राष्ट्रवादी विदेश नीति का विकास Development of Nationalist Foreign Policy

राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों पर पश्चात्य प्रभावों का महत्वपूर्ण एवं अवश्यंभावी परिणाम यह था कि वे अपने हितों को इसमें तलाशने लगे तथा वे तत्कालीन प्रभावी अंतरराष्ट्रीय विचारों एवं गतिविधियों से अवगत हुये। धीरे-धीरे राष्ट्रवादी चिंतक यह महसूस करने लगे कि उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद एक अंतरराष्ट्रीय चरित्र का शासन है तथा इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। तदुपरांत साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवादी विचारधारा के उदय एवं विकास के फलस्वरूप राष्ट्रवादी विदेश नीति का दृष्टिकोण निर्मित हुआ। इस नीति के विकास की प्रक्रिया को हम निम्नलिखित अर्थों में देख सकते हैं।

1880 से प्रथम विश्व युद्ध तक

साम्राज्यवाद विरोधी एवं एशिया समर्थक भावनायें

1878 के पश्चात, अंग्रेजों ने अनेक विस्तारवादी अभियान किये, जिनका राष्ट्रवादियों ने तीव्र विरोध किया। इन अभियानों में सम्मिलित थे-

  • द्वितीय अफगान युद्ध (1878-80)।
  • 1882 में इंग्लैण्ड द्वारा मिश्र में कर्नल अराबी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिये सेनायें भेजना।
  • 1885 में बर्मा का कम्पनी साम्राज्य में विलय।
  • 1890 के दशक में रूस के प्रसार को रोकने के लिये उत्तर-पश्चिम में किये गये विभिन्न प्रयास।

राष्ट्रवादियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध जनजातीय कबीलों द्वारा किये गये प्रतिरोध का समर्थन किया। राष्ट्रवादियों ने उग्र-साम्राज्यवाद के स्थान पर शांति की नीति अपनाये जाने की वकालत की। 1897 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सी.शंकरन नायर ने कहा “हमारी वास्तविक नीति शांति की नीति है।”

इस प्रकार 1880-1914 के दौरान उभरती विचारधारा थी-

  1. उपनिवेशवादी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे राष्ट्रों से घनिष्ठता। जैसे-रूस, आयरलैंड, मिश्र, तुर्की, इथियोपिया, सूडान, बर्मा एवं अफगानिस्तान।
  2. एशिया समर्थक भावनायें परिलक्षित हुयीं-
  • 1885 में बर्मा के अधिग्रहण की भर्त्सना।
  • जापान के औद्योगिक विकास के उदाहरण से प्रेरणा।
  • आई-ही-त्वान आंदोलन के दमन के लिये 1895 में जापान का विभाजन किये जाने की भर्त्सना।
  • चीन की विभाजित करने के साम्राज्यवादी प्रयासों की निंदा।
  • जापान द्वारा जारशाही रूस की पराजय- इसने यूरोपीय अजेयता के मिथक को तोड़ दिया।
  • कांग्रेस द्वारा बर्मा की स्वतंत्रता का समर्थन।

प्रथम विश्व युद्ध

राष्ट्रवादियों ने युद्ध में इस उम्मीद के साथ ब्रिटेन का समर्थन किया कि वह युद्ध के उपरांत भारत में भी लोकतंत्र के उन सिद्धांतों को लागू करेगा, जिसके लिये वे संघर्षरत थे। युद्ध की समाप्ति के पश्चात कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावित शांति सम्मेलन में उसे भी प्रतिनिधित्व दिया जाये। 1920 में कांग्रेस ने भारतीयों से अपील की कि वे पश्चिम में लड़ने हेतु जाने वाली सेनाओं में सम्मिलित न हों। 1925 में, कांग्रेस ने सन-यात-सेन के नेतृत्व में चल रहे चीन के राष्ट्रवादी आंदोलन के दमन हेतु भारतीय सेना को भेजे जाने की कड़ी आलोचना की।

1920 एवं 1930 के दशक में-समाजवादियों के साथ समीकरण स्थापित करना

1926-1927 में, जवाहरलाल नेहरू यूरोप में थे, जहां उन्होंने समाजवादियों एवं अन्य वामपंथी नेताओं से सम्पर्क स्थापित किया। इससे पहले दादा भाई नौरोजी ने समाजवादी कांग्रेस के हेग सम्मेलन में भाग लिया। नौरोजी, विश्व प्रसिद्ध समाजवादी एच.एम. हाइन्डमैन के घनिष्ठ मित्र थे। लाला लाजपत राय ने भी 1914 से 1918 के दौरान अपनी अमेरिका यात्रा के समय अमेरिका के समाजवादियों से गहन सम्पर्क स्थापित किया। गांधीजी के भी टाल्सटॉय एवं रोलैंड रोंमा से घनिष्ठ संबंध थे।

1927 में, जवाहरलाल नेहरू पीड़ित राष्ट्रवादियों के ब्रुसेल्स में आयोजित सम्मेलन में शामिल हुये तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया। इस सम्मेलन आयोजन एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमरीकी देशों के राजनितिक निर्वासन की सजा झेल रहे राष्ट्रवादियों एवं क्रांतिकारियों ने किया था। ये राष्ट्रवादी, राजनीतिक एवं आर्थिक साम्राज्यवाद के चंगुल में जकड़े हुये थे। इस सम्मेलन में जवाहरलाल- अल्बर्ट आइन्स्टीन, श्रीमती सं-यात-सेन, रोलैंड रोमां एवं जॉर्ज लैंसबरी साथ अध्यक्ष चुने गये। नेहरू, अपने यूरोप प्रवास के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंतराष्ट्रीय चरित्र से परिचित हुये। नेहरू लीग की साम्राज्यवाद विरोधी कार्यकारिणी के लिये भी मनोनीत किये गये। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने विश्व के अन्य भागों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों से सम्पर्क बनाये रखने के लिये “विदेश विभाग' की स्थापना की। 1927 में जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ की यात्रा की तथा इस समाजवादी राष्ट्र की उपलब्धियों से वे अत्यंत प्रभावित हुये। उन्होंने रूस को साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक विशाल ताकत के रूप में देखा।

1936 के पश्चात- फासीवाद विरोधी रवैया

1930 का दशक, यूरोप में फासीवाद के उदय एवं इसके विरुद्ध संघर्ष का काल था। राष्ट्रवादियों ने निष्कर्ष निकाला कि साम्राज्यवाद एवं फासीवाद-पूंजीवाद के ही दो अंग हैं। राष्ट्रवादियों ने विश्व के विभिन्न भागों यथा- इथियोपिया, स्पेन, चीन तथा चेकोस्लोवाकिया में चल रहे फासीवाद विरोधी आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया। 1939 में अपने त्रिपुरी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन की फासीवाद समर्थक नीति से खुद को पृथक घोषित कर दिया।

1939 में, राष्ट्रवादियों ने जापान द्वारा चीन पर किये गये आक्रमण को निंदनीय बताया। कांग्रेस ने डॉ. एम. अटल के नेतृत्व में एक चिकित्सा मिशन भी चीनी सशस्त्र सेनाओं की सहायता के लिये, चीन भेजा।

फिलिस्तीन के मुद्दे पर कांग्रेस ने फिलिस्तीनियों का समर्थन किया। यद्यपि उसने यहूदियों के प्रति भी सहानुभूति जताई किंतु मांग की कि फिलिस्तीनियों को उनके स्थानों से विस्थापित न किया जाये तथा इस मुद्दे को फिलिस्तीनी एवं अरब आपस में द्विपक्षीय सहयोग द्वारा हल करें तथा पश्चिम को इस मसले पर हस्तक्षेप न करने दें। कांग्रेस ने फिलिस्तीन के विभाजन का भी विरोध किया।

स्वतंत्रता के उपरांत

स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने तत्कालीन शीत युद्ध तथा विश्वव्यापी गुटबंदी से दूर रहते हुये अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाई। उसकी विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति पर आधारित थी तथा शीघ्र ही भारत विश्व के राष्ट्रों के मध्य गुट-निरपेक्षता की नीति का अगुआ बन गया।

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