अशक्तजनों के अधिकारों पर अभिसमय Convention on The Rights of Persons With Disabilities

विकलांगों के अधिकारों पर अभिसमय संयुक्त राष्ट्र संघ के हाथ में विकलांग लोगों के अधिकारों एवं गरिमा के संरक्षण एवं रक्षा हेतु एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार यंत्र प्रदान करता है।

संयुक्त राष्ट्र का 1980 का दशक अशक्तजन दशक था। 1987 में, विद्वानों की वैश्विक बैठक ने प्रगति की समीक्षा की और अनुशंसा की कि संयुक्त राष्ट्र महासभा को अशक्तजनों के विरुद्ध भेदभाव के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय अभिसमय तैयार करना चाहिए। ड्राफ्ट अभिसमय की रूपरेखा इटली द्वारा प्रस्तावित की गई और उसके पश्चात् स्वीडन ने ऐसा किया, लेकिन किसी प्रकार की सहमति पर नहीं पहुंचा जा सका। कई सरकारी प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि मौजूदा मानवाधिकार दस्तावेज पर्याप्त थे। इसके बावजूद, वर्ष 1998 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने गैर-अपरिहार्य स्टैण्डर्ड रूल्स ऑन द इक्वलाइजेशन ऑफ अपार्चयुनिटीज फॉर पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज (The Standard Rules on the Equalization of Opportunities for Persons with Disabilities) को अपनाया। वर्ष 2000 में, पांच अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों के नेताओं ने अभिसमय का सभी सरकारों द्वारा समर्थन करने का आह्मान करने के लिए बीजिंग घोषणा जारी की।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अभिसमय पर बातचीत करने के लिए 2001 में एक तदर्थ समिति की स्थापना की। पहली बैठक अगस्त 2002 में आयोजित की गई और मसौदे बनाने का कार्य मई 2004 में शुरू किया गया। तदर्थ समिति के प्रतिनिधिमण्डल में एनजीओ, सरकारें, राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थान और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का प्रतिनिधित्व होता है।

यह पहला समय था कि जब एनजीओ ने मानवाधिकार यंत्र के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाई।

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मसौदे को 13 दिसंबर, 2006 को स्वीकार किया गया और 30 मार्च, 2007 को हस्ताक्षर के लिए रखा गया। 20 पक्षों द्वारा इसकी पुष्टि के बाद 3 मई, 2008 को यह प्रवृत हो गई। वर्तमान में (2014 के अनुसार) इसके 145 हस्ताक्षरकर्ता और 87 पक्ष हैं। अभिसमय की निगरानी अशक्तजन अधिकारों संबंधी समिति द्वारा की जाती है।

अभिसमय का उद्देश्य अशक्त जनों के अधिकारों का संवर्द्धन, संरक्षण एवं उनके सभी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आवास एवं पुनर्वास, राजनीतिक जीवन में सहभागिता, और समानता तथा भेदभाव रहित व्यवहार जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्र इस अभिसमय में शामिल हैं।

यह अभिसमय किसी नए अधिकार या स्वामित्व का सृजन नहीं करता अपितु मौजूदा अधिकारों को इस तरीके से संबोधित करता है जिससे अशक्तजनों की आवश्यकताओं एवं दशाओं की सटीक अभिव्यक्ति हो सके। अभिसमय के अनुच्छेद 4-32 अशक्तजनों के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और राज्यों के उनके प्रति दायित्व की प्रकट करते हैं। इनमें से अधिकतर अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र के अन्य अभिसमयों में पुष्टि हुई है। गौरतलब है कि अभिसमय में कुल 50 अनुच्छेद हैं।

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