रासायनिक शस्त्र अभिसमय Chemical Weapons Convention – CWC

रासायनिक शस्त्र अभिसमय (Chemical Weapons Convention–CWC) रासायनिक युद्ध पर नियंत्रण रखने के लिये अब तक की सबसे व्यापक और महत्वाकांक्षी विश्व व्यवस्था, 29 अप्रैल, 1997 को प्रभाव में आयी। यह अभिसमय रासायनिक शस्त्रों के विकास, जमाव और उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है तथा उनके विनाश की अपील करता है। इसमें न केवल युद्ध में कार्य आने वाले रसायनों बल्कि उन मध्यवर्ती पदार्थों को भी सम्मिलित किया गया है, जो ऐसे रसायनों के विकास में सहायक हो सकते हैं। अतः यह व्यवस्था शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिये अनेक नियमित व्यावसायिक उपयोग वाले रसायनों पर लागू होती है। सदस्य देशों को अपने रासायनिक संग्रहणों, रासायनिक उत्पादन, क्षमता, प्रक्रिया, फैक्ट्री क्षेत्रों और अन्य जानकारियों के संबंध में हेग स्थित केंद्रीय सचिवालय में वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी पड़ती है। सीडब्ल्यूसी के अंतर्गत घोषित रासायनिक संचय को गुप्त रखा जाता है।

यह अभिसमय सदस्य देशों को किन्हीं अन्य देशों द्वारा रासायनिक शस्त्रों के विकास और निर्माण में सहायक होने की अनुमति नहीं देता है। यह संदिग्ध ठिकानों का बिना किसी पूर्व सूचना के और नियमित निरीक्षण करता है। अभिसमय में चुनौती निरीक्षण का भी प्रावधान है, जिससे इसे नया बल मिलता है। इसके अधीन संक्षिप्त सूचना के साथ व्यावसायिक और सरकारी ठिकानों पर धोखाधड़ी के आरोपों की जांच की जायेगी।

सीडब्ल्यूसी में गैर-सदस्यीय देशों द्वारा रासायनिक निर्यात करने पर उनके विरुद्ध आर्थिक प्रतिबंधों का प्रावधान है।

सीडब्ल्यूसी के अनुसार सदस्य देशों को अनुसमर्थन के दो वर्षों के भीतर रासायनिक संचय को नष्ट करने के लिये एक व्यापक योजना विकसित करनी चाहिये। तीसरे वर्ष में उन संचयों की नष्ट करना शुरू कर देना चाहिये तथा सात वर्षों के भीतर 45 प्रतिशत संचयों को नष्ट करने का कार्य समाप्त हो जाना चाहिये। अभिसमय 10 वर्षों के भीतर संपूर्ण रासायनिक शस्त्रों को नष्ट करने की मांग करता है।

निरीक्षण व्यवस्था ने 1996 से कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

रासायनिक युद्ध का उद्भव बिंदु 1915 है, जब जर्मन सेना ने बेल्जियम के यप्रेस (Ypres) शहर के निकट गठबंधन सेना के जमाव पर क्लोरीन गैस का उपयोग किया। विषैले रासायनिक कारक न केवल सशस्त्र सेनाओं को उपलब्ध होते हैं बल्कि अन्य विध्वसंक संगठन भी इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिये, जापान के ओम (Aum) संप्रदाय के समर्थकों द्वारा टोक्यो के भूमिगत रेलवे मार्ग में सैरीन (Sarin) गैस फैला दिए जाने से अनेक लोगों की मृत्यु हो गई। नाजी शासनकाल में हिटलर ने भी लाखों की संख्या में उपस्थित कैदियों को मारने के लिये विषैली गैसों का प्रयोग किया। हाल के वर्षों में वियतनाम युद्ध रासायनिक हथियारों के प्रयोग का स्पष्ट उदाहरण है। इस युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका ने वियतनाम पर नैपेलम (Napalm) तथा एजेंट ऑरंज (Agent orange) जैसे विषैले रसायनों को गिराया जिससे वनस्पति, वायुमंडल तथा लोगों को अपूर्णनीय क्षति पहुंची। वियतनाम में रासायनिक हथियारों के प्रयोग के परिणामस्वरूप बच्चों और वनस्पतियों का विकास अवरुद्ध हुआ। रासायनिक हथियारों के प्रयोग का दूसरा बड़ा उदाहरण खाड़ी युद्ध है।

विशेषज्ञों का मानना है कि, रासायनिक कारकों को प्रक्षेपास्त्रों के माध्यम से गिराया जा सकता है या पैदल सैनिकों, जो मुखौटे तथा अन्य रसायन-रोधी (chemical proof) उपकरणों से सुसज्जित होते हैं, के माध्यम से फेंका जा सकता है।

प्रयोग किये जाने वाले प्रमुख रासायनिक हथियार झुलसा देने वाले (blistering) होते हैं, जो सरसों या ल्युसाइट (Lewisite) से बने होते हैं। इन रसायनों के संपर्क में आने पर या इन्हें सूंघने पर फफोले, अंधापन या फेफड़ों की घातक बीमारियां उत्पन्न होती हैं। युद्ध में प्रयोग किया जाने वाला दूसरा रसायन चोकिंग (chocking) कहलाता है, जिसके सूघने से फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तथा उनमें तरल द्रव्य जमा हो जाता है। रासायनिक हथियार के रूप में प्रयोग आने वाला एक अन्य पदार्थ ब्लूड (Blood) है। ब्लूड का उत्पादन सायनोजेन क्लोराइड या हाइड्रोजन सायनाइड से होता है, जिसके सूघने से रक्त में ऑक्सीजन का प्रवाह बंद हो जाता है। स्नायु (nerve) गैस, जिसका उत्पादन टेबुन (Tabun), सैरीन (Sarin) और सोमान (Soman) से होता है, के संपर्क में आने पर या उसे सूघने पर स्नायु तंत्र विघटित हो जाता है।

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