कला और वास्तुकला Art and Architecture

इस युग की वास्तुकला को भारतीय-सारासेनिक अथवा पठान अनुचित है, जैसा कि फर्गुसन तथा कुछ दूसरे विद्वानों ने किया है और आत्मा एवं शरीर में पूर्णत: भारतीय ही मानी जा सकती है, जैसा कि हम लोगों को विश्वास करने को कहता है। वास्तव में यह भारतीय एवं शैलियों का मिश्रण थी, जैसा तत्कालीन संस्कृति के कुछ अन्य क्षेत्रों में हुआ सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि भारतीय इस्लामी कला केवल इस्लामी कला का स्थानीय प्रकार नहीं है और न यह केवल हिन्दू कला का परिवर्तित रूप ही है। .....मौटे तौर पर भारतीय इस्लामी वास्तुकला, अपनी प्रकृति दोनों स्रोतों से ग्रहण करती है, यद्यपि दोनों अंश सर्वदा समान नहीं होते।

इसमें सन्देह नहीं कि भारत में कुछ ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन शैलियाँ थीं, जब कि सातवीं सदी के मध्य से इस देश में इस्लामी प्रभाव धीरे-धीरे प्रविष्ट हो रहे थे। साथ-साथ हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए की जिसे हम साधारणतः इस्लामी कला कहते हैंवह एक समान जातीय तथा अकेले ढंग की नहीं थी बल्कि अरबों, पारसियों तथा तुर्कों- जैसे इस्लाम के अनुयायी पश्चिमी मध्य एशिया, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण-पश्चिमी यूरोप के विभिन्न भागों की कला अपने साथ लेते आए। इनके इस युग में पुराणी भारतीय कला की विभिन्न शैलियों के साथ, धर्म और व्यक्तिगत रूचि की आवश्यकताओं के अनुसार, मिलने के कारण वास्तुकला की नयी भारतीय शैलियों का विकास हुआ, जो जौनपुर, बंगाल, बीजापुर, गुजरात इत्यादि प्रत्येक प्रान्त में भिन्न थीं। दिल्ली की वास्तुकला में, वहाँ के मुस्लिमों की अत्याधिक संख्या के कारण, इस्लामी प्रभाव अधिक थे। दूसरी ओर, जौनपुर तथा दक्कन में स्थानीय शैलियाँ अधिक उन्नत थीं, जब कि बंगाल में विजेताओं ने न केवल ईंटों से भवन-निर्माण की प्रथा को अपनाया, बल्कि अपने भवनों को रुखानी से काटे हुए तथा साँचे में ढाले हुए अलंकरणों से सुशोभित किया, जो (अलंकरण) हिन्दू नमूनों की साफ-साफ नकल थे। इसी प्रकार पश्चिम भारत में भी उन्होंने सुन्दर गुजराती शैली को करीब-करीब पूरे-का-पूरा अपना लिया, जिस शैली में मध्यकालीन भारत के कुछ सुन्दरतम भवन बने हैं। कश्मीर में उन्हेने विलक्षण काष्ठ वास्तु-कला के साथ भी वही किया जो, (काष्ठ वास्तुकला) हिमालय के उस भाग में बहुत समय से प्रचलित रही होगी।

वास्तुकला की विदेशी तथा स्वदेशी शैलियों का यह मिश्रण कतिपय कारणों से संभव हुआ। मुसलमानों को आवश्यकतावश भारतीय शिल्पकारों तथा मूर्तिकारों को नियुक्त करना पड़ गया, जो स्वभावत: अपने कार्य में, अपने देश में फैली कला-परम्पराओं से मार्ग-निर्देशन प्राप्त करते थे। साथ-साथ, मुस्लिम आक्रमणों के प्रारम्भिक काल में मस्जिदें हिन्दू तथा जैन मन्दिरों की सामग्री से बनीं तथा कभी-कभी मन्दिरों को ही विजेताओं की आवश्यकताओं के अनुसार कुछ अंश में परिवर्तित कर दिया गया। फिर भारतीय एवं इस्लामी शैलियों के बीच कुछ  विलक्षण विभिन्नताओं के बावजूद, उनमें दो बैटन में समानता थी, जिससे इनकी मिलावट में सहायता मिली। बहुत से हिन्दू मंदिरों एवं मुस्लिम मस्जिदों की एक खास विशेषता यह थी की उनमें खुला हुआ अंगम होता था, जो कमरों अथवा स्तम्भों से घिरा रहता था। जो मन्दिर इस ढंग पर बने होते थे, स्वाभाविक रूप में मस्जिदों में परिवर्तित किये जा सकते थे तथा विजेता सर्वप्रथम इन्हें ही इस उद्देश्य से व्यवहार में लाते थे। फिर एक मौलिक विशेषता, जिसने दोनों शैलियों के बीच एक सामान्य कडी का काम किया, यह थी कि इस्लामी एवं हिन्दू दोनों कलाओं में दृढ़ रूप में सजावट की जाती थी। अलंकार एक के लिए उतना ही प्राणप्रद था, जितना दूसरे के लिए। दोनों अपने अस्तित्व तक के लिए इस पर निर्भर थीं।

दिल्ली शैली के सर्वश्रेष्ठ नमूने कुतुब वर्ग की मस्जिदें हैं। इनमें सबसे विख्यात कुतुबमीनार है। इसकी विशेषताएँ हैं- सीधी खड़ी मीनारें, सुन्दर अक्षरों में लिखे अभिलेख तथा बरामदों के नीचे लटकते हुए चूनामय पदार्थ के टुकड़े। अलाउद्दीन के राज्यकाल के दोनों प्रमुख स्मारक निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जबाएतखाना मस्जिद तथा कुतुबमीनार पर अलाई दरवाजा- हिन्दू वास्तुकारों के विचारों पर मुस्लिम विचारों की बढ़ी हुई प्रधानता प्रदर्शित करते हैं। तुगलक-काल की वास्तुकला वह वैभव, समृद्धि तथा विभिन्नता खो चुकी थी जो दास एवं खल्जी शासनों की वास्तुकला की विशेषताएँ थीं। यह नीरस, साधारण, सख्त और नियमानुसारी बन गयीं। यह तुगलकों के धार्मिक विचारों एवं उसके शासन काल में वित्त की अपेक्षा कृत दुर्व्यवस्था के कारण हुआ। सैय्यदों एवं लोदियों के समय में खल्जी-युग की प्राणवंत शैली को पुनर्जीवित करने के प्रयास किये गये। पर ये सीमित अंशों में ही सफल हुए तथा यह शैली तुगलकयुग के मृत्युकारी परिणाम को नहीं हटा सकी।

1400 से लेकर 1478 ई. के बीच इब्राहिम महमूद एवं हुसैन शकों के राजत्वकालों में जौनपुर में वास्तुकला की एक नयी शैली विकसित हुई, जिस पर हिन्दू कला का असंदिग्ध प्रभाव दिखाई पड़ता है। इसकी विशाल ढलुआँ दीवार, वर्गाकार स्तम्भ, छोटे बरामदे और छायादार रास्ते हिन्दू कारीगरों द्वारा निर्मित हैं तथा स्पष्टत: हिन्दू विशेषताएँ हैं। जौनपुर की मस्जिदों पर सामान्य ढंग की मीनारें नहीं हैं। वास्तव में जौनपुर के बहुत से नये भवन एक नये उद्देश्य के लिए पुराने मंदिरों की सामग्री से बनाये गये थे। अटालादेवी मस्जिद, जिसकी नींव 1377 ई. में दी गयी पर जो 1408 ई. में तैयार हुई, जौनपुर शैली का एक ज्वलंत नमूना है।

बंगाल में भी वास्तुकला की एक मिश्रित शैली विकसित हुई। इसकी विशेषताएँ थीं- मुख्यत: ईंटों का व्यवहार; पत्थर का गौण उपयोग; छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबों का प्रयोग तथा बाँस के भवनों से अनुकरण की टेढ़ी रेखाओं वाली कगनियों (कार्निसों) की परम्परागत हिन्दू शैली और कमल की तरह सुन्दर रूप में काढ़ी हुई हिन्दू प्रतीकात्मक सजावटदार आकृतियों का मुसलमानों द्वारा उपयोग। पांडुआ की चार सौ गुंबजांवाली आदीना मस्जिद, जिसे सिकन्दर ने 1368 ई. में बनवाया था, अपनी विशालता एवं सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रान्त की अन्य विख्यात मस्जिदें हैं- छोटा सोना मस्जिद, जिसे 1493 से 1511 ई. के बीच हुसैन शाह के शासन-काल में वली मुहम्मद ने बनाया; बड़ा सोना मस्जिद, जिसे नसरत शाह ने गौड़ में 1526 ई. में पूरा करवाया तथा कदम रसूल, जिसे उसी सुल्तान ने 1530 ई. में बनवाया।

गुजरात प्रान्त में भी वास्तुकला की एक सुन्दर शैली का विकास हुआ। मुसलमानों के आगमन के पहले से ही वहाँ एक श्रेष्ठ स्वदेशी शैली थी तथा विजेताओं के भवनों पर उस शैली के प्रभाव के निश्चित चिन्ह हैं, यद्यपि यदाकदा मेहराबों का प्रयोग प्रतीकात्मक उद्देश्य के लिए हुआ करता था। इस प्रकार हम 1411 से 1441 ई. के अन्दर पुराने मंदिरों तथा भवनों के विध्वंस से अहमद शाह के द्वारा बनायी गयी अहमदाबाद की नयी राजधानी में निर्मित भवनों में लकड़ी पर सुन्दर खुदाई का तथा पत्थर की कोल जालियों और अलंकारों का प्रयोग पाते हैं। जामा मस्जिद में, जिसका निर्माण 1411 ई. में आ था, दो सौ साठ खम्भे हैं, जो पत्थर के पंद्रह गुम्बजों का भार थामे हैं। ये गुंबज देशी शैली में समतल रूप से बाहर निकले हुए (पत्थर इत्यादि रदों से बने हैं। डाक्टर बर्गेस ने, जिसने आक्योंलॉजिकल सर्वे ऑफ वेस्टर्न की अपनी पाँच जिल्दों में प्राचीन एवं मध्यकालीन वास्तुकला के एवं विशेषताओं का पूरा वर्णन किया है, उचित ही लिखा है कि यह कला की सारी सुन्दरता तथा परिपूर्णता की उस ऐश्वर्य के साथ मिलावट थी, जिसकी उनकी अपनी कृतियों में ही कमी थी।

अनेक भवनों, में, जिनका अहमदशाही शासकों के गद्दी पर बैठने के समय से गुजरात में निर्माण हुआ, पुरानी भारतीय कला की परम्परा ही प्रधान रही, यद्यपि इस्लाम के अनुगामियों की आवश्कताओं के अनुसार इसमें कुछ अंशों में परिवर्तन भी लाये गये।

मालवा राज्य की पुरानी राजधानी धार में बिलकुल पुराने भवनों के अवशेषों से दो मस्जिदें बनायी गयीं। इन मस्जिदों के गुम्बज एवं स्तम्भ हिन्दू ढंग के थे। पर मांडू के, जहाँ राजधानी शीघ्र बदलकर ले जायी गयी, भवनों पर दिल्ली के भवनों की तरह मुस्लिम कला परम्पराओं की प्रधानता थी। देशी पद्धतियों का अपनाया जाना अथवा अनुकरण करना दबा दिया गया जान पड़ता है तथा भवन नुकीली मेहराब शैली में दृढ़तापूर्वक चिपटे रहे। गौरवशील वास्तुकला की सुन्दरता वाले अनेक भवनों में जो नर्मदा के किनारे एक विशाल पठार पर स्थित मांड के किलाबन्द शहर में बने थे, निम्नलिखित उल्लेख के योग्य हैं- जामा मस्जिद, जिसकी योजना और प्रारंभ हुशंग के द्वारा तथा समाप्ति मुहमूद खल्जी के द्वारा हुई; हिण्डोला महल; जहाज महल; हुशंग की कब्र; तथा बाज बहादुर एवं रूपमती के राजमहल। इनमें से बहुत-से भवनों में संगमरमर एवं बलुआ पत्थर का व्यवहार किया गया था।

कश्मीर के मुस्लिम सुल्तानों ने पत्थर एवं काष्ठ की वास्तुकला की पुरानी परंपरा को जारी रखा, लेकिन इस पर भवन रचना-सम्बन्धी आकृतियों तथा सजावट सम्बन्धी अभिप्रायों को, जो इस्लाम के साथ खास तौर से संबद्ध थे, आरोपित कर दिया। इस तरह यहाँ भी हम लोग कला-सम्बन्धी हिन्दू तथा मुस्लिम विचारों का सम्मिश्रण पाते हैं।

दक्षित भारत में बहुमनियों की, जो कला, विद्याओं एवं विज्ञानों के सरंक्षक थे, वास्तुकला भारतीय, तुर्की, मिस्री तथा पारसी-जैसे अनेक तत्त्वों का सम्मिश्रण थी। इनमें से पारसी तद्भव कुछ भवनों में जैसे- गुलबर्गा की जामा मस्जिद, दौलताबाद की चाँद मीनार (1435 ई.) तथा बीदर के महमूद गावान के कॉलूज (1472 ई.) में आसानी से पहचाना जा सकता था। बहमनियों के बहुत-से भवन पुराने मन्दिरों के स्थानों पर तथा उनकी सामग्री से बने थे। इस प्रकार पुरानी हिन्दू कला के प्रभाव को रोका नहीं जा सका। तुर्की एवं मिस्री तत्व पश्चिम एशियाई तथा अफ्रिकी साहसिकों के द्वारा प्रविष्ट हुए जिन्हें बहमनी राज्य में नौकरी मिली थी। पारसी तत्व उन पारसियों के द्वारा लाया गया, जो उस राज्य में पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़ी संख्या में आये। पर दक्कन की देशी कला पंद्रहवीं सदी के अन्त से बढ़ी हुई शक्ति के साथ अपने को पुन: स्थापित करने लगी। चूंकि वे स्मारक, जो अगली सदी में बीजापुर के आदिलशाहियों द्वारा बनवाये गये, भारतीय कलाकारों तथा कारीगरों द्वारा तैयार हुए इसलिए जैसा सर जॉन मार्शल लिखते हैं, यह अनिवार्य था कि भारतीय प्रतिभा विदेशी प्रभाव से ऊपर उठकर इन रचनाओं पर अपनी छाप और भी गहरी लगाए।

इस तरह हम पाते हैं कि राजनैतिक सम्बन्धों में कटुता के बावजूद तुर्क-अफगान-युग में हिन्दू एवं इस्लामी सभ्यताओं के समाघात से समाज, संस्कृति एवं कला के क्षेत्रों में मेलजोल एवं आपस की समझदारी उत्पन्न हो रही थी। यह मेलजोल महान् मुग़ल अकबर के समय में अपूर्व हद तक विकसित हुआ तथा उसके उत्तराधिकारियों और उत्तरगामी मुगलों के समय में भी पूर्णत: नष्ट नहीं हुआ।

जनसमुदाय के उत्थान के अपने आदर्श के साथ भारत के सन्त उपदेशों शब्दों के प्रचार, सूफी सन्तों एवं विद्वानों के सहिष्णुतापूर्ण विचार तथा भारत के प्रान्तीय साहित्य का विकास आधुनिकता के चिन्ह माने जा सकते हैं, जो दो सभ्यताओं के मिलने के परिणाम थे, जब कि मध्यकालीन सल्तनत का शीघ्रता से पतन हो रहा था। बाबर के आक्रमण के ठीक पहले भारतीय इतिहास की एक दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता थी विजयनगर, उड़ीसा तथा मेवाड़ जैसे देशी राज्यों का उदय अथवा अभिवृद्धि। यह विदेशी प्रभुता के विरुद्ध प्रतिवाद के रूप में था। हम लोगों को इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि मध्यकालीन मुस्लिम साम्राज्य के विध्वंस पर उठने वाले स्वतंत्र मुस्लिम राज्यों के सभी शासक विदेशी नहीं माने जा सकते। गुजरात, अहमदनगर तथा बरार के शासक देशी उद्गत के थे। बहुत-से राज्य, भले ही वे हिन्दू रहे हों या मुस्लिम, जिनका उत्कर्ष इस समय हुआ था, आत्म-निर्णय के लिए स्थानीय आन्दोलनों के रूप में थे। पर एक दूसरे तुर्की आक्रमण से, जिसका नेता बाबर था, उनके अवसर नष्ट हो गये। इस प्रकार बाबर के आक्रमण ने भारत के इतिहास को एक नया मोड़ दिया।

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