रासायनिक बंधन Chemical Bonding

किसी अणु में उपस्थित अवयवी परमाणुओं को परस्पर बाँधकर अणु को विशेष ज्यामितीय आकार में रखने वाले बल को रासायनिक बंधन कहते हैं।

अक्रिय गैसों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configurations of Inert Gases): प्रकृति में पाये जाने वाले अक्रिय गैसों की संख्या 6 है। ये गैसें हैं- हीलियम (He), निऑन (Ne), ऑर्गन (Ar), क्रिप्टॉन (Kr), जेनॉन (Xe) तथा रेडॉन (Rn)I हीलियम (He) को छोड़कर सभी अक्रिय गैसों के परमाणुओं की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। परमाणु की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉनों का समूह सर्वाधिक स्थायी होता है। आठ इलेक्ट्रॉनों के समूह को अष्टक (Octet) कहते हैं। इस प्रकार परमाणु की बाह्यतम कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 8 हो जाने से परमाणु स्थायी बन जाता है या परमाणु की बाह्यतम कक्षा में दो इलेक्ट्रॉनों के हो जाने से भी परमाणु तभी स्थायी बनता है, जब वह बाह्यतम कक्षा परमाणु का पहला शेल (K शेल) हो और उसके बाद परमाणु में कोई अन्य शेल उपस्थित न हो। अक्रिय गैसों के परमाणु की बाह्यतम कक्षा में बाहर से किसी इलेक्ट्रॉन को प्रविष्ट कराना या उसमें से किसी इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाल देना संभव नहीं है। इसी कारण अक्रिय गैसों के परमाणुओं की बाह्यतम कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉन रासायनिक अभिक्रिया में भाग नहीं ले सकते। अतः इन गैसों के परमाणु मुक्त अवस्था में रहते हैं। इनके परमाणु और अणु एक समान होते हैं। अर्थात् अक्रिय गैसों के अणु एकपरमाणुक (Mono Atomic) होते हैं।

अक्रिय गैसों को छोड़कर अन्य जितने भी तत्व हैं, उनके परमाणु की बाह्यतम कक्षा अस्थायी होती है, क्योंकि उनमें 8 से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं। वे अपनी बाह्यतम कक्षा में अपने निकटतम अक्रिय गैस की भाँति इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति रखते हैं, ताकि वे स्थायी बन जाय। इसी कारण, तत्वों के बीच रासायनिक संयोग होता है।

अष्टक पूर्ण करने की प्रक्रिया (Process of Completion of the Octet): कोई भी परमाणु अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था तीन प्रकार से प्राप्त करता है-

(i) किसी दूसरे परमाणु को अपना एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके।

(ii) किसी दूसरे परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करके।

(iii) किसी दूसरे परमाणु के साथ एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का साझा करके।


आयन (Ions): विद्युत् आवेशयुक्त परमाणु या परमाणुओं के समूह को आयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+), मैग्नीशियम आयन (Mg++), क्लोराइड आयन (CI-), सल्फेट आयन (So4--), कार्बोनेट आयन (CO3--) आदि।

आयन दो प्रकार के होते हैं-

  1. धनायन (Cation): जिस आयन पर धन आवेश (Positive Charge) होता है, उसे धनायन कहते हैं। उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+) और मैग्नीशियम आयन (Mg++) धनायन हैं।

धन आयन का निर्माण परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के निकल जाने से होता है।

Na \xrightarrow [ ]{ -e } Na+

Mg \xrightarrow [ ]{ -2e } Mg++

सभी धातु तत्वों के आयन धनायन होते हैं। सिर्फ हाइड्रोजन (H+) और अमोनियम आयन (NH4+) अधातु तत्वों के बने होते हैं।

  1. ऋणायन (Anion): जिस आयन पर ऋण आवेश होता है, उसे ऋणायन कहते हैं। उदाहरण के लिए, क्लोराइड आयन (Cl-), ऑक्साइड आयन (O--), सल्फेट आयन (SO4---), कार्बोनेट आयन (CO3--) आदि ऋणायन हैं। ऋणायनों का निर्माण किसी परमाणु द्वारा एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के ग्रहण करने के कारण होता है।

Cl+ e → Cl-

O + 2e → O

सभी अधातुओं के आयन ऋणायन (Anion) होते हैं। सामान्यतः धातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन में बदल जाने की प्रवृत्ति के कारण ये विद्युत् धनात्मक तत्व कहलाते हैं। इसके विपरीत अधातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन में बदल जाने की प्रवृति के कारण ये विद्युत् ऋणात्मक तत्व कहलाते हैं।

संयोजकता (valency): संयोजकता शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द valentia से हुई है, जिसका अर्थ है- क्षमता। तत्वों के परमाणुओं के परस्पर संयोजन करने की क्षमता को ही संयोजकता कहते हैं। दूसरे शब्दों में, अपने निकटस्थ अक्रिय गैस की तरह इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करने में किसी परमाणु द्वारा त्यक्त या ग्रहित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या को उस परमाणु की संयोजकता कहते है। किसी तत्व की संयोजकता उसके परमाणु की बाह्यतम कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए- सोडियम परमाणु एक इलेक्ट्रॉन का त्यागकर अक्रिय गैस निऑन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है।

Na (2, 8, 1)  \xrightarrow [ ]{ -e } Na+  (2, 8)

अतः सोडियम (Na) की संयोजकता 1 होती है। इसी प्रकार क्लोरीन परमाणु एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है।

Cl (2, 8, 7)  \xrightarrow [ ]{ +e } Cl+  (2, 8, 8)

अतः क्लोरीन की संयोजकता 1 होती है।

रासायनिक बंधन के प्रकार

रासायनिक बंधन मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं-

  1. वैद्युत् संयोजक बंधन या आयनिक बंधन (Electrovalent or Ionic Bond): जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण होने से उन दोनों परमाणुओं के बीच बंधन बनता है, तो उसे वैद्युत् संयोजक बंधन कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण इस प्रकार होता है कि प्राप्त आयनों की बाह्यतम कक्षाओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था अक्रिय गैसों की भाँति स्थायी बन जाती है। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड का बनना- सोडियम (Na) और क्लोरीन (CI) परमाणुओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्थाएँ इस प्रकार होती हैं-

Na (11) – 2, 8, 1

Cl (17) - 2, 8, 7

सोडियम परमाणु (Na) अपनी बाह्यतम कक्षा के एक इलेक्ट्रॉन का त्याग कर अक्रिय गैस निऑन जैसी स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। क्लोरीन परमाणु (CI) एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसी स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। अब Na+ और Cr- आयनों पर विपरीत आवेशों की उपस्थिति के कारण ये दोनों आयन स्थिर वैद्युत् आकर्षण बल (Electrostatic Force of Attraction) द्वारा परस्पर जुटकर सोडियम क्लोराइड (Na+Cl- या NaCl) बनाते हैं।

विद्युत संयोजक के गुण (Characters of Electrovalent Compounds): जिन रासायनिक यौगिक के अणु में वैद्युत् संयोजक बंधन या आयनिक बंधन रहता है, उन्हें वैद्युत् संयोजक या आयनिक यौगिक कहते हैं। जैसे- NaCI, MgCL2 CaO आदि।

वैद्युत् संयोजकों में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं-

(i) वैद्युत् संयोजक यौगिक या आयनिक यौगिक दो विपरीत आवेशयुक्त आयनों से निर्मित होते है, जैसे- Na+Cl-, Ca++ O‑-, Cu++SO4---, आदि।

(ii) वैद्युत् संयोजक या आयनिक यौगिकों में विपरीत आवेश वाले आयनों के बीच मजबूत अंतरआण्विक विद्युत् आकर्षण बल लगने के कारण ये रवादार उच्च घनत्व वाले ठोस होते हैं। ये कठोर और भंगुर होते हैं।

(iii) मजबूत अंतरआण्विक वैद्युत् आकर्षण बल से जुड़े आयनों को एक-दूसरे से पृथक करने में अत्यधिक ऊष्मीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस कारण आयनिक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक उच्च होते हैं।

(iv) आयनिक प्रकृति वाले वैद्युत् संयोजक यौगिक प्रायः धुवीय घोलको (जल, द्रव अमोनिया आदि) में घुलनशील होते हैं, परन्तु कार्बनिक घोलकों (बेंजीन, ईथर, कार्बन टेट्राक्लोराइड आदि) जो अधुवीय होते हैं, में अघुलनशील होते हैं। उदाहरण के लिए, सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम आयोडाइड आदि जल में घुलनशील होते हैं, परन्तु ये बेंजीन, किरासन तेल, पेट्रोल आदि में अघुलनशील होते हैं।

(v) ठोस अवस्था में आयनिक यौगिकों के अवयवी आयनों के बीच मजबूत आकर्षण बल कार्यरत रहने के कारण इनके आयन एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गमन नहीं कर सकते हैं। इस कारण ठोस अवस्था में ये यौगिक विद्युत् के कुचालक होते हैं।

(vi) आयनिक यौगिकों के अवयवी आयन गलित अवस्था में या जलीय विलयन में आयनीकृत होकर एक-दूसरे के आकर्षण बल से मुक्त हो जाते हैं। इस कारण गलित अवस्था में या जलीय विलयन में ये यौगिक विद्युत् के सुचालक होते हैं तथा विद्युत् अपघटन होता है।

(vii) वैद्युत् संयोजक यौगिकों की अभिक्रियाएँ आयनिक प्रकृति की और प्रायः तीव्र गति वाली होती हैं।

  1. सहसंयोजक बंधन (Covalent Bond): जब दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप रासायनिक बंधन बनता है, तब उसे सहसंयोजक बंधन कहते हैं। सहसंयोजक बंधन के बनने में दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी इस प्रकार से करते हैं कि निर्मित अणु में प्रत्येक परमाणु एक अक्रिय गैस का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है। सहसंयोजक बंधन तभी बनता है, जब अभिकारी परमाणुओं को अक्रिय गैस की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता हो। सहसंयोजक बंधन तीन प्रकार के होते हैं-

(i) एकल सहसंयोजक बंधन (Single Covalent Bond): जब दो परमाणुओं के बीच एक जोड़ा इलेक्ट्रॉनों का साझा होता है, तब एकल सहसंयोजक बंधन बनता है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन अणु (H2) में दोनों H परमाणुओं के बीच साझेदारी में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2 (या एक जोड़ा) होती है। अतः इनके बीच एकल सहसंयोजक बंधन बनता है।

H : H → H – H

(ii) द्विक सहसंयोजक बंधन (Double Covalent Bond): जब दो परमाणुओं के बीच दो जोड़े इलेक्ट्रॉनों का साझा होता है, तब उनके बीच द्विक सहसंयोजक बंधन बनता है। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन अणु का बनना।

O : : O → O = O

(iii) त्रिक सहसंयोजक बंधन (Triple Covalent Bond): जब दो परमाणुओं के बीच तीन जोड़ा इलेक्ट्रॉनों का साझा होता है, तब उनके बीच त्रिक सहसंयोजक बंधन बनता है। उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन अणु का बनना।

N : : N → N ≡ N

सहसंयोजकता (Covalency): किसी सहसंयोजक यौगिक में एक परमाणु की सहसंयोजकता इलेक्ट्रॉनों की वह संख्या है, जिसे वह परमाणु साझेदारी में भाग लेने के लिए, प्रदान करता है। उदाहराण के लिए, H2 (H ­­­- H) में हाइड्रोजन की सह-संयोजकता 1, O2, (O=O) में ऑक्सीजन की सह-संयोजकता 2, N2 (N ≡ N) में नाइट्रोजन की सह संयोजकता 3, CH4 में कार्बन की सहसंयोजकता 4 होती है।

सहसंयोजक यौगिकों के गुण: दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलवस्वरूप बने रासायनिक यौगिक की सहसंयोजक यौगिक कहते हैं। सहसंयोजक यौगक के निम्नलिखित गुण होते हैं-

  1. अधिकांश सहसंयोजक यौगिक साधारण अवस्था में गए या द्रव या वाष्पशील ठोस होते हैं।
  2. सहसंयोजक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक निम्न होते हैं, इसका कारण यह है कि इनमें अन्तराण्विक बल वैद्युत संयोजक यौगिकों के स्थिर वैद्युत आकर्षण बल की अपेक्षा बहुत कमजोर होते हैं।
  3. सहसंयोजक यौगिक जल में प्रायः अविलेय, परन्तु कार्बनिक विलायकों में विले होते हैं।

सहसंयोजक यौगिक और उनकी आकृतियाँ
सहसंयोजक यौगिकज्यामितीय आकारबंधन कोण
1. कार्बन डाइऑक्साइडएकरैखिक180°
2. जलकोणीय105°
3. अमोनियापिरामिड109°
4. मिथेनचतुष्फलकीय109°28'
5. एथिलीनतलीय120°
6. ऐसीटिलीनएक रैखिक180°
7. कार्बन टेट्राक्लोराइडचतुष्फलकीय109°28'
8. फॉस्फोरस पेंटाक्लोराइडत्रिकोणीय बाइपिरामिड120°, 90°
9. सल्फर हेक्साक्लोराइडअष्टफलकीय90°
10. हाइड्रोजन सल्फाइडकोणीय92°
11. सल्फर डाइऑक्साइडकोणीय119.5°
12. फॉस्फीनपिरामिड107.5°
13. क्यूप्रामोनियम आयनवर्गाकार समतलीय90°

  1. सहसंयोजक यौगिक द्रवित अवस्था या विलयन की अवस्था में विद्युत् के कुचालक होते हैं, क्योंकि इन अवस्थाओं में ये आयन उत्पन्न नहीं करते हैं। किन्तु HCl और NH3 के जलीय विलयन विद्युत् के सुचालक होते हैं, क्योंकि इन विलयनों में आयन उपस्थित होते हैं।
  2. सहसंयोजक यौगिकों के साथ अभिक्रियाएँ प्रायः धीरे-धीरे होती हैं।
  3. सहसंयोजक यौगिक अणुओं के रूप में रहते हैं।

  1. उप-सहसंयोजक बंधन (Co-ordinate Bond): उप-सहसंयोजक बंधन में इलेक्ट्रॉन युग्म एक ही परमाणु से प्राप्त होता है। इस बंधन की रचना में इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करने वाले परमाणु को दाता तथा ग्रहण करने वाले परमाणु को ग्राही कहा जाता है। दाता परमाणु द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉन युग्म को एकाकी युग्म कहा जाता है।

उप-सहसंयोजक बंधन को तीर (→) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करने वाले दाता पर धनात्मक आवेश (δ+) तथा इसे ग्रहण करने वाले ग्राही परमाणु पर ऋणात्मक आवेश (δ-) स्थापित हो जाता है। उदाहरण- अमोनियम आयन (NH4+) का बनना।

इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी (Lone Pair of Electron): इलेक्ट्रॉनों का ऐसा जोड़ा जो सहसंयोजक बंधन के बनने में भाग नहीं लेते हैं, इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी कहलाता है। उदाहरण के लिए, जल (H2O) के बनने में ऑक्सीजन परमाणु के पास दो जोड़े इलेक्ट्रॉन शेष रह जाते है, जिनका साझा किसी भी परमाणु के साथ नहीं होता है। इसी प्रकार अमोनिया (NH3) में नाइट्रोजन परमाणु के पास एक जोड़ा इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है।

यौगिक जिनमें सहसंयोजक और आयनिक दोनों बंधन उपस्थित हो: कुछ ऐसे यौगिक भी होते हैं, जिनके अणु में सहसंयोजक और आयनिक दोनों प्रकार के बंधन उपस्थित रहते हैं। जैसे- सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH), हाइड्रोजन सायनाइड (HCN), सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4,), कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3) आदि।

(i) सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH): इसमें सोडियम आयन (Na+) तथा हाइड्रॉक्सिल आयन (OH-) के बीच आयनिक बंधन रहता है, किन्तु हाइड्रॉक्सिल आयन के हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं के बीच एकल सहसंयोजक बंधन रहता है।

NaOH → Na+ – O – H

(ii) हाइड्रोजन सायनाइड (HCN): इसमें हाइड्राजेन आयन (H+) तथा सायनाइड आयन (CN-) के बीच आयनिक बंधन रहता है, जबकि सायनाइड आयन (CN-) के कार्बन और नाइट्रोजन परमाणुओं के बीच त्रिक सहसंयोजक बंधन होता है।

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