संविधान का संशोधन Amendment of The Constitution

संविधान एक जीवित एवं प्रगतिशील प्रलेख होता है। देश और काल की परिवर्तित होती परिस्थितियों के अनुसार संविधानों में भी परिवर्तन लाना आवश्यक हो जाता है। कई बार उत्पन्न होने वाली विभिन्न नई-नई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार संविधान में परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में यदि देश का संविधान देश के विकास में बाधक बनता है तो परिवर्तन की आंधी से वह स्वयं ही विनष्ट हो जाता है। विश्व के संविधानों को प्रायः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- नम्य संविधान तथा अनम्य संविधान। संघीय संविधान अनम्य होते हैं, इसलिए उनके संशोधन की प्रक्रिया जटिल होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया के संविधानों की संशोधन प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है।

संविधान का विकास तीन प्रकार से होता है- परम्पराओं द्वारा, न्यायिक व्याख्या द्वारा तथा संविधान में संशोधन की पद्धति द्वारा।

परम्पराएं और प्रथाएं निश्चित तौर पर राजनितिक संस्थाओं के स्वरूप को निर्धारित करती हैं। जहां तक न्यायिक समीक्षा का प्रश्न है, भारत और अमेरिका के उच्चतम न्यायालयों द्वारा समय-समय पर संवैधानिक समस्याओं की व्याख्या भी की गई है किंतु लिखित संविधान के विकास का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत औपचारिक संशोधन ही है। किसी भी देश के संविधान में संशोधन किया जाना प्रमुखतः निम्नलिखित कारणों से आवश्यक हो जाता है-

  1. संविधान कोई साध्य न होकर साध्य की प्राप्ति हेतु साधन मात्र है। अतः उसे समय एवं राज्य की आवश्यकताओं का प्रतिरूप होना चाहिए। आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्रांतिकारी दौर में कोई भी संविधान अनन्य स्थायित्व का दावा करते हुए कह नहीं सकता कि वह परिवर्तनशील परिस्थितियों के अनुकूल होने की क्षमता भी रखता है।
  2. संविधान के अंतर्गत वर्णित आदशों, लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु संविधान के उन उपबंधों में संशोधन करना आवश्यक है, जो उनसे मेल नहीं खाते।
  3. सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की प्राप्ति हेतु परम्परावादी मान्यताओं में शांतिपूर्ण परिवर्तन संविधान संशोधन के माध्यम से ही सम्भव है।
  4. संविधान संशोधन के माध्यम से उसमें कोई नई बात अथवा किसी नए तथ्य को समाविष्ट किया जाता है।
  5. संविधान की जन-आकांक्षाओं, इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का प्रतिबिम्ब होना चाहिए। वर्तमान संविधान यदि मौजूदा आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने में अक्षम है तो उसमें यथोचित परिवर्तन कर देने चाहिए।

भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक विशाल एवं लिखित संविधान है, किन्तु इसकी विशेषता यह है की इसमें नम्यता और अम्नाम्यता दोनों का अद्भुत् मिश्रण है। भारत का संविधान लिखित होते हुए भी अनम्य या कठोर नहीं है।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया

संविधान के भाग-20 के अंतर्गत अनुच्छेद-368 में संविधान संशोधन से संबंधित प्रक्रिया का विस्तृत उपबंध है। संविधान के संशोधन हेतु किसी विधेयक को संसद में पुरःस्थापित करने हेतु राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक नहीं है। संविधान में संशोधन की प्रक्रिया की दृष्टि से भारतीय संविधान के अनुच्छेदों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।
  2. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में दो-तिहाई (⅔) बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।
  3. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में दो-तिहाई (⅔)बहुमत के साथ भारत के आधे राज्यों के विधान्मंदलों के संकल्पों की स्वीकृति द्वारा संशोधित किया जा सकता है।

साधारण बहुमत द्वारा

संविधान में कई ऐसे उपबंध हैं, जिनके संशोधन के लिए किसी विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। अभिप्राय यह है कि इन अनुच्छेदों के संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में केवल साधारण बहुमत की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार के संशोधनों का जो क्षेत्र है, उसमें नये राज्यों का निर्माण, राज्य के क्षेत्र, सीमा और नाम में परिवर्तन आदि आते हैं। इस श्रेणी में संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेद आते हैं-अनुच्छेद-3, 4, 169 तथा 239-क ।

दो-तिहाई बहुमत द्वारा

संविधान की इस संशोधन प्रक्रिया में प्रत्येक सदन में सदस्यों की कुल संख्या का बहुमत तथा उस सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

संशोधन का प्रस्ताव किसी भी सदन में रखा जा सकता है किंतु पारित उसे तब मन जाएगा, जब संसद के दोनों सदनों द्वारा ⅔ बहुमत से उसका अनुमोदन कर दिया जाये। इस प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों के संशोधन विधेयक का अलग-अलग दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक होता है।

इस श्रेणी में आने वाले अनुच्छेदों की सूची काफी विस्तृत है। वास्तव में प्रथम श्रेणी और तृतीय श्रेणी में आने वाले अनुच्छेदों को छोड़कर सभी अनुच्छेद ऐसे हैं, जिन्हें संसद दो-तिहाई बहुमत द्वारा ही बदल सकती है।

दो-तिहाई बहुमत तथा राज्य विधान मंडलों की स्वीकृति द्वारा

संशोधन की इस प्रक्रिया में संविधान के कुछ ऐसे अनुच्छेद आते हैं, जिन्हें संशोधित करना अत्यंत कठिन होता है। इन अनुच्छेदों में संशोधन करने के लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ भारत के कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति आवश्यक होती है। इस श्रेणी में संविधान के निम्नलिखित उपबंध आते हैं-

  1. अनुच्छेद 54- राष्ट्रपति का निर्वाचन
  2. अनुच्छेद 55- राष्ट्रपति के निर्वाचन की विधि
  3. अनुच्छेद 73–संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  4. अनुच्छेद 162- राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  5. अनुच्छेद 241- केंद्र शासित क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय
  6. संघीय न्यायपालिका (भाग-5 अध्याय-4)
  7. राज्यों के लिए उच्च न्यायालय (भाग-6 अध्याय-5)
  8. संघ-राज्य-संबंध (विधायी) (भाग-11 अध्याय-1)
  9. सातवीं अनुसूची का कोई भी विषय
  10. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व
  11. संविधान-संशोधन से संबंधित अनुच्छेद-368

जिन उपबंधों का सम्बन्ध केंद्र और राज्यों दोनों के ही अधिकार क्षेत्रों से है, उनमें संशोधन न तो केंद्र कर सकता है और न ही राज्य। इस प्रकार की संशोधन प्रक्रिया में केंद्र और राज्य दोनों का हाथ होने के कारण यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल मानी जाती है।

संविधान संशोधन संबंधी विशेष प्रावधान

संविधान संशोधन विधेयकों हेतु संयुक्त अधिवेशन नहीं

संविधान संशोधन की प्रक्रिया के संदर्भ में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है की संविधान विधेयक पारित करने की प्रक्रिया साधारण विधेयकों के पारित करने की प्रक्रिया से भिन्न है। अनुच्छेद-108 के अंतर्गत किसी विधेयक को पारित करने के सम्बन्ध में दोनों सदनों के मध्य उत्पन्न गतिरोध को दूर करने हेतु राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाए जाने का प्रावधान है। यह प्रावधान संविधान के संशोधन सम्बन्धी विधेयकों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता। इस संदर्भ में सम्पूर्ण प्रक्रिया (संविधान संशोधन) का उल्लेख अनुच्छेद- 368(2) के अंतर्गत किया गया है। यदि इस क्षेत्र में संयुक्त अधिवेशन का उपबंध होता तो अनुच्छेद-368(2) में विशेष बहुमत का उपबंध निरर्थक हो जाता।

  • अनुच्छेद-368 के अनुसार संसद संविधान में संशोधन तीन प्रकार से ला सकती है-
  1. साधारण बहुमत द्वारा
  2. दो-तिहाई बहुमत द्वारा, तथा;
  3. दो-तिहाई बहुमत के साथ देश के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति से।
  • संशोधन अधिनियम पर दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न होने पर संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान नहीं है।
  • पारित संशोधन अधिनियम पर अपनी स्वीकृति प्रदान करने हेतु राष्ट्रपति बाध्य है।
  • मौलिक अधिकारों में संशोधन सम्भव है जबकि संविधान के आधारिक लक्षणों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार आधारिक लक्षणों की संख्या 19 है। 

राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य

संविधान संशोधन सम्बन्धी विधेयक के विषय में राष्ट्रपति की अनुमति की औपचारिकता बनाए रखा गया है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि यह ज्ञात हो सके कि संशोधन विधेयक किस तिथि से संविधान के भाग के रूप में प्रवृत्त हुआ है। राष्ट्रपति की संशोधन विधेयक को वीटो करने की शक्ति छीन ली गई है। 24वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1971 के पश्चात् अनुच्छेद-368(2) के अंतर्गत अनुमति देगा शब्द रखे गए हैं।

विभिन्न संविधान संशोधन अधिनियम

भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। 1951 में प्रथम संविधान संशोधन से लेकर वर्तमान समय तक संविधान में कुल 97 संशोधन किए जा चुके हैं। संविधान में अब तक किए गए संशोधनों का क्रमानुसार विवरण इस प्रकार है-

प्रथम संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1951

इस संशोधन के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद-19 में वर्णित भाषण देने तथा विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकारों के साथ-साथ कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने के अधिकारों से संबंधित व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने की व्यवस्था की गई। इस संशोधन के द्वारा संविधान में नौवीं अनुसूची को सम्मिलित किया गया और विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंधों के संदर्भ में उपबंध भी विहित किया गया। इसके अतिरिक्त इस संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 15, 19, 31, 85, 87, 174, 176 341, 342, 372 और 376 को भी संशोधित किया गया।

द्वितीय संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1952

संविधान के इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 81 को संशोधित करके लोकसभा के एक सदस्य के निर्वाचन के लिए 7½ लाख मतदाताओं की सीमा निर्धारित की गई थी और लोकसभा के लिए सदस्यों की संख्या 500 निश्चित की गई थी।

तृतीय संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1954

संविधान के इस संशोधन द्वारा सातवीं अनुसूची के अंतर्गत 3 वैधानिक सूचियों में परिवर्तन किया गया। इसके परिणामस्वरूप राज्यों की सूची की कुछ शक्तियां समवर्ती-सूची में शामिल करके संघ सरकार की विधायी शक्ति के क्षेत्र का विस्तार किया गया।

इस संशोधन द्वारा समवर्ती-सूची की प्रविष्टि 33 को हटाकर उसके स्थान पर नाइ प्रविष्टि रखी गयी, जिसमें खाद्य सामग्री, चारा, कपास और जूट जैसी अतिरिक्त मदों को भी सम्मिलित किया गया, जिनके उत्पादन और वितरण पर लोकहित में आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रण रखा जा सके।

चतुर्थ संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1955

संविधान के इस संशोधन अधिनियम द्वारा सम्पति के अधिकार संबंधी अनुच्छेद-31 तथा 31(क) में पुनः संशोधन किया गया। इस संशोधन द्वारा नौवीं अनुसूची तथा अनुच्छेद-305 को भी संशोधित किया गया।

पांचवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1955

इस संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-3 में संशोधन करके राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गयी कि वे राज्य विधान मंडलों द्वारा प्रस्तावित उन कानूनों के सन्दर्भ में विचार प्रकट करने हेतु समय सीमा निर्धारित कर सकें, जिनका उनके क्षेत्र और सीमाओं आदि पर प्रभाव पड़ता हो।

छठा संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1956

इस संशोधन द्वारा अंतरराज्यीय व्यापार में क्रय और विक्रय पर लगने वाले करों से संबद्ध अनुच्छेद-269 और अनुच्छेद-286 को संशोधित किया गया। इसके अतिरिक्त इस संशोधन द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की गयी तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय में वकालत करने की अनुज्ञा दी गयी।

सातवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1956

इस संशोधन द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन किये गये। राज्यों के पुनर्गठन से संबद्ध इस संशोधन का उद्देश्य नए राज्यों की स्थापना और राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन ही नहीं था बल्कि इससे पूर्व राज्यों के जो तीन वर्ग थे उन्हें भी समाप्त करना और कुछ क्षेत्रों को संघ शासित प्रदेशों की श्रेणी में सम्मिलित करना था।

इस संशोधन में लोकसभा की रचना, प्रत्येक जनगणना के बाद पुनः समायोजन, नए उच्च न्यायालयों की स्थापना, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आदि के संबंध में उपबंधों की व्यवस्था की गई।

आठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1960

संविधान के इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-334 में संशोधन करके अनुसूचितजातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं संवैधानिक प्रावधान को 26 जनवरी 1960 से 10 वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया।

नौवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1960

इस संशोधन के द्वारा भारत तथा पाकिस्तान के बीच सीमा समझौते के फलस्वरूप भारत द्वारा कतिपय राज्य क्षेत्रों का हस्तांतरण पाकिस्तान को कर दिया गया।

दसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1961

इस संशोधन द्वारा दादर और नागर हवेली के क्षेत्र की भारतीय क्षेत्र में सम्मिलित कर उसे केंद्र शासित प्रदेश में शामिल करने और उस पर प्रशासन की व्यवस्था के लिए अनुच्छेद-240 और प्रथम अनुसूची को संशोधित कर राष्ट्रपति की विनियम शक्तियों के अधीन कर दिया गया।

ग्यारहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1961

इस संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई कि उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल बनाने हेतु संसद की दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक आवश्यक नहीं है। इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-71 को संशोधित करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि निर्वाचक मंडल में किसी कारण से कोई स्थान रिक्त था।

बारहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1962

इस संशोधन द्वारा गोवा, दमन और दीव को एक संघ शासित प्रदेश के रूप में संविधान की प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया और अनुच्छेद-240 का संशोधन कर उसकी प्रशासनिक व्यवस्था कर दी गयी।

तेरहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1962

नागालैंड राज्य अधिनियम, 1962 के द्वारा नागालैंड की भारतीय संघ के सोलहवें राज्य के रूप में मान्यता प्रदान कर नागालैंड की जनता की विशेष संरक्षण प्रदान किया गया। इस संशोधन के द्वारा नागालैंड के राज्यपाल को कुछ विशेष जिम्मेदारियां भी दी गई हैं।

चौदहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1962

इस संशोधन द्वारा पूर्वकालीन फ्रांसीसी संस्थाओं को पॉण्डिचेरी (वर्तमान पुडुचेरी) के नाम से संघ राज्य क्षेत्र बना लिया गया। अनुच्छेद-81 को संशोधित करके लोकसभा में संघ शासित प्रदेशों के स्थानों की संख्या 20 से बढ़ाकर 25 कर दी गयी। इस अधिनियम के द्वारा एक नए अनुच्छेद-239(क) का निर्माण कर संसद को विधि द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पुडुचेरी में स्थानीय विधानमंडलों या मंत्रिपरिषदों का गठन करने का अधिकार प्रदान किया गया।

पंद्रहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1968

इस संशोधन द्वारा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गयी और उच्च न्यायालयों को संघ सरकार के विरुद्ध मुकदमों की सुनवाई का अधिकार दिया गया। इस संशोधन की दूसरी विशेषता यह थी कि सरकारी प्राधिकारियों के लिए अनुशासनीय आदेशों के विरुद्ध अपील करने का क्षेत्र परिसीमित कर दिया गया, इसके अनुसार, 1963 तक मिलने वाले दो अवसरों के स्थान पर एक अवसर की व्यवस्था कर दी गयी।

सोलहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1963

इस संशोधन द्वारा राज्यों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वह देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए नागरिकों के मूल अधिकारों के प्रयोग पर उचित प्रतिबंध लगायें।

इस संशोधन के अनुसार, संसद तथा राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन के लिए उम्मीदवारों द्वारा ली जाने वाली शपथ का संशोधन करके उसमें यह शर्त स्थापित की गई कि वे भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता को बनाये रखने के लिए वचनबद्ध हैं।

सत्रहवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1964

यह अधिनियम अनुच्छेद 31-(क) में उल्लिखित सम्पदा की परिभाषा का संशोधन करता है। इसमें यह प्रावधान किया गया कि यदि राज्य किसी ऐसी भूमि का अधिग्रहण करता है, जो उसके स्वामी की कृषि के अधीन हो और भूमि की अधिकतम सीमा के भीतर आती हो, तो उस सम्पत्ति के बाजार मूल्य के आधार पर राज्य को मुआवजा देना होगा।

इस संशोधन द्वारा रैयतवाड़ी बंदोबस्त तथा अन्य भूमि सुधार अधिनियमों के अंतर्गत प्रबंधित भूमि भी सम्पदा में सम्मिलित कर ली गई।

अठारहवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1966

इस संविधान द्वारा पंजाब का पुनर्गठन किया गया- पंजाबी भाषी क्षेत्र में पंजाब और हिंदी भाषी क्षेत्र में हरियाणा राज्य का गठन किया गया।

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-3में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि राज्य शब्द में संघ शासित प्रदेश भी सम्मिलित होंगे। इसमें यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि संसद को किसी राज्य या संघ शासित प्रदेश के किसी भाग को साथ मिलाकर किसी नए राज्य या संघ शासित प्रदेश का निर्माण करने की शक्ति होगी।

उन्नीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1966

इस संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-324(1) में से इन शब्दों को निकाल दिया गया कि संसद तथा विधानमंडलों के निर्वाचन से उत्पन्न शंकाओं और विवादों की सुनवाई निर्वाचन आयोग के न्यायालय में होगी। इस संशोधन द्वारा निर्वाचन आयोग के कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया।

बीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1966

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-233(क) को संविधान में शामिल किया गया। इस संशोधन द्वारा कुछ ऐसे जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों को मान्यता प्रदान की गई, जिनकी नियुक्तियां अनुच्छेद-233या 235 (उच्च न्यायालय के अधीनस्थ अधिकारों पर नियंत्रण से सम्बद्ध) के अंतर्गत विधिवत नहीं की गई थी। राज्यपाल द्वारा की गई नियुक्तियों को भी विधिमान्य बना दिया गया।

इक्कीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1967

इस संशोधन द्वारा सिंधी भाषा को भारतीय भाषा मानकर संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया गया।

बाईसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1969

संविधान के इस संशोधन अधिनियम द्वारा असम राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी पहाड़ी राज्य मेघालय का सृजन किया गया।

तेईसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1969

इस संसोधन अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए संसद तथा राज्य विधानमंडलों में स्थानों के आरक्षण और आंग्ल-भारतीय समुदाय के सदस्यों को मनोनीत करने की अवधि को दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।

चौबीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1971

इस संशोधन अधिनियम के द्वारा संसद को मौलिक अधिकारों के साथ संविधान के समस्त उपबंधों में संशोधन करने का अधिकार प्रदान किया गया। इसके लिए संविधान की धारा 368 और 13 में संशोधन किया गया। इसके द्वारा गोलकनाथ मुकदमे का निर्णय निष्प्रभावी हो गया।

पच्चीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1971

इस संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि यदि सरकार किसी सम्पत्ति या भूमि को अधिगृहीत करके मुआवजे की जो राशि तय करती है तो उस राशि की पर्याप्तता संबंधी विवाद के लिए न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। साथ ही अधिग्रहण के बदले में मुआवजा शब्द उसके स्थान पर राशि शब्द रख दिया गया।

एक नया खंड जोड़कर यह उपबंध बनाया गया कि यदि किसी अधिनियम में यह घोषणा है कि वह अनुच्छेद-39 के खंड (ख) और (ग) के निदेशक तत्वों को प्रभाव देने के लिए है तो उसे इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि यह भौतिक अधिकारों को क्षति पहुंचाता है।

छब्बीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1971

इस संशोधन द्वारा भूतपूर्व रियासतों के शासकों की मान्यता तथा उनको दी जाने वाली प्रिवीपर्स को समाप्त कर दिया गया। इस संशोधन से संविधान के अनुच्छेद-291 और 362 को समाप्त कर एक नये अनुच्छेद-360(क) को सम्मिलित किया गया। अनुच्छेद-366 में उपवाक्य 2 के स्थान पर एक नये वाक्य को सम्मिलित किया गया।

सत्ताईसवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1971

संविधान के इस संशोधन द्वारा मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश नामक दो केंद्रशासित प्रदेशों की स्थापना की गई।

अठ्ठाईसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1972

इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नये अनुच्छेद-312(क) को सम्मिलित करके अनुच्छेद-814 और उसके द्वारा प्रदत्त भारतीय सिविल सेवा के विशेषाधिकारों तथा सेवा की शताँ को समाप्त कर दिया गया।

उनतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1972

इस अधिनियम द्वारा केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 और केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971 को संविधान की नौवीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया गया ताकि उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सके।

तीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1972

इस संशोधन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपीलों की संख्या कम कर दी गई। इसके पूर्व सर्वोच्च न्यायालय में अपील पर फैसला उस मामले में अंतर्निहित धनराशि के आधार पर किया जाता था। इस संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि केवल उन्हीं मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकेगी, जिनमें विधि का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न विचाराधीन हो।

इकतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1973

8 मई, 1973 को संसद द्वारा पारित इस अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद-81 का संशोधन करके लोकसभा में निर्वाचित सीटों की संख्या 525 से बढ़ाकर 545 कर दी गई।

बत्तीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1973

इस संशोधन द्वारा आंध्र प्रदेश में छह सूत्री कार्यक्रम लागू करने की व्यवस्था की गई। इसके द्वारा अनुच्छेद-371(1) का संशोधन किया गया तथा सातवीं अनुसूची की सूची (1) की प्रविष्टि 63 का भी संशोधन किया गया।

तैतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1974

इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद-101, 190 को संशोधित करके यह प्रावधान बनाया गया की राज्य विधानमंडल और संसद के सदस्यों से कोई त्यागपत्र प्राप्त होता है तो अध्यक्ष इस बात का समाधान करेगा कि त्यागपत्र स्वैच्छिक और वास्तविक है।

चौंतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1974

इस संशोधन द्वारा विभिन्न राज्यों द्वारा पारित किए गए 20 भूमि सुधार कानूनों को संविधान की 9वीं अनुसूची में सम्मिलित करके उन्हें संरक्षण प्रदान किया गया।

पैंतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1974

इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नये अनुच्छेद-2(क) को जोड़ा गया और अनुच्छेद-80 तथा 81 का संशोधन करके सिक्किम को सह-संयुक्त राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। इस अधिनियम द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची को भी सम्मिलित किया गया।

छत्तीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1975

इस संशोधन द्वारा सिक्किम की भारतीय संघ के 22वें राज्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई। इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-2(क) और अनुसूची 10 को समाप्त करके अनुसूची 1 में मद 22 को जोड़ दिया गया।

सैंतीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1975

संविधान के इस संशोधन द्वारा केंद्र प्रशासित राज्य क्षेत्र में विधानमंडल तथा मंत्रिपरिषद के गठन की व्यवस्था की गई। अनुच्छेद-239(क) और 240

का संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि विधानमंडल वाले केन्द्रशासित प्रदेशों की भांति केंद्रशासित प्रदेश अरुणाचल प्रदेश के लिए भी राष्ट्रपति द्वारा विनियम बनाने की शक्ति का प्रयोग तब किया जा सकेगा, जब विधान सभा या तो भंग हो गई हो या उसके कार्य निलम्बित हों।

अड़तीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1975

संसद के द्वारा इस अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद-123,213,239 (ख), 352,356,359 और 360 का संशोधन किया गया। इसके द्वारा राष्ट्रपति की आपातकालीन घोषणा और राष्ट्रपति, राज्यपालों और संघ शासित प्रदेशों के प्रशासकीय प्रमुखों द्वारा जारी किये गये अध्यादेशों को न्यायिक पुनरीक्षण के क्षेत्र से बाहर कर दिया गया।

उनतालीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1975

इसके द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर कर दिया गया। इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-71 को संशोधित किया गया और अनुच्छेद-329(क) को अंतःस्थापित किया गया।

चालीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1976

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-297 को प्रतिस्थापित किया गया और नौवीं अनुसूची में 125 से 188 तक की प्रविष्टियां जोड़ी गई। इस अधिनियम के द्वारा यह घोषणा की गई कि- भारत के प्रादेशिक समुद्र या महाद्वीपीय जलमार्ग भूमि या अन्य आर्थिक क्षेत्र के भीतर सागर के निचले भाग की समस्त भूमि, खनिज और अन्य मूल्यवान वस्तुएं संघ सरकार के स्वामित्व में होंगी और संघ के प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होंगी।

इकतालीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1976

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-316 को संशोधित करके राज्यों के लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की सेवानिवृति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 कर दी गई। संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनकी सेवानिवृति की आयु सीमा 65 वर्ष निश्चित की गई है।

बयालीसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1976

यह संविधान में किए गए अब तक के संशोधनों में सबसे व्यापक संशोधन है। इस संविधान संशोधन में एक प्रकार से संपूर्ण संविधान का पुनरीक्षण किया गया। इसकी व्यापकता को दृष्टिगत करते हुए ही इसे मिनी संविधान कहा जाता है। मुख्यतः यह संशोधन स्वर्ण सिंह आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए किया गया था। संवैधानिक संशोधन में कुल 59 प्रावधान थे और यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक व्यापक एवं विवादस्पद संवैधानिक संशोधन था।

इस संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य शब्दों के स्थान पर प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य शब्द और राष्ट्र की एकता शब्दों के स्थान पर राष्ट्र की एकता और अखंडता शब्द स्थापित किए गए। इसके अतिरिक्त मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, संघीय कार्यपालिका, संसद, संघीय न्यायपालिका, भारत का नियंत्रक महालेखा-परीक्षक, राज्य कार्यपालिका, राज्य विधान मंडल, उच्च न्यायालय, संघ तथा राज्यों के संबंध, लोक सेवा आपात उपबंध, संविधान संशोधन, सातवीं अनुसूची आदि से संबद्ध उपबंधों का संशोधन किया गया। इस अधिनियम द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।

तत्कालीन शासक वर्ग के द्वारा इस संवैधानिक संशोधन के चाहे जो भी लक्ष्य और उद्देश्य बतलाए गए हो, वस्तुतः इसका सर्वप्रमुख उद्देश्य प्रधानमंत्री एवं कार्यपालिका के हाथ में अधिकाधिक शक्ति का सकेन्द्रण था।

तैतालिसंवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1977

संविधान के इस संशोधन द्वारा उच्चतम न्यायालय को राज्यों के कानूनों पर तथा उच्च न्यायालयों को केंद्रीय अधिनियमों की वैधानिकता पर निर्णय देने का वह अधिकार पुनः वापस कर दिया गया, जो बयालीसवें संशोधन द्वारा छीन लिया गया था। इसके अतिरिक्त लोकसभा व राज्य विधान सभाओं के 6 वर्ष के कार्यकाल को कम करके पुनः 5 वर्ष कर दिया गया।

चवालिसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978

इस संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर केवल संवैधानिक अधिकार बना दिया गया। संविधान के इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-352 के अंतर्गत आपात उपबंधों में आंतरिक अव्यवस्था के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द का प्रयोग किया गया। अनुच्छेद-74 में यह उपबंध जोड़ा गया कि- राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से किसी परामर्श पर साधारण रूप से या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा करेगा, और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के पश्चात् दिए गए परामर्श के अनुसार कार्य करेगा।

अनुच्छेद-356 को संशोधित करके किसी भी राज्य में राष्ट्रपति द्वारा प्रशासन की अवधि, एक समय में एक वर्ष से घटाकर 6 महीने कर दी गई। छठी लोकसभा चुनाव के दौरान जनता पार्टी ने घोषणापत्र में कहा था कि वह 42वें संवैधानिक संशोधन के प्रावधानों को रद्द कर देगी लेकिन सत्ता में आने के पश्चात् इसे रद्द करने के बजाए इसके संदर्भ में गुणावगुण के आधार पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया। 42वें संशोधन की कुछ बातें 43वें संशोधन (1977) और कुछ 44वें संशोधन (1979) में रद्द की गई। कुल मिलाकर 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा भारतीय संविधान को फिर से सामान्य स्थिति में लाने का प्रयास किया गया है।

पैतालिसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1980

इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संसद तथा राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए किए गए आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया।

छियालिसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1982

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-269 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गई कि अंतरराज्यीय व्यापार और वाणिज्य के दौरान प्रेषित माल पर लगाए गए कर को राज्यों को सौंप दिया जाए।

सैतालिसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1984

इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान की नवम अनुसूची में कुछ भूमि सुधार अधिनियमों की सम्मिलित कर लिया गया। ऐसी व्यवस्था इसलिए की गयी ताकि इनके क्रियान्वयन में न्यायालय के पुनरीक्षण सम्बन्धी विवादों से बचा जा सके।

अड़तालिसवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1984

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-356 के खण्ड (5) में परंतु अतःस्थापित करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढाई गयी।

उनचासवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1984

इस संशोधन द्वारा त्रिपुरा राज्य की स्वायत्तशासी जिला परिषद को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई क्योंकि त्रिपुरा सरकार ने यह सिफारिश की थी कि संविधान की छठी अनुसूची के उपबंधों को उस राज्य क्षेत्र के जनजातीय क्षेत्रों में लागू किया जाए। इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-244 तथा पांचवीं एवं छठी अनुसूची में संशोधन किया गया।

पचासवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1984

इस संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-33 में संशोधन करके इसमें निम्न उपबंधों को जोड़ दिया गया-

  1. राज्य अथवा राज्य के अधीन सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के सदस्य
  2. राज्य द्वारा संस्थापित किसी कार्यालय या व्यवस्था में गुप्तचर विभाग से संबद्ध व्यक्ति
  3. किसी बल,कार्यालय अथवा संगठन के लिए दूर-संचार साधनों की व्यवस्था में नियुक्त व्यक्ति।

संविधान के अनुच्छेद-33 में यह उपबंध है कि संसद को भाग-3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को सशस्त्र सेनाओं अथवा लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंधित या निरस्त किया जा सकता है।

इक्यावनवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1984

इस संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद- 330 और 332 का संशोधन किया गया। अनुच्छेद- 330 को संशोधित करके नागालैण्ड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम की अनुसूचित जनजातियों के लिए संसद में स्थान आरक्षित किए गए।

इसी प्रकार अनुच्छेद-332 में संशोधन करके स्थानीय जनजातियों की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नागालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में स्थान आरक्षित किए गए।

बावनवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1985

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद,-101, 102, 190, 191 का संशोधन किया गया। साथ ही दल-बदल से संबद्ध कानून बनाकर संविधान में दसवीं अनुसूची की स्थापित किया गयी।

इस संशोधन द्वारा यह उपबंध किया गया कि यदि संसद अथवा विधान मंडल का कोई सदस्य अपने दल का त्याग करता है, या निर्वाचन के लिए नामित करने वाली पार्टी के द्वारा दल से निष्कासित कर दिया जाता है, अथवा कोई स्वतंत्र सदस्य सदन में सीट प्राप्त करने के 6 महीने बाद किसी अन्य राजनैतिक दल में शामिल हो जाता है, तो ऐसे सदस्यों की सदस्यता सदन में समाप्त हो जाएगी।

तिरपनवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1986

इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नये अनुच्छेद-371(छ)को सम्मिलित किया गया। इस अधिनियम द्वारा मिजोरम को पूर्णराज्य का दर्जा प्रदान किया गया और यह व्यवस्था की गई कि मिजोरम निवासियों की धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं, परम्परागत कानून और विधि के सम्बन्ध में संसद कानून का निर्माण नहीं कर सकती। इस उपबंध के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई कि मिजोरम की विधान सभा की न्यूनतम सदस्य संख्या 40 होगी।

चौवनवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1986

इस संशोधन अधिनियम द्वारा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन में वृद्धि करने का उपबंध किया गया। इस संशोधन के अंतर्गत अनुच्छेद 125, 221 तथा दूसरी अनुसूची का संशोधन किया गया। अनुच्छेद-125 और 221 में यह प्रावधान किया गया कि संसद कानून बनाकर भविष्य में न्यायाधीशों के वेतन में परिवर्तन कर सकती है।

पचपनवां सविघान (संशोधन) अधिनियम, 1986

संविधान के इस संशोधन द्वारा केंद्रशासित प्रदेश अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया गया। इस अधिनियम द्वारा यह भी व्यवस्था की गई कि अरुणाचल प्रदेश राज्य में कानून और व्यवस्था के क्षेत्र में राज्यपाल को विशेष अधिकार प्राप्त होंगे। राज्यपाल का यह विशेषाधिकार राष्ट्रपति द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।

छप्पनवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1987

इस संशोधन द्वारा गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करके, दमन और दीव को पृथक् केंद्रशासित प्रदेश के रूप में स्थापित कर दिया गया। इस संशोधन द्वारा गोवा राज्य की विधान सभा में 30 सदस्यों की संख्या निर्धारित कर दी गई।

सत्तावनवां संविघान (संशोधन) अधिनियम, 1987

इस संशोधन द्वारा नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा में स्थान आरक्षित करने के लिए तथा नागालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण करने के लिए अनुच्छेद-330 और 332 को संशोधित किया गया।

अठ्ठावनवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1987

संविधान के इस संशोधन द्वारा राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह केंद्रीय अधिनियमों के हिंदी अनुवाद में प्रयुक्त भाषा, शैली तथा शब्दावली के अनुसार संविधान के हिन्दी रूपांतर में आवश्यक परिवर्तन करने के उपरांत संविधान सभा के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए संविधान के हिंदी अनुवाद की प्रतिलिपि को प्रकाशित करवाएं। इस अधिनियम द्वारा राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गयी है की वह संविधान में किए गए प्रत्येक संशोधनों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवा सकता है।

उनसठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1988

इस संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-356 का संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि आपात की अवधि 6-6 महीने करके तीन वर्षों तक प्रवृत्त हो सकती है।

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद- 352 का संशोधन करके पंजाब राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि को बढ़ाया गया।

साठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1988

इस संशोधन के द्वारा अनुच्छेद-276 में संशोधन करके राज्य सरकारों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वे व्यावसायिक वृत्ति एवं आजीविका से संबंधित करों की दर 250 रु. से 2500 रु. प्रतिवर्ष तक बढ़ा सकते हैं।

इकसठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1989

इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद-326 में संशोधन करके मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

बासठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1989

इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद-334 को संशोधित करके अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को 10 वर्ष के लिए अर्थात 2000 तक के लिए बढ़ा दिया गया।

तिरसठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1989

पंजाब राज्य में आपात स्थिति लागू करने के लिए 1988 में पारित किए 59वें संशोधन अधिनियम को समाप्त कर दिया गया। अनुच्छेद-356 और 359(A) के द्वारा पंजाब के संबंध में एक विशेष उपबंध लगाया गया था। इन दोनों के संशोधित उपबंधों को निरस्त कर दिया गया।

चोंसठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1990

इस अधिनियम के द्वारा भी अनुच्छेद-356 को संशोधित करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि 6 महीने और बढ़ा दी गई।

पेंसठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1990

इस संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद-338 को संशोधित करके अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गई।

छियासठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1990

इस अधिनियम द्वारा भूमि सुधार से संबंधित राज्य सरकारों के कानूनों को संविधान की नौंवी अनुसूची में सम्मिलित करके न्यायिक समीक्षा के क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। इस संशोधन द्वारा नौवीं अनुसूची में 203 से 257 तक प्रविष्टियों की अंतःस्थापित किया गया।

सड़सठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1990

इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-356(घ) को संशोधित करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि 6 महीने के लिए और बढ़ाई गई। अर्थात् पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि 4 वर्ष कर दी गई।

अड़सठवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1991

इस संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-356 का संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि पंजाब में आपात की स्थिति पांच वर्ष तक हो सकेगी।

उनहतरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1991

इस अधिनियम द्वारा दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के लिए विधान सभा और मंत्रिपरिषद का उपबंध किया गया। इस संशोधन द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित किया गया और केंद्रशासित प्रदेशों की तुलना में इसे विशेष दर्जा प्रदान कर दिया गया।

सत्तरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-54 और 368 को संशोधित करके दिल्ली और पांडिचेरी (वर्तमान पुदुचेरी) संघ राज्य क्षेत्रों की विधान सभाओं के सदस्यों को राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्मित निर्वाचक-मण्डल में शामिल कर लिया गया।

इकहत्तरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992

इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में कोंकड़ी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को शामिल कर लिया गया।

बहतरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992

इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद-332 में 3(ख) को अंतःस्थापित किया गया। इसके द्वारा त्रिपुरा राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की गई।

तिहतरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992

यह अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन है। इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग-9 तथा ग्यारहवीं अनुसूची को जोड़ा गया। इस अधिनियम द्वारापंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इस अधिनियम में पंचायतों के गठन, संरचना, निर्वाचन, सदस्यों की अर्हताएं, पंचायतों के अधिकार एवं शक्तियों तथा उत्तरदायित्वों आदि के प्रावधान हैं।

चौहत्तरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992

इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग-9(क) तथा 12वीं अनुसूची जोड़ी गई है। इस अधिनियम के अधीन नगरपालिकाओं की संरचना, गठन सदस्यों की योग्यता, निर्वाचन, नगर पंचायतों के अधिकार एवं शक्तियों तथा उत्तरदायित्वों के संबंध में उपबंध स्थापित किए गए हैं।

पचहत्तरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1993

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-323(क) के खंड (2) में एक नया उपखंड जोड़ा गया। इसके द्वारा राज्य स्तर पर किराया-नियंत्रण न्यायाधिकरण स्थापित करने की और अन्य सभी अदालतों में मकान-मालिक एवं किरायेदार से संबद्ध मुकद्दमे दाखिल करने पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है। ऐसे मुकद्दमों के फैसले के लिए अपील केवल उच्चतम न्यायालय में की जा सकेगी।

छिहत्तरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1993

इस अधिनियम के द्वारा संविधान की 9वीं अनुसूची में संशोधन करके एक नया उपबंध जोड़ा गया। इस संविधान संशोधन द्वारा तमिलनाडु में स्थित शिक्षण संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 69 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी है।

सतहतरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1995

इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद-16 के साथ एक नये उपखंड 4(क) को अंतःस्थापित किया गया। इस अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की प्रोन्नति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।

अठहतरवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1995

इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान की नौवीं अनुसूची में भूमि सुधार से संबंधित 27 उन अधिनियमों को सम्मिलित कर लिया गया, जिन्हें राज्यों द्वारा पारित किया गया था। इस प्रकार नौवीं अनुसूची में शामिल अधिनियमों की कुल संख्या अब 284 हो गयी है।

उन्नासीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1999

इस संविधान संशोधन के अनुसार अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि 26 जनवरी, 2010 तक के लिए बढ़ा दी गयी है।

अस्सीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2000

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-269, 270 तथा 272 में संशोधन करके केंद्र व राज्यों के मध्य करों के वितरण की व्यवस्था में परिवर्तन लाये गये हैं।

इक्यासीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2000

इस संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित की गयी 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को बढ़ाया जा सकेगा। अब सरकार अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए आरक्षित रिक्त पदों को भरने के लिए 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण की व्यवस्था कर सकेगी।

बयासीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2000

इस अधिनियम द्वारा सरकार अनुसूचित जाती एवं जनजाति के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों के न्यूनतम योग्यता सम्बंधी प्रावधानों से छूट दिला सकेगी। इन वर्गों के सरकारी कर्मचारी भी कार्य मूल्यांकन मापदंडों में छूट के आधार पर प्रोन्नति प्राप्त कर सकेंगे।

तिरासीवां सविघान (संशोधन) अधिनियम, 2000

अनुच्छेद-273(घ) से सम्बद्ध इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से अरुणाचल प्रदेश राज्य की पंचायती राज व्यवस्था में विभिन्न निकाय पदों पर अनुसूचित जाति के लोगों हेतु आरक्षण प्रावधान नहीं करने की छूट प्रदान की गई है। यह छूट अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों के न होने के कारण दी गई है।

चौरासीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2002

इसमें 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन पर लगे प्रतिबंध को हटाने का प्रावधान है तथा यह 1991 की जनगणना के आधार पर राज्य के भीतर परिसीमन की अनुमति प्रदान करता है। ज्ञातव्य है कि 1976 में लगाया गया प्रतिबंध 2001 तक मान्य था। इसी प्रकार इस विधेयक द्वारा संविधान के संबंधित अनुच्छेदों के प्रावधानों में भी संशोधन करते हुए लोकसभा एवं विधानसभा सीटों की संख्या-निर्धारण पर लगे प्रतिबंध को 2000 से 2026 तक बढ़ा दिया गया है। इस विधेयक द्वारा 2026 तक लोकसभा एवं राज्य विधानसभा की सीटों के राज्यवार विभाजन पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।

पचासीवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2002

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16(4क) को संशोधित करते हुए भारत सरकार के राजपत्र (गजट) में प्रकाशित किया गया। यह सरकारी सेवा में रत अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तियों से संबंधित है। इसके द्वारा उन्हें 1995 के आरक्षण नियमों के तहत प्रोन्नति के लाभ मिल सकेंगे। इस संशोधन में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियों के अंतर्गत अनुवर्ती वरिष्ठता के आधार पर प्रोन्नति देने की व्यवस्था है।

छियासिवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2002

इस संशोधन द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त एवं अनिवार्य बनाते हुए इसे मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया। संविधान के अनुच्छेद-21 के अनुसार-  सरकार राज्य द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगी। यह अनुच्छेद इसे मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद-51क) में शामिल करते हुए अभिभावकों से अपेक्षा करता है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे। इस संशोधन के द्वारा संविधान के अनुच्छेद-45 को संशोधित किया गया है, जिसमें 6 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को प्रारंभिक बाल्य सुरक्षा तथा शिक्षा उपलब्ध कराने का उल्लेख था।

सतासिवां संविधान (संशोधन), अधिनियम, 2003

इस संविधान संशोधन में व्यवस्था दी गई है कि राज्य विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन हेतु वर्ष 2001 के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा। इसमें यह भी प्रावधान है कि 2001 के जनसंख्या संबंधी आंकड़े लोक सभा व राज्य सभा में अनुसूचित जाति व जनजातियों के सदस्यों के लिए आरक्षण का आधार होंगे।

अठासिवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2003

इस संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 268(क) जोड़ा गया, जो संघ द्वारा सेवा कर उद्गृहीत करने तथा संघ व केंद्र सरकारों द्वारा विनियोजित व संगृहीत करने से संबद्ध है। इसमें यह प्रावधान है कि सेवा कर विनियोत व एकत्रित करने के विनियम संसद द्वारा बनाए जाएंगे। इसमें यह भी कहा गया है कि सेवा कर संघ-सूची (सातवीं अनुसूची) में शामिल किया जाएगा।

नवासिवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2008

इस संविधान संशोधन के अनुसार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग को दो पृथक् भागों- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में विभाजित किया गया है। इसके द्वारा संविधान में अनुच्छेद 388(क) जोड़ा गया है। राष्ट्रीय जनजाति आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, तथा तीन अन्य सदस्य होंगे। इन पदाधिकारियों की सेवा शर्तों व अवधि आदि का निर्धारण समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा निश्चित किया जाएगा। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में भी एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्य होंगे। इनकी सेवा शर्ते इत्यादि का निर्धारण भी राष्ट्रपति द्वारा ही निश्चित किया जाएगा।

नब्बेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2003

इसमें यह प्रावधान है कि असम के राज्य विधानसभा में बोडोलैंड क्षेत्र के जिलों के अनुसूचित जाति व जनजातियों के प्रतिनिधियों की संख्या, जो बोडोलैंड के अस्तित्व में आने से पूर्व निर्धारित थी, वह जारी रहेगी।

इक्यानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2008

इस संविधान संशोधन द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे में दल-बदल कर जाने की प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके तहत् 1985 में निर्मित दल-बदल कानून के तीसरे परिच्छेद को हटा दिया गया है, जिसके अंतर्गत एक-तिहाई सदस्यों के साथ दल-बदल किया जा सकता था।

इस संविधान संशोधन में केंद्र या राज्य की मंत्रिपरिषद के आकार की निम्न सदन के सदस्यों की संख्या के पन्द्रह प्रतिशत करने की भी व्यवस्था की गई है। इसमें दल-बदल करने वाले सदस्यों को लाभ का राजनैतिक पद पाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इस संविधान संशोधन में छोटे राज्यों-मिजोरम व सिक्किम आदि को कम से कम 12 मंत्रियों को नियुक्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है, भले ही यह संख्या निम्न सदन की सदस्य संख्या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक क्यों न हो।

लाभ का राजनीतिक पद उस ओर विनिर्दिष्ट करता है- (a) जब इस पद संबंधी कार्य हेतु लोक-राजस्व से वेतन दिया जाए, तथा; (b) किसी निकाय के अंतर्गत, जो संगठित हो या असंगठित, जो भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अंशतः या पूर्णतः स्वामित्व में हो तथा जिसके लिए निकाय द्वारा पारिश्रमिक या वेतन प्रदान किया जाए।

बयानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2003

इस संविधान संशोधन द्वारा बोडो, सन्थाली, मैथिली तथा डोगरी भाषाओं की संविधान की आठवीं अनुसूची में समाविष्ट किया गया है। इस प्रकार अब इस अनुसूची में शामिल भाषाओं की संख्या 22 हो गई है।

तिरानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2005

इस अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 15 में एक नया उपबंध (5) जोड़ा गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत राज्यों को सरकारी अनुदान के बिना ही चल रही निजी शैक्षणिक संस्थाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के प्रवेशार्थियों को प्रवेश में आरक्षण उपलब्ध कराने का अधिकार प्राप्त हो गया है।

चौरानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2006

इस अधिनियम के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद-164(1) को संशोधित करके छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में जनजातीय मामलों की देख-रेख हेतु पृथक् मंत्री की नियुक्ति का अनिवार्य प्रावधान किया गया है, जबकि बिहार को इससे बाहर कर दिया गया है। अब इस संशोधित सूची में ओडीशा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश हैं, जहां जनजातीय मामलों की देखरेख हेतु पृथक मंत्री की नियुक्ति की जानी अनिवार्य है।

छत्तीसगढ़ और झारखण्ड की जब नए राज्यों के रूप में स्थापना हुई थी तब अविभाजित मध्य प्रदेश राज्य का एक बहुत बड़ा जनजातीय क्षेत्र छत्तीसगढ़ में चला गया और अविभाजित बिहार राज्य का समूचा जनजातीय क्षेत्र झारखण्ड में चला गया। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, इन चारों राज्यों की कुल जनसंख्या में से जनजातीय जनसंख्या का प्रतिशत था- बिहार-0.9; झारखण्ड-26.8; छत्तीसगढ़-81.8 और मध्य प्रदेश-20.8। अतः, बिहार की जनजातीय मामलों के मंत्री की आवश्यकता नहीं है। अनुच्छेद-164(1) अब मध्य प्रदेश, ओडीशा, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड पर लागू होगा।

पिच्चयानवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2009

इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया है। इसके अंतर्गत लोक सभा एवं राज्य विधानसभाओं में आरक्षण की व्यवस्था को 10 वर्ष के लिए और आगे बढ़ा दिया गया है। 1999 के 79वें संविधान संशोधन द्वारा बढ़ाई 10 वर्ष की अवधि 25 जनवरी, 2010 को समाप्त हो गई। इससे पूर्व इसकी अवधि 10-10 वर्ष के लिए 8वें, 23वें, 45वें, 62वें एवं 79वें संविधान संशोधन द्वारा बढ़ाई जाती रही है।

छियानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011

इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची [अनुच्छेद 344(1) और अनुच्छेद 351] में 15वें स्थान पर आने वाली भाषा उड़िया का नाम परिवर्तन कर ओडिया कर दिया गया है।

सत्तानबेवां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011

इस अधिनियम को 12 जनवरी, 2012 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके द्वारा संविधान के भाग-III में अनुच्छेद 19 के खण्ड (1) के उपखण्ड (ग) में या संघ के बाद या सहकारी समितियां शब्द जोड़ा गया है। भाग-IV में अनुच्छेद 43ख जोड़ा गया है तथा भाग-9क के पश्चात् भाग-9ख जोड़ा गया है। इनमें सहकारी समितियों के गठन, विनियमन एवं विधि संबंधी प्रावधान किए गए हैं।

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