वायुमण्डल- संघटन एवं तापमान Atmosphere - Composition And Temperature

पृथ्वी के चारों ओर गंधहीन, रंगहीन और स्वादहीन पारदर्शी गैसों के मिश्रण का एक विशाल आवरण है, जो कई सौ किलोमीटर मोटा है। इस आवरण को ही वायुमण्डल (Atmosphere) कहा जाता है। प्रो. ट्रिवार्या (Triwartha) के अनुसार, “पृथ्वी से परिवेष्ठित गैसों का एक विशाल आवरण जो पृथ्वी का अभिन्न अंग है और उसे चारों ओर से घेरे हुए है, वायुमण्डल कहलाता है।”

वायुमंडल की संघटना या बनावट Composition of the Atmosphere

वायुमण्डल अनेक गैसों का यान्त्रिक सम्मिश्रण है। इसमें नाइट्रोजन, आक्सीजन (प्राण वायु), कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, हाइड्रोजन, हीलियम, नियोन, क्रिप्टोन, जिनोन (Xenon), ओजोन, आदि गैसें पायी जाती हैं, किन्तु धरातल के समीप की वायु में (10 किमी की ऊंचाई तक) ऑक्सीजन- 21% और नाइट्रोजन- 78%  गैसें ही मुख्य हैं। वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग इन्हीं दो गैसों से निर्मित है। शेष 1 प्रतिशत में अन्य सभी गैसें सम्मिलित हैं। वायु में गैसों के साथ अशुद्धियों के रूप में गन्धक का तेजाब, शोरे का तेजाब तथा अन्य कई पदार्थ सूक्ष्म मात्रा में मिलते हैं। इन गैसों के अतिरिक्त वायु की निचली परतों में थोड़ी मात्रा में धूल के कण व जल वाष्प भी पाए जाते हैं। अधिक ऊँचाई पर तो वायु हल्की या विरल होकर गुच्छों के रूप में बिखरी हुई मिलती है।

10 किलोमीटर के उपरान्त भारी गैसों की मात्रा विभिन्न ऊँचाई पर कम और हल्की गैसों की मात्रा बढ़ती जाती है। अतः सामान्यतः भारी गैसें वायुमण्डल के निचले स्तरों में और हल्की गैसें ऊपरी स्तरों में मिलती हैं। उदाहरणार्थ, कार्बन डाइऑक्साइड गैस वायुमण्डल में 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक, आक्सीजन और नाइट्रोजन 100 किलोमीटर की ऊँचाई तक और हाइड्रोजन 125 किलोमीटर की ऊँचाई तक मिलती है। इसके बाद बहुत ऊँचाई पर हीलियम, नियोन, क्रिप्टोन एवं जिनोन जैसी हल्की गैसें 125 किलोमीटर से अधिक ऊँचाई पर पायी जाती हैं।

वायुमंडल की परतें Layers of Atmosphere

पिछले 150 वर्षों में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर जो निष्कर्ष वायुमण्डल की विभिन्न परतों के बारे में निकाले गए हैं उसके अनुसार वायुमण्डल निम्नांकित परतों में विभक्त किया गया है-

परिवर्तन क्षोभमण्डल Troposphere

यह वायुमण्डल का सवसे नीचे का भाग है। जो धरातल से 16 किलोमीटर की ऊँचाई तक एवं ध्रुवों पर10 किमी. की ऊँचाई तक पाया जाता है। इस भाग में जलवाष्प, धूलकण और भारी गैसें अधिक पायी जाती हैं। वायुमण्डल के इस भाग में वायु कभी शान्त नहीं रहती। यहाँ आँधी, मेघ गर्जन, विद्युत का चमकना, कड़कना, इत्यादि अनुभव होती हैं। इसमें निरन्तर पवनें और संवहनीय धाराएँ चला करती हैं जो ताप और आर्द्रता को काफी ऊँचाई तक वितरित करती रहती हैं। इस भाग में ऊँचाई के अनुसार ताप गिरता जाता है। प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 सेण्टीग्रेड तापमान कम होता है। इसे ताप की सामान्य हास दर कहा जाता है। अतः इस भाग में नीचे से ऊपर की ओर तापमान के अनेक स्तर मिलते हैं। विक्षोभ सीमा में ध्रुवों पर -40° से -9° सेण्टीग्रेड तक और विषुवत् रेखा पर -80° सेण्टीग्रेड -90° सेण्टीग्रेड तक ताप रहते हैं।

वायुमण्डल की गैसें और उनकी मात्रा अथवा वायुमण्डल का संघटन

गैसें मात्रा प्रतिशत में
भारी गैसें नाइट्रोजन (N2) 78.03

99.02

99.9923

  ऑक्सीजन (O2) 20.99
  आर्गन (Ar) 0.9323
  कार्बन डाइऑक्साइड (CO­2) 0.03
  हाइड्रोजन (H2) 0.01
हलकी गैसें नियोन (Ne) 0.0018
हीलियम (He) 0.0005
क्रिपटोन (Kr) 0.0001
जेनान (Xe) 0.000005
ओजोन (O3) 0.000001

मध्य या क्षोभ स्तर Tropopause

क्षोभ मण्डल एवं समताप मण्डल के बीच यह एक संक्रमण पट्टी होती है। इसकी ऊँचाई ध्रुवों पर 10 किलोमीटर एवं विषुवत् रेखा पर 16 किलोमीटर है। इसे मध्य स्तर (Tropopause) कहते हैं। इसकी मोटाई 1.5 से 2 किलोमीटर है। इसमें तापमान प्रायः समान रहते हैं। इसकी निचली सीमा पर जेट पवनें चलती हैं।

समताप मण्डल Stratosphere

इसकी ऊँचाई 16 से 30 किलोमीटर तक आंकी गयी है। यहाँ क्षैतिज रूप से पवनें चला करती हैं। सम तापमान, मेघों का अपेक्षाकृत अभाव और हल्की पवनें इस मण्डल की अन्य विशेषताएँ हैं। यहाँ जल-वाष्प और धूलकण प्रायः नहीं मिलने से वायु विक्षोभ की क्रिया नहीं होती, यहाँ के तापमान प्रायः स्थिर रहते हैं। यहाँ वायुमण्डलीय प्रभावकारी घटनाएँ यथा- आंधी, तूफान, हिम, मेघगर्जन, आर्द्रता, धूलकण, आदि नहीं पाई जाती हैं।

ओजोन मण्डल Ozonosphere

यह 32 से 80 किमी. की ऊँचाई तक फैला हुआ है। इस भाग में ओजोन गैस की प्रधानता रहती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली अत्यन्त गरम पराबैंगनी किरणों (Ultra-violet Rays) को सोख लेती हैं। इसमें निहित ओजोन गैस (O3) के साथ UV किरणें O3 का आणविक विघटन करती हैं जिससे इनकी शक्ति समाप्त हो जाती है (O3 ó UVàO2 + O) धरातल से पहुंचने वाली ऑक्सीजन (O2) परमाणु ऑक्सीजन(O) को पुनः मिलाती है जिससे O3 बनती है। यह प्रक्रिया निरन्तर इस मण्डल में चलती है जिससे UV किरणों से पृथ्वी के जैव जगत की रक्षा होती है। वरना यह पृथ्वी अन्य ग्रहों की तरह वीरान होती। इस मण्डल से तापमान धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ने लगता है। इसका जलवायु पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है।

आयन मण्डल Ionosphere

ओजोन मण्डल के ऊपर वायु की कई तहें पायी जाती हैं। इन्हीं तहों को आयन मण्डल कहा गया है। वायुमण्डल का यह भाग 80 से 640 किलोमीटर तक विस्तृत है। इस भाग में स्वतन्त्र आयन की संख्या पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। आकाश का नीलवर्ण, घुवीय प्रकाश और ब्रह्माण्ड किरणे (Cosmic Rays ) इस भाग की विशेषताएँ हैं। इस मण्डल में तापमान की वृद्धि तेजी से होती है क्योंकि यहाँ की पवनें ब्रह्माण्ड किरणों को सोखकर विद्युन्मय हो जाती हैं।

बहिर्मण्डल Exosphere

वायुमण्डल में ऊँचाई के हिसाब से यह सबसे ऊँची और अन्तिम परत है, जिसकी ऊँचाई अनुमानतः 640 से 1,000 किलोमीटर और इससे भी अधिक आंकी गयी है। यहां पर सबसे हल्की गैसें रुई के गुच्छे की भाँति तैरती रहती हैं।

वायुमंडल का महत्त्व Importance of Atmosphere

वायु मानव सहित सम्पूर्ण जैव मण्डल का आधार है। पृथ्वी की सतह पर वायुमण्डल की गैसों की बनावट का अनेक प्रकार से प्रभाव पड़ता है। ऐसे प्रभाव की एवं वायुमण्डल की घटनाओं या आकस्मिक घटनाओं की खोज मनुष्य निरन्तर नव विकसित तकनीक, अनुभव, प्रेक्षण एवं दूरस्थ संवेदन (रिमोट सेंसिंग) तथा रॉकेट एवं उपग्रहों से सही-सही ज्ञान प्राप्त करता रहा है। इसी कारण मानव द्वारा वर्तमान में वनों का विनाश करने, इनका सन्तुलन बिगाड़ने एवं बढ़ते हुए प्रदूषण के कुप्रभावों से वर्तमान वैज्ञानिक जगत बुरी तरह चिन्तित है, क्योंकि इसका प्रभाव वायुमण्डल के सन्तुलन एवं परतों गैसों के व्यवहार पर पड़ता है। इसका तेजी से एवं घातक प्रभाव मानव तथा अन्य जीवों पर भी पड़ने लगा है। पृथ्वी तल का तापमान, गैसों का संगठन एवं मानव की सहनशीलता सभी इससे प्रभावित रहे हैं। इसी कारण परमाणु अस्त्रों पर रोक लगाई जा रही है। आज ओजोन परत में छिद्र होने की आशंका भी मानव एवं जैव-जगत को विशेष चेतावनी है। वैज्ञानिक इस ओर भी निरन्तर सुधार के लिए उपाय सुझाते रहे हैं। अतः संसार के सभी देशों के निवासियों एवं जैव-जगत का हित इसी में है कि वायुमण्डल की निचली परतें स्वच्छ एवं सहज रूप में बनी रहें। इसके लिए पृथ्वी की सतह पर वातावरण का सन्तुलन तथा मानव एवं जैव-जगत तथा प्रकृति के बीच मानव द्वारा सहयोग एवं सुखद स्थिति बनाए रखना आवश्यक है अन्यथा बढ़ते हुए प्रदूषण तथा विगड़ते हुए वायुमण्डल की सजा सम्पूर्ण मानव समाज को भुगतनी पड़ सकती है। पश्चिम एशिया में तेल के कुओं तथा इण्डोनेशिया के जंगलों में लगी आग से स्थानीय रूप से भयंकर गर्मी व प्रदूषण बढ़ा है। अत: वायुमण्डल में बढ़ती हुई घातक गैसों व जहरीले धुएं से भूमण्डल का तापमान गिर भी सकता है। वायुमण्डल की निचली परत असन्तुलित व दूषित हो सकती है। इनसे सम्पूर्ण भोजन श्रृंखला एवं जैव रसायन ही प्रदूषित होकर मानवशील क्रियाओं पर अनेक प्रकार से प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

सूर्यातप Insolation

वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रमुख स्रोत सूर्य है। सौर ऊर्जा को ही सूर्यातप कहते हैं। अनुमान है कि सूर्य के धरातल पर लगभग 5,700° सेण्टीग्रेड अथवा 6000° केल्विन से भी अधिक तापमान रहता है और इसके नाभिक (Nucleous) में 1.5 से 2.0 करोड़ डिग्री केल्विन तापमान रहता है। सूर्य से निरन्तर शून्य की ओर ताप तरंगों (Heat waves) के रूप में शक्ति प्रसारित होती रहती है। सूर्य के धरातल से निकलने वाली गर्मी प्रति वर्ग इंच लगभग 1,00,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है। पृथ्वी सूर्य से 14.96 करोड़ किलोमीटर दूर है एवं इसके धरातल को सूर्य से प्रसारित शक्ति का केवल 12,00,00,00,000 भाग (दो अरबवाँ भाग) ही प्राप्त होता है। सूर्य से पृथ्वी के समस्त धरातल पर प्रति मिनट इतनी शक्ति प्राप्त होती है, जितनी कि मानव जाति एक वर्ष में उपयोग में लाती है। सूर्य की शक्ति का इतना स्वल्प अंश प्राप्त होते हुए भी पृथ्वी की समस्त भौतिक और जीवन सम्बन्धी घटनाएं इसी शक्ति पर निर्भर हैं। सूर्य से प्राप्त होने वाली इसी शक्ति को ही सूर्याभिताप कहते हैं। यह प्रति सैकण्ड 2,97,000 किलोमीटर की गति से विद्युत चुम्बकीय तरंगों के द्वारा पृथ्वी के धरातल पर आता है। इसे पृथ्वी तल तक पहुँचने में 8 मिनट 30 सेकण्ड का समय लगता है।

स्टीयर्स के अनुसार, “एक दिन का सूर्यातप वह कुल ऊष्मा है जो सूर्य से धरातल पर उस एक दिन से प्राप्त होती है”। The insolation for a day is the total amount of heat received from the sun during that day.

मोंकहाउस के अनुसार, “सूर्य से विकरित ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है।"

ट्रिवार्था के अनुसार, “सूर्य से ताप का विकिरण लघु तरंगों के रूप में होता है जो 1250 से 16,700 किलोमीटर लम्बी होती है तथा 1,86,000 मील प्रति सेकण्ड की गति से चलती है, सूर्यातप कहलाती है।”

सूर्य पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूरा है। सूर्य की सतह पर 6,000 सेण्टीग्रेड तापमान है जो विकिरण द्वारा चारों ओर फैलता है, किन्तु सूर्य से प्रसारित इस शक्ति का कुछ अंश ही धरातल को प्राप्त होता है और इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव होता है।

सूर्य से बड़े परिमाण में चारों ओर शक्ति प्रसारित होती है, परन्तु सूर्य से प्रसारित इस शक्ति का कुछ ही अंश धरातल को प्राप्त होता है, क्योंकि सूर्य से निकलने वाली शक्ति जब धरातल पर पहुँचती है तो उसे वायुमण्डल की 640 किलोमीटर मोटी परत को पार करके आना पड़ता है। इसलिए धरातल पर आने वाली शक्ति का लगभग आधे से अधिक भाग मार्ग में नष्ट हो जाता है। किम्बाल (Kimball) ने नष्ट होने वाली शक्ति का आगणन इस प्रकार किया है- कुल 100% में से 35% प्रतिविम्बित होकर वापस शून्य में चली जाती है, 19% जलवाष्प, गैसें, वायुमण्डलीय क्रियाएं एवं धुल के कण सोख लेते हैं। इस प्रकार सूर्य से प्राप्त कुल शक्ति का 35+19 = 54 % भाग नष्ट हो जाता है और केवल 46% ही पृथ्वी तक पहुँच पाता है”।

सूर्याभिताप Factors Affecting Insolation

सूर्य की किरणों का सापेक्ष तिरछापन- पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, अतः सूर्य की भू-सापेक्ष स्थिति बदलती रहती है। इस परिक्रमण के फलस्वरूप सूर्य 6 महीने उत्तरायण और 6 महीने दक्षिणायन होता है। दूसरे शब्दों में, जब 22 दिसम्बर को सूर्य मकर अयन रेखा पर लम्बवत् चमकता है अर्थात् दक्षिणायन तो उत्तरी गोलार्द्ध में उसकी किरणें बहुत तिरछी पड़ती हैं। उस समय उत्तरी ध्रुव वृतीय क्षेत्रों में तो ये पहुँच भी नहीं पाती। यह मकर रेखा सूर्य की दक्षिणायन यात्रा की अन्तिम सीमा होती है। यहाँ से 22 दिसम्बर के उपरान्त सूर्य की उत्तरायण गति आरम्भ होती है और तब उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणे अधिकाधिक सीधी पड़नी आरम्भ हो जाती हैं। 21 जून को सूर्य की किरणे कर्क रेखा प्रर लम्बवत हो जाती हैं।

सूर्याभिताप की मात्रा सूर्य की किरणों के सीधे या तिरछे होने पर निर्भर होती है। धरातल पर जब सूर्य की किरणे ठीक लम्बवत् होती हैं तो ताप अधिक प्राप्त होता है और जब ये किरणे तिरछी पड़ती हैं, तब ताप कम प्राप्त होता है। इसके दो मुख्य कारण हैं-

  1. तिरछी किरणे धरातल के अधिक भाग को घेरती हैं, अतः उन्हें भूतल के अधिक भाग को गर्म करना पड़ता है, इसके विपरीत सीधी किरणे धरातल के कम भाग पर पड़ती हैं और यह कम भाग ही सारा या अधिक ताप प्राप्त करता है।
  2. तिरछी किरणों को वायुमण्डल की अधिक मोटाई पार करनी पड़ती है अतः वायुमण्डल में अधिक ताप नष्ट हो जाता है, फलतः धरातल पर पहुंचने वाले ताप की मात्रा कम हो जाती है।

दिन और रात की लम्बाई- परिभ्रमण और परिक्रमण पृथ्वी की दो गतियाँ हैं। परिभ्रमण गति द्वारा पृथ्वी अपनी धुरी पर बराबर चक्कर लगाती है और परिक्रमण द्वारा वह अपनी कक्ष पर 66½° का कोण बनाती हुई सूर्य के चारों ओर घूमती है। इन गतियों के कारण ही पृथ्वी पर दिनरात तथा ऋतु परिवर्तन होता है भिन्न-भिन्न ऋतुओं में विभिन्न अक्षांशों पर दिन और रात की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है, जिनका प्रभाव पृथ्वी पर सूर्याभिताप की न्यूनाधिक मात्रा पर पड़ता है। किसी स्थान पर जितना ही सूर्य ऊंचा और अधिक देर तक चमकता है, वहां उतना ही अधिक सूर्याभिताप प्राप्त होता है। भूमध्य रेखा पर दिन-रात सदैव बराबर होते हैं, परन्तु भूमध्य रेखा से दूर अन्य अक्षांशों पर परिभ्रमण की विभिन्न स्थितियों के अनुसार दिनरात छोटे-बड़े होते रहते हैं। विभिन्न अक्षांशों पर ज्यों-ज्यों विषुवत् रेखा से उत्तर या दक्षिण को जाते हैं, सूर्य से प्राप्त गर्मी की यह मात्रा जाती है। नीचे तालिका से यह तथ्य स्पष्ट होता है-

अक्षांश 10° 20° 30° 40° 50° 60° 70° 80° 90°
ताप का प्रतिशत 100 90 95 88 79 68 57 47 43 32

केवल 21 मार्च और 23 सितम्बर को अर्थात वसन्त विषुव (Spring Equinox) और शरद विषुव (Autumnal Equinox) को समस्त भूमंडल पर दिन और रात बराबर (अर्थात 12-12 घंटे के) होते हैं। 23 सितम्बर से 21 मार्च तक दिन बड़े और राते छोटी तथा 22 दिसम्बर का दिन सबसे लम्बा होता है, जबकि सूर्य मक ररेखा पर लम्बवत पड़ता है। 22 मार्च से 23 सितम्बर तक उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन होता है जबकि सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् चमकता है 66½° से ध्रुवों तक के प्रदेशों में दिन की लम्बाई 24 घण्टे से भी अधिक होती है और धुवों पर यथानुसार दिन की लम्बाई 6 महीने तक की होती है। विभिन्न अक्षांशों पर दिन की अवधि (घण्टा-मिनट) निम्न तालिका में दिखायी गयी है-

उत्तरी गोलार्द्ध

अक्षांश

दक्षिणी गोलार्द्ध
0 10 20 30 40 50 60 66
21 जून 12-0 12-35 13-12 13-36 14-52 14-52 16-18 18-30 22 दिसम्बर
22 दिसम्बर 12-0 11-35 11-35 10-04 9-08 9-08 4-42 5-30 21 जून

वायुमण्डल की अवस्था Condition of Atmosphere- धरातल पर प्राप्त सूर्याभिताप की मात्रा वायुमण्डल की अवस्था पर निर्भर करती है। आकाश की मेधाच्छन्नता, आर्द्रता, धूल, आदि वायुमण्डल की परिवर्तनशील दशाएं पृथ्वी पर पहुँचने वाले सूर्याभिताप की मात्रा को निरन्तर बदलती रहती हैं। वायुमंडल में छायी हुई धूल सूर्य शक्ति को पृथ्वी तक पहुंचने में बाधा उपस्थित करती है। आकाश की मेघाच्छन्नता भी सूर्याभिताप पर गहरा प्रभाव डालती है, क्योंकि मेघ सूर्याभिताप को पुनः प्रतिबिम्वित करने में बड़े महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं, इस कारण धरातल पर आने वाली सूर्यशक्ति में कुछ न्यूनता जाती है।

पृथ्वी से सूर्य की दूरी- सूर्य से पृथ्वी की दूरी सदैव एक समान नहीं होती। उपसौर (Perihelion) की अपेक्षा अपसौर(Aphelion) की दशा में सूर्य से पृथ्वी की दूरी अधिक होती है। अपसौर की व्यवस्था में पृथ्वी को सूर्य से कम शक्ति प्राप्त होती है और उपसौर की दशा में अधिक

घरातल की प्रकृति Nature surface- खुली और वनस्पति-विहीन शैलों वाले क्षेत्र खेतिहर भूमि की अपेक्षा अधिक गरम रहते हैं। इसी प्रकार बालू मिट्टी वाले भाग कॉप या दलदल भूमि की अपेक्षा शीघ्र ही अधिक गरम और ठण्डे हो जाते हैं। इसी कारण से मरुस्थलों में दैनिक तापान्तर अधिक मिलता है।

ऊँचाई का प्रभाव Effect Altitude- अधिक ऊंचे स्थानों पर तापमान कम रहता है। इसका कारण यह है कि समुद्र के धरातल से प्रति 165 मीटर ऊँचे उठने पर तापमान 1°C कम हो जाता है। इसके ये कारण हैं-

  1. वायुमण्डल की ऊपरी पतों का घनत्व कम होता है, इस कारण वहाँ भूमि से गर्मी शीघ्र विकिरित हो जाती है।
  2. धरातल के समीप की वायु में कार्बन, जलवाष्प, धूलकण, आदि पर्याप्त मात्रा में विद्यमान रहते हैं। ये सब धरातल से गर्मी को शीघ्र बाहर निकलने से रोकते हैं। धरातल के समीप की वायु सघन और अधिक घनत्व वाली होती है, अतः स्वयं पर्याप्त गर्मी सोख लेती है। फलस्वरूप धरातल के समीप की वायु का तापमान अधिक तथा पर्वतीय भागों में तापमान कम रहता है।

वायुमंडल का गर्म होना Heating of the Atmosphere

वायुमण्डल के गर्म होने की तीन विधियाँ हैं-

विकिरण Radiation

जब धरातल सूर्य से आने वाली गर्मी के द्वारा बिना माध्यम के प्रत्यक्ष रूप से गरम हो जाता है तो वह गर्मी को पार्थिव शक्ति में बदल कर पुनः प्रसारित करता है। धरातल से निकलने वाली यह शक्ति लम्बी लहरों के नीचे प्रकट होती है जो शीघ्र ही वायुमण्डल में समाकर उसे गरम कर देती है। वायु के इस प्रकार गरम होने को विकिरण कहते हैं।

संचालन Conduction

यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत गर्मी किसी पदार्थ के द्वारा एक अणु से दूसरे अणु को स्थानान्तरित होती है। जैसे, जब किसी लोहे की छड़ का एक सिरा गरम हो जाता है तो संचालन के द्वारा दूसरा सिरा भी गरम हो जाता है। दिन में धरातल सूर्याभिताप द्वारा गरम हो जाता है। अतः जब वायुमण्डल की ठण्डी वायु गरम पृथ्वी के सम्पर्क में आती है तो वह संचालन द्वारा गरम हो जाती है। संचालन द्वारा वायु के एक के बाद एक स्तर गरम हो जाते हैं।

संवाहन Convection

जब किसी स्थान की वायु संचालन और विकिरण द्वारा गरम हो जाती है तो गर्मी पाकर वह हल्की होती है, परन्तु इसके आसपास ठण्डी और भारी वायु विद्यमान होती है। इस प्रकार गरम वायु ऊपर उठती है और ठण्डी वायु उसका स्थान लेने के लिए नीचे आती है। इस प्रकार वायुमंडल में संवाहन धाराएं उत्पन्न हो जाती हैं। इस संवाहन क्रिया के द्वारा समस्त वायुमंडल गरम हो जाता है।

तापमान की माप Measurement of Temperature

तापमान को मापने के लिए तीन प्रकार के पैमाने काम में लाए जाते हैं, जिन्हें फारेनहाइट, सेण्टीग्रेड और रियूमर (Reaumur) कहते हैं। फारेनहाइट पैमाना 180 बराबर भागों में बंटा रहता है। इसमें हिमांक बिंदु (Freezinz Point) 32° और क्वथनांक बिंदु (Boiling Point) 212° होते हैं। सेन्टीग्रेड पैमाना 100 भागों में बंटा रहता है। इसमें हिमांक बिंदु 0° और क्वथनांक बिंदु 100° माना जाता है। तापमापी यंत्र (Thermometers) सामान्यतः इन दोनों पैमाने पर ही बने होते हैं। इसके अतिरिक्त अधिकतम न्यूनतम तापमान मापने के लिए अधिकतम और न्यूनतम तापमापी काम में लाया जाता है। इस यन्त्र में लकड़ी के एक तख्ते पर दो तापमापी लगे होते हैं। इनमें से एक अधिकतम तथा दूसरा न्यूनतम ताप प्रकट करता है। अधिकतम तापमापी में पारा भरा होता है और पारे के ऊपर एक लोहे का संकेतक रहता है। दिन में गर्मी से पारा फैलता है। पारे के फैलने से संकेतक ऊपर चढ़ जाता है, परन्तु पारे के सिकुड़कर नीचे उतर जाने पर संकेतक नीचे नहीं उतर पाता, क्योंकि उसके नीचे एक कमानी लगी रहती है। इस प्रकार संकेतक की स्थिति से दिन भर के अधिकतम तापमान को जाना जा सकता है। वर्तमान में न्यूनतम एवं अधिकतम तापमापी एक साथ मिले होते हैं।

उपर्युक्त °C और °F पैमाने अधिक प्रचलित हैं लेकिन विशेष उद्देश्यों में रियूमर(°R) का भी प्रयोग होता है। °R में हिमांक बिंदु 0° तथा क्वथनांक बिंदु 80° और सम्पूर्ण मापन 80 बराबर भागों में बंटा होता है। एक पैमाने से दूसरे पैमाने में परिवर्तन के निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं-

C/5 = F-32 / 9 = R/4

तापलेखी Thermograph

तापमान का स्वयं-सूचक यन्त्र होता है। इसमें दो धातुओं (जिनके प्रसारण गुण भिन्न होते हैं) की दो पतियाँ लगी रहती हैं। इसके एक सिरे पर पेंसिल लगी रहती है, जिसकी नोंक एक घूमते हुए ढोल को छूती है। तापमान के घटनेबढ़ने पर धातु की पती पर जो प्रभाव होता है उससे पेंसिल ऊंची=नीची होती है और नोंक से ढोल पर चिपके ग्राफ कागज पर उसकी एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा खिंच जाती है। इस रेखा से हमें तापमान के सभी परिवर्तन ज्ञात हो जाते हैं।

दैनिक ताप परिसर Daily Range Temperature

दिन और रात के अधिकतम और न्यूनतम तापमान के अन्तर को दैनिक ताप परिसर कहा जाता है। इससे जलवायु की विषमता का पता लगता है। इसकी विशेषताएँ निम्न हैं-

  1. विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर दैनिक तापपरिसर घटता जाता है। भूमध्य रेखा पर कम तथा मरुस्थलीय क्षेत्रों में यह सर्वाधिक रहता है।
  2. मेघ तथा जल-वाष्प की उपस्थिति में यह अधिक नहीं होने पाता। मेघ कम्बल का कार्य करते हैं। वे सूर्य किरणों के ताप को सोखकर दिन में तापमान को अधिक बढ़ने तथा विकीर्ण ताप रोककर रात्रि में अधिक घटने से रोकते हैं। फलस्वरूप ताप-परिसर अधिक नहीं होने पाता।
  3. ऊँचाई बढ़ने के साथ तापपरिसर घटता है।
  4. सागरों तथा जलाशयों की निकटवर्ती स्थिति से भी तापपरिसर अधिक नहीं होने पाता, किन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में यह अधिक रहता है।
  5. हिम की उपस्थिति से तापपरिसर बढ़ता है, क्योंकि उससे विकिरण शीघ्र होता है।

वार्षिक ताप परिसर Annual Range Temperature

वर्ष के सबसे गर्म महीने के औसत तापमान और सबसे ठण्डे महीने के औसत तापमान के अन्तर को वार्षिक ताप-परिसर कहा जाता है। जिन स्थानों का दैनिक और वार्षिक ताप-परिसर जितना अधिक होता है, उतनी ही वहाँ की जलवायु विषम होती है, किन्तु जहाँ यह कम होता है वहां की जलवायु भी सम होती है। वार्षिक ताप-परिसर की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. कर्क तथा मकर रेखाओं के बीच में अर्थात् उष्ण कटिबन्ध सूर्य वर्ष में दो बार लम्बवत् चमकता है। इस कारण वहाँ दो अधिकतम तथा दो न्यूनतम तापमान प्राप्त होते हैं। अत: इस कटिबन्ध के महाद्वीपीय भागों में ताप परिसर सर्वाधिक रहता है
  2. शीतोष्ण तथा शीत कटिबन्घों में ग्रीष्ममें सूर्य की अपेक्षाकृत लम्बवत् किरणे प्राप्त होती हैं तथा तापमान ऊँचे रहते हैं। इसके विपरीत, शीत ऋतु में तापमान अधिक गिर जाता है। अतः ताप परिसर अधिक रहता है।
  3. सागर के सीमावर्ती भागों में तापपरिसर कम होता है, क्योंकि जल और स्थल सभी दैनिक तापमान को सम रखते हैं।
  4. ऊँचाई बढ़ने से भी तापपरिसर कम हो जाता है। ध्रुवों पर वार्षिक तापपरिसर सबसे अधिक होता है, क्योंकि वहां 6 महीने तक निरन्तर सूर्य चमकता रहता है और शेष 6 महीने निरन्तर रात्रि रहती है।

भू-मंडल पर तापमान का क्षैतिज वितरण Distribution Temperature on Earth Surface

भूमण्डल पर तापमान के वितरण का अध्ययन दो रूपों में किया जाता है-

  1. तापमान का क्षैतिज वितरण
  2. तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण।

तापमान का क्षैतिज वितरण Horizontai Distribution of Temperature

सूर्यामिताप की मात्रा विषुवत् रेखा से उत्तर और दक्षिण की और बढ़ने पर घटती जाती है। इससे स्पष्ट है कि धरातल पर ताप क्षेत्रों की सीमाएँ अक्षांश रेखाओं द्वारा बनायी जाती हैं। यूनानी विद्वानों ने इसी आधार पर पृथ्वी को निम्नांकित तीन ताप कटिबन्धों (Thermal zones) में विभक्त किया था-

  1. उष्ण कटिबंध Torrid or Tropical Zone- विषुवत रेखा के दोनों ओर कर्क रेखा (23½° उत्तर) और मकर रेखा (23½° दक्षिण) के बीच फैला है। सूर्य 21 जून को कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है। साथ ही साथ ये दोनों रेखाएँ सूर्य की उत्तरी तथा दक्षिणी सीमाएँ हैं इन्हीं के मध्य सूर्य वर्षपर्यन्त चमकता है। अत: इस कटिबन्ध में वर्षपर्यन्त अधिक तापमान रहता है। इस मण्डल में तापमान 52°C तक रिकार्ड किया गया है।
  2. शीतोष्ण कटिबन्ध Temperate zone- दोनों गोलाद्धों में 23½° अक्षांश से 66½°  अक्षांश तक फैला हुआ है। इस भाग में दिन की लम्बाई 40° अक्षांश पर 16 घण्टे, 63° अक्षांश पर 20 घण्टे होती है।
  3. शीत कटिबन्ध Frigid Zone- दोनों गोलाद्धों में 66½° अक्षांश से ध्रुवों तक 90 अक्षांश) फैले हुए हैं। इस भाग में दिन की अवधि 64 घण्टे से अधिक होती है। ध्रुवों के समीप छः महीने का दिन और छः महीने की रात होती है। सूर्य की किरणे अत्यन्त तिरछी पड़ने के कारण यहां कठोर शीत पड़ती है।

सूपान (Supan) ने ताप खण्डों की सीमाएँ समताप रेखाओं द्वारा निर्धारित कीं। उनके अनुसार 20° सेण्टीग्रेड वार्षिक तापमान रेखा उष्ण कटिबन्ध की सीमा बनाती है और 10° सेण्टीग्रेड ताप वाली ग्रीष्म ऋतु की तापमान रेखा शीतोष्ण कटिबन्ध को शीत कटिबन्ध से पृथक् करती है।

समतापी रेखाएँ Isothems

“भूमण्डल पर तापमान का वितरण समतापी रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। ये समतापी रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं, जो कि सभी स्थानों के समुद्र तल पर मानकर समान औसत तापमान वाले स्थानों को मिलाती हैं।”

अतः उन रेखाओं को बनाने से पूर्व प्रत्येक स्थान के तापमान को समुद्र तल पर स्थित मान लिया जाता है, क्योंकि ऊँचाई पर तापमान कम होता जाता है। यदि कोई स्थान समुद्रतल से 1,650 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और उसका तापमान 6° सेण्टीग्रेड है तो उसका समुद्र तल पर तापमान 16° सेण्टीग्रेड ही होगा क्योंकि 165 मीटर की ऊंचाई पर 1° सेण्टीग्रेड तापमान गिर जाता है। अत: मानचित्र में उस स्थान का समुद्रतल का तापमान 16° सेण्टीग्रेड समताप रेखा द्वारा प्रकट किया जाएगा। ऐसा करने पर ताप की तुलना ठीक प्रकार हो सकती है।

विश्व में समताप रेखाओं की प्रवृत्ति Trend of Isotherms of World

  1. समतापी रेखाएँ सामान्य अक्षांशों के समानान्तर पूर्व से पश्चिम जाती हैं, क्योंकि भूखण्ड पर भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्याभिताप की मात्रा घटती-बढ़ती जाती है। तापमान अक्षांशों के अनुसार घटताबढ़ता है।
  2. ये रेखाएँ सीधी होती हैं, किन्तु समुद्रतट के समीप इनकी दिशा में परिवर्तन हो जाता है। स्थल से समुद्र की ओर जाते समय ये रेखाएँ ग्रीष्म ऋतु में विषुवत् रेखा की ओर तथा शीत ऋतु में ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं, क्योंकि जल और स्थल के तापमान में अन्तर पाया जाता है। सामुद्रिक धाराएँ तथा स्थायी पवनें भी इनकी दिशाओं को प्रभावित करती हैं।
  3. दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा जल का विस्तार अधिक होने से ये रेखाएं अधिक स्थायी (सीधी) होती हैं।
  4. जल और स्थल के मिलन क्षेत्रों में इनकी सामान्य दिशा पूर्व-पश्चिम की अपेक्षा उत्तर-दक्षिण हो जाती है।
  5. निम्न अक्षांशों में जलधाराओं के कारण ये रेखाएं विषुवत् रेखा की ओर झुक जाती हैं, जबकि ऊंचे अक्षांशों में गर्म जल की धाराओं के कारण ये ध्रुवों की ओर झुक जाती हैं।
  6. विषुवत् रेखा पर वर्ष भर अधिक सूर्याभिताप की प्राप्ति के कारण सर्वोच्च औसत तापमान पाया जाता है।
  7. ध्रुवों पर सूर्य की किरणे सदैव तिरछी पड़ने तथा तीन महीने तक सूर्य के न निकलने के कारण निम्नतम औसत तापमान ध्रुवों के निकट पाया जाता है।
  8. उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी का सर्वोच्च तापमान और शीतकाल का निम्न तापमान स्थल पर ही पाया जाता है। उदाहरणार्थ, अफ्रीका में लीविया देश के अजीजिया नगर का सर्वोच्च तापमान 72° सेण्टीग्रेड और साइबेरिया के वखॉयांस्क नगर में निम्नतम तापमान -50° सेण्टीग्रेड अंकित किया गया है।

जनवरी और जुलाई के तापमान Temperature of January and July

जनवरी का समताप-दर्शक मानचित्र देखने से स्पष्ट होता है कि इस समय उच्चतम तापमान दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है। आस्ट्रेलिया और दक्षिणी अफ्रीका में 30° सेण्टीग्रेड से भी अधिक तापमान पाया जाता है। न्यूनतम तापमान उत्तरी गोलार्द्ध में साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड और उत्तरी कनाडा में पाए जाते हैं। साइबेरिया में स्थित वखॉयांस्क नामक स्थान पर इस ऋतु में तापमान -50° सेण्टीग्रेड तक नीचे उतर जाता है। विश्व का सबसे ठंडा स्थान यही है। इसे विश्व का ठंडा ध्रुव (cold pole of the earth) कहा जाता है।

इसके विपरीत, जुलाई की समतापी रेखा से स्पष्ट होता है कि इस समय उच्चतम तापमान उत्तरी गोलार्द्ध में और न्यूनतम तापमान दक्षिणी गोलार्द्ध में है। इस समय 30° सेण्टीग्रेड वाली रेखा उत्तरी गोलार्द्ध के एक बड़े भाग को घेरे हुए रहती है, अतः उत्तरी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के सभी मरुस्थलों में 40° सेण्टीग्रेड से भी अधिक तापमान रहता है। सहारा तथा थार मरुस्थलों से 52° सेण्टीग्रेड भी अधिक तापमान बढ़ जाता है। इस में सबसे कम तापमान दक्षिण ध्रुवों पर पाया जाता है।

तापमान का उर्ध्वाधर वितरण Vertical Distribution of Temperature

सामान्य अवस्थाओं में ऊँचाई बढ़ने पर तापमान निरन्तर कम होता जाता है। इनकी दर प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेण्टीग्रेड तापमान कम हो जाना हैं। तापमान के इस प्रकार कम होने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि वायुमण्डल प्रत्यक्ष रूप से धरातल द्वारा ही गरम होता है। सूर्य का प्रभाव अप्रत्यक्ष होता है। अतः धरातल के समीप की वायु अधिक गरम रहती है। इसके अतिरिक्त भूतल के निकट की हवा भारी होती है और उसमें जलवाष्प, धूल कण, आदि अधिक मात्रा में रहते हैं। फलतः धरातल के समीप की वायु उससे ऊपर की शुष्क, हल्की तथा स्वच्छ वायु की अपेक्षा अधिक पार्थिव शक्ति को ग्रहण करने में सफल होती है। अतः वायुमण्डल के निचले भागों में वायु की सघनता तथा गर्मी को सुरक्षित रखने वाली गैसों की अधिकता से वायु अधिक उष्ण रहती है और ज्यों-ज्यों हम ऊपर उठते जाते हैं, उष्णता की कमी आती जाती है। वर्तमान शताब्दी में किए गए शोधकार्यों से स्पष्ट हुआ है कि ऊँचाई के अनुसार तापमान घटने का नियम एक निश्चित ऊँचाई तक (सिर्फ विक्षोभ मण्डल की सीमा तक) ही लागू होता है। इस ऊँचाई से ऊपर समताप मण्डल में तापमान प्रायः समान रहता है। समताप मण्डल के बाद अधिक ऊपर जाने पर पुनः तापमान बढ़ने लगता है।

तापमान का व्युत्क्रमण या ताप विलोमता Inversion of Temperature

साधारणतः ऊँचाई के अनुसार तापमान में कमी आती जाती है, किन्तु कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि ऊँचाई बढ़ने पर भी तापमान घटने की अपेक्षा बढ़ते जाते हैं और वायु तहें सामान्य अवस्था के विपरीत, शीतल, उष्ण और अधिक शीतल के रूप में पायी जाती हैं। वायुतहों की ऐसी व्यवस्था की ही तापमान का व्युत्क्रमण या तापमान का प्रतिलोमन कहा जाता है। निम्न विशेष परिस्थितियाँ इस व्युत्क्रमण में सहायक होती हैं-

  1. लम्बी रातें- लम्बी रातें होने से धरातल के ताप का विकिरण समाप्त हो जाता है तथा रात्रि के अन्तिम प्रहर में धरातल का तापमान वायु की अपेक्षा अधिक बढ़ जाता है।
  2. स्वच्छ आकाश- रात्रि को स्वच्छ आकाश की उपस्थिति में धरातल से विकिरित P ताप वायुमण्डल द्वारा रोका नहीं जा सकता। अतएव वह शीघ्रता से बाह्य आकाश में विकिरित होकर समाप्त हो जाता है तथा धरातल को ठण्डा रहने का अवसर प्राप्त होता है।
  3. शीतल एवं शुष्क वायु- ऐसी वायु भी विकिरित ताप को न्यून मात्रा में ही सोख पाती है। जिसके कारण वायुमण्डल की ऊपरी सतहों में तापमान अधिक तथा निचली सतहों में कम हो जाता है।
  4. शान्त वायु- वायु के शान्त रहने से संवहन धाराएँ नहीं बनतीं तथा तापमान में विभिन्न स्तरों पर परिवर्तन नहीं आ पाते।
  5. हिम की उपस्थिति- हिम सूर्य किरणों को प्रत्यावर्तित कर देता है तथा रात्रि को उससे शीत लहरों का विकिरण होता है।

तापमान का व्युत्क्रमण या प्रतिलोमन के प्रकार Types of Inversion of Temperature

तापमान का व्युत्क्रमण सामान्य रूप से तीन प्रकार का होता है-

घरातलीय व्युत्क्रमण Surface Inversion

शीत कटिबन्ध के ठण्डे स्थानों पर सर्दियों में या रात्रि में प्रमुख रूप से पाया जाता है। रात्रि में ठण्डी तथा शुष्क वायु प्रवाहित होती है तथा आकाश स्वच्छ रहता है। रात्रि भी शीत ऋतु में लम्बी होती हैं। इस कारण दिन में प्राप्त होने वाला ताप रात्रि में शीघ्रता से विकिरित हो जाता है चूंकि भूमि वायु की अपेक्षा शीघ्र ठण्डी हो जाती है, इस कारण रात्रि में धरातल एवं उसके सम्पर्क में आने वाला वायुमण्डल का निचला सिरा अधिक ठण्डा हो जाता है, जबकि ऊपरी स्तर अपेक्षाकृत गरम रहता है।

सम्पकीय व्युत्क्रमण Advectional Inversion

ऐसी स्थिति शीतोष्ण चक्रवातों के वाताग्र क्षेत्रों में पाई जाती है। यहां पर ठण्डा सीमान्त (Cold Front) प्राय: गरम सीमान्त (Cold Front) की गरम वायु को ऊँचा उठा देता है। इस कारण नीचे का स्तर ठण्डा तथा ऊपर का अपेक्षाकृत गरम रहता है।

उच्च धरातलीय व्युत्क्रमण Upper face Inversion

यह स्थिति बहुधा पर्वतों पर पायी जाती है, जहां कि ठण्डी वायु रात्रि में घाटियों में पहुँच जाती है तथा उसका स्थान लेने के लिए निकटवर्ती प्रदेश से गरम वायु जाती है। उच्च भाग से घाटियों की ओर प्रवाहित होने वाली शीतल वायु को वायु-प्रवाह कहते हैं।

तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले घटक

भूमध्य रेखा से दूरी या अक्षांशीय स्थिति- किसी स्थान पर उसके अक्षांश के अनुसार ही सूर्य की किरणों का तिरछापन होता है। सामान्यतः भूमध्य रेखा पर सूर्य लम्बवत् चमकता है तथा उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में वर्ष पर्यन्त रहता है अतः यहाँ अधिक गरमी प्राप्त होती है। भूमध्य रेखा से उत्तर और दक्षिण की ओर जाने पर ताप कम हो जाता है। यही कारण है कि कोलम्बो मुम्बई से अधिक गरम रहता है।

सागर से दूरी- स्थल की अपेक्षा जल धीरे-धीरे गरम होता है और धीरे-धीरे ठण्डा होता है। इसी कारण सागर स्थल की अपेक्षा गर्मियों में शीतल और शीतकाल में भी हल्के गरम रहते हैं। इसी भांति तटवर्ती भागों की अपेक्षा दूर वाले स्थानों में ग्रीष्म में अधिक गर्मी और शीतकाल में अधिक सर्दी पड़ती है। अतः सागर के निकटवर्ती भागों की जलवायु सम और दूर वाले स्थानों की जलवायु विषम होती है। इसी कारण मुम्बई की तुलना में दिल्ली की जलवायु विषम रहती है।

समुद्रतल की ऊँचाई- साधारणतः ऊँचाई के साथ विलोमता साथ तापमान घटता जाता है। प्रति 165 मीटर की ऊंचाई पर 1° सेण्टीग्रेड तापमान कम हो जाता है। अतः जो स्थान समुद्रतल से जितनी अधिक ऊँचाई पर होता है, वह उतना ही ठण्डा होता है। विषुवत् रेखा के निकट समुद्रतल पर बसे सिंगापुर का औसत तापमान 23°  सेण्टीग्रेड है, जबकि विषुवत् रेखा पर 2,851 मीटर की ऊँचाई पर स्थित क्वीटो नगर का औसत तापमान 13° सेण्टीग्रेड है।

प्रचलित पवनें- किसी भी स्थान की जलवायु वहां पर चलने वाली पवनों पर ही निर्भर करती है। जब किसी स्थान पर गरम पवनें चलती हैं तो तापमान को बढ़ा देती हैं और यदि वहां ठण्डी पवनें चलती हैं तो वे उसके तापमान को नीचा कर देती हैं। ध्रुवों की ओर से आने वाली ठण्डी पवनें शीतकाल में समस्त मध्य एशिया को बहुत ही ठण्डा कर देती हैं जबकि थार मरुस्थल की ओर से चलने वाली पवने ग्रीष्म में दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तापमान को बढ़ा देती हैं।

समुद्री धाराएँ- धाराओं का तटवर्ती भागों की जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिन तटों के समीप ठण्डी धाराएँ बहती हैं, वहां शीतकाल में तापमान बहुत नीचे हो जाते हैं और समुद्र तटों पर हिम जम जाता है। इसके विपरीत, जिन तटों के समीप गरम धाराएँ बहती हैं, वे तट को गरम बना देती हैं। ऐसे तटों का तापमान शीतकाल में भी काफी ऊँचा रहता है जिससे वे जमते नहीं। उदाहरणार्थ, फिनलैण्ड की खाड़ी तथा उत्तरी सागरीय क्षेत्र के समीप से उत्तरी अटलांटिक प्रवाह गर्भ धारा बहती है जिससे वहां का तट शीतकाल में भी नहीं जमता, परन्तु उन्हीं अक्षांशों पर स्थित लैब्राडोर का पठार लैब्रोडोर की ठण्डी धारा के कारण वर्ष में नौ महीने हिम से ढका रहता है।

भूमि का ढाल- साधारणतः सूर्य के सम्मुख पड़ने वाले ढाल विमुख ढालों की अपेक्षा गर्मियों में अधिक गरम और शीतकाल में कम ठण्डे रहते हैं। इसका कारण यह है कि सूर्य के सम्मुख ढाल पर विमुख ढाल की अपेक्षा सूर्य की किरणे कम तिरछी पड़ती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढाल, जो सूर्य के सम्मुख पड़ते हैं, उत्तरी ढालों की अपेक्षा अधिक गरम रहते हैं।

मिट्टी की प्रकृति- मिट्टी की प्रकृति का भी जलवायु पर प्रभाव पड़ता है। बालू मिट्टी शीघ्र गरम अथवा ठण्डी हो जाती है। फलस्वरूप मरुभूमि अन्य स्थानों की अपेक्षा गर्मियों में अधिक गरम और जाड़ों में अधिक ठण्डी रहती है। राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भागों में जलवायु की विषमता का एक प्रमुख कारण रही है, किन्तु चिकनी मिट्टी वाले प्रदेश धीरे-धीरे गरम और ठण्डे होते हैं।

मेघ तथा वर्षा- जिन भागों में वर्ष भर वर्षा होती है और आकाश मेघों से ढका रहता है, वहां गर्मियों का औसत तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है, क्योंकि मेघ सूर्य की गर्मी का कुछ अंश सोख लेते हैं और कुछ गर्मी वाष्पीकरण क्रिया में नष्ट हो जाती है। इसके विपरीत, शीतकाल में मेघ धरातल से विकिरण को रोक लेते हैं, जिससे शीत ऋतु में वहां का तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है। संक्षेप में, मेघ और वर्षा दोनों ही वार्षिक ताप-परिसर को कम करने में सफल होते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन में सामुद्रिक तटों और भारत का मालाबार तट का ताप-परिसर बहुत कम रहता है।

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