जंतुओं में गुणसूत्र ढांचा Chromosomal Pattern

गुणसूत्रों (chromosome) की संख्या, आकृति, माप एवं रचना जातीय लक्षण (specific characters) होते हैं। अतः  किसी भी एक जाति विशेष के सारे सदस्यों की सभी शरीर कोशाओं में समान गुणसूत्र ढांचा (Karyotype) या नमूना होता है। गुणसूत्रों की संख्या अधिकांश जीव जातियों में 10 से 50 तक होती है। गुणसूत्रों की संख्या सबसे कम केवल 2 एस्कैरिस श्रेणी के निमैटोड परजीवियों (Ascaris megalocephalia vnivalence) और अभी तक ज्ञात सबसे अधिक संख्या 1600, रेडियोलैरियन (Aulancantha) में होती है।

मनुष्य में इनकी संख्या 46, मेढक में 26, मक्खी में 12, कुत्तों में 78, बिल्ली में 38, हाइड्रा में 32, ड्रोसोफिला मक्खी में 8 होती है।

प्रत्येक जाति के गुणसूत्र जोड़ियों में होते हैं। अतः इनकी कुल संख्या द्विगुण (diploid) संख्या होती है। प्रत्येक जोड़ी के दो समान गुणसूत्रों को समजत गुणसूत्र (Homologous chromosome) कहते हैं। एकलिंगी जीवों में प्रत्येक संतान को समजात गुणसूत्रों की प्रत्येक जोड़ी का एक अंडाणु (Ovum) द्वार माता से और दूसरा गुणसूत्र  शुक्राणु (sperm) द्वारा पिता से प्राप्त होता है। मानव जाति में पुरुष के 46 गुणसूत्रों की 23 जोड़ियों में से केवल 22 जोड़ियों के गुणसूत्र ही अपने-अपने जोड़ीदार के समान होते हैं और इन्हें ऑटोसोम्स (Autosomes) कहते हैं। 23वीं जोड़ी के गुणसूत्र (chromosomes) असमान होते हैं और इन्हें हेटेरोसोम्स (Heterosomes) या एलोसोम्स (Allosomes) कहते हैं। मनुष्य में इस 23वीं जोड़ी के कारण पुरुष और स्त्री का लिंगभेद (sex differentiation) विकसित होता है। अतः ये गुणसूत्र लिंग गुणसूत्र कहलाते हैं।

अन्य जंतुओं में लिंग निर्धारण

स्तनधारियों, अधिकांश कीटों, सभी एकलिंगी पादपों तथा मछलियों के गुणसूत्रों में वैसा ही लिंगभेद होता है जैसा कि मनुष्य में। इसके विपरीत, पक्षियों, पतंगों व् तितलियों (Moths and butterflies) में यह भेद उल्टा होता है, अर्थात नर में लिंग गुणसूत्र (sex chromosome) समान, परन्तु मादा में असमान होते हैं। कुछ कीटों (टिड्डे व बग) में यह लिंग (sex) नर या मादा में लिंग गुणसूत्रों (sex-chromosomes) में से एक की अनुपस्थिति से होता है।

रोग क्षमता Immunization

मनुष्य के शरीर की रोग क्षमता इस बात पर आधारित रहती है कि शरीर प्रतिरक्षी (Antibodies) उत्पन्न करने में कितना सक्षम है। प्रतिरक्षी विशेष सूक्षम-जीवों (Micro-organism) द्वारा उत्पन्न जीव-विष (Toxins) का नाश कर देटे हैं। शरीर में प्रोटीन इंजेक्ट करने से प्रतिरक्षी बन्ने की क्रिया को तीव्र किया जा सकता है, तब प्रतिरक्षी रक्त सीरम में पहुंचाए जाते हैं। बाहरी प्रोटीन के इंजेक्ट होते ही शरीर में प्रतिरक्षी का निर्माण तेजी से शुरू हो जाता है। उसके बाद एक स्तर पर आकर स्थिर हो जाता है और फिर कम होना शुरू हो जाता है। बाहरी प्रोटीन के इंजेक्ट करने से प्रतिरक्षी का निर्माण पुनः शुरू हो जाता है।

गुणसूत्र उत्परिवर्तन Chromosomal Mutation or Aberration

गुणसूत्र उत्परिवर्तन में एक या अधिक गुणसूत्रों की रचना में परिवर्तन हो जाते हैं। ये परिवर्तन प्रायः युग्मकजनन (gametogenesis) के अर्धसूत्री विभाजन (Meiotic division) के समय होते है। अर्धसूत्री विभाजन के समय गुणसूत्र पहले 2 या अधिक टुकड़ों में टूटते हैं। पारगमन में समजात गुणसूत्रों के बीच इन्हीं टुकड़ों की अदक बदल होती है। कभी-कभी एक या अधिक टुकड़े समय पर आपस में जुड़ नहीं पाते हैं और कोशाद्रव्य (cytoplasm) में घुसकर समाप्त हो जाते है। कभी कभी गुणसूत्रों के एक या अधिक टूटे टुकड़े गलत स्थानों पर जुड़ जाते हैं। इसे स्थानांतरण कहते हैं। इसमें  एक या अधिक टुकड़ों के आपस में जुड़ने में इनके सिरे बदल जाते हैं। इस प्रकार किसी गुणसूत्र पर एक या अधिक जींस दोहरे हो जाते हैं। अतिरिक्त भाग प्रायः समजात गुणसूत्र का होता है, जिसने इसे विलोपन (Deletion) में खोया था। अतः गुणसूत्रों की संख्या बदल सकती है। गुणसूत्रों की संख्या बदल सकती है। गुणसूत्रों की संख्या में ऐसी अनियत घटा-बढ़ी को विषमागुणन या एन्यूप्लॉयडी (Aneuploidy) कहते हैं। कभी-कभी गुणसूत्रों की संख्या एकसूत्री (Haploid) संख्या की तिगुनी, चौगुनी आदि हो जाती है। इसे बहुगुणन (polyploidy) कहते हैं। एन्यूप्लॉयडी में  गुणसूत्रों  की बदलती हुई संख्या एकगुण सेट के गुणों में नहीं होती। अर्ध गुणसूत्रण (Meiosis) में एक या अधिक समजात जोड़ियों के गुणसूत्रों में परस्पर पृथक ण हो पाने (non-disjunction)  के कारण गुणसूत्रों की संख्या में ऐसे हेर-फेर हो जाते हैं। ये ऑटोसोम्स (Autosomes) में भी हो सकते हैं और लिंग गुणसूत्रों में भी। इनसे शरीर के कई लक्षण एक साथ प्रभावित होकर असाधारण या रोगग्रस्त दशा का प्रदर्शन करते हैं। ऐसे लक्षणों के समूह को सिंड्रोम कहते हैं। मानवों में भी सिंड्रोम पाए जाते हैं-

डाउन्स सिंड्रोम  Down’s Syndrome

औसतन 700 में से एक इस सिंड्रोम वाला होता है\ इसमें 21वीं जोड़ी के ऑटोसोम्स 2 के बजाय 3 होते हैं। इस सिंड्रोम वाला व्यक्ति  छोटे कद और कमजोर दिमाग वाला होता है। ऐसा व्यक्ति अधिकतर 16 साल से पहले मर जाता है। इनका सर गोल,त्वचा खुरदुरी, जीभ मोटी, उँगलियाँ ठूंठदार, मुख खुला, आँखें तिरछी और पलकें मंगोलों की भांति वलित (Folded) होती हैं। इसलिए इस सिंड्रोम को मंगोली जड़ता (Mangoloid idiocy) भी कहते है। इन सिंड्रोमों में जननांग सामान्य, लेकिन पुरुष नपुंसक होते हैं।

टरनर्स सिंड्रोम Turners syndrome

ये ऐसी स्त्रियाँ होती हैं, जिनके लिंग गुणसूत्रों (sex chromosomes) में केवल एक एक्स (X) गुणसूत्र उपस्थित होता है, अर्थात ये लिंग गुणसूत्रों के लिए मोनोसोमिक (Monosomic) होती हैं। औसतन, 5000 स्त्रियों में से एक टरनर्स सिंड्रोम होती है। इनका कद छोटा और जननांग अल्पविकसित होते हैं। वक्ष चपटा तथा ये स्त्रियाँ नपुंसक (Eunuchs) होती हैं।

क्लाइनफेल्टर्स सिंड्रोम Klinefelter’s syndrome

इनमे लिंग गुणसूत्र डो के बजाय 3 और प्रायः XXY होते हैं। अतः ये लिंग गुणसूत्रों के ट्राइसोमिक होते हैं। Y गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण, इनका शरीर लगभग सामान्य ओउरुशों जैसा होता है, लेकिन एक अतिरिक्त एक्स (X) गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण वृषण (Testis) छोटे होते हैं और इनमे शुक्राणु (sperms) नहीं बनते। अतः ये सिंड्रोम भी नपुंसक (Impotent) होते हैं। प्रायः इनमें स्त्रियों जैसे स्तनों का विकास हो जाता है, जिसे गाइनोकोमैस्टिया )Gynaecomastia) कहते हैं।

मानव में लिंग-सह्लग्न गुण  Sex Linked Characters

मानव में लैंगिक लक्षणों के जींस मुख्यतः लिंग गुणसूत्रों में होते हैं, लेकिन लैंगिक द्विरुपता (sexual dimorphism) इतनी जटिल और व्यापक होती है कि कई ऑटोसोमल जींस भी लानिगिक विभेदी कारन को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार लिंग सूत्रों में, लैंगिक लक्षणों के अतिरिक्त, कुछ अन्य, गैर-लैंगिक या दैहिक (somatic) लक्षणों के जींस भी होते हैं। बस इन्हीं लक्षणों को गुण या लक्षण कहा जाता है और इनकी वंशागति को लिंग-सहलग्न वंशागति (sex-linked inheritance)। मानव में लगभग 120 दैहिक गुण लिंग सहलग्न होते हैं।

लिंग सहलग्न वंशागति Sex-Linked Inheritance

दुर्बल एक्स-सहलग्न वंशागति (Recessive X-linked inheritance) में मानव के कुछ आनुवांशिक रोगों के जींस आदर्श रूप से एक्स (X) लिंग गुणसूत्रों में होता हैं। इनमे से अधिकांश रोगों के दुर्बल या सुप्त (recessive) होते हैं, अर्थात इनके प्रबल या प्रभावी (dominant) एलील सामान्य रोग हीन दशा स्थापित करते हैं। अब क्योंकि पुरुष में एक्स (X) गुणसूत्र केवल 1, लेकिन स्त्रियों में 2 होते हैं। इन लक्षणों की वंशागति विशेष प्रकार की होती है। सुप्त होने के कारण ये रोग संकर (Heterozygous) स्त्रियों में होते हैं, जिनमें प्रत्येक एक्स (X) गुणसूत्र में रोग का एक जिन होता है, इसके विपरीत, पुरुषों में केवल एक ही एक्स (X) गुणसूत्र (chromosome) होने के कारण ऐसे लक्षण का केवल एक ही जींस उपस्थित होता है (hemizygous condition)। अतः एक ही सुप्त जीन से रोग का विकास हो जाता है। इसलिए ऐसे रोग प्रायः पुरुषों में ही अधिक पाए जाते हैं। दूसरी बात यह है कि पुत्रों को इन लक्षणों के जीन  कभी पिता से नहीं मिल सकते हैं, क्योंकि पुरुष का अकेला एक्स (X) गुणसूत्र सदैव पुत्रियों में जाता है। स्पष्ट है कि इन पुत्रियों से ही ये फिर ये जीन दूसरी पीढ़ी (F2) के पुत्रों अर्थात नातियों में जाते हैं। ऐसी वंशागति को क्रिस क्रास (criss-cross) वंशागति कहते हैं। इसमें स्त्रियों की भूमिका प्रायः रोग की जीनी वाहकों (Genic carriers) के रूप में होती है। मानव के एक्स (X) सह्लग्न दुर्बल लक्षणों में वर्णान्धता (colour blindness) एवं हीमोफीलिया (haemophilia) के रोग महत्वपूर्ण हैं।

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