ताम्रपाषाण काल (2000 ई.पू. से 500 ई.पू.) Chalcolithic Age - 2000 BC to 500 BC

ताम्रपाषाण काल के विषय में हमें केवल ध्वंसावशेषों से कुछ सूचना प्राप्त होती है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हम ताम्रपाषाणकालिक स्थलों को दो भागों में बाँट सकते हैं-

  1. परवर्ती हड़प्पा स्थल जो अपनी प्रकृति में ताम्रपाषाणकालिक ही थे।
  2. अन्य ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ।

इसके अलावा कुछ अन्य संस्कृतियाँ हैं जैसे उदाहरण के लिए चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति तथा उत्तरी काले पालिशदार मृदभांड संस्कृति। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् भारतीय उपमहाद्वीप में कतिपय संस्कृतियाँ अस्तित्व में आई। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् क्रमबद्ध नगर योजना, पक्के ईंटों का प्रयोग, लेखन कला, मानक माप व तौल की प्रणाली आदि संस्कृतियां आई परन्तु संभवत: इनका एक सकारात्मक प्रभाव था, ग्रामीण क्षेत्रों में धातु तकनीकी का प्रसार। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् कुछ ऐसी ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ अस्तित्व में आई जिन पर सिन्धु सभ्यता का प्रभाव देखा जा सकता है। इन्हें परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के नाम से जाना जाता है। इस संस्कृति के अंतर्गत कुछ महत्त्वपूर्ण संस्कृतियाँ इस प्रकार हैं- सिंध में झूकर संस्कृति, पंजाब एंव वहावलपुर में कब्रगाह ‘एच' संस्कृति, गुजरात में लाल-चमकीले मृदभांड संस्कृति, गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में गैरिक मृदभांड संस्कृति।

ताम्रपाषाणकालीन कृषि संस्कृति

धातु काल के मनुष्यों के सामाजिक जीवन में पहले की अपेक्षा कुछ सुधार अवश्य हुआ होगा। इस संस्कृति के अंतर्गत तांबे एवं पत्थरों के उपकरणों का प्रयोग साथ-साथ होता था। यद्यपि सीमित रूप में निम्न गुणवत्ता से युक्त कांसे का भी प्रयोग होता था। कुछ ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ द.पू. राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग एवं पश्चिमी महाराष्ट्र में स्थापित हुई। इसके अलावा कुछ बस्तियाँ पूर्वी भारत व दक्षिणी भारत में भी स्थापित हुई। इन ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियों की निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं-

  1. चित्रित बर्तनों का प्रयोग जो मुख्यत: लाल पर काले रंगों से रंगे थे।
  2. सिल्कामय पत्थरों के ब्लेड व पत्थरों का अत्यधिक विकसित उद्योग।

दक्षिण पूर्व राजस्थान में अहार या बनास संस्कृति का विकास हुआ। इसका विकास बनास की घाटी में हुआ। इसका प्रारूप स्थल अहार था। यद्यपि गिलुद भी इसी से सम्बद्ध है। गिलुद से ही पकाये गए ईंटों का साक्ष्य प्राप्त होता है, जो लगभग 1500 ई.पू. से सम्बद्ध है। अहार से हमें लघुपाषाण उपकरण प्राप्त नहीं होते है, केवल तांबे के उपकरण ही मिले हैं। अहार को ताम्रवती भी कहा गया है। अहार में बने हुए मकान लकड़ी व कच्ची मिट्टी के बदले, पत्थरों के मिले हैं। इस संस्कृति का काल 2400 से 1400 ई.पू. है।

पश्चिम मध्यप्रदेश में मालवा संस्कृति का विकास हुआ। इससे पूर्व कायथा संस्कृति का भी विकास हो चुका था। इसका काल 2000 ई.पू. से 1800 ई.पू. था, जबकि मालवा का 1700 से 1200 ई.पू.। मालवा संस्कृति का मूल क्षेत्र मालवा, कायथा व एरण है। मालवा संस्कृति अपनी मृदभांडो की उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है। आगे मालवा संस्कृति का प्रसार महाराष्ट्र क्षेत्र में भी हुआ।

ताप्ती नदी की घाटी में (2000-1800 ई.पू.) स्वाल्दा तथा महाराष्ट्र में जोरवे संस्कृति का विकास हुआ। जोरवे संस्कृति का मुख्य क्षेत्र जोरवे, नेवासा, दैमाबाद, इनामगांव, प्रकाश, नासिक और चंदोली इत्यादि थे। इसका काल 1400 ई.पू. से 700 ई.पू. तक माना जाता है। जोरवे संस्कृति के अंतर्गत घरों की बनावट वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार होती थी। दीवारें मिट्टी या गारे को मिलाकर बनाई जाती थीं। दैमाबाद में प्राप्त तांबे की चार वस्तुएँ हैं- रथ चलाता मनुष्य, सांड, गैडा एवं हाथी। जोरवे संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल दैमाबाद ही  है। यहाँ से चार संस्कृतियों के स्तर प्राप्त हुए हैं। सबसे बड़ा उत्खनित ग्रामीण स्थल नवदाटोली है। सर्वाधिक फसलों की संख्या नवदाटोली से प्राप्त हुई है।

पूर्वी भारत में बिहार में चिरंद, सेनुआर, सोनपुर व तारादीह में ताम्रपाषाणकालीन स्थल मिले हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह व नरहन में ताम्रपाषाणकालीन स्थल मिले हैं। उसी तरह बंगाल में पांडू, रजार, ढीबी तथा महीषादल में ताम्रपाषाणकालीन स्थल प्राप्त हुए हैं।

ताम्रपाषाणकालीन स्थल

मेहरगढ़- मेहरगढ़ से तीन संस्कृतियों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं- नवपाषाणकालीन, क्वेटा संस्कृति, हड़प्पा और हड़प्पा कालीन संस्कृति। यहाँ से कपास की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है जो आर्वेरियम गोसिपियम किस्म का है। इससे कपास के आयतित होने की धारणा टूटी। ऐसा माना जाता है कि मेहरगढ़ से ही हड़प्पावासियों को कपास की जानकारी मिली थी। यहाँ से पूर्व हड़प्पाकाल में लाजवर्त मणि के प्रयोग का साक्ष्य मिला है।

मेट्ठी (पूर्वी बलूचिस्तान)- यह कुल्ली-नाल संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से तैौबे को गलाकर चिन और दर्पण के निर्माण का साक्ष्य मिला है। यहाँ से दफनाने और दाह संस्कार का साक्ष्य मिला है जो इसकी अद्वितीय विशेषता है। साथ ही यहाँ से कलश शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।

आमरी-आमरी पाकिस्तान- सिंध क्षेत्र में स्थित है। इसकी खोज सर्वप्रथम कसाल द्वारा की गई और फिर आर. जी. मजुमदार एंव एन. जी. मजुमदार द्वारा इसे प्रकाश में लाया गया। यहाँ से चार संस्कृतियों की जानकारियाँ मिलती हैं-

  • प्राक् हड़प्पा - ताम्रपाषाण फेज I – आमरी संस्कृति

प्रमुख स्थल – झांगर

हड़प्पा - ताम्रपाषाण फेज II - हड़प्पा संस्कृति

प्रमुख स्थल – झूकर

  • हड़प्पोत्तर – ताम्रपाषाण फेज III - झूकर संस्कृति
  • हड़प्पोत्तर - ताम्रपाषाण फेज IV - झांगर संस्कृति

प्रमुख स्थल- आमरी

आमरी से पाषाण और ईट निर्मित मकान के संकेत प्राप्त होते है। यहाँ से अन्नागार का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। आमरी के लोगों द्वारा चाक निर्मित मृदभांडों का प्रयोग किया जाता था।

रानाधुंडई- पाकिस्तान में गोमलघाटी के झोब लोरलाई क्षेत्र में स्थित, इस स्थल से प्राप्त मृदभांडों पर हड़प्पा की तरह चित्रकारी की गई है। यहाँ से प्राप्त मृण्मूर्तियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि इनका निर्माण अंगप्रत्यंग जोड़कर किया जाता था। यहाँ से हड़प्पा की तरह कूबड़दार बैल की मूर्ति प्राप्त हुई है। यहाँ से सोने की पिन भी प्राप्त हुई है जो अन्य किसी भी स्थल से नहीं प्राप्त हुई है। यहाँ से घोडे की अस्थियाँ भी प्राप्त हुई हैं। कई संदभों में यह स्थल हड़प्पा से सादृश्य रखता है।

कोटदीजी- सिंध क्षेत्र में स्थित इस स्थल की 1935 में धुर्रे द्वारा पहचान की गई। 1955 में एफ. ए. खान द्वारा उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया। यहाँ से प्राप्त सोलह स्तर दो संस्कृतियों से सम्बद्ध हैं। यहाँ से प्राप्त ऊपर के तीन स्तर हड़प्पा काल से, एक संक्रमण काल से और नीचे के बारह स्तर हड़प्पा-पूर्व काल से सम्बद्ध हैं। इसका विकास स्थानीय संस्कृति के रूप में हुआ तथा संक्रांति स्वर हड़प्पा संस्कृति के स्थानीय संस्कृति होने का प्रमाण है। यहाँ बस्ती के बाहर कच्ची ईंटों की सुरक्षा दीवार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। कालीबंगा की तरह कोटदीजी के हड़प्पा-पूर्व संस्कृति का पतन भीषण अग्निकांड के कारण हुआ।

कालीबंगा- यह सोथी कालीबंगा संस्कृति का प्रमुख स्थल है। यह स्थल दो संस्कृतियों, पूर्व संस्कृति और हडप्पाई संस्कृति से संबद्ध है। इसकी खोज 1949 में अमलानंद घोष द्वारा की गई तथा 1961 में बी. बी. लाल के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ। यहाँ से बैल की खण्डित मूर्ति प्राप्त हुई है तथा मृदभांड पर कूबड़दार बैल की आकृति मिली है। कालीबंगा में चूड़ी उद्योग का साक्ष्य मिला है। यहाँ से भारत में सर्वप्रथम जुते हुए खेत तथा कृषि प्रचयलीका प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

मुंडीगांक- यहाँ से ऊँची दीवार तथा उसके ऊपर धूप में पकी ईंटों की बुर्ज का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ काँसे की मूठदार कुल्हाड़ियों और बसलों का प्रयोग भी किए जाने का साक्ष्य हड़प्पा काल में मिला है। साथ ही यहाँ से पक्की मिट्टी की स्त्री मृण्मूर्ति का साक्ष्य मिला है।

यदि अन्य आरंभिक हड़प्पा स्थलों पर गौर किया जाय, तो हम पाते कि कोटदीजी और कालीबंगा के अतिरिक्त तरकाई जिला से भी किलेबंदी का साक्ष्य मिला है। इसी प्रकार आरंभिक हड़प्पा काल में लीवान से पाषाण उद्योग का साक्ष्य मिला है। बहावलपुर क्षेत्र में हाकरा की सूखी तलहटी में 40 आरंभिक हड़प्पाकालीन स्थलों का पता चला है। कालीबंगा और कोटदीजी दोनों ही जगहों से मातृदेवी की मृण्मूर्ति, अन्नागार और किलेबंदी का साक्ष्य प्राप्त हुआ है और दोनों का ही पतन अग्निकांड के कारण हुआ है। आमरी, नाल और रानाघुंडई से न तो नारी मृण्मूर्ति और न ही पशु मृण्मूर्ति प्राप्त हुए हैं। नाल में उत्खनन कार्य एच. इरग्रीब्स (1925-26) के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ तथा यहाँ से मकानों के अंदर फर्श पर शवाधान का साक्ष्य मिला है। रहमान की ढेरी से आरंभिक हड़प्पा काल में ही सुनियोजित बस्ती का साक्ष्य मिला है। यहाँ ध्यातव्य है कि क्वेटा और झोब घाटी (उत्तरी बलूचिस्तान) में हड़प्पाई स्थल नहीं मिले हैं।

अन्य ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ

क्वेटा संस्कृति- यहाँ से गुलाबी रंग लिए सफेद रंग के मृदभांड प्राप्त हुए हैं जिस पर काले रंग से चित्रकारी की गई है।

कुल्ली संस्कृति- यहाँ पर ऑरेल स्टाइन के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ। यहाँ से अलंकृत मृदभांड का साक्ष्य मिला है जिसकी बाहरी सतह पर वृषभ का अंकन है। यहीं से दफनाने तथा कुल्ली से दाह संस्कार का साक्ष्य मिला है। यहीं से ही कच्ची ईटों के मकान का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

झोब संस्कृति- यहाँ स्टुअर्ट पिग्गट के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ तथा यहाँ से पाँच सांस्कृतिक चरणों का संकेत मिला है। दूसरे सांस्कृतिक चरण में चाक पर बने लाल रंग के मृदभांड का साक्ष्य प्राप्त हुआ है तथा मकान बनाने हेतु पत्थर की नींव का प्रयोग किया गया। झोब संस्कृति का चौथा और पाँचवां चरण पूर्ववर्ती काल से भिन्न है तथा यह हड़प्पा सभ्यता की परवर्ती अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। मुगलघुडई से पायाण लिंग और योनि के साक्ष्य प्राप्त हुए हे।

गैरिक मृदभांड संस्कृति- गंगा यमुना दोआब में हमें गैरिक मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य मिलता है। इसका काल 2000 से 1500 ई.पू. निर्धारित किया गया है। गैरिक मृदभांड संस्कृति में घर सरपट के बनाए जाते थे और उस पर मिट्टी की लिपाई की जाती थी। फर्श थापी गयी मिट्टी से बनायी गयी थी। इस संस्कृति का पतन सम्भवत: बाढ़ के कारण हुआ।

गंगा यमुना दोआब एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गैरिक मृदभांड संस्कृति का सर्वप्रथम साक्ष्य 1950 ई. में बदायूँ के पास रिसोली और बिजनौर के पास राजपुर परसा से प्राप्त हुआ है। अब तक कुल 110 स्थल प्रकाश में आ चुके हैं। आलमगीरपुर, हस्तिनापुर और अहिच्छत्र में गैरिक मृदभांड संस्कृति के अवसान के पश्चात् कुछ अंतराल तक खालीपन आ गया और फिर आगे चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति का विकास हुआ है; जबकि अतरंजीखेड़ा से यह साक्ष्य प्राप्त होता है कि गैरिक मृदभांड संस्कृति तथा चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के मध्य के काल में, काले एवं लाल मृदभांड संस्कृति का भी चरण रहा था।

काले व लाल मृदभांड संस्कृति- सर्वप्रथम 1960 ई. में अतरंजीखेड़ा नामक स्थल से काले व लाल मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् जोधपुरा एवं नोह से भी इस संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। काले व लाल मृदभांड संस्कृति का विशिष्ट लक्षण है, बर्तन के अंदर का भाग तथा बाहर के भाग में किनारा काले रंग तथा शेष बर्तन लाल रंग से चित्रित है। अतरंजीखेड़ा से गैरिक मृदभांड संस्कृति के पश्चात् काले एवं लाल मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य प्राप्त होता है।

ताम्र निधान संस्कृति- ताम्र संचय का सबसे पहला साक्ष्य 1822 ई. में कानपुर के पास बिठुर से प्राप्त हुआ है। अब तक ताम्र संचय के कुल 85 स्थान प्रकाश में आए हैं। इनमें ताम्र संचय का सबसे बड़ा भडार मध्य प्रदेश के गंगेरिया से प्राप्त हुआ है। यहाँ से कुल 424 उपकरण प्राप्त हुए हैं। ताम्र संचय के सबसे अधिक स्थल उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं। यहाँ कुल 35 स्थल मिले हैं। इटावा के पास साईपाई नामक स्थल से ताम्र संचय के साथ गैरिक मृदभांड भी प्राप्त होते हैं। इस आधार पर ताम्र संचय का संबंध गैरिक मृदभांड से मान लिया गया।

चित्रित धूसर मृदभांड- चित्रित धूसर मृदभांड का प्रारम्भिक साक्ष्य 1946 ई. में अहिच्छत्र से प्राप्त हुआ है। अब तक चित्रित धूसर मृदभांड के कुल 750 स्थल प्रकाश में आ चुके हैं लेकिन इनमें 30 स्थलों की खुदाई हुयी है। इनमें से चार स्थल ऐसे हैं-भगवानपुरा, दधेरी, नागर और कटपालन, जिनसे चित्रित धूसर मृदभांड के साक्ष्य मिलते हैं फिर भी इन्हें परवर्ती हड़प्पा का विस्तार माना जाता है। यहाँ से लोहे के उपकरण प्राप्त नहीं होते।

चित्रित धूसर मृदभांड से संबंधित सबसे बड़ा स्थल हरियाणा से प्राप्त बुखारी है। चित्रित धूसर मृदभांड में मकान सरपत के बनाए जाते थे एवं उन्हें मिट्टी से पोता जाता था। गंगा यमुना दोआब क्षेत्र से प्राप्त स्थलों में लोहे के उपकरण मिले हैं। केवल हस्तिनापुर से लोहे के उपकरणों का साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। खेती (कृषि) के उपकरणों में, जखेरा में लोहे की बनी हसिया एवं कुदाली प्राप्त हुई है। खुदाई के पश्चात् हस्तिनापुर से चावल तथा अतरंजीखेड़ा से गेहूँ व जौ का साक्ष्य मिला है।

उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड- इसका प्रारम्भिक साक्ष्य 1930 ई. में तक्षशिला से प्राप्त हुआ है। अब तक कुल 1500 स्थल प्रकाश में आए हैं। इनमें 74 स्थलों की खुदायी हुयी है। उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड संस्कृति के स्तर कहीं-कहीं चित्रित धूसर मृदभांडों के ऊपर प्राप्त हुए हैं तो कहीं काले व लाल मृदभांडों के ऊपर प्राप्त हुए हैं। यह आवश्यक रूप से लोहे से संलग्न है। कालांतर में यह द्वितीय नगरीकरण, पक्की ईंटों तथा आहत मुद्रा के प्रयोग में संलग्न हो गया है।

दक्षिण भारत

पुरापाषाण काल के अधिकांश स्थल प्रायद्वीपीय भारत से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण कालीन स्थल भी प्राप्त हुए। दक्षिण भारत में नवपाषाणकालीन स्थलों का विकास ही ताम्रपाषाणकालीन स्थलों के रूप में हुआ। अत: दक्षिण भारत के स्थल नवपाषाण-ताम्रपाषाण काल के नाम से जाने जाते हैं। दक्षिण भारत में खेतिहर समुदाय का विकास तीन चरणों में-

2500 से 1800 ई.पू.- इस चरण में उत्नूर, कुपयाल, कौडेकाल, पालावाय, पिकलीहल और मास्की आदि स्थलों से खेतिहर समुदायों के साक्ष्य मिलते हैं।

1800 से 1500 ई.पू.- इस चरण से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, पिकलीहल, ब्रह्मगिरी, संगनाकालू, तैकलकोटा, हल्लूर और टीमरसिपुर आदि।

1500 से 1100 या 1000 ई.पू.- इससे सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, तेकल्लकोटा, हल्लूर, पिकलीहल, संगनाकालू, ब्रह्मगिरी और पय्यामपल्ली आदि।

दक्षिण भारत में इन ताम्रपाषाणकालीन स्थलों से राख के ढेर प्राप्त हुए हैं। सम्भवतः यह धार्मिक अनुष्ठान से संबद्ध था। दक्षिण भारत में ताम्रपाषाणकाल का अंत 1100/1000 ई.पू. में हुआ।

सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग कमोवेश एक ही चरण में हुआ था। लगभग 1100/1000 ई.पू. में द. भारत में लोहे के उपकरणों का प्रयत्न प्रारम्भ हो गया। तत्पश्चात् दक्षिण भारत के इतिहास में महापाषाणकाल की शुरूआत हुई। इस महापाषाणकाल की सूचना हमें उनकी यथार्थ बस्तियों से कम तथा उनकी कब्रों से ज्यादा होती है। उसी प्रकार महत्वपूर्ण आवास स्थल एंव कब्रगाह निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं-कर्नाटक में ब्रह्मगिरी, मास्की, हल्लूर, जदिगेनहल्लि, आंध्रप्रदेश में नागार्जुनकोंड, चेल्लेस्वरम तथा पोचमपद, तमिलनाडु में अमृतमंगलम, सनुर तथा कुन्नुपुर और केरल में पोरमकालम महत्वपूर्ण हैं। महापाषाणकालीन शवों को दफनाने के भी तरीके देखने को मिलते हैं। इसी अधर पर भारत में मुख्यतः 4 प्रकार के महापाषणकालीन कब्रगाह देखे जाते हैं।

संगौरा वृत- इसमें पहले शव को लोहे के औजारों मनिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की हड्डियों के साथ दफना दिया जाता था। तत्पश्चात् समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगोरा वृत नया कुंड बोरगाँव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।

ताबूत- यह भी अत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार की महापाषाणयुगीन समाधियाँ उत्तर प्रदेश के बाँदा एंव मिर्जापुर जिलों में मिलती हैं।

मैनहरि- इस प्रकार की समाधियों में, शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा-सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था तो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इस प्रकार की स्मारक समाधियाँ कर्नाटक के मस्की एंव गुलबर्गा क्षेत्रों में मिलती हैं।

महापाषाण तंब- इस प्रकार की समाधियों के निर्माण में, सर्वप्रथम पत्थर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी स्थित कर दी जाती थी। उपरोक्त बनावट मेज के आकार का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तंब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज इस प्रकार की समाधियाँ कर्नाटक में ब्रह्मगिरी एंव तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थान पर प्राय: देखी गयी हैं।

दक्षिण के इस महापाषाणकालिक संस्कृति के दो महत्वपूर्ण अभिवधण रहे, प्रथम लौह उपकरणों का प्रयोग तथा दूसरे काले एवं लाल मृदभांडों के प्रयोग से जुड़ा होना। महापाषाणकालिक लोग साधारणतया पहाड़ की ढलान पर रहते थे। अपने आवास के लिए वे नैसर्गिक तालाब या जलाशय के निकट पर्वतीय क्षेत्र का उपयोग करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि उन लोगों ने सिंचाई की सहायता से धान की उपज प्रारंभ की किन्तु आरंभ में कृषि के लिए उपयोगी उपकरण, जैसे फावड़े, कुदाल, हँसुवा आदि की अपेक्षा युद्ध से संबंधित उपकरणों की संख्या ही अधिक है। अत: ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि महापाषाणकालिक लोग कृषि का विशेष विकास नहीं कर सके थे। महापाषाणकालिक लोग धान और रागी की खेती करते थे तथा मवेशी, भेड़ एवं बकरी पालते थे। आरंभ में ये सीमित भूमि का ही उपयोग करते थे परन्तु संभवतः प्रथम शती में अथवा इससे कुछ पहले ही उपजाऊ भूमि को कृषि के लिए उपयोग में लाने लगे थे।

महापाषाणकालिक संस्कृति से संबद्ध आवास स्थल एवं कब्रगाह दोनों प्रचुर संख्या में मिले हैं। इससे संबद्ध महत्वपूर्ण आवास स्थल दक्षिण भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं- कर्नाटक में ब्रह्मगिरी, मास्की, पिक्कीहल, संगनकल्ल, हालेंगती, हल्लर तथा टी. नरसीपूर, आंध्र प्रदेश में नागा, नागार्जुनकोंड, केसर पल्लि, येलेस्वरम, तमिलनाडु में पय्यमपल्लि कुनरत्तूर, तिरूक्कमपलपूर तथा उरैयुर। मृतक की आवश्यकता की सामग्री को भी इनके (कब्र के) साथ दफनाया जाता था। यहाँ के दो स्थलों- यथा, हल्लूर व पिक्कीहल से लोहे का साक्ष्य कब्रों से मिला है। इसमें देशी व विदेशी संस्कृति का मिश्रण है। चित्रकारी में घोड़े भी हैं। अत: इनका संबंध मध्य एशिया से रहा होगा। दक्षिण भारत में उस समय घोड़े नहीं थे।

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