मूलभूत रसायन उद्योग Basic Chemicals Industry

इसके अंतर्गत वे रसायन शामिल हैं, जिनका प्रयोग अन्य उत्पादों के निर्माण में कच्चे माल के रूप में किया जाता है तथा जो बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जाता है। मूलभूत रसायनों में सल्फ्यूरिक अम्ल, सोडा भस्म, कॉस्टिक सोडा, जैब्नाशक एवं कीटनाशक शामिल हैं।

सल्फ्यूरिक अम्ल का प्रयोग प्लास्टिक पेन्ट्स, उर्वरकों, औषधियों विरंजक पदार्थों, चर्मशोधकों तथा कृत्रिम रेशों के निर्माण में किया जाता है। सल्फ्यूरिक अम्ल बनाने वाले प्रमुख संयंत्र खेतड़ी, अलवाय, मुंबई, कोलकाता, बर्नपुर तथा जमशेदपुर में स्थित हैं। सोडा भस्म बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में सोडियम क्लोराइड तथा चूना-पत्थर की जरूरत होती है। इसके मुख्य संयंत्र गुजरात के पोरबंदर, मीठापुर, घारान्गधरा में स्थापित हैं। कॉस्टिक सोडा सामान्यतः सोडा भस्म के रासायनिक परिवर्तन द्वारा तैयार किया जाता है। अतः सोडा भस्म उत्पादित करने वाले संयंत्रों में ही कॉस्टिक सोडा का उत्पादन होता है। गुजरात के उक्त तीन संयंत्रों के अतिरिक्त कल्याण व ठाणे (महाराष्ट्र) तथा टीटागढ़ (प. बंगाल) में भी कॉस्टिक सोडा का उत्पादन होता है।

रासायनी (महाराष्ट्र) स्थित हिंदुस्तान ऑर्गनिक केमीकल्स लिमिटेड द्वारा औषधियों, कृत्रिम रबर तथा विरंजकों के निर्माण में प्रयुक्त किये जाने वाले आवश्यक रसायनों का उत्पादन किया जाता है। जैवनाशक, जिनमें कीटनाशक, कृतंकनाशक व फंफूद नाशक भी शामिल हैं- कृषि एवं जन-स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। हिंदुस्तान इनसेक्टीसाइड लिमिटेड द्वारा अपने उद्योगमंडल (केरल), रासायनी (महाराष्ट्र), दिल्ली तथा कोवूर स्थित केंद्रों के माध्यम से बेन्जीन हेक्साक्लोराइड, डी.डी.टी., मैलाथियान तथा एंडोसुल्जान का उत्पादन किया जाता है।

अल्कोहल आधारित उद्योगों का विकास 1940 के दशक के बाद शुरू हुआ, जो चीनी उद्योग से प्राप्त शीरे का प्रयोग करते थे। बाद में इनके द्वारा अन्य रसायनों का उत्पादन शुरू कर दिया गया। तेल संकट ने एक पुनर्नवीकरणीय ईंधन के रूप में अल्कोहल के महत्व को तथा पॉलीविनाइलक्लोराइड (पीवीसी) इत्यादि रसायन उद्योगों में अल्कोहल का उपयोग किया जाता है।


पेट्रोरसायन उद्योग

1990 के दशक के दौरान लगभग 18 प्रतिशत प्रतिवर्ष संवृद्धि के साथ भारतीय पेट्रोरसायन ने भारतीय औद्योगिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। इस उद्योग में मुख्यतः सिंथेटिक फाइबर, पॉलीमर्स, इलास्टोमर्स, सिंथेटिक डिटरजेंट, परफॉर्मेस प्लास्टिक आदि आते हैं। इस क्षेत्र ने कृत्रिम रबड़, कृत्रिम रेशा, कृत्रिम साबुन, पीवीसी तथा प्लास्टिक जैसे उत्पादों के निर्माण से औद्योगिक परिदृश्य को बदलकर रख दिया है, क्योंकि इन नये उत्पादों ने अब पुराने परम्परागत कच्चे मालों- लकड़ी, कांच, धातु इत्यादि का स्थान ग्रहण कर लिया है। इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईपीसीएल) पेट्रोरसायन उत्पादों का अग्रणी उत्पादक है, जिसके नेप्था आधारित संयंत्र वड़ोदरा (गुजरात), नागोथाने (महाराष्ट्र) तथा गैस आधारित परिसर खम्भात की खाड़ी (गुजरात) में दाहेज में स्थित हैं।

भारतीय पेट्रोरसायन निगम लिमिटेड (आईपीसीएल) में कई कंपनियों के मिश्रण के साथ, निगम ने 2005 में पॉलिस्टर क्षेत्र में प्रवेश किया। निगम की पॉलिस्टर इकाइयां होशियारपुर (पंजाब), नागपुर (महाराष्ट्र), इलाहाबाद और बाराबंकी (उत्तर प्रदेश), बोलपुर (ओडीशा) तथा सिलवासा (गुजरात) में हैं।

रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड, एक निजी क्षेत्र का उद्यम, पेट्रोरसायन क्षेत्र में महत्वपूर्णं उपस्थिति रखती है।


उर्वरक उद्योग

रासायनिक उर्वरक उद्योग भारत का महत्वपूर्ण उद्योग है। इसका स्थान देश के उद्योगों में इस्पात उद्योग के बाद दूसरा है। भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उर्वरक उत्पादक देश है। चीन और अमेरिका क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं। कृषि के क्षेत्र में विशेष रूप से हरित क्रांति के बाद उर्वरक एक महत्वपूर्ण निवेश बन गया है।

1961 में भारतीय उर्वरक निगम (एफसीआई) की स्थापना की गयी। 1974 में स्थापित नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) ने उद्योग क्षेत्र में और बढ़ावा दिया। 1978 में, कपनी का पुर्नोत्थान किया गया और पांच अलग-अलग कपनियां- एनएफएल, एफ.सी.आई., हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर और प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इण्डिया लिमिटेड का संचालन एफसीआई के अंतर्गत शुरू किया गया।

रुग्ण औद्योगिक कपनी (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1985 के तहत् औद्योगिक और वितीय पुनर्निर्माण बोर्ड ने 1992 में फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (एफसीआई) को रुग्ण उद्योग घोषित कर दिया। अगले दशक में, भारत सरकार ने जोधपुर खनन संगठन को छोड़कर इस सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कम्पनी की अन्य सभी उर्वरक उत्पादन इकाइयों को समाप्त कर दिया, जो उसके बाद एक इकाई के रूप में अस्तित्व में आ गई।

जोधपुर खनिज संगठन का नया नाम एफसीआई अरावली जिप्सम और मिनरल्स इण्डिया लिमिटेड कर दिया गया। एफएजीएम आईएल या एफसीआई अरावली जिप्सम एण्ड मिनरल्स इण्डिया लिमिटेड की मुख्य गतिविधियों में सिंदरी उर्वरक संयंत्र के लिए जिप्सम खनिज की आपूर्ति करना था। जिप्सम उत्पाद अमोनियम सल्फेट के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में आवश्यक है। वर्ष 2003 से, जोधपुर खनन संगठन का एफसीआई अरावली जिप्सम एण्ड मिनरल्स इण्डिया लिमिटेड के साथ विलय हो गया। जोधपुर खनन संगठन के अंतर्गत जिप्सम उत्पादित करने वाली नौ खानें थीं। जिप्सम खनिज मोहनगढ़, कवास, बीकानेर, सूरतगढ़ और रामसिंह पुर जैसे भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित हैं। एशिया में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाली जिप्सम की राजस्थान के जैसलमेर में स्थित मोहनगढ़ खान के द्वारा आपूर्ति की जाती है।

फर्लिलाइजर्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (एफसीआई) की चार इकाइयां, सिन्द्री (बिहार) गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), तलचर (ओडीशा) तथा रामागुण्डम (आंध्र प्रदेश) में स्थापित हैं।

नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) की छह इकाइयां स्थापित हैं- नांगल, भटिण्डा, पानीपत, विजयपुर और विजयपुर विस्तार। नांगल में दो इकाइयां [कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (सीएएन) संयंत्र और यूरिया संयंत्र] हैं। अन्य सभी यूरिया संयंत्र हैं।

राष्ट्रीय केमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (आरसीएफ) ट्राम्बे के पांच उर्वरक संयंत्रों और थाल (महाराष्ट्र) के गैस पर आधारित बड़े संयंत्र का प्रबंध करता है। कम्पनी मेथेनॉल, सांद्रित नाइट्रिक अम्ल, मिथाइलमीन, अमोनियम बाई कार्बोनेट, सोडियम नाइट्रेट, डाइ-मिथाइल एसीटामाइड, डाइ-मिथाइल फॉरमाइड, इत्यादि की तरह औद्योगिक रसायन उत्पादित करती हैं।

राष्ट्रीय केमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड द्वारा निर्मित मुख्य उर्वरक उत्पादों में उज्जवला, सुफला, सुजला, माइक्रोला और बायोला शामिल हैं। बायोला एक बहुउद्देशीय जैव-उर्वरक है- यह मिट्टी में निश्चित फॉस्फोरस के साथ विलयन के रूप में होता है जो पौधों की वृद्धि के लिए उपयोगी है।

भारत सरकार के अधिकार के तहत् वर्ष 1978 में हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर्स कॉरपोरेशन लिमिटेड शुरू की गई। इस सार्वजनिक क्षेत्र की कपनी के तत्वावधान में कई संगठन आये। ये उत्पादित इकाइयां शामिल हैं- बरौनी, नामरूप, दुर्गापुर और हल्दिया।

1992 में, औद्योगिक और वितीय पुनर्निर्माण बोर्ड ने हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड की एक रुग्ण उद्योग के रूप में पहचान की। 1995 में, भारत सरकार ने हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड को पुनर्जीवित करने के लिए एक पुनर्गठन योजना तैयार की। लेकिन धन की कमी के कारण, दुर्गापुर और हल्दिया के संयंत्रों का सुधार संभव नहीं हो पाया।

ब्रह्मपुत्र वैली फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीवीएफसीएल) भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख उर्वरक कपनियों में से एक है। वास्तव में, यह नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस का उपयोग करने में अग्रणी माना जाता है। 2002 में, ब्रह्मपुत्र वैली फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीवीएफसीएल) की स्थापना एक नई कंपनी के रूप में हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड से नामरूप इकाई के अलग होने के बाद हुई। असम के डिब्रूगढ़ जिले में नामरूप में कुल तीन उत्पादन संयंत्र स्थित हैं। तेल एवं अधिशेष प्राकृतिक गैस की खोज क्रमशः लावा तेल क्षेत्र और नहरकटिया तथा मोरान क्षेत्र में की गई।

ब्रह्मपुत्र वैली फर्टिलाइजर कार्पोरेशन लिमिटेड अमोनिया और यूरिया के उत्पादन के लिए जानी जाती है। हालांकि, केवल यूरिया का मुक्ता यूरिया के ब्रांड नाम के तहत् बाजार के लिए उत्पादन किया जाता है। मुक्ता यूरिया का विपणन कृभकों कॉपरेटिव नेटवर्क पर काफी हद तक निर्भर है जोकि महत्वपूर्ण कॉपरेटिव फर्टिलाइजर कपनियों में से एक है।

फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड (एफएसीटी), उद्योगमंडल (केरल) की तीन इकाइयां चल रही हैं। इनमें से एक उद्योगमंडल में और दो कोच्चि में हैं। उर्वरकों के अलावा, कपनी रसायनों के निर्माण में भी संलग्न है।

मद्रास फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एमएफएल) भारत सरकार एवं राष्ट्रीय इरानी तेल कपनी और शेष सार्वजनिक धारिता के रूप में एक संयुक्त उपक्रम है।

पाइराइट्स, फॉस्फेट्स एण्ड केमिकल्स लिमिटेड की स्थापना 1963 में की गई थी। यह अमझोर (बिहार) और सलादीपुरा (राजस्थान) में पाइराइट्स के खनन तथा मसूरी में फास्फेट खनन में सक्रिय है। अमझोर में सिंगल सुपर फॉस्फेट का उत्पादन भी होता है।

पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड (पीपीएल) को ओडीशा में पारादीप के परिसर में फॉस्फेटिक फर्टिलाइजर बनाने के लिए स्थापित किया। पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड का एशिया में डीएपी या डाइ-अमोनियम फॉस्फेट संयंत्र सबसे बड़ा है। हाल के वर्षों में संगठन को भारी नुकसान उठाना पड़ा और इसके फलस्वरूप इकाई को रुग्ण घोषित किया गया। इसका उत्पादन बंद कर दिया गया। इसके अलावा वर्ष 1998 में इसे विनिवेश आयोग के पास भेजा गया। आयोग ने कम से कम 51 प्रतिशत की सामरिक बिक्री के लिए सिफारिश की। अब इस उद्यम का मालिक जौरी इंडस्ट्रीज लिमिटेड है और इसे मेसर्स जौरी फास्फेट प्राइवेट लिमिटेड के नाम से जाना जाता है।

प्रोजेक्ट्स एण्ड डेवलपमेंट इण्डिया लिमिटेड (पीडीआईएल) पहले फर्टिलाइजर (योजना एवं विकास) इण्डिया लिमिटेड के नाम से जानी जाती थी, उर्वरक एवं सहायक रासायनिक परियोजनाओं में डिजाइन, इंजीनियरिंग एवं संरक्षण एवं निर्माण/प्रारंभ की क्रियाओं में सक्रिय है। कपनी ने भारत में उत्प्रेरकों के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।

इसके अलावा, हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी (राजस्थान) में अम्ल युक्त उर्वरक संयंत्र है और नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, नेवेली (तमिलनाडु) में एक उर्वरक संयंत्र है।

इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कॉपरेटिव लिमिटेड (इफ्को) और कृषक भारती कॉपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के उर्वरक विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत बहु-राज्यीय कॉपरेटिव समितियां हैं। इफ्को की छह इकाइयों में गुजरात में कलोल और कांडला में एक-एक तथा उत्तर प्रदेश में फूलपुर, फूलपुर विस्तार, अंगोला और अंगोला विस्तार में एक-एक हैं। कृभकों के पास गुजरात के हजीरा में एक गैस आधारित अमोनिया-यूरिया संयंत्र भी है।

यहां कई राज्य स्तर और निजी क्षेत्र के संगठन उर्वरक के उत्पादन में शामिल हैं: गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर एण्ड केमीकल लिमिटेड, उर्वरकनगर (वडोदरा), गुजरात, कोरोमण्डल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, विशाखापत्तनम, एन्नौर और नवी मुंबई; श्रीराम फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स, कोटा (राजस्थान), जौरी इण्डस्ट्रीज लिमिटेड फर्टिलाइजर निगम लिमिटेड, तूतीकोरिन; डंकन्स इण्डस्ट्रीज लिमिटेड, कानपुर, मंगलौर केमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, पानम्बुर (मंगलौर), गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाइजर्स कं.लिमिटेड, भरूच (गुजरात), इण्डो-गल्फ फर्टिलाइर्स एण्ड केमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड, जगदीशपुर (उत्तर प्रदेश); गोदावरी फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स लिमिटेड, नागार्जुन फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स लिमिटेड, काकीनाडा,(आंध्र प्रदेश)।


कांच उद्योग

भारत में कांच उद्योग स्थूल रूप से दो भागों में विभक्त है- कुटीर उद्योग एवं कारखाना उद्योग। कुटीर उद्योगों में मुख्य रूप से कांच की चूड़ियों, गुलदस्तों, टेबल लैम्पों आदि का निर्माण होता है और कारखाना उद्योगों में कांच के पात्रों, बर्तनों, बल्ब, चिमनी, परावर्तक एवं वाहन की हेडलाइटों, जांच नलिकाओं आदि का निर्माण होता है। कांच उद्योग मुख्य रूप से फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश) एवं बेलगांव (कर्नाटक) में अवस्थित हैं।

आधुनिक उद्योग के रूप में यह उद्योग उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और पंजाब में केन्द्रित है। उत्तर प्रदेश में सिरेमिक उद्योग मुख्य रूप से परतदार कांच, खोखले और दबे (बल्व, चिमनी, रिफ्लेक्टर और मोटर हेडलाइट्स) हुए कांच वस्तुओं उत्पादक है, जबकि बंगाल और महाराष्ट्र कांच की ट्यूब्स, टेस्ट-ट्यूब्स, बीकर्स, और साधारण ग्लास के लिए प्रसिद्ध हैं। पंजाब में खोखली वस्तुओं और वैज्ञानिक एवं परिशुद्ध वस्तुओं का उत्पादन होता है।

कांच बनाने के लिए कच्चे माल की काफी संख्या में जरूरत पड़ती है जैसे- सिलिका रेत, कोयला और रसायन आदि। सिलिका रेत सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। कांच बनाने के लिए अपेक्षित शुद्ध कोटि वाला रेत भारत में कई स्थानों पर पाया जाता है। इसमें कोयले की सुलभ आपूर्ति का काफी महत्व है। काफी हद तक कोयला पश्चिम बंगाल और झारखण्ड से प्राप्त किया जाता है। रेत के अतिरिक्त सोडा एश, बोरेक्स, सेलेनियम, शोरा, मैंगनीज डाइआक्साइड, सल्फेट आदि रसायनों की आवश्यकता पड़ती है। ये रसायन देश में कम मात्रा में पाये जाते हैं।

भारत में कांच की सभी प्रकार की वस्तुएं निर्मित होती हैं, लघु क्षेत्र में कई प्रकार की विनिर्माण इकाइयां स्थापित की गई हैं। 40 से अधिक इकाइयां ग्लास कटेनर और खोखली वस्तुओं का उत्पादन कर रही हैं। भारत में 1993 में तरल कांच निर्मित करने के लिए प्रथम संयंत्र  स्थापित किया गयाजिसका निर्माण करने में वास्तुशिल्प, ऑटोमोटिव, दर्पण और सौर ऊर्जा उद्योगों में किया गया। बाजार में कई विदेशी ब्रांड भी आ गये हैं। सपाट ग्लास का उपयोग न केवल इमारतों की सुंदरता के लिए करते हैं अपितु लकड़ी की पर्याप्त बचत में भी सहायक है, इस प्रकार वन संसाधन का संरक्षण होता है।

भारत में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के लिए भी कांच का सामान निर्मित किया जाता है। 1980 के दशक के आस-पास फाइबर ग्लास के उत्पादन में विकास किया गया।

फाइबर ग्लास के उत्पादन और इससे पुनः प्लास्टिक उत्पाद बनाने के लिए फाइबर ग्लास का प्रयोग प्लास्टिक पदार्थ के मिश्रण के साथ किया जाता है। फाइबर ग्लास के प्रयोग का मुख्य उद्देश्य मिश्रित सामग्री को यांत्रिकी मजबूती प्रदान करना है, क्योंकि यह गैर-संक्षारक और एल्यूमीनियम की तुलना में हल्का लेकिन स्टील से अधिक मजबूत है।


नमक उद्योग

नमक मानव उपभोग की आधारभूत जरूरत है। इसका निर्माण मुख्य रूप से समुद्री जल, मृदा एवं झील के सौर वाष्पीकरण द्वारा होता है। देश में कुल नमक उत्पादन में 70 प्रतिशत योगदान समुद्री नमक का है। नमक निर्माण गतिविधि मुख्य रूप से गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, ओडीशा, पश्चिम बंगाल जैसे तटीय प्रदेशों और राजस्थान के पृष्ठ प्रदेश तक सीमित है। गुजरात, तमिलनाडु तथा राजस्थान अपनी जरूरत से अधिक नमक उत्पादन करते हैं, तथा नमक की कमी और गैर-नमक उत्पादक राज्यों की जरूरत को पूरा करते हैं।

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