मुगल काल में स्थापत्य कला Architecture During Mughal Period

साहित्य एवं धर्म के समान कला में भी मुगलकाल पूर्णत: नवीनता और पुनर्जागरण का युग नहीं था, बल्कि उन प्रक्रियाओं का विस्तार और चरम परिणति था, जो पिछले तुर्क-अफगान-युग में आरम्भ हुई थीं। वास्तव में 1526 ई. के बाद की कला, इसके पहले के युग की कला के समान मुस्लिम तथा हिन्दू कला परंपराओं एवं तत्वों का सम्मिश्रण है।

औरंगजेब को छोड़कर, जिसकी धार्मिक कट्टरता कला के पोषण के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकी, भारत के सभी प्रारम्भिक मुगल बादशाह महान् निर्माता थे। यद्यपि बाबर का भारतीय राज्यकाल छोटा था, फिर भी वह अपने संस्मरण (आत्मकथा) में हिन्दुस्तान की भवन निर्माण कला की आलोचना करने तथा भवननिर्माण के लिए विचार करने का समय निकाल सका। कहा जाता है कि उसने भारत में मस्जिदें तथा अन्य स्मारक बनाने के लिए कुस्तुन्तुनिया से अल्बानिया के प्रसिद्ध भवननिर्माता सीनान के शिष्यों को आमंत्रित किया। श्री पसी ब्राउन लिखते हैं, यह बहुत असंभाव्य है कि इस प्रस्ताव का कभी कोई परिणाम निकला हो; क्योंकि यदि उस प्रसिद्ध स्कूल का कोई भी सदस्य मुगलों के यहाँ नौकरी कर लेता, तो बाइजैण्टाइन शैली के प्रभाव के चिन्ह दिखाई देते किन्तु ऐसा कोई चिन्ह नहीं है। बाबर ने अपने भवनों के निर्माण के लिए भारतीय संगतराशों को बहाल किया। वह स्वयं अपने संस्मरण में लिखता है कि आगरे में उसके भवनों में छः सौ अस्सी तथा सीकरी, बियाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं किउल में उसके भवनों में लगभग पंद्रह सौ मजदूर प्रतिदिन काम करते थे। बाबर के बड़े-बड़े भवन पूर्णत: लुप्त हो चुके हैं। तीन छोटे भवन बच रहे हैं। इनमें एक पानीपत के काबुली बाग में एक स्मारक मस्जिद है (1526); दूसरा, रोहिलखंड में सम्भल नामक स्थान पर जामी मस्जिद (1526) है तथा तीसरा, आगरे के पुराने लोदी किले के भीतर एक मस्जिद है

भाग्यहीन बादशाह हुमायूँ के राज्यकाल के अर्धभग्नावस्था में केवल दो भवन शेष हैं। एक भवन आगरे की मस्जिद है। दूसरा भवन पूर्वी पंजाब के हिसार जिले के फतहाबाद में एक बड़ी और अच्छे अनुपात पर निर्मित मस्जिद है, जो फारसी ढंग के मीनाकारी किये हुए खपड़ों की सजावट के साथ लगभग 1540 ई. में बनी थी। यहाँ पर हमें यह याद रखना चाहिए कि यह फारसी, बल्कि मंगोल, पद्धति पहले-पहल भारत में हुमायूँ द्वारा नहीं लायी गयी; यह पहले से ही बहमनी राज्य में पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वर्तमान थी।

भारतीय-अफगान पुनर्जीवनकर्ता शेरशाह का छोटा शासनकाल भारतीय भवन-निर्माण-कला के इतिहास में संक्रान्ति का युग है। उसके द्वारा योजित दिल्ली में चहारदीवारियों से घिरी हुई राजधानी के, जो उसकी असामयिक मृत्यु के कारण पूरी नहीं की जा सकी, दो बचे हुए द्वार तथा पुराना किला नामक गढ़ कुछ काल तक प्रचलित भवन-पद्धति से अधिक परिष्कृत एवं कलात्मक रूप से अलंकृत भवन-पद्धति प्रदर्शित करते हैं। किला-ए-कुहना नामक मस्जिद को, जो 1545 ई. में दीवारों के भीतर बनी थी, उसके उज्ज्वल वास्तुकलात्मक गुणों के कारण, उत्तरी भारत के भवनों में उच्च स्थान देना चाहिए। शेरशाह का मकबरा, जो बिहार के शाहाबाद जिले के सहसराम नामक स्थान पर एक तालाब के बीच ऊँचे चबूतरे पर बना है, आकार एवं गौरव, दोनों दृष्टियों से भारतीय मुसलमानी निर्माण कला का चमत्कार है तथा हिन्दू एवं मुस्लिम वास्तुकलात्मक विचारों का आनंदजनक सम्मिश्रण प्रदर्शित करता है। इस प्रकार शासन में ही नहीं, बल्कि संस्कृति तथा कला में भी महान् अफगान ने महान् मुगल अकबर के लिए रास्ता तैयार कर दिया।

स्थापत्य कला

अकबर के शासनकाल में भवन-निर्माण-कला का अद्भुत विकास हुआ। बादशाह ने अपनी पहले की संपूर्णता के साथ कला के प्रत्येक ब्योरेवार विवरण का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया तथा उदार एवं समन्वयशील मन से विभिन्न साधनों से कलात्मक विचारों को ग्रहण किया। इन कलात्मक विचारों को व्यावहारिक रूप उन कुशल कारीगरों ने दिया, जिन्हें अकबर ने अपने चारों ओर एकत्रित कर रखा था। अबुल फजल उचित ही कहता है कि उसके बादशाह ने आलीशान इमारतों की योजना बनायी तथा अपने मस्तिष्क एवं हृदय की रचना को पत्थर और मिट्टी की पोशाक पहनायी। फर्गुसन ने ठीक ही कहा कि फतेहपुर सीकरी किसी महान् व्यक्ति के मस्तिष्क का प्रतिबिम्ब था।

अकबर क्रियाशीलता केवल वास्तुकला की परमोत्कृष्ट कृतियों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उसने कुछ दुर्ग, ग्राम्य गृह, मीनारें, सराय, स्कूल, तालाब एवं कुएँ भी बनवाये। उसकी माँ जाम के एक फारसवासी शेख परिवार में उत्पन्न हुई थी, जिससे उसने विरासत में फारसी विचार पाये और वह अभी भी उनसे चिपका रहा। फिर भी हिन्दुओं के प्रति उसकी सहनशीलता, उनकी संस्कृति से सहानुभूति तथा उन्हें अपने पक्ष में करने की नीति के कारण उसने अपने बहुत-से भवनों में वास्तुकला की हिन्दू शैलियों का व्यवहार किया। इन भवनों की सजावट की विशेषताएँ हिन्दू तथा जैन मंदिरों में पायी जाने वाली सजावट की विशेषताओं की अनुकृतियाँ हैं। इसकी अभिव्यक्ति निम्नांकित कला-कृतियों में देखी जा सकती है- आगरे के किले के अन्दर जहाँगीरी महल में, जिसमें वर्गाकार स्तम्भ तथा सहारे के रूप में चोटियाँ हैं एवं हिन्दू ढंग पर बनी, (पत्थर या ईंटों की) तहाँ से शून्य, छोटी मेहराबों की पत्तियाँ हैं; फतेहपुर सीकरी के, जो 1569 से लेकर 1584 ई. तक शाही राजधानी रही, बहुत-से भवनों में तथा लाहौर के किले में। पुरानी दिल्ली में हुमायूँ के प्रसिद्ध मकबरे तक में, जो 1569 ई. के आरम्भ में तैयार हुआ था तथा जो साधारणतः पारसी कला के प्रभावों को प्रदर्शित करता हुआ समझा जाता है, कब्र की धरातल पर की योजना भारतीय है। भवन के बाहरी भाग में उजले संगमरमर का स्वच्छन्द प्रयोग भारतीय है तथा रंग-बिरंगे खपडों की सजावट, जिसका पारसी भवन-निर्माता इतना अधिक व्यवहार करते थे, अनुपस्थित है। फतेहपुर सीकरी में बादशाह के सबसे शानदार भवन हैं- जोधाबाई का महल तथा दो अन्य रहने के भवन जो कुछ लोगों के कथनानुसार उसकी रानियों के रहने के लिए बनवाये गये थे; दीवाने-आम, जो हिन्दू शैली का था, जिसमें खम्भे पर निकली हुई बरामदे की छत थी; आश्चर्यजनक दीवाने-खास, जो योजना, बनावट एवं अलंकार में स्पष्ट रूप से भारतीय था; जामी मस्जिद नामक संगमरमर की मस्जिद, जिसका वर्णन फर्गुसन ने पत्थर में रूमानी कथा के रूप में किया है; बुलन्द दरवाजा, जो मस्जिद के दक्षिणी द्वार पर है तथा अकबर की गुजरात-विजय के स्मारक स्वरूप संगमरमर तथा बलुआ पत्थर से बनाया गया है तथा पंचमहल, जो पिरामिड के आकार का पाँच महलों का था और भारतीय बौद्ध विहारों की, जो अब तक भारत के कुछ भागों में वर्तमान है, योजना का प्रसार था। उस युग के दो अन्य उल्लेखनीय भवन हैं- इलाहाबाद में चालीस स्तम्भों का राजमहल तथा सिकन्दरा में अकबर का मकबरा। इलाहाबाद का राजमहल, जिसके निर्माण में विलियम पिंच के लेखानुसार चालीस वर्ष लगे तथा विभिन्न वगों के पाँच हजार से लेकर बीस हजार तक मजदूर लगाये गये, निश्चित रूप में भारतीय ढंग का है तथा उसमें हिन्दू स्तम्भों की पंक्तियों पर आधारितबाहर निकली हुई बरामदे की छत है। सिकन्दरा में अकबर के मकबरे के विशालकाय ढाँचे में, जिसकी योजना बादशाह के जीवन-काल में बनी थी, किन्तु जो 1605 तथा 1613 के बीच निर्मित हुआ था, पाँच चबूतरे हैं, जो सफेद संगमरमर के सबसे ऊपरी महल तक एक गुम्बजदार छत के साथ ऊपर बढ़ने में एक-के-बाद दूसरे घटते जाते हैं तथा यह समझा जाता है कि स्मारक के ऊपर एक केन्द्रीय गुम्बज बनवाने का विचार थ। इस भवन का भारतीय ढग भारत के बौद्ध विहारों से तथा संभवत: कोचीन-चीन में प्रचलित खमेर वास्तुकला से भी प्रेरित था।

जहाँगीर के शासनकाल में, उसके पिता के वास्तुकला-विषयक कार्य को ध्यान में रखते हुए, बहुत कम इमारतें बनीं किन्तु उसके समय की दो इमारतें विशेष आकर्षण की हैं। एक है अकबर का मकबरा, जिसकी खास विशेषताओं की चर्चा पहले की जा चुकी है। दूसरी है आगरे में इतिमादुद्दौला की कब्रें, जिसे उसकी पुत्री तथा जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ ने बनवाया। यह कब्र बिलकुल उजले संगमरमर की बनी हुई थी तथा संगमरमर में जडित कम मूल्य वाले पत्थरों से सजी हुई थी। इस काम का एक पहले का नमूना हम उदयपुर के गोलमण्डल मंदिर में पाते हैं (1600 ई. से)। अत: यह एक राजपूत शैली थी या सम्भवतः एक पुरानी भारतीय शैली थी।

शाहजहाँ बहुत बड़ा निर्माता था। उसके कारण बहुत- से भवन, राजमहल, किले, उद्यान तथा मस्जिदें आगरे, दिल्ली, लाहौर, काबुल, कश्मीर, कंधार, अजमेर, अहमदाबाद, मुखलिसपुर तथा अन्य स्थानों में पायी जाती हैं। यद्यपि इन इमारतों पर किये गये खर्च का पक्का अंदाज लगाना सम्भव नहीं, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि इन पर कई दर्जन करोड़ रुपये लगे होंगे। अकबर की इमारतों की तुलना में शाहजहाँ की इमारतें चमक-दमक एवं मौलिकता में घटिया हैं, परन्तु अति व्ययपूर्ण प्रदर्शन एवं समृद्ध और कौशलपूर्ण सजावट में वे बढ़ी हुई हैं, जिससे शाहजहाँ की वास्तुकला एक अधिक बड़े पैमाने पर रत्नो के सजाने की कला बन जाती है। यह विशेष रूप से दीवाने-आम एवं दीवाने-खास जैसे उसके दिल्ली के भवनों में देखी जा सकती हैं

शाहजहाँ के द्वारा अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की कब्र पर बनवाया गया शानदार मकबरा ताजमहल जिसके निर्माण में उस समय 50 लाख रुपए लगे थे उचित ही अपनी सुन्दरता एवं वैभव के लिए संसार का एक आश्चर्य मन जाता है। ताज की योजना बनाने वाले और इसके निर्माण करने वाले कारीगरों के विषय में स्मिथ का विचार है कि यह यूरोपीय और एशियाई प्रतिभा के सम्मिश्रण की उपज है। परन्तु मोइनुद्दीन अहमद ने इस पर आपत्ति की है तथा वे अपने विवेकपूर्ण तर्क देकर हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि दाम्पत्य प्रेम के इस महान् स्मारक की योजना या निर्माण में इटली वाले अथवा फ्रांसीसी वास्तुकारों को कोई हाथ न था। वे इसकी योजना का श्रेय उस्ताद ईसा को देते हैं। ताज का अध्ययन करते समय भारतीय कला के विद्यार्थी को कुछ बातें नहीं भूलनी चाहिएँ। प्रथमत: इसकी योजना तथा प्रमुख विशेषताएँ एकदम नयी नहीं थीं, क्योंकि शेर के मकबरे से लेकर हुमायूँ की कब्र तथा बीजापुर के स्मारकों को देखते हुए, शैली का उतार आसानी से दृष्टिगोचर होता है। यहाँ तक कि संगमरमर तथा अन्य पत्थरों में बेल-बूटे का काम तथा संगमरमर में बहुमूल्य पत्थरों के जड़ने की कला भी पहले से ही पश्चिमी भारत एवं राजपूत कला में उपस्थित थी। दूसरे, उजले संगमरमर के प्रचुर मात्रा में प्रयोग तथा भारतीय ढंग की कुछ सजावटों से पता चलता है कि शाहजहाँ की इमारतों पर पारसी प्रभाव की उतनी बहुलता नहीं थी, जितनी कि सामान्यतः सोची जाती है। तीसरे, मुगलकाल में भारत का पश्चिमी जगत् विशेष रूप से भूमध्य सागरीय क्षेत्र के साथ सम्बन्ध का ध्यान रखते हुए यह विश्वास करना ऐतिहासिक रूप से असंगत नहीं होगा कि सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों में भारत की कला पर पश्चिमी जगत् की कला के कुछ तत्वों का प्रभाव था तथा तत्कालीन भारत के विभिन्न भागों में कुछ यूरोपीय निर्माता विद्यमान् थे।

जहाँगीर का मकबरा, जिसे शाहजहाँ ने आरम्भ में ही लाहौर में शाहदरा नामक स्थान में बनवाया था, यद्यपि ताज के समान प्रसिद्ध नहीं है, तथापि कला का एक सुन्दर नमूना है। इस राज्यकाल की दूसरी प्रसिद्ध कला की कृति थी मयूर सिंहासन (तख्ते-ताऊस)। सिंहासन सुनहले पाँवों पर एक खाट के रूप में था। मीनाकारी किया हुआ चंदवा पन्ने के बारह स्तम्भों पर आधारित था। प्रत्येक स्तम्भ पर रत्नों से जड़े दो मयूर थे। प्रत्येक जोडे पक्षियों के बीच हीरों, पन्नों, लाल मणियों तथा मोतियों से आच्छादित एक वृक्ष था। नादिरशाह इस सिंहासन को 1739 ई. में फारस ले गया परन्तु दुर्भाग्यवश अब यह इस संसार में कहीं नहीं है।

औरंगजेब के शासनकाल में भवन-निर्माण-कला की शैली का ह्रास होने लगा। यह कट्टर बादशाह प्रत्यक्ष रूप में भवन-निर्माण-कला के विरुद्ध तो था ही, तो उसने अपने पूर्वगामियों के विपरीत इसे प्रोत्साहन देना या भवनों का निर्माण करना भी बंद कर दिया। उसके राज्यकाल की जो कुछ भी इमारतें हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण थी लाहौर मस्जिद, जो 1674 ई. में पूरी हुई थी, वे पुराने आदशों की कमजोर नकल मात्र है। शीघ्र भारतीय कलाकारों की रचनात्मक प्रतिभा अधिकतर लुप्त हो गयी और अठारहवीं सदी में एवं उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में आशिक रूप में अवध तथा हैदराबाद में शेष रहीं।

उद्यान

बाबर ने आगरा में आरामबाग का निर्माण कराया। जहाँगीर के द्वारा कश्मीर की घाटी में अनेक बाग लगवाए गए जिनमें शालीमार बाग सबसे प्रमुख है। शाहजहाँ ने कश्मीर में निशात बाग एवं चश्मा-ए-शाही लगवाया। औरंगजेब ने हरियाणा में पिंजोर बाग उद्यान लगवाया।

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