चोल साम्राज्य में सांस्कृतिक जीवन Cultural Life in the Chola Empire

समाज में जातिप्रथा प्रचलित थी। ब्राह्मणों का समाज में आदर था और वे सादा जीवन बिताते थे। ब्राह्मणों की अलग बस्ती थी। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के कारण कुछ मिश्रित जातियां बन गई थीं।

समाज में नारी का उच्च स्थान था। राजपरिवारों एवं सामन्तों की अनेक पत्नियां होती थीं, परन्तु साधारण लोग एक पत्नीव्रत होते थे। सतीप्रथा प्रचलित थी। मन्दिरों में देवदासियां होती थीं और वे नृत्य द्वारा देवता को प्रसन्न करती थीं। शैव और वैष्णव मतों का अधिक प्रचार था। चोल राजा शैव मत के अनुयायी थे। धार्मिक जीवन में मन्दिरों का विशेष स्थान था। इसके अतिरिक्त मन्दिर, बैंक, विद्यालय और औषधालय का कार्य भी करते थे। मन्दिरों के निर्माण द्वारा अनेक लोगों की जीविका चलती थी। मन्दिर सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र थे-जैसे नाटक, कथा, नृत्य इत्यादि।

इस काल में कला को बडा प्रोत्साहन मिला। चोल राजाओं ने अनेक मन्दिरों और जलाशयों का निर्माण कराया। राजराज महान् ने तंजोर में राजराजेश्वर मन्दिर का निर्माण कराया। इस मन्दिर का निर्माण 1003 ई. में शुरू होकर 1010 ई. में पूर्ण हुआ। राजेन्द्र चोल ने 1025 ई. में अपनी राजधानी गंगई कोण्ड-चोलपुरम् में एक विशाल मन्दिर बनवाया। यहीं पर राजेन्द्र चोल ने एक विशाल झील खुदवाई और इस झील पर जो बाँध बंधवाया, उसकी लम्बाई 16 मील थी। इस काल में अनेक सुन्दर कांस्य-प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। नटराज की विशाल और भव्य मूर्तियों का निर्माण कलाकारों ने किया।

इस काल में साहित्य के क्षेत्र में भी प्रगति हुई। यह काल तमिल संस्कृति का स्वर्णयुग कहलाता है। प्रसिद्ध विद्वान् निरूत्कदंवर ने तमिल महाकाव्य जीवक चिन्तामणि की रचना इसी समय हुई। जैन लेखक तोलामुक्ति ने शूलमणि नामक ग्रन्थ लिखा। कुलोत्तुंग तृतीय के काल में कम्बन ने रामावतारम् नामक काव्य की रचना की जिसकी कथावस्तु वाल्मीकि रामायण से ली गई है। बौद्ध विद्वान् बुद्धमित्र ने ग्यारहवीं शताब्दी में सोलियम नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। इसी प्रकार जैन विद्वान् पवनान्दि ने नन्तमूले नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। सेक्लिर कृत पेरियापुराणम् भी इसी काल की रचना है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यह काल सांस्कृतिक उपलब्धियों की दृष्टि से एक सृजनशील युग था जिसमें स्थापत्य कला और मूर्तिकला का विकास हुआ। साहित्य की प्रगति के कारण यह युग तमिल साहित्य का स्वर्णयुग कहलाया। चोलों ने सुदूर दक्षिण के एक बड़े भाग को जीतकर राजनैतिक एकीकरण एवं कुशल प्रशासन प्रदान किया जिसकी प्रमुख विशेषता स्थानीय स्वशासन थी।

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