरिक्त संविधान के विभिन्न बिखरे हुए उपबंधों द्वारा भी पंथ निरपेक्षता के आधार को सुदृढ़ता प्रदान की गई।

संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को धर्म, जाति, वंश आदि के आधार पर भेदभाव किये बिना विधि के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान करता है अर्थात राज्य द्वारा निर्मित विधि बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों पर लागू होगी।

अनुच्छेद 15 में जीवन के किसी भी क्षेत्र में राज्य द्वारा नागरिकों के प्रति किये जाने वाले भेदभावपूर्ण आचरण का निषेध किया गया है।

अनुच्छेद 16 सभी नागरिकों को धर्म, जाति, वंश, जन्मस्थान या लिंग पर आधारित किसी भी भेदभाव के बिना सरकारी पदों या नौकरी में नियोजन का अवसर उपलब्ध कराता है।

अनुच्छेद 17 में अश्पृश्यता को दण्डनीय अपराध घोषित करके सामाजिक समानता को सुनिश्चत किया गया।

अनुच्छेद 29 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने का अधिकार प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 30 के अधीन अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी रूचि के अनुकूल शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने तथा उनका प्रशासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ। राज्य द्वारा ऐसी संस्थाओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में किसी प्रकार के भेदभाव की निषिद्ध किया गया है।

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 325 में भी यह प्रावधान है कि धर्म, वंश, लिंग या जाति के आधार पर किसी भी व्यक्ति को निर्वाचक नामावली में शामिल किये जाने के लिए अपात्र नहीं समझा जायेगा।

भारत में धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अंतर्गत पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के बजाय संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना की गयी। सरकारी कार्यालयों या राज्य द्वारा पोषित किसी भी संस्थान में किसी भी धर्म के प्रतीकों या प्रथाओं के व्यवहार को निषिद्ध किया गया। नीति निर्देशक सिद्धांतों के अधीन सभी नागरिकों के लिए समान आचार संहिता (अनुच्छेद 44) बनाने का निर्देश भी पंथनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को ही पुष्ट करता है।

भारत में धर्म की तुलना में राज्य को सर्वोच्च स्थान दिया गया। बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार “किसी भी समुदाय के लोगों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे संसद की सार्वभौमिक अधिकार सत्ता से बाहर हैं।” भारतीय संविधान में धार्मिक भेदभाव का निषेध करते हुए भी राज्य को दलित समुदाय के हितार्थ विधि-निर्माण करने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है। यह ‘सकारात्मक पक्षपोषण' पंथनिरपेक्षता की वैज्ञानिक भावना को अभिव्यक्त करता है। भारतीय लोकतांत्रिक पंथनिरपेक्ष गणराज्य एक ‘न्याय प्रशासनवादी' के रूप में सभी धर्मो को स्वतंत्रता एवं समानता प्रदान करता है और साथ ही अपने लोकतांत्रिक दायित्वों को निभाते हुए धार्मिक गतिविधियों पर सावधानीपूर्वक निगरानी रखता है तथा आवश्यकता पड़ने पर युक्तिसंगत हस्तक्षेप भी करता है। उल्लेखनीय है कि नेहरू युग (1947-64) में भारतीय राज्य द्वारा विभिन्न धार्मिक समुदायों के प्रति इसी नीति का संतोषजनक रूप से पालन किया गया।

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