संसद का गठन Constitution of Parliament

राज्यसभा

राज्यसभा अपने नाम के अनुरूप राज्यों की परिषद है। यह अप्रत्यक्ष रूप से जनता का प्रतिनिधित्व करती है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा के सदस्यों की कुल संख्या 250 निश्चित की गई है। इनमें से 238 सदस्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों की संख्या संविधान की चौथी अनुसूची में अंकित की गई है। संविधान के अनुच्छेद 80(4) के अनुसार, राज्यों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन सम्बंधित राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। यह निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल वैकल्पिक मत द्वारा किया जाता है। जो व्यक्ति राज्यसभा का चुनाव लड़ना चाहता है उसका नाम विधानसभा के कम-से-कम 10 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित होना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 80(5) के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि संसद द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार मनोनीत अथवा निर्वाचित किये जाते हैं। राष्ट्रपति उन 12 व्यक्तियों को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करता है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो। वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं, जिनमें 233 सदस्य राज्यों एवं संघशासित प्रदेशों से निर्वाचित तथा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं।

राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर निश्चित किया जाता है। जिस राज्य की जनसंख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है, उस राज्य की अन्य राज्यों की अपेक्षा प्रतिनिधित्व भी अधिक दिया जाता है। उदाहरण के लिए, हरियाणा 5 प्रतिनिधि राज्यसभा में भेज सकता है जबकि अकेले उत्तर प्रदेश की 31 प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया है। राज्यसभा का पहली बार गठन 1952 में किया गया था ।

राज्यसभा के गठन में चार सिद्धांत निहित हैं- अर्ध संघीय, प्रतिनिधित्व सिद्धांत, संयुक्त पुनर्विचार और नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत तथा प्रख्यात और विशिष्ट व्यक्तियों को भारतीय राज-व्यवस्था से सम्बद्ध करने का सिद्धांत। राज्यसभा के गठन का निकट से अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यद्यपि इसके निर्वाचन की प्रक्रिया भिन्न है तथापि यह लोकसभा से मूलतः भिन्न नहीं है।

राज्यसभा की प्रासंगिकता

आम चुनाव में जीतने वाली पार्टी लोकसभा में अपना बहुमत रखती है, किंतु राज्यसभा में ऐसा होना जरूरी नहीं होता। बहुमत प्राप्त विजयी दल का उल्लास तब ठंडा पड़ जाता है, जब कोई मामला या विधेयक राज्यसभा में अटक जाता है, जहां उसे बहुमत हासिल नहीं होता।

आलोचकों का मत है कि राज्यसभा वर्तमान यथार्थ की प्रतिबिंबित नहीं करती है तथा अनेक मामलों में जनादेश की अवहेलना करती है। उदाहरण के लिए, 1977 में जनता पार्टी सरकार को, 42वें संविधान संशोधन को निरस्त करने के, अपने चुनावी वायदे को पूरा करने में राज्यसभा के कारण अनेक कठिनाइयां उठानी पड़ीं। यह संशोधन आपातकाल के दौरान पारित किया गया था और इसी के विरोध में जन्मी प्रतिक्रिया के कारण जनता पार्टी को व्यापक जनादेश प्राप्त हुआ था।

संविधान निर्माताओं द्वारा राज्यसभा की निम्नलिखित भूमिकाओं को प्रकट किया गया था-

  1. संघीय स्तर पर विधायी प्रक्रिया हेतु परिपक्व व वरिष्ठजनों (जो सक्रिय राजनीति की उठा-पटक या लोकसभा चुनावों की खुली प्रतिस्पर्द्धा में भाग लेने के इच्छुक नहीं होते) की सलाह व मार्ग-दर्शन को सुरक्षित रखना।
  2. राज्यों को संसदीय स्तर पर, अपने दृष्टिकोणों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने हेतु समर्थ बनाना।
  3. संसदीय विधायन के अंतर्गत कुछ हद तक नीतियों की निरंतरता को सुनिश्चित करना।
  4. संसद के एक सदन के रूप में कार्य करना, जो न्यूनाधिक रूप में लोकसभा के साथ सहयोग करता है ताकि त्वरित प्रस्तावों पर दोनों सदनों के बीच पैदा किसी संघर्ष से बचने के रक्षोपाय खोजे जा सकें और विधायन कार्य सुगमतापूर्वक हो सके।

राज्यसभा के सदस्य (राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्यों को छोड़कर) राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। मनोनीत सदस्य विशिष्ट ज्ञान एवं व्यावहारिक अनुभव (साहित्य, विज्ञान, कला एवं समाज सेवा के क्षेत्र में) रखने वाले व्यक्ति होते हैं (अनुच्छेद 80)। राजनीतिक चालों से विलग तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले राज्यसभा के सदस्यों से सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि वे विभिन्न विधायी मानदंडों पर शांतिपूर्वक विचार-विमर्श करेंगे तथा राज्यसभा में वाद-विवाद की महत्ता पर निरंतर बल देते रहेंगे। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) में निर्दिष्ट किया गया है कि, किसी भी ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य के प्रतिनिधि अथवा राज्यों की परिषद के सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता, जो उस राज्य के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता नहीं है।  जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम का भाग-3 स्पष्ट करता है कि राज्यसभा का कोई सदस्य मात्र उसी राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिसका वह निवासी है। वर्ष 2003 में संसद ने जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर, राज्यसभा सदस्य के लिए उस राज्य विशेष के अधिवास की अपरिहार्यता को समाप्त कर दिया एवं साथ ही राज्यसभा के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था की भी समाप्त कर दिया। इस संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अगस्त 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में इस संशोधन की वैधता को स्वीकार किया। जबकि भाग-4 के अनुसार लोकसभा हेतु चुना जाने वाला प्रतिनिधि देश के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता हो सकता है।

राज्यों की भागीदारी

प्रत्येक राज्य की विधान सभा से राज्यसभा की होने वाला निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत आधारित आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के माध्यम से सम्पन्न होता है [अनुच्छेद 80(4)]। संविधान निर्माताओं का निर्णय था कि राज्यसभा की शक्ति राज्यों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में वितरित होगी। उस समय स्वीकृत मापदंड के अनुसार एक राज्य की 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि होगा तथा 50 लाख से ऊपर जाने पर प्रति 20 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि राज्यसभा में भेजा जायेगा। इसी मापदंड के अनुसार विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 1 से 34 के बीच में है। इस प्रावधान द्वारा यह आशा की गई थी कि यह प्रत्येक राज्य में उन अल्पसंख्यकों के निष्पक्ष प्रतिनिधित्व को संभव बनायेगा, जो बहुमत से भिन्न विचार रखते हैं। इसीलिए राज्यसभा राज्य विधान सभाओं से चुनी गयी पार्टियों के विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रतिनिधिक अंश का प्रतिनिधित्व करती है तथा संसदीय स्तर पर राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने का उपकरण बन जाती है।

यह उल्लेखनीय है की संविधान सभा द्वारा इस विचार को अस्वीकृत कर दिया गया था कि राज्यसभा में प्रत्येक राज्य से पांच सदस्य (व्यस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित) भेजे जाने चाहिए। राज्यसभा में सभी राज्यों के समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत इसलिए स्वीकार नहीं किया गया था कि संविधान के निर्माण से पहले भारतीय संघ के राज्य स्वतंत्र सत्ताओं के रूप में (अमेरिका की भांति) नहीं थे। दूसरा कारण भारतीय संघ के राज्यों की विशाल जनसंख्या एवं विस्तृत भू-भाग का होना था।

संविधान निर्माताओं ने राज्य सभा को एक स्थायी सदन के रूप में स्थापित किया है, जिसका विघटन नहीं किया जा सकता। राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष बाद सेवामुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था करने का उद्देश्य सार्वजनिक नीतियों की निरंतरता कायम रखने के अलावा पुराने एवं नये मतों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखना है।

क्या राज्यसभा विधान में बाधक है?

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार धन विधेयक के मामले में निम्न सदन (लोकसभा) का विचार मान्य होगा। धन विधेयकों के संबंध में राज्यसभा द्वारा सुझाये गये संशोधनों को मानना या न मानना लोकसभा पर निर्भर है (अनुच्छेद-109)। साथ ही धन विधेयकों या वित्तीय विधेयकों को राज्यसभा द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 109 एवं 117)। अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाला विचार-विमर्श एवं निर्णय केवल लोकसभा में ही होता है।

अन्य सभी विधेयकों के मामले में दोनों सदनों की शक्तियां लगभग समान हैं। गतिरोध की स्थिति को संयुक्त बैठक के माध्यम से दूर किया जाता है (अनुच्छेद-108), हालांकि इन संयुक्त बैठकों में लोकसभा का मत ही प्रभावी रहता है, क्योंकि इसके सदस्यों की संख्या (545) राज्यसभा के सदस्यों की संख्या (250) से अधिक होती है। किंतु, विरोधी दलों के पर्याप्त बहुमत की स्थिति में राज्यसभा विधेयक की विषय-वस्तु में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सकती है। पिछले दो दशकों से अनेक राज्यों में केंद्रीय सत्तारूढ़ दल से भिन्न दलों की सरकारें मौजूद रहीं हैं। इन भिन्न दलों या उनके समूहों द्वारा कुछ निश्चित राज्यों में बहुमत प्राप्त कर लिया जाता हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्यसभा में इनकी शक्ति काफी बढ़ जाती है। यही कारण है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सीटों का प्रतिशत राज्यसभा में, लोकसभा की तुलना में, कम होता है। वास्तव में कई अवसरों पर सत्तारूढ़ दल राज्यसभा में किसी संशोधन विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई मत जुटाने में असमर्थ रहता है। उदाहरणस्वरूप, 1977 एवं 1978 में प्रस्तुत क्रमशः 43वें एवं 44वें संविधान संशोधन विधेयकों का सत्तारूढ़ दल (लोकसभा में बहुमत प्राप्त) तथा मुख्य विपक्षी दल (राज्यसभा में बहुमत प्राप्त) के बीच हुए वृहद् समझौते के अभाव में पारित होना असंभव ही था।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि कड़े विरोध की दशा में राज्यसभा की स्थिति राज्यों की विधान परिषदों की तुलना में पूर्णतः भिन्न है। संसद के दोनों सदनों के बीच पैदा गतिरोध को हटाने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी जाती है जिसमें उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा अंतिम निर्णय किया जाता है। दूसरी ओर राज्य विधान सभा द्वारा दूसरी बार पारित विधेयक को स्वतः ही विधान परिषद द्वारा पारित मान लिया जाता है (अनुच्छेद-197)। साथ ही संसद की अनुमति से विधान सभाएं अपने दो-तिहाई बहुमत तथा कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार विधान परिषद का अवसान कर सकती है। इसके लिए संवैधानिक संशोधन जैसे कानून की आवश्यकता नहीं होती है (अनुच्छेद-169)।

क्या राज्यसभा वास्तव में राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है?

राज्यसभा मात्र द्वितीयक विचारों का सदन नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों की संरक्षक भी है। अनुच्छेद-249 संसद को राज्य-सूची में शामिल विषयों के संबंध में विधि निर्माण की शक्ति प्रदान करता है, यदि राज्यसभा द्वारा इस आशय का प्रस्ताव (राष्ट्रीय हित में आवश्यक या उचित मानकर) उपस्थित या मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के साथ पारित किया गया है। इस प्रावधान पर विचार-विमर्श के दौरान संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णामचारी दो आधारों पर इससे असहमत थे-

  1. इस विशिष्ट प्रावधान के उल्लंघन की संभावना, तथा;
  2. सभी संघों में केंद्रीय शक्ति संचय की सार्वभौमिक प्रवृति।

उक्त असहमतियों के बावजूद इस प्रावधान को स्वीकार करने का कारण यह था कि संविधान सभा द्वारा राज्यसभा को अनुच्छेद-249 के उल्लंघन का एक विश्वसनीय रोधक मान लिया गया था। जैसा कि कृष्णामचारी द्वारा उद्धृत किया गया है कि केंद्र को राज्यसभा द्वारा अधिकृत किया जायेगा, जिसमें सभी राज्यों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होता है। राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से संसद को विधि निर्माण का अधिकार देना, यह संकेत देता है की राज्य केंद्र द्वारा ग्रहण की गई शक्ति से सहमत है। इससे इस मान्यता की पुष्टि हो जाती है कि राज्यसभा राज्यों की प्रतिनिधि है तथा उनके सामूहिक विचारों को अभिव्यक्त करती है।

यद्यपि सिद्धांत में, अनुच्छेद-249 के अधीन राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव राज्य विधान सभाओं और उनकी सरकारों के दृष्टिकोणों या सहमतियों को प्रतिबिंबित करता है किंतु व्यावहारिक रूप में सदैव ऐसा नहीं होता। अनेक उदाहरणों से पता चलता है कि कई बार राज्यसभा में प्रस्ताव का समर्थन करने वाले बहुमत दल का दृष्टिकोण राज्य सरकारों कको चलने वाले एवं राज्य विधान सभाओं में बहुमत प्राप्त करने वाले दलों से सीधा विरोध रखता है।

इस बात की भी संभावना मौजूद रहती है कि कुछ बड़े राज्य प्रस्ताव या विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की क्षमता रखते हों, जबकि छोटे राज्यों की एक बड़ी संख्या प्रस्ताव के विरुद्ध हो। 1986 में राज्यसभा द्वारा अनुच्छेद 249 के अधीन प्रस्ताव लाने पर कई बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों का मत एक दल या अन्य दलों अथवा छोटे राज्यों में सरकार चलाने वाले दलों द्वारा अप्रभावी बना दिया गया।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के निर्माण के दौरान कई राज्यों द्वारा दो सुझाव प्रस्तुत किये गये- प्रथम, प्रतिनिधित्व का नवीन मापदंड, तथा; दूसरा, राज्यसभा में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व। किंतु, आयोग द्वारा उक्त दोनों सुझाव रद्द कर दिये गये। आयोग का मानना था कि इनमें से कोई भी सुझाव बड़े राज्यों द्वारा कुचले जा रहे छोटे राज्यों के हितों या दृष्टिकोणों के बचाव हेतु अभेद्य सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने में समर्थ नहीं होगा। आयोग द्वारा कहा गया कि सुझाए गए उपचार बीमारी को अधिक गंभीर बना सकते हैं तथा राज्यसभा की मूल भूमिका पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं।

समस्या का मूल राज्यसभा की पुनर्रचना में निहित नहीं है बल्कि इस बात में है कि राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने वाले साधन के रूप में राज्यसभा की विशिष्ट भूमिका को किस प्रकार मजबूत किया जाए। सरकारिया आयोग के अनुसार, ऐसा राज्यसभा द्वारा अपनी आंतरिक कार्यवाही में प्रक्रियात्मक रक्षोपायों को अपनाकर किया जा सकता है। राज्यसभा अपने प्रक्रिया नियमों के द्वारा वास्तविक प्रतिनिधिक अंश की प्रतिबिंबित करने वाली एक विशेष समिति की स्थापना कर सकती है। यह समिति स्वतंत्र एवं खुले विचार-विमर्श द्वारा सदन में विभिन्न दलों के दृष्टिकोणों को सुनिश्चित कर सकती है तथा अनुच्छेद-249 या अनुच्छेद-312 के अधीन प्रस्तुत विधेयकों के बारे में पहले से ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि उक्त विधेयक मात्र सहमति के आधार पर ही पारित किये जायेंगे। यह प्रक्रियात्मक उपाय इन विशेष प्रस्तावों के दुरुपयोग संबंधी आशंकाओं को दूर करने में सफल होगा। यह कुछ बड़े राज्यों (जिनमें केंद्र में सत्तारूढ़ दल का ही शासन है) के व्यापक संख्यात्मक समर्थन के आधार पर केंद्र द्वारा हासिल विधि निर्माण शक्ति को छोटे राज्यों के हितों के प्रतिकूल होने से रोकेगा। यह राज्यसभा की इन विशिष्ट शक्तियों का प्रयोग सहकारी संघवाद के सिद्धांत के अनुकूल होना सुनिश्चित करेगा।

लोकसभा

दूसरा सदन लोकसभा है एवं इसका निर्वाचन जनता राज्यसभा के विपरीत वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से करती है। संविधान के

राज्य सभा चुनावों के लिए नए नियम

अक्टूबर 2003 में नई दिल्ली में सम्पन्न एक सर्वदलीय बैठक में जन-प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 के अंतर्गत राज्य सभा चुनावों के लिए नियमों एवं विनियमों का अनुमोदन किया गया। संशोधित अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार,

  1. प्रत्याशियों के लिए निवास संबंधी आवश्यकता का निवारण, तथा;
  2. गुप्त मतदान प्रणाली के स्थान पर खुली मतदान व्यवस्था का अंगीकरण किया गया।

नए नियमों एवं विनियमों के अनुसार, राज्य सभा चुनावों में मतदान जहां दो चरणों (Two Tier) में होगा वहीं विधायकों द्वारा मतदान दलगत निर्देशों के अनुसार करना होगा।

अनुच्छेद-81 के अनुसार लोकसभा में राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए 530 से अधिक तथा संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए ऐसी रीति से जो संसद विधि द्वारा उपबंधित करे, चुने गए 20 से अधिक सदस्य नहीं होगे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति अधिक-से-अधिक दो सदस्य नामजद कर सकता है (अनुच्छेद 331)। इस प्रकार, संविधान में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 निश्चित की गई है। अनुच्छेद 81(2) के अनुसार प्रत्येक राज्य की लोकसभा में स्थानों का आबंटन ऐसी रीति से किया जाएगा कि स्थानों की संख्या से उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासाध्य एक ही हो। हालांकि यह धारा लोकसभा में उन राज्यों की स्थान आवंटित करने के संदर्भ में लागू नहीं होती, जिनकी जनसंख्या 6 मिलियन से अधिक नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्य का विभिन्न क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन हेतु प्रत्येक निर्वाचन क्षत्र की जनसंख्या व उसे आबंटित सीटों के मध्य का अनुपात, जो भी अधिक व्यावहारिक व उचित हो, को अपनाना होगा।

82वें अनुच्छेद के अनुसार राज्यों को लोकसभा में सीटों का आबंटन तथा प्रत्येक राज्य की क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन की प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए। यह पुनर्निर्धारण संसद द्वारा निर्मित विधि के अनुरूप किया जाना चाहिए। इस प्रकार, अनुसूचित जातियों व् अनुसूचित जनजातियों के निर्वाचन क्षेत्रों तथा प्रत्येक राज्य में लोकसभा (व राज्य में विधान सभा में) हेतु निर्धारित सीटों की संख्या में परिवर्तन किए बिना निर्वाचन क्षेत्रों का युक्तीकरण व पुनर्समायोजन किया जाना चाहिए।

2002 के 84वें अधिनियम के अनुसार तथा 2003 के सतासीवें संशोधन अधिनियम के पश्चात्,

  1. लोकसभा में राज्यों की सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर रहेगा। महत्वपूर्ण है कि यह आधार वर्ष 2026 के बाद आई पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहेगा।
  2. प्रत्येक राज्य का क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन के पुनर्समायोजन हेतु 2001 के संगणकों को आधार माना जाएगा (84वां संविधान संशोधन 1991 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति प्रदान करता है, जबकि 2003 का 87वां संशोधन 2001 की जनगणना के आधार पर) ।

अवधि

राज्यसभा

संविधान के अनुच्छेद 83(1) के अनुसार, राज्यसभा एक स्थायी सदन है अर्थात् यह कभी भी विघटित नहीं होता। संसद द्वारा निर्मित कानून के अनुसार राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इन सेवानिवृत्त सदस्यों के स्थान पर नये सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इस प्रकार राज्यसभा के सभी सदस्य 6 वर्ष तक अपने पद पर बने रहते हैं।

लोकसभा

अनुच्छेद 88(2) के अंतर्गत सामान्यतः लोकसभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। यह अवधि समाप्त होते ही लोकसभा स्वयं भंग हो जाती है। राष्ट्रपति अवधि के पूर्व भी लोकसभा को भंग कर सकता है। परंतु ऐसा मंत्रिमंडल के परामर्श से ही किया जा सकता है। परंतु इस अवधि को, जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है तब, संसद विधि द्वारा, ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकेगी, जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं होगी एवं उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात् उसका विस्तार किसी भी दशा में छह माह की अवधि से अधिक नहीं होगा ।

योग्यताएं

अनुच्छेद 84 के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित तभी होगा, जब-

  1. वह भारत का नागरिक हो और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेता है या प्रतिज्ञान करता है और उस पर अपने हस्ताक्षर करता है।
  2. वह राज्यसभा में स्थान के लिए कम से कम 30 वर्ष की आयु का और लोकसभा में स्थान के लिए कम से कम 25 वर्ष की आयु का है, और;
  3. उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं हैं जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त निहित की जाएं।

संसद के अधिकारी

राज्यसभा

संसद के प्रत्येक सदन का अपना सभापतित्व करने वाला अधिकारी और सचिव तथा अन्य कर्मचारी होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 89 के अनुसार उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। राज्यसभा के सभापति को साधारणतया मत देने का अधिकार नहीं होता है क्योंकि वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है बल्कि उसे यह पद भारत का उप-राष्ट्रपति होने के कारण प्राप्त होता है। परंतु यदि किसी विषय पर पक्ष तथा विपक्ष में डाले गये मतों की गणना एक समान हो तो राज्यसभा के सभापति को निर्णायक मत डालने का अधिकार होता है। राज्यसभा का सभापति वे सभी कार्य करता है जो लोकसभा का अध्यक्ष करता है। अंतर इतना ही है कि लोकसभा अध्यक्ष को संविधान ने कुछ विशेष शक्तियां दी हैं। उदाहरण के लिए, धन विधेयक को प्रमाणित करना या दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन का पीठासीन अधिकारी होना। राज्यसभा अपने सदस्यों में से किसी एक सदस्य को उप-सभापति निर्वाचित करती है।

उल्लेखनीय है कि राज्यसभा के सभापति को वेतन उपराष्ट्रपति के रूप में मिलता है जो वर्तमान में 1.25 लाख रुपए प्रतिमाह निर्धारित किया गया है।

लोकसभा

संविधान के अनुच्छेद 98 के अनुसार, लोकसभा चुनाव के पश्चात् अपने पहले अधिवेशन में ही दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनती है। अध्यक्ष या उपाध्यक्ष सदन के जीवनपर्यंत अपने पद पर बना रहता है किंतु उसका पद निम्नलिखित रूप से इसके पहले भी समाप्त किया जा सकता है जैसा कि संविधान का अनुच्छेद 94 कहता है-

  1. उसके सदन के सदस्य न रहने पर,
  2. यदि वह अध्यक्ष है, तो उपाध्यक्ष की सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित पद त्याग करने पर (उपाध्यक्ष की स्थिति में अध्यक्ष को),
  3. लोकसभा सदस्यों द्वारा बहुमत से पारित प्रस्ताव (परंतु इस संकल्प को प्रस्तावित करने की आशा की कम से कम चौदह दिन के पूर्व सूचना देना अपरिहार्य) द्वारा उसे अपने पद से हटाये जाने पर।

परंतु यह और कि जब कभी लोकसभा का विघटन किया जाता है तो विघटन के पश्चात होने वाले लोकसभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा।

जब अध्यक्ष को हटाये जाने की कार्यवाही होती है तो वह अध्यक्षता नहीं कर सकता है परंतु उसे लोकसभा में बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है। उसे मतदान करने का अधिकार होता है परंतु मत बराबर होने की दशा में मतदान करने का अधिकार नहीं होता है।

अध्यक्ष की भांति ही उपाध्यक्ष का चुनाव भी लोकसभा सदस्यों द्वारा ही होता है। उपाध्यक्ष तब तक अपने पद पर बना रहता है, जब तक कि वह सदन का सदस्य रहता है अथवा स्वयं इस्तीफा दे देता है अथवा सदन में बहुमत से पारित एक प्रस्ताव के द्वारा उसे हटा नहीं दिया जाता। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करता है और कार्यवाही के नियमानुसार अध्यक्ष के सभी अधिकारों का उपयोग करता है। अध्यक्ष के विपरीत उपाध्यक्ष की सदन एक सदस्य की हैसियत से बोलने, सदन की कार्यवाही में भाग लेने और किसी भी मुद्दे पर मतदान करने का अधिकार देता है लेकिन उपाध्यक्ष यह सब कुछ उसी स्थिति में कर सकता है, जबकि अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता कर रहा हो।

लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियां एवं कार्य

लोक सभा के अध्यक्ष का पद सदन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, परम्परागत एवं औपचारिक पद है। अध्यक्ष लोकसभा का सर्वोच्च प्राधिकार प्राप्त अधिकारी होता है, जो कि उसकी अनन्य निष्पक्षता पर आधारित होता है। अध्यक्ष की अधिकांश शक्तियों एवं कार्यों का उल्लेख संविधान के अंतर्गत किया गया है, जबकि कुछ मामलों में उसे अपने विवेकानुसार कार्य करना पड़ता है। उसकी प्रमुख शक्तियां एवं कार्य हैं-

  1. अध्यक्ष का सर्वप्रथम एवं सर्वप्रमुख कार्य लोक सभा की अध्यक्षता करना और उसकी कार्यवाही का संचालन करना है।
  2. लोक सभा की बैठक स्थगित अथवा गणपूर्ति न होने की दशा में बैठक को निलम्बित करना है।
  3. कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं, इसका निर्धारण भी अध्यक्ष ही करता है एवं उसका निर्णय अंतिम होता है।
  4. किसी विधेयक के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के मध्य विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर आहूत दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता भी लोकसभा का अध्यक्ष ही करता है।
  5. सदन का यदि कोई सदस्य हिंदी अथवा अंग्रेजी में अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर पाने में असमर्थ होता है तो अध्यक्ष अपने विवेक से उस सदस्य को अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति प्रदान कर सकता है।
  6. इस बात का निर्धारण अध्यक्ष ही करता है कि कब किस सदस्य को बालने का अवसर दिया जाए और उसे किय्नी देर बोलने दिया जाए। आवश्यक होने पर वह भाषणों की समय सीमा का निर्धारण भी कर सकता है।
  7. अध्यक्ष विधेयकों एवं संकल्पों के सम्बन्ध में रखे गए संशोधनों में से कुछ को सभा के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु चयनित कर सकता है और ऐसे किसी भी संशोधन को सभा के समक्ष प्रस्तुत करने से इंकार कर सकता है, जो उसके विचार में तुच्छ अथवा नगण्य हों।
  8. सदन में किसी विषय पर बराबर मत रहने पर वह अपना निर्णायक मत (Casting Vote) डे सकता है।
  9. संसद की समस्त समितियों पर सर्वोच्च नियंत्रण अध्यक्ष का ही होता है। वही उनके अध्यक्षों/सभापतियों की नियुक्ति करता है और में ऐसे दिशा-निर्देश प्रेषित कर सकता है, जो वह आवश्यक समझे। कोई भी समिति अध्यक्ष की पूर्वानुमति के बिना न तो संसद भवन से बाहर अपनी बैठक का आयोजन कर सकती है और न ही राज्य सरकार को अधिकारियों को गवाही के लिए बुला सकती है।
  10. लोकसभा में व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व अध्यक्ष का है और वह सभी सदस्यों से नियमों का पालन करवाता है। यदि कोई कार्यवाही में बाधा डालता रहे तो अध्यक्ष उसका नाम लेकर उसे सभा से निलम्बित कर सकता है।
  11. लोकसभा अथवा उससे सम्बन्धित मामलों से सम्बन्धित संविधान तथा नियमों की व्यख्या करने का अधिकार अध्यक्ष का है और कोई भी सरकार इस सम्बन्ध में अध्यक्ष के साथ वाद-विवाद नहीं कर सकती।
  12. अध्यक्ष के रूप में आसन पर बैठकर अभिव्यक्त विचारों के सम्बन्ध में उसे सार्वजनिक रूप से अथवा समाचार-पत्रों में वाद-विवाद का केंद्र नहीं बनाया जा सकता।
  13. वह सदन की कार्यवाहियों के सम्बन्ध में समय-समय पर राष्ट्रपति को सुचना देता रहता है, जिससे राष्ट्रपति एवं संसद के मध्य सामंजस्य बना रहता है।
  14. दल-बदल सम्बन्धी मामलों का निर्धारण तथा सदस्यों की योग्यता अथवा अयोग्यता का निर्धारण अध्यक्ष ही करता है।

अतः लोकसभा अध्यक्ष का पद अत्यधिक महत्वपूर्ण तथा सम्मान युक्त है। अध्यक्ष सदस्यों के व्यक्तिगत तथा दल या गुटों के आधार पर प्राप्त अधिकारों तथा विशेषाधिकारों का रक्षक होता है। अध्यक्ष सदन की शक्तियों, कार्यो तथा सम्मान का प्रतीक है।

सभापतियों की सूची

यदि किसी समय लोकसभा में अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष उपस्थित न हों तो ऐसी स्थिति में सदन की कार्यवाही को चलाने के लिए अध्यक्ष लोकसभा सदस्यों में से ही अधिक से अधिक 6 सभापतियों की एक सूची बनाता है और जरूरत पड़ने पर उस सूची में मनोनीत किए गए व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में सदन के अधिवेशनों की अध्यक्षता करते हैं। जब कोई व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है, ऐसी स्थिति में उसे अध्यक्ष की सारी शक्तियां प्राप्त होती हैं।

कार्य संचालन

संसद के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा (अनुच्छेद 99)।

प्रत्येक सदन में या सदनों की संयुक्त बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण अध्यक्ष को अथवा सभापति या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति को छोड़कर उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा।

संसद के किसी सदन की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर भी उस सदन को कार्य करने की शक्ति होगी और यदि बाद में यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति जो ऐसा करने का हकदार नहीं था, कार्यवाहियों में उपस्थित रहा है या उसने मत दिया है या अन्यथा भाग लिया है तो भी संसद की कोई कार्यवाही विधिमान्य होगी।

जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक संसद के प्रत्येक सदन का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति सदन के सदस्यों की कुल संख्या का दसवां भाग होगी। यदि सदन के अधिवेशन में किसी समय गणपूर्ति नहीं है तो सभापति या अध्यक्ष अथवा उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह सदन को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे, जब तक गणपूर्ति नहीं हो जाती है।

स्थानों का रिक्त होना एवं सदस्यों की निरर्हताएं

संसद का सदस्य निम्नलिखित दशाओं में अपना स्थान रिक्त करेगा-

  • यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों का सदस्य चुन लिया जाता है तो वह एक या दूसरे सदन के स्थान को रिक्त करने के लिए संसद की विधि द्वारा विहित रीति से अपना स्थान रिक्त करेगा।
  • इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति संसद या राज्य के विधानमंडल के किसी सदन के लिए निर्वाचित हो जाता है तो उसे राज्य विधान मंडल के स्थान के लिए पद त्याग करना होगा। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर संसद में उसका स्थान रिक्त हो जाएगा।
  • यदि कोई व्यक्ति अनुच्छेद 102 में विनिर्दिष्ट निरर्हता से ग्रस्त हो जाता है तो उसका स्थान रिक्त हो जाएगा।
  • कोई सदस्य, यथास्थिति, राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष को सम्बोधित त्यागपत्र द्वारा अपना स्थान त्याग सकता है और ऐसा करने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा।
  • यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि से अधिक समय के लिए सदन के सभी अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसका स्थान रिक्त घोषित कर सकता है।
  • अनुच्छेद 102 के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन
  1. यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है।
  2. यदि वह विकृतचित्त है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है,
  3. यदि वह अनुमोदित दिवालिया है,
  4. यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली है या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति अनुषक्ति को अभिस्विकर किए हुए है,
  5. यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है।
  6. अनुच्छेद 102(2) के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य होने के लिए निर्हित होगा यदि वह 10वीं अनुसूची के अधीन इस प्रकार निर्हित हो जाता है इसमें दल बदल के आधार पर निरर्हता का उल्लेख किया गया है।
52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1985 के मतानुसार निम्न परिस्थितियों में भी संसद सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी-
  1. यदि कोई सदस्य अपने दल या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान में अनुपस्थित रहे। परन्तु यदि 15 दिन के अंदर दल उसे निर्देश के उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी;
  2. यदि निर्दलीय रूप में निर्वाचित संसद सदस्य किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए, अथवा;
  3. यदि कोई मनोनीत सदस्य शपथ लेने के 6 माह के बाद की अवधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए।
  •  यदि यह प्रश्न उठता है कि संसद के किसी सदन का कोई सदस्य किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न राष्ट्रपति को विनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया जाएगा। राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करेगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा (अनुच्छेद 103)।
  • अनुच्छेद 104 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जो संसद के किसी सदन में अनुच्छेद 99 की अपेक्षाओं का पालन करने से पहले या यह जानते हुए कि वह अर्हत नहीं है या उसकी सदस्यता से निरर्हत कर दिया गया है, उसमें बैठता है या मत देता है तो वह प्रतिदिन के लिए 500 रुपए के जुर्माने का भागी होगा।

संसद सदस्यों के वेतन एवं भत्ते

संसद के प्रत्येक सदन के सदस्य ऐसे वेतन और भत्ते, जिन्हें संसद समय-समय पर विधि द्वारा अवधारित करे और जब तक इस संबंध में इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे भत्ते उन दरों और ऐसी शर्तों पर, जो भारत डोमिनियन की संविधान सभा के सदस्यों को इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले लागू थीं, प्राप्त करने के हकदार होगे (अनुच्छेद 106)।

लाभ का पद

लाभ का पद ऐसा पद है जिसमें कुछ लाभ या धन की प्राप्ति होती है। किसी भी सरकार के अधीन ऐसा पद धारण करना जिसके साथ कोई वेतन, संबलम, उपलब्धि या अप्रतिकारात्मक भत्ता जुड़ा हुआ है, लाभ का पद धारण करना है। लाभ का पद शब्द को प्रस्तुत करने का मूलाधार कर्तव्य और हितों के बीच के टकराव को टालना तथा सरकारी पदों का व्यक्तिगत लाभों के लिए दुरुपयोग को कम करना था।

संविधान में कहीं भी लाभ का पद परिभाषित नहीं किया गया है। संविधान इस शब्द का केवल प्रतिषेधक अर्थ में अनुच्छेद 102, 171, 64, 65 तथा अन्य कई स्थानों पर उल्लेख करता है। संविधान के अनुच्छेद 102(1)(क) के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना, संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है। राज्य विधानसभा की सदस्यता के संदर्भ में अनुच्छेद-191 समान रोक लगाता है। यहां तक कि भारत के राष्ट्रपति पर भी अनुच्छेद 58 व 59 के अंतर्गत तथा उपराष्ट्रपति पर अनुच्छेद 66(4) के अंतर्गत समान रोक लगाई गई है।

वर्षों से भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री पदों पर लाभ के पदों पर आसीन व्यक्तियों की व्यवस्थापिका से लेकर कार्यपालिका तक में नियुक्त करने की प्रथा विकसित हो रही थी। वास्तव में यह प्रथा, सभी कार्यों हेतु, नेताओं द्वारा स्वीकृत एक ऐसा मार्ग था जो कि शक्तियों को नष्ट कर रहा था अथवा उन्हें विकृत कर रहा था। तभी अचानक, जया बच्चन का मामला प्रकाश में आया और जब इसी मुद्दे पर राष्ट्रपति द्वारा उन्हें राज्य सभा सीट के लिए अयोग्य घोषित किया गया, तो लाभ के पद का मुद्दा सामने आया।

मई 2006 के पूर्वार्द्ध में चुनाव आयोग को राष्ट्रपति के माध्यम से अनुच्छेद-102(1)(a) के अंतर्गत 43 संसद सदस्यों की अयोग्यता का पता लगाने सम्बन्धी 31 याचिकाएं प्राप्त हुई। निःसंदेह इनमें से एक याचिका कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी से सम्बन्धित थी, जो कि लोकसभा की निर्वाचित सदस्य होने के साथ-साथ राष्ट्रीय परामर्शकारी परिषद (National Advisory Council) के अध्यक्ष का पद भी सम्भाले हुए थीं। इस मुद्दे के उछाले जाने पर सोनिया गांधी ने लोकसभा की सदस्यता से त्याग-पत्र दे दिया। इसके अतिरिक्त एक याचिका भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता विजय कुमार मल्होत्रा से सम्बन्धित थी, जो स्थलीय खेलों के लिए अखिल भारतीय परिषद् (All India Council for Sports on the Ground) के अध्यक्ष थे, हालांकि इसका निर्वाचन पश्चात् अयोग्यता से कोई सम्बन्ध नहीं था। दूसरी ओर अनेक सदस्य अयोग्य करार दिए जाने के भय का सामना कर रहे थे। राज्यों में यदि देखा जाए तो 18 राज्यों के विधानमण्डल के 240 सदस्यों के समक्ष भी अयोग्य करार दिए जाने की समस्या उत्पन्न हो गई।

लाभ के पदों पर आसीन सांसदों को संसद की सदस्यता की अयोग्यता से बचाने के उद्देश्य से संसद द्वारा पारित (अयोग्यता निवारण) संशोधन विधेयक, 2006 [Parliament (Prevention of Disqualification) Amendment Bill, 2006] पर 18 अगस्त, 2006 को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर दिए गए। 46 पदों की इस विधेयक से बाहर रखा गया है। उल्लेखनीय है कि, पहले यह विधेयक संसद के दोनों सदनों ने मई 2006 में पारित किया था, किंतु कुछ आपत्तियों के साथ राष्ट्रपति ने इसे 31 मई, 2006 को वापस लौटा लिया था। बाद में सरकार ने इस विधेयक को बिना किसी संशोधन के पुनः संसद में प्रस्तुत किया तथा राज्य सभा ने 27 जुलाई, 2006 को और लोकसभा ने 31 जुलाई, 2006 को इसे पुनः पारित किया। पुनः संदर्भित किए जाने पर राष्ट्रपति ने 18 अगस्त, 2006 को इस पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।

अधिनियम के तहत् लाभ के पद के दायरे से बाहर संगठनों की सूची- राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, त्रिपुरा खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड, उत्तर प्रदेश विकास परिषद; सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण आयोग उत्तर प्रदेश; भारतीय सांख्यकीय संस्थान कोलकाता; पश्चिम बंगाल हस्तशिल्प विकास निगम लिमिटेड, पश्चिम बंगाल लघु उद्योग विकास निगम लिमिटेड, पश्चिम बंगाल उद्योग विकास निगम लिमिटेड, श्रीनिकेतन शांति निकेतन विकास प्राधिकरण; हल्दिया विकास प्राधिकरण; पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम, हुगली नदी पुल आयुक्त, वक्फ बोर्ड, पश्चिम बंगाल, पश्चिम बंगाल मत्स्य विकास निगम लिमिटेड, पश्चिम बंगाल राज्य हज समिति, आसनसोल, दुर्गापुर विकास प्राधिकरण, पश्चिम बंगाल, पश्चिम बंगाल फार्मास्युटिकल और फाइटोकैमिकल विकास निगम लिमिटेड; पश्चिम बंगाल पॉवर लूम और हथकरघा विकास निगम लिमिटेड; पश्चिम बंगाल खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड; शहरी युवा स्वरोजगार सोसायटी, पश्चिम बंगाल, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण; भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन फेडरेशन लिमिटेड, (नैफेड); दी इण्डियन फार्मर फर्टिलाइजर को-आँपरेटिव लिमिटेड, (इफको), कृषक भारती को-आँपरेटिव लिमिटेड (कृभको); दी नेशनल को-आँपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड; अरोविल प्रतिष्ठान; राष्ट्रीय असंगठित क्षेत्र उद्यम आयोग; योजना बोर्ड: एशियाटिक सोसायटी; दिल्ली ग्रामीण विकास बोर्ड; मौलाना आजाद शिक्षा प्रतिष्ठान; इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र; डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड, गुटनिरपेक्ष और अन्य विकासशील देशों के लिए अनुसन्धान और सूचना प्रणाली; भारतीय मनोमिति सैंस्थान; उत्तर प्रदेश सहकारी विकास बैंक; उत्तर प्रदेश सहकारी परिसंघ लिमिटेड; भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ, उत्तर प्रदेश कृषि और ग्रामीण विकास बैंक, उत्तर प्रदेश सहकारी बैंक लिमिटेड, भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद, नियंत्रण बोर्ड ए.एन. सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान पटना; अखिल भारतीय खेलकूद परिषद; हावड़ा सुधार न्यास; दलित सेना दिल्ली; दी सोशल जस्टिस ट्रस्ट दिल्ली बहुजन फाउण्डेशन लखनऊ उत्तर प्रदेश; बहुजन प्रेरणा चेरीटेबल ट्रस्ट दिल्ली; दी सेण्ट्रल वक्फ़ काउंसिल; नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एण्ड लाइब्रेरी; जलियांवाला बाग स्मारक न्यास; भारतीय हज समिति, मलिक घाट फूल बाजार परिचालन समिति, पश्चिम बंगाल मत्स्य निगम लिमिटेड।

अगस्त, 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद के अयोग्यता संरक्षण अधिनियम, 2006 में उल्लिखित 55 पदों की अयोग्यता से संरक्षण या लाभ के पद से संरक्षण प्रदान करने की संवैधानिक रूप से वैध माना है।

मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन, न्यायाधीश आर.वी. रवींद्रन एवं न्यायाधीश जे.एम. पांचाल की पीठ ने निर्णय दिया कि संसद को अपनी शक्तियों के अंतर्गत विधायी शक्ति प्राप्त है। यह संसद का विशेषाधिकार है कि वह किस पद की लाभ के पद में शामिल करती है या नहीं। इससे संविधान के अनुच्छेद-14 (विधि के समक्ष समता) का उल्लंघन नहीं होता क्योंकि प्रत्येक पद की अपनी भिन्नताएं एवं स्वभाव होता है। इस निर्णय के साथ ही उच्चतम न्यायालय ने उपभोक्ता शिक्षा एवं शोध सोसायटी तथा संसद सदस्य दिनेश त्रिवेदी की याचिका को खारिज कर दिया जिसमें इस अधिनियम की संवैधानिक एवं कानूनी वैधता को चुनौती दी गई थी।

उल्लेखनीय है कि, राष्ट्रपति ने विधेयक की पारदर्शिता पर प्रश्न उठाते हुए सरकार से पूछा था कि इसे पुरानी तिथि से लागू क्यों किया गया है? कुछ पदों को ही छूट प्राप्त करने का आधार क्या है? राष्ट्रपति को यह बात भी उचित नहीं लगी कि जिन पदों को केन्द्र की सरकार छूट प्रदान कर रही है वे कुछ राज्यों में ही लाभ की परिधि में आते हैं।

लाभ के पद की अवधारणा के सम्बन्ध में संविधान सर्वथा मौन है। समय-समय पर न्यायालयों द्वारा प्रेषित निर्णयों एवं अन्य समकक्ष अभिकरणों द्वारा की जाने वाली टिप्पणियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि-

  1. एक अस्थायी एवं अंशकालीन कार्यकाल की अपेक्षा एक लगातार एवं स्थाई कार्यकाल निश्चित तौर पर लाभ का पद है।
  2. संघ अथवा राज्य सरकार के अधीन कोई पद, जिसके लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त करने और हटाने की शक्ति सरकार के पास होती है और जिसके वेतन-भत्ते सार्वजनिक कोष से देय हों, अवश्य ही लाभ का पद है।
  3. यदि कोई व्यक्ति सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर कार्यों का सम्पादन करे।

पद का सम्बन्ध अनिवार्यतः किसी लाभ से होता है, जो कि पद धारक को उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों एवं उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने के बदले प्राप्त होते हैं। उदाहरणार्थ- घर, वाहन, आदि या कुछ अन्य सुविधाएं। कोई पद लाभ का है अथवा नहीं यह न्यायालय द्वारा तब तक निर्णीत नहीं होता जब तक कि कार्यालय में धारक की वास्तविक तौर पर लाभ प्राप्त रहते हैं। ज्ञातव्य है कि, लाभ के पद को कोई वरीयता नहीं दी जाती थी। यहां तक कि संसद की इससे सम्बन्धित समिति में कोई सांसद रहना भी नहीं चाहता था। राज्य सभा चुनाव में हार गए एक कांग्रेस नेता ने जया बच्चन का चुनाव इस आधार पर खारिज करने की मांग की कि वे लाभ के पद पर रहते हुए सांसद बनी हैं। जया बच्चन उस समय उत्तर प्रदेश राज्य फिल्म विकास परिषद की अध्यक्ष थीं। इस पद हेतु उन्हें 5000 रुपए मासिक तथा यात्रा व्यय (Travelling Allowances) प्राप्त होते थे, जो कि मंत्रियों को प्राप्त होने वाले लाभ से भी काफी अधिक होते थे। इसी तथ्य को आधार बनाकर राष्ट्रपति से शिकायत की गई। राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग से परामर्श मांगा और आयोग ने जया बच्चन के पद को लाभ का पद घोषित कर दिया। इसके बाद जया बच्चन की राज्य सभा की सदस्यता चली गई।

इसके बाद तो तमाम सांसदों एवं मंत्रियों के विरुद्ध इसी आधार पर शिकायतें की जाने लगीं। इसी क्रम में तेलुगू देशम पार्टी के सांसद येरन नायडू ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विरुद्ध यह शिकायत की कि वे यूपीए अध्यक्ष के तौर पर लाभ के पद पर हैं। इस संदर्भ में भाजपा की ओर से भी शिकायत दर्ज कराई गई कि उनके पास (सोनिया गांधी) इसके अतिरिक्त और भी कई पद हैं। सोनिया गांधी ने सभी पदों सहित लोकसभा की सदस्यता से भी त्याग-पत्र दे दिया। तत्पश्चात् उन्होंने रायबरेली से चुनाव लड़ा और सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त कराकर भारी मतों से जीतकर पुनः सांसद (लोकसभा सदस्य) चुनी गई।

सांसद क्षेत्र विकास निधि

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैंड) पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा 1993 में शुरू की गई थी। इस योजना का उद्देश्य संसद सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर स्थायी सामुदायिक परिसम्पतियों के सृजन पर बल देते हुए विकासात्मक प्रकृति के कार्यों की अनुशंसा करने हेतु सक्षम बनाना है। योजना के आरंभ से ही राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की स्थायी परिसम्पतियों अर्थात् पेयजल, प्राथमिक शिक्षा, सार्वजानिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और सड़कें इत्यादि का निर्माण किया जा रहा है। वर्ष 1998-94 में जब इस योजना को लागू किया गया था, तब प्रत्येक सांसद को 5 लाख रुपए की राशि आबंटित की जाती थी, जिसे वर्ष 1994-95 में बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए और वर्ष 1998-99 में बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए किया गया। ज्ञातव्य है कि इस योजना के कार्यान्वयन, नीति-निर्माण, वित्त आवंटन एवं प्रबंधन तंत्र के निर्धारण के लिए सांख्यिकी और कार्यान्वयन मंत्रालय उत्तरदायी है। संसद सदस्य को प्रत्येक वर्ष सांसद निधि से अनुसूचित जाति के लोगों के निवास क्षेत्रों के लिए कम से कम 15 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए 7.5 प्रतिशत लागत के कार्यों की अनुशंसा करना जरूरी है। लोक सभा सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए कार्यों के लिए अनुशंषा कर सकते हैं, जबकि राज्य सभा के चुने हुए सदस्य अपने निर्वाचन राज्य के एक या अधिक जिलों में कार्यों के कार्यान्वयन की अनुशंसा कर सकता है।उल्लेखनीय है कि सांसदों की लंबे समय से चली आ रही मांग की सरकार ने मान लिया है, और इसमें ढाई गुना की वृद्धि करते हुए 2 करोड़ प्रति वर्ष से 5 करोड़ प्रति वर्ष कर दिया है। यह वृद्धि 1 अप्रैल, 2011 से लागू हो चुकी है। इसके लिए प्रत्येक वर्ष 2870 करोड़ रुपए का आवंटन किया जाएगा।

यदि इस निधि को कर्तव्यनिष्ठा एवं विकासात्मक तौर पर संचालित किया जाए तो यह बेहद कल्याणकारी साबित होगी।

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