श्री अरविन्द घोष Sri Aurobindo Ghose

अरविन्द घोष या श्री अरविन्द (1872-1950) एक देशभक्त भारतीय कवि और दूरदर्शी दार्शनिक थे, जो की भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध थे| श्री अरविंद घोष का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में कृष्ण धन घोष और स्वर्णलता बोस के घर हुआ था| स्वर्णलता बोस, राजनरायण बोस की पुत्री थी जो की एक अग्रणी राष्ट्रवादी थे| इनके पिता के. डी. घोष एक पश्चिम पारक व्यक्ति थे इन्हे पश्चिम की सभ्यता  से अत्यधिक लगाव था| जब अरविंद 7 वर्ष के थे तब इनके पिता इन्हे और इनके भाइयों और अपनी पत्नी को इंग्लैंड ले कर चले गये|

अरविंद लंदन में सेंट पॉल स्कूल में शिक्षित हुए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की साथ ही विश्वविद्यालय के लिए अपने क्षेत्र में प्रदान किए गए सभी शीर्ष पुरस्कार जीतने में सफल रहे| अरविंद जब हाई स्कूल में थे तभी से उनमें शास्त्रीय दुनिया और उनकी भाषा, ग्रीक और लैटिन सीखने में एक भावुक रुचि विकसित हो गई| श्री अरविंद ने जेयोहॉन गोती (Johann Goethe), दांते अलीघीएरी (Dante Alighieri) और पेड्रो काल्डेरों (Pedro Calderon) के मूल ग्रंथो को पढ़ने और समझने के लिए उन्होने फ्रेंच, जर्मन, इतालवी और स्पेनिश भाषाएँ भी सीखीं|

श्री अरविंद 18 वर्ष की आयु में ही आई. सी. एस. (I.C.S. Indian Civil services) की परीक्षा में बैठे और इसे उत्तीर्ण भी कर लिया| परंतु उन्होने भारत में ब्रिटिश सरकार के लिए काम नहीं करने का फैसला किया| इसके बजाय 1893 उन्हें बड़ौदा रियासत में नौकरी करना ज़्यादा उचित लगा|  उन्होंने बड़ौदा में तेरह साल बिताए और बड़ौदा राज्य कॉलेज (जो बाद में विश्वविद्यालय बना) के प्रमुख के पद तक पहुंचे| यह वह वर्ष थे जब उन्होंने निकट भविष्य में अपने कामो की तयारी कर ली थी| अपनी मूल भाषा बंगाली को छोड़कर उन्होंने संस्कृत सीखी, वेद, उपनिषद, और महाकाव्यों पढ़ा| उन्होंने मराठी, गुजराती भी सीखी| अपने सख्त हिंदू संस्कार के अनुसार 1901 में उन्होंने मृणालिनी बसु से शादी कर ली| 1905 में बंगाल-विभाजन के समय घोष सार्वजनिक सुर्खियों में आये| वह कोलकाता चले गए और नव स्थापित नेशनल कॉलेज, बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रमुख के पद को स्वीकार कर लिया| यहाँ उन्होंने बंगाली दैनिक ‘युगांतर’ शुरू कर दिया और बिपिन चंद्र पाल द्वारा संपादित अंग्रेजी दैनिक बंदे मातरम  में भी शामिल हो गए| श्री घोष ने बन्दे मातरम के कुछ पन्ने प्रकशित किये, जिसमे उन्होंने सर्वप्रथम अपने सत्याग्रह के तरीकों और स्वदेशी सिद्धांतों को रखा और उस समय ब्रिटिश अधिकारियों मुख्य रूप से लार्ड कर्जन के उस निर्णय का बहिष्कार किया जिसमे बंगाल को दो भागो एक मुसलिम बहुल और दुसरे हिन्दू बहुल प्रान्तों में विभाजित करने की बात कही गयी थी| कोलकाता में आयोजित 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के साथ "ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त पूर्ण स्वायत्तता" के अपने राष्ट्रवादी एजेंडे की घोषणा कर दी| घोष को बंदे मातरम् में भड़काऊ लेख प्रकाशित करने के लिए 1907 में गिरफ्तार कर लिया गया| श्री घोष के साहसिक और आत्मसम्मान की रक्षा के तरीकों ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी बहुत प्रभावित किया और उन्होंने अपनी कई कविताओं में उन्हें बधाई देते हुए लिखा कि “अरविन्द! रवींद्र का नमस्कार स्वीकार करें”| घोष को 1908 में फिर से गिरफ्तार किया गया और उन्होंने विचाराधीन कैदी के रूप अलीपुर जेल में एक साल बिताया| इतिहास में इसे 'अलीपुर षडयन्त्र केस' के नाम से जानते है। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द ने एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया जो उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस अनुभव ने उन्हें पूरी तरह से उसे बदल दिया| राष्ट्रवाद अब उनके जीवन में और भी गहरे और अभिन्न रूप में समा गया| अंग्रेजी साप्ताहिक ‘कर्मयोगिन’ और बंगाली साप्ताहिक ‘धर्म’ में उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की दिव्य महत्व पर लेख लिखा| ‘कर्मयोगिन’ के कार्यालय में 1910 में उन्हें यह संदेश मिला कि उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया जाएगा| उन्होंने एक त्वरित निर्णय किया और नाम बदलकर एक नाव में सवार होकर चंदेरनगर चले गए, जो कोलकाता के बाहर एक फ़्रांसिसी रियायत थी, यहाँ से वह पांडिचेरी चले गए, यह भी दक्षिण भारत की एक फ़्रांसिसी रियायत थी| अंग्रेजों ने पांडिचेरी के बाहर उन्हें पकड़ने का प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे| पांडिचेरी में  घोष ने राजनीतिक गतिविधियों को त्याग दिया| इसके बजाय उन्होंने खुद को योग, ध्यान, और पवित्र ग्रंथों का गहन अध्ययन करने के लिए समर्पित कर दिया| यहाँ उन्हें एक फ्रेंच दंपत्ति, पॉल रिचर्ड और उनकी पत्नी मिरा अल्फासा रिचर्ड (जो बाद में पांडिचेरी आश्रम की माँ बनी) ने संरक्षण दिया| अपने फ्रांसीसी मित्रों से सहायता के साथ, घोष ने मासिक पत्रिका ‘अन्य’ का प्रकाशन शुरू कर दिया जिसमे उन्होंने मानव जाति के दिव्य भाग्य, मानव जाति के एकीकरण, आत्मा और भारतीय सभ्यता और संस्कृति का महत्व जैसे अपने बुनियादी दार्शनिक पदों व्यक्त किया|  बाद में ये सभी लेख घोष की प्रसिद्ध रचना ‘जीवन परमात्मा (The Life Divine) में प्रकाशित हुए| इसके तुरंत बाद अरविन्द ने 23,813 पंक्तियों की अंग्रेजी की सबसे लम्बी कविता लिखी| इस महाकाव्य ने सर हर्बर्ट हॉल को भी प्रभावित किया जिस उन्होंने “किसी भी मानक से महान (great by any standard)" कहा| सन् 1926 में अरबिंदो अपनी तनहाई को पूरा करने के लिए सेवानिवृत्त हो गये| कुछ समय के लिए उन्होंने अपने अलगाव को तोडा|  1928 में उन्होंने कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर  से मुलाकात की जिन्होंने अरविंद के चेहरे को आंतरिक प्रकाश के साथ की चमक के साथ देखा| कई लोगों ने अरविन्द से उनके राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप का आग्रह किया| अरबिंदो ने सभी अनुरोधों को ठुकरा दिया और उनके आदर्शों और विचारों को समझने का आग्रह किया| उनकी योग पद्धति जीवन, मन और शरीर को बदलने के लिए व्यक्ति का सशक्तिकरण करती है| उनके अनुसार एक गतिशील अभिन्न सांस्कृतिक चेतना जो सर्वोपरि है उसे उन्होंने ‘परा-मन (supermind)’ कहा|

अरविन्द के पाँच प्रमुख स्वप्न थे, पहला मुक्त और स्वतंत्र भारत को देखने की उनकी कामना, जिसे उन्होंने 15 अगस्त 1947 पर अपने जन्मदिन पर सच होते देखा, उनका दूसरा सपना था एशिया के पुनरुत्थान, तीसरा पूरे विश्व का एक संघ, चौथा दुनिया को भारत की आध्यात्मिक उपहार देना, पाँचवाँ मानव विकास में एक बड़ा कदम जो उसे बड़े और उच्च चेतना की तरफ ले जाये| 5 दिसम्बर 1950 श्री अव्रिंद इस दुनिया को छोड़कर चले गये|  परंतु उनका काम पांडिचेरी आश्रम में उनके उत्तराधिकारियों ने और माँ ने जारी रखा| ऑरोविले, पांडिचेरी के बाहरी इलाके में स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय है जिसने अरविन्द के विचारों का प्रसार जारी रखा है| इनके विचारों के प्रसार के लिए हरिदास चौधरी ने 1971 में सैन फ्रांसिस्को में एकात्म अध्ययन संस्थान (Institute of Integral Studies) की स्थापना की जो श्री अरविंद के सांस्कृतिक और पूर्व / पश्चिम के अभिन्न दर्शन के मॉडलिंग पाठ्यक्रम पर आधारित एक पूर्ण मान्यता प्राप्त ग्रेजुएट स्कूल है|

अरविन्द की प्रमुख कृतियाँ -

द मदर

लेटर्स ऑन योगा

सावित्री

योग समन्वय

दिव्य जीवन

फ्यूचर पोयट्री

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