दीन-ए-इलाही Din-e-Ilahi

अकबर सुन्नी धर्म के बाहरी रूपों को 1575 ई. तक मानता रहा। इसी समय शेख मुबारक तथा उसके दोनों पुत्रों-फैजी एवं अबुल फजल-के साथ उसका सम्पर्क हुआ, जिससे उसके विचारों में परिवर्तन आ गया। तब उसने दार्शनिक एवं धर्मशास्त्रीय प्रश्नों पर वाद-विवाद करने के उद्देश्य से फतहपुर सीकरी में इबादतखाना (पूजा का भवन) नामक एक भवन बनवाया। पहले उसने वहाँ इस्लाम के विद्वान् धर्मोपदेशको को बुलवाया, पर उनके शास्त्रार्थ ने शीघ्र अशिष्ट विद्वेषअस्वस्थ कट्टरपन तथा व्यक्तिगत आक्षेपों का रूप धारण कर लिया तथा वे अकबर के कुछ प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर न दे सके। वास्तव में उनका ओछा वितंडावाद, जिसका स्पष्ट चित्र बदायूंनी देता है, उसकी जिज्ञासु आत्मा को सन्तुष्ट करने में असफल रहे तथा उसे अन्यत्र सत्य की खोज करने को प्रवृत्त किया। अत: उसने इबादतखाना में विभिन्न धमाँ एवं मतों के बुद्धिमान् लोगों को बुलवाया, जिनमें मुख्यत: पुरुषोत्तमदेवी तथा कुछ अन्यों के समान हिन्दू दार्शनिक; कुछ जैन उपदेशक, जिनमें सबसे प्रसिद्ध थे हरि विजय सूरिविजय सेन सूरि तथा भानुचन्द्र उपाध्यायदस्तूर महायार जी राना जैसे पारसी पुरोहित और गोआ के ईसाई धर्म-प्रचारक। सम्राट् अकबर प्रत्येक धर्म के धर्माचार्यो की बाते ध्यान से सुनता था। उसे हृदयंगम करता था, उस पर मनन-चिन्तन करता था और जो बात उसे प्रिय और तर्कसंगत प्रतीत होती थी, उसे स्वीकार कर उसके अनुसार आचरण करने का प्रयास करता था। परिणामत: उसकी धार्मिक मान्यताओं में इस्लाम, हिन्दू धर्म, जैन मत, ईसाई तथा पारसी अथवा जरथुष्ट्र की अनेक धार्मिक मान्यताओं का समावेश था। इससे कुछ धर्माचार्यो को यह भ्रम हो गया था कि सम्राट् ने उनके धर्म को अंगीकार कर लिया है। परन्तु वस्तुत: ऐसा नहीं था। उसने किसी धर्म-विशेष को अंगीकार नहीं किया किन्तु विभिन्न धर्मो के सार को स्वीकार कर, उसने उनका समन्वय और सामञ्जस्य का एक समन्वित रूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया। दीन-ए-इलाही (1582 ई.) इसी प्रयास का एक प्रतिफल था। जैसा कि जेसुइट लेखक वारटोली ने लिखा है- यह (दीन इलाई) विभिन्न तत्वों का सम्मिश्रण था जो अंशत: मुहम्मद की कुरान और ब्राह्मणों के धर्मग्रन्थों तथा एक सीमा तक (जहाँ तक उसके उद्देश्य के अनुकूल था) ईसा मसीह की इन्ज़ील से लिए गए थे। इस प्रकार अकबर का दीन-ए-इलाही अकबर धार्मिक सहिष्णुता और उदार लोकेश्वरवाद का प्रतीक था जिसमें विभिन्न धमों के अच्छे सिद्धान्तों का समावेश था जो इस बात का संकेत देता है कि अकबर का उद्देश्य एक ऐसे राष्ट्रीय धर्म का प्रवर्त्तन करना था जिसे हिन्दू और मुसलमान दोनों स्वीकार कर सकें। यह एक प्रकार से एकेश्वरवाद (तवाहीद-ए-इलाही) पर आधारित सार्वजनीन सहिष्णुता (सुलह-ए-कुल) का सन्देशवाहक था। सम्राट् अकबर ने दीन-ए-इलाही की स्थापना अवश्य की किन्तु उसे किसी पर जबरन थोपने का प्रयास नहीं किया, उसने बलात् धर्म-परिवर्तन का (जो भय या धन के प्रलोभन पर आधारित होता) का कोई प्रयास नहीँ किया। कई इतिहासकारों ने सम्राट् अकबर की धार्मिक नीति की कटु आलोचना की है। इतिहासकार विसेंट स्मिथ ने लिखा कि अकबर की दीन-ए-इलाही उसकी मूर्खता की स्मारक (मानूमेण्ट ऑफ हिज फाली) थी। किन्तु अनेक इतिहासकार स्मिथ के विचारों से सहमत नहीं हैं। वस्तुतः अकबर धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु और दूरदर्शी शासक था। वह यह भलीभाँति जानता था कि मुग़ल साम्राज्य के स्थायित्व के लिए धार्मिक सहिष्णुता नितान्त आवश्यक है। साथ ही देश में शान्ति-व्यवस्था की स्थापना की दृष्टि से भी इसकी आवश्यकता है। यद्यपि दीन-ए-इलाही के अनुयायियों की संख्या नगण्य थी और एक प्रकार से अकबर की मृत्यु के साथ ही इसका भी अंत हो गया। किन्तु दीन-ए-इलाही में धार्मिक सहिष्णुता का जो प्रच्छन्न सन्देश समाहित है, उसके औचित्य पर प्रश्न-चिह्न नहीं लगाए जा सकते है। जैसा कि इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है जिन उदारविचारों के कारण अकबर ने यह कार्य किया, उसका प्रभाव परस्पर संघर्षरत विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों वाले देश पर बहुत दिनों तक रहा।

यद्यपि अब्दुल कादिर बदायूंनी जैसे इतिहासकार ने अकबर की धार्मिक मान्यताओं को इस्लाम धर्म विरोधी या नास्तिकतापरक बताया है। किन्तु इस प्रकार के विचार पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। अकबर न तो इस्लाम विरोधी था न नास्तिक। वह एक धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु, प्रबुद्ध और दूरदर्शी सम्राट् था। उसे नास्तिक कहना उसके प्रति अन्याय करना होगा। जैसा कि उसके पुत्र जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुजके जहाँगीरी में लिखा है कि- उसके पिता का ईश्वर में प्रतिपल विश्वास बना रहता था।  यह सत्य है कि हिन्दू धर्म, जैन धर्म, जरथ्रुष्ट ईसाई धर्म से प्रभावित उसने कई ऐसे फरमान जारी किए जो कट्टरपंथियों दृष्टि से अनुचित थे किन्तु उसका उद्देश्य हिन्दुस्तान में शान्ति-व्यवस्था स्थापित करते हुए देश की रक्षा और व्यवस्था में विभिन्न धर्म और मतावलम्बियों का सहयोग प्राप्त करना था। साथ ही, उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति भी थी जिसने उसे विभिन्न धर्मो की सारभूत सामग्री और मूलतत्वों को जानने के लिए उत्प्रेरित किया था। इतिहासकार बदायूनी तथा जेसुइट पादरियों ने अकबर पर यह आरोप लगाया है कि अपने शासन-काल के परवर्ती काल-खण्ड में उसने अपने मूल धर्म अर्थात इस्लाम धर्म का परित्याग कर दिया था। इस आरोप में आंशिक सच्चाई है क्योंकि शासन के अन्तिम वर्षों में अकबर ने कुछ ऐसे आदेश जारी थे जो इस्लाम धर्म से संगत नहीं बैठते थे। परन्तु इसके पीछे उसका उद्देश्य उन उलेमाओं के अनुचित प्रभाव पर अंकुश लगाना था जो मध्ययुगीन यूरोप के भाँति लोगों की आज्ञाकारिता पर समानान्तर दावा करते थे और अपने धार्मिक पदाधिकारी (इमामें आदिल) के रूप में प्रतिष्ठापित कर को सशक्त करने के लिए प्रयत्नशील थे। इसी प्रयोजन से उसने ऐसे कार्य किए जिनमें कट्टरपंथी उलेमाओं ने उसे इस्लाम विरोधी ठहराने प्रयास किया। जून, 1579 ई. में सीकरी के प्रधान उपदेशक को हटा दिया अपने नाम में खुतवा पढ़ा और सितम्बर, 1579 ई. में उसने तथाकथित अमोघत्व आदेश जारी किया, जिसने उसे धर्म के मामलों में सर्वोच्च पंच बना दिया। इससे उलेमाओं एवं उनके समर्थकों को अपार क्रोध हुआ होगा, पर अकबर निर्भय रहा। वह आध्यात्मिक उपलब्धियों के बिना राष्ट्र का आध्यात्मिक नेतृत्व धारण नहीं करना चाहता था।.....आदि से अन्त तक फतेहपुर सीकरी में धर्मोपदेशक के उच्च आसन पर चढ़ने के समय से लेकर दीने-इलाही की घोषणा तक अकबर परम सच्चा था। ऐसी तर्कसंगत एवं उदार भावनाओं वाले पुरुष की पर-धमों से घृणा करने वाले अथवा उनमें से किसी के शत्रु के रूप में निन्दा करना अनुचित है। उसने कुरान की प्रभुता को कभी अस्वीकार नहीं किया-यहाँ तक कि तथाकथित अमोघत्व-आदेश में भी नहीं। उसका आदर्श था विभिन्न धमों में जो वह सर्वोपरि समझता था उन सबका श्रेष्ठ समन्वय-एक ऐसा आदर्श जो सारतः राष्ट्रीय था, जिसके लिए वह पीछे के लोगों की कृतज्ञता का उचित रूप में अधिकारी है।

दीन-ए-इलाही के सिद्धांत- अकबर ने सभी धर्मो का तुलनात्मक अध्ययन कर दीन-ए-इलाही या तकहीद-ए-इलाही अथवा दैवी एकेश्वरवाद (डिवाइन मोनोथीज़्म) नामक एक धर्म की स्थापना की। इस धर्म के मुख्य सिद्धान्त निम्नांकित थे-

  1. यह धर्म ईश्वर की एकता में विश्वास करता था।
  2. एक-दूसरे का अभिवादन करते समय इस धर्म के सदस्य अल्ला-हु-अकबर तथा जल्ला जलालुह शब्दों का प्रयोग करते थे।
  3. इस धर्म के अनुयायियों के लिए मांस भक्षण वर्जित था।
  4. इस धर्म के अनुयायियों को अपने जन्म दिवस पर एक दावत देना आवश्यक था।
  5. इस धर्म के अनुयायियों को मछुआरों या शिकारियों के साथ भोजन करना वर्जित था।
  6. इस धर्म के अनुयायियों को अपने जीवन-काल में ही श्राद्ध देना आवश्यक था।
  7. इज्जत, समान धर्म, सम्पत्ति और सम्राट् के प्रति स्वामिभक्ति इस धर्म के अनुयायियों के चार आदर्श थे।
  8. सूर्य के लिए सम्मान तथा अग्नि पूजा इस धर्म में मान्य थे।

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