अकबर: 1556-1605 ई. Akbar: 1556-1605 AD.

अकबर को, जो उस समय अपने अभिभावक एवं अपने पिता के पुराने साथी बैरम खाँ के साथ पंजाब में था, तेरह वर्ष की आयु में 14 फरवरी, 1556 ई. को विधिवत् हुमायूँ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। परन्तु अभी भी हिन्दुस्तान पर मुगलों की प्रभुता अनिश्चित थी। शेरशाह के उत्तराधिकारियों के मूर्खतापूर्ण कारनामों और झगड़ों के कारण देश उसके सुधारों के लाभों से वंचित हो गया था। उसी समय उसे एक भयंकर दुर्भिक्ष का शिकार बनना पड़ा। साथ-साथ भारत के विभिन्न भागों में प्रत्येक स्वतंत्र राज्य शक्ति के लिए स्पर्धा कर रहा था। उत्तर-पश्चिम में अकबर का सौतेला भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम काबुल पर लगभग स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था। उत्तर में कश्मीर एक स्थानीय मुसलमान वंश के अधीन था। हिमालय के राज्य भी स्वतंत्र थे। सिंध तथा मुल्तान शेरशाह की मृत्यु के बाद दिल्ली के अधिकार से मुक्त हो गये थे। उड़ीसा, मालवा एवं गुजरात तथा गोंडवाना (आधुनिक मध्यप्रदेश में) के स्थानीय नायक किसी भी प्रभुसत्ता के नियंत्रण से मुक्त थे। विन्ध्य पर्वत के दक्षिण विस्तृत विजय नगर-साम्राज्य तथा खानदेश, बरार, बीदर, अहमदनगर एवं गोलकुंडा की मुस्लिम सल्तनतें थीं, जिन्हें उत्तरीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पुर्तगीजों ने गोआ एवं दिव पर अधिकार कर पश्चिमी तट पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। अपनी मृत्यु के पहले हुमायूँ हिन्दुस्तान में अपने राज्य का एक बहुत छोटा हिस्सा फिर से लौटा सका था। अभी भी शेरशाह के राज्य के अधिकांश भाग पर सूरों का कब्जा था। जैसा अहमद यादगार हमें बताता है, आगरे से मालवा तक के देश तथा जौनपुर की सीमाओं पर आदिलशाह की राजसत्ता थी; दिल्ली से छोटे रोहतास तक, जो काबुल के रास्ते पर था, शाह सिकन्दर के हाथों में था; तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहिम खौं के अधीन था।

हिन्दुस्तान पर प्रभुत्व के दावों के लिए अकबर तथा शेर के प्रतिनिधियों के बीच कुछ चुनना नहीं था। जैसा स्मिथ लिखता है- निर्णय केवल तलवार से ही हो सकता था। इस प्रकार अकबर की पैतृक सम्पत्ति अनिश्चित किस्म की थी तथा उसका साम्राज्य-निर्माण का कार्य वास्तव में बहुत कठिन था।

अकबर के राज्याभिषेक के शीघ्र बाद आदिलशाह सूर के योग्य सेनापित तथा मंत्री हीमू ने आगे बढ़ मुगलों का विरोध किया। वह रेवाड़ी का एक बनिया था। उसने पहले दिल्ली के मुग़ल शासक तर्दी बेग को पराजित कर आगरे एवं दिल्ली पर अधिकार कर लिया। तदीं बेग को दिल्ली की प्रतिरक्षा करने में असफल होने के कारण बैरम खाँ की आज्ञा से मार डाला गया। हीमू ने राजा विक्रमजित् अथवा विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। एक विशाल सेना लेकर जिसमें डेढ़ हजार लड़ाई के हाथ थे, उसने पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में अकबर एवं बैरम का मुकाबला किया। उसे मुग़ल सेना के उभय पक्षों के विरुद्ध प्रारम्भिक सफलताएँ मिलीं परन्तु लड़ाई का निर्णय एक तीर ने कर दिया, जो अचानक उसकी आँख में जा लगा। उसकी चेतना जाती रही तथा उसके सैनिक अपने नेता से वंचित होकर घबड़ाहट में तितर-बितर हो गये। ऐसी असहाय अवस्था में हीमू मार डाला गया। कुछ के मतानुसार उसे अपने हाथों से मारने में अकबर के अस्वीकार करने पर बैरम ने मार डाला तथा कुछ दूसरों के मतानुसार अपने संरक्षक के उकसाने पर अकबर ने स्वयं उसे मार डाला।

पानीपत की दूसरी लड़ाई का परिणाम निर्णायक हुआ। उसने मुगलों के पक्ष में अपना निर्णय देकर भारत में प्रभुता के लिए अफगानों तथा मुगलों के बीच के संघर्ष का अन्त कर दिया। विजेताओं ने शीघ्र दिल्ली एवं आगरे पर अधिकार कर लिया। मई, 1557 ई. में सिकन्दर सूर ने उनके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। पूर्वी प्रान्तों में उसे एक जागीर मिली। अकबर ने शीघ्र उसे वहाँ से निकाल दिया। एक भगोडे की दशा में बंगाल में उसकी मृत्यु हुई (1558-1559 ई.)। मुहम्मद आदिल मुंगेर में बंगाल के शासक के विरुद्ध लड़ता हुआ मर गया (1556 ई.)। इब्राहिम सूर को इधर-उधर भटकने के बाद उड़ीसा में आश्रय मिला, जहाँ लगभग दस वर्षों के बाद वह मारा गया (1567-1568 ई.)। इस प्रकार हिन्दुस्तान पर अकबर की प्रभुता के दावों का विरोध करने वाला कोई सूर प्रतिद्वन्द्वी न रहा। आगे चलकर सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदियों में मुगलों के विरुद्ध जो अफगानों के विद्रोह हुए, वे प्राय: इतने छिटपुट एवं स्थानीय थे कि उनसे मुग़ल आधिपत्य पर कोई भयंकर संकट उपस्थित नहीं हो सकता था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई (1556 ई.) से भारत में मुग़ल साम्राज्य का वास्तविक प्रारम्भ हुआ तथा इसने उसके विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 1558 ई. तथा 1560 ई. के बीच ग्वालियर, अजमेर एवं जौनपुर इसमें मिला लिये गये। पर अपने अभिभावक एवं संरक्षक बैरम खाँ की रक्षा के जाल में बँधे रहने के कारण अकबर स्वेच्छापूर्वक काम करने की स्वतंत्र न था। संरक्षक ने मुगलों की बहुमूल्य सेवा की थी, परन्तु उच्छृखल तरीके से कार्य करने के कारण उसने अब तक बहुतों को अपना शत्रु बना लिया था। 1560 ई. में बादशाह ने अपने हाथों में शासन-सूत्र ले लेने का अपना निर्णय बैरम खाँ के सामने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया तथा उसे बर्खास्त कर दिया। संरक्षक प्रत्यक्ष रूप से आत्मसमर्पण दिखलाते हुए अपने स्वामी के निर्णय के सामने झुक गया तथा मक्का चला जाना स्वीकार कर लिया। परन्तु जब अकबर ने बैरम के एक व्यक्तिगत शत्रु तथा पहले के अधीन अफसर पीर मुहम्मद को अपने संरक्षक (बैरम) को शाही राज्य के बाहर छोड आने के लिए अथवा, जैसा बदायूंनी कहता है, उसे शीघ्रातिशीघ्र मक्का रवाना करने के लिए नियुक्त किया, तब बैरम ने इसे अपना अपमान समझ कर विद्रोह कर दिया। वह जालंधर के निकट परास्त हो गया। पर अकबर ने उसकी विगत सेवाओं का विचार कर उसके साथ उदारता का व्यवहार किया और इस प्रकार बुद्धिमानी का परिचय दिया। मक्का की राह में जनवरी, 1561 ई. में एक लोहानी अफगान ने छुरा भोंक कर बैरम खाँ को मार डाला। उस अफगान के पिता को पहले कभी संरक्षक के अधीन मुग़ल सिपाहियों ने मार डाला था। यद्यपि अफगानों ने उसका सब-कुछ लूट लिया परन्तु उसका परिवार अपमानित होने से बच गया। उसका पुत्र अब्दुर्रहीम अकबर के संरक्षण में ले लिया गया। आगे चलकर वह साम्राज्य का एक प्रमुख सरदार बन गया। बैरम खाँ की पत्नी से अकबर ने विवाह कर लिया।

बैरम खाँ के पतन के शीघ्र बाद शासन-सूत्र अकबर के हाथों में नहीं आया और दो वर्षों तक (1560-1562 ई.) उसकी धाई माहम अनगा, उसके पुत्र आदम खाँ तथा अपने सम्बन्धियों के साथ राज्य पर अनुचित प्रभाव जमाये रही। शासन पर एक महिला के वर्चस्व स्थापित करने के कारण इस समय की सरकार को पेटीकोट सरकार भी कहा जाता है। आदम खाँ तथा पीर मुहम्मद ने ऐसे उपायों से मालदा पर विजय प्राप्त की (1561 ई.), जिनका वर्णन उनके अत्याचारों के चश्मदीद गवाह बदायूनी ने स्पष्टता से किया है, पर उन्हें कोई दण्ड न मिला। अन्त में उनके प्रभाव से ऊब कर अकबर ने आदम खाँ को मरवा डाला। उसकी माँ शोकाकुल होकर चालीस दिनों के बाद चल बसी। इस प्रकार 1562 ई. के मई महीने तक अकबर अपने को अन्त:पुर के प्रभाव से मुक्त कर सका।

अकबर स्वभाव से ही प्रबल साम्राज्यवादी था। उसने जनवरी, 1601 ई. में असीरगढ़ पर अधिकार करने तक अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए देश-विजय की नीति का अनुसरण किया। अदृष्ट एवं नियंत्रणहीन परिस्थितियों ने उसे इसे और बढ़ाने से रोक दिया। उसका विश्वास था कि- राज्य को सदैव, विजय करने को कृतसंकल्प रहना चाहिए, अन्यथा उसके पड़ोसी उसका सशस्त्र विरोध करते हैं। सच तो यह है कि चालीस वर्षों के अन्दर अनेक बार दूसरे राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाकर अकबर ने लगभग सम्पूर्ण उत्तर एवं मध्य भारत का राजनैतिक एकीकरण कर दिया।

मालवा को आदम खाँ तथा पीर मुहम्मद ने 1561 ई. में जीता था। परन्तु इसके शासक बाज बहादुर ने शीघ्र इस पर पुन: अधिकार कर लिया तथा कई वर्षों तक उसने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। बाज बहादुर की रानी रूपमती थी। दोनों उच्च कोटि के गायक माने जाते थे। उस काल में मालवा संगीत का केन्द्र माना जाता था। 1962 में अकबर ने मालवा को अंतिम रूप से जीत लिया। बाज बहादुर अकबर के मनसबदारों में शामिल हो गया। 1564 ई. में अकबर ने कड़ा तथा पूर्वी प्रदेशों के शासक आसफ खाँ को गढ़ कटंगा (गोंडवाना में) के राज्य को जीतने के लिए भेजा। इस राज्य में मोटे तौर पर (आधुनिक) मध्य प्रदेश के उत्तरी जिले पड़ते हैं। उसका राजा वीर नारायण अल्पवयस्क था, परन्तु उसकी माँ दुर्गावती, जो एक अत्यन्त रूपवती एवं वीर राजपूत स्त्री थी, उस पर योग्यतापूर्वक शासन करती थी। 15वीं सदी के अंत में अमनदास ने इस राज्य की स्थापना की थी। उसने गुजरात के शासक बहादुर शाह को रायसीन का क्षेत्र जीतने में मदद की थी तो बहादुर शाह ने खुश होकर उसे संग्राम राय की उपाधि दी। दुर्गावती से उसके पुत्र की शादी हुई थी। दुर्गावती एक कुशल योद्धा एवं शेर के शिकार में दक्ष थी। उसने वीरतापूर्वक शाही दल का विरोध किया, परन्तु गढ़ एवं मण्डला (आजकल जबलपुर जिले में) के बीच उस दल के साथ युद्ध में वह पराजित हुई। सच्चे राजपूत की तरह उसने अपमान की अपेक्षा मृत्यु को अधिक पसन्द किया तथा आत्महत्या कर ली। इस प्रकार जैसा उसका जीवन उपयोगी था, वैसा ही महान् एवं त्यागपूर्ण उसका अन्त भी हुआ। अल्पवयस्क शासक वीर नारायण अपने शत्रुओं से वीरतापूर्वक लड़ता हुआ युद्ध में काम आया। आक्रमणकारियों ने काफी माल लूटा। आसफ खाँ ने कुछ समय तक राज्य को अपने अधिकार में रखा लेकिन आगे चलकर यह पुराने शासक-परिवार के एक सदस्य को दे दिया गया। मुगलों ने उसे- अपने राज्य के उस भाग पर से अधिकार छोड़ देने को विवश कर दिया, जो आजकल भोपाल कहलाता है।

खनवा के युद्ध (1527 ई.) के परिणामस्वरूप उत्तर में राजपूतों के प्रभाव का पूर्ण ह्रास नहीं हुआ। भारत के इतिहास में राजस्थान अभी भी एक प्रबल तत्त्व था। अकबर एक राजनीतिज्ञ की सच्ची सूझ तथा उदार दृष्टिकोण से सम्पन्न था। उसका खानदान विदेशी था। अफगान इसी भूमि के लाल थे। ऐसी परिस्थिति में उसने भारत में अफगानों को हटाकर अपने खानदान के लिए साम्राज्य निर्माण के अपने कार्य में राजपूत मैत्री के मूल्य को अनुभव किया। इस प्रकार उसने के मिलाने का तथा अपने लगभग सभी कायों में उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त करने और स्थिर रखने का यथासम्भव प्रयत्न किया। अपनी विवेकपूर्ण एवं उदार नीति से उसने उनमें से अधिकांश के दिल इस हद तक जीत लिये कि उन्होंने उसके साम्राज्य की बहुमूल्य सेवायें कीं तथा इसके लिए अपना रक्त तक बहाया। वास्तव में अकबर का साम्राज्य मुग़ल पराक्रम एवं कूटनीति तथा राजपूत वीरता एवं सेवा के एकीकरण का परिणाम था। 1562 ई. में अम्बर (जयपुर) के राजा बिहारी मल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और उसके साथ हुई इस मित्रता को एक वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा पुष्ट किया। बिहारी मल, अपने पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह के साथ आगरे गया। उसे पाँच हजार की मनसबदारी मिली। उसके पुत्र एवं पौत्र को भी सेना में उच्च पद मिले। इस मध्यकालीन भारत में उत्पन्न कुछ महान् सेनापतियों एवं कूटनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करने में समर्थ हुए।

परन्तु मेवाड़, जहाँ राजपूत भावना अपने विशुद्धतम रूप में प्रस्फुटित थी, जो अपने ऊँचे पर्वतों एवं मजबूत किलों द्वारा प्रतिरक्षा के उत्तम साधनों से सम्पन्न था तथा जिसने उत्तरी भारत पर प्रभुता के लिए बाबर से संघर्ष किया था, मुग़ल बादशाह के समक्ष आज्ञाकारी बनकर नतमस्तक नहीं हुआ। इसने मालवा के भगोडे शासक बाज बहादुर को शरण देकर उसे क्रुद्ध कर दिया। इसकी स्वतंत्रता अकबर के लिए कष्टकर थी। वह एक अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श का समर्थक था। इसके आर्थिक हित के लिए भी मेवाड़ पर नियंत्रण रखना आवश्यक था, जिससे होकर गंगा-यमुना के दोआब तथा पश्चिमी तट के बीच वाणिज्य के रास्ते गुजरते थे। राणा साँगा की मृत्यु के पश्चात् मेवाड़ में आन्तरिक फूट के फैले रहने तथा एक कुलीन पिता के अयोग्य पुत्र उदय सिंह की दुर्बलता के कारण अकबर की महत्त्वाकांक्षापूर्ण योजना सुगम हो गयी। टॉड कहता है- मेवाड़ के लिए यह कितना अच्छा होता यदि वहाँ का इतिहास अपने राजाओं की सूची में उदय सिंह का नाम कभी अंकित नहीं करता।

जब अक्टूबर, 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ के गढ़ को घेर लिया तब राजधानी को अपने भाग्य के भरोसे छोड़ कर उदय सिंह पहाड़ियों में जा छिपा। पर राणा के कुछ अनुगामी साहसी थे, जिनमें जयमल एवं पत्ता प्रमुख थे। इन्होंने शाही दल का चार महीनों तक (20 अक्टूबर, 1567 से लेकर 23 फरवरी, 1568 ई.) तक भयंकर विरोध किया। अंत में जयमल स्वयं अकबर के द्वारा छोड़ी गयी एक बन्दूक की गोली से मारा गया। बाद में पत्ता भी मारा गया। प्रतिरक्षा के नेताओं की मृत्यु के कारण घिरी हुई सेना हतोत्साह होकर हाथ में तलवार लेकर शत्रुओं पर टूट पड़ी। उस सेना का प्रत्येक मनुष्य वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया। राजपूत स्त्रियों ने जौहर व्रत का पालन किया। तब अकबर ने चित्तौढ़ के गढ़ को रौद डाला। अकबर का रोष उन पर भी पड़ा, जिन्हें टॉड राजकीयता के प्रतीक कहता है। इस प्रकार वह बड़े नगाड़े (जिनका व्यास आठ अथवा दस फीट था तथा जिनकी प्रतिध्वनि मीलों तक राजाओं के चित्तौड़ के द्वार पर आगमन और वहाँ से प्रस्थान को घोषित करती थी) एवं चित्तौड़ की महामाता के मंदिर से विशाल झाड़-फानूस भी आगरे ले गया। यह अभियान अकबर के चरित्र पर एक दाग है क्योंकि पहली और अंतिम बार उसने चित्तौड़ के किले पर ही कत्लेआम करवाया। अकबर ने जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर आगरे के किले में इनकी मूर्तियाँ बनवाई।

चित्तौड़ के पतन से भयभीत होकर अन्य राजपूत नायकों ने, जो अब तक अकबर का विरोध करते रहे थे, उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। फरवरी, 1569 ई. में रणथम्भोर के राय सुरजन हाड़ा ने अपने दुर्ग की कुजियाँ अकबर को समर्पित कर दी तथा बादशाह के यहाँ नौकरी कर ली। उसी वर्ष बुन्देलखंड में कालिंजर के प्रधान राजा रामचंद्र ने भी उसका अनुकरण किया। कालिंजर पर अधिकार करने से अकबर की सैनिक स्थिति बहुत दृढ़ हो गयी तथा इसे मुग़ल साम्राज्यवाद की प्रगति में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। 1570 ई. में बीकानेर तथा जैसलमेर के शासकों ने न केवल मुग़ल बादशाह की अधीनता ही स्वीकार की बल्कि उससे अपनी पुत्रियों का विवाह भी कर दिया।

इस प्रकार एक-एक कर राजपूत नायकों ने मुगलों की प्रभुता स्वीकार कर ली। पर मेवाड़ ने अब भी इसे मानना कबूल नहीं किया। अपनी पैतृक राजधानी खोने पर भी उदय सिंह ने स्वतंत्रता कायम रखी। 3 मार्च, 1572 ई. को उदयपुर से लगभग उन्नीस मील उत्तर-पश्चिम की ओर गोगुंडा नामक स्थान पर उसकी मृत्यु हुई। इसके बाद उसके पुत्र प्रताप के रूप में मेवाड़ को एक सच्चा देशभक्त एवं नेता मिला। वह हर तरह से अपने देश की परम्पराओं का भक्त था। उसने आक्रमणकारियों का दृढ़ता से प्रतिरोध किया। उसके कार्य की महत्ता अच्छी तरह तब समझी जा सकती है, जब हम यह देखते हैं कि बिना राजधानी के अल्य साधनों के साथ उसे मुग़ल बादशाह की संगठित शक्ति का विरोध करना पड़ा, जो उस समय धरती पर सबसे अधिक और बेहद धनी सम्राट् था। उसके साथ नायक एवं पडोसी तथा उसका सगा भाई तक, जो शूरता एवं स्वतंत्रता के उच्च राजपूती आदशों से हीन थे, मुगलों से जा मिले थे। परन्तु राजस्थान का यह राष्ट्रीय वीर, जो अपने सम्बन्धियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर धातु का बना था, किसी भी विघ्न से डरने वाला नहीं था। संकट की विकरालता से प्रताप का साहस और भी दृढ़ हो जाता था। उसने, टाड के शब्दों में- अपनी माँ का दूध समुज्ज्वल करने की सौगन्ध खायी थी और उसने अपनी इस प्रतिज्ञा को अच्छी तरह निभाया। उसके राज्य पर अनिवार्य शाही आक्रमण अप्रैल, 1576 ई. में हुआ। इस फौज का सेनापतित्व आम्बेर के राजा मानसिंह एवं आसफ खाँ ने किया। गोगुंडा के निकट हल्दीघाट की घाटी में घमासान लड़ाई हुई। प्रताप पराजित हुआ। वह किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भागा, जो झाला के नायक की निस्वार्थ भक्ति के कारण बच सकी, क्योंकि उसने अपने को राणा घोषित कर शाही दल के आक्रमण को अपने ऊपर ले लिया था। अपने प्रिय घोडे चेतक पर सवार हो राणा ने पहाड़ियों की ओर भागकर आश्रय लिया। उसके शत्रुओं ने एक-एक कर उसके गढ़ों पर अधिकार कर लिया। परन्तु प्रताप अत्यन्त भयानक विपत्ति में भी अधीनता स्वीकार करने की बात नहीं सोच सकता था। अपने कठोर शत्रु द्वारा एक चट्टान से दूसरी चट्टान खदेड़ा जाकर तथा अपने परिवार को स्थानीय पहाड़ियों के फल खिलाकर उसने निर्भीक उत्साह और स्फूर्ति के साथ युद्ध जारी रखा। उसने अपनी मृत्यु के पहले अपने बहुत-से किलों पर पुन: अधिकार कर लेने का संतोष प्राप्त किया। उसने अपनी नई राजधानी चांवड़ बनाई। सत्तावन वर्षों की आयु में 19 जनवरी, 1597 ई. को उसकी मृत्यु हुई। गुरिल्ला युद्ध का जनक महाराणा प्रताप ही था। यह राजपूत देशभक्त अपने अन्तिम क्षण तक अपनी मातृभूमि के लिए चिन्तित रहा, क्योंकि उसे अपने पुत्र पर भरोसा न था। अपने मरने के पहले उसने अपने नायकों से प्रतिज्ञा करवाई कि उसका देश तुर्कों के हाथों में नहीं सौंपा जायेगा। इस प्रकार एक राजपूत के जीवन का अंत हुआ, जिसकी स्मृति की आज भी प्रत्येक सिसोदिया पूजा करता है। टाड के शब्दों में- यदि मेवाड़ का उसका अपना

थुसीडिडीज अथवा अपना जेनोफोन (यूनानी इतिहासकार) होता, तो ऐतिहासिक प्रतिभा के लिए न तो पोलोपोनेसस के युद्ध और न दस गाजर का प्रत्यागमन ही उतने अधिक रंग-बिरंगे प्रसंग प्रदान करता, जितने मेवाड़ के अनेक परिवर्तनों के बीच इस दैदीप्यमान शासनकाल के कार्य। निर्भय, वीरता, कठोर साहस, वह निष्कपटता जो प्रतिष्ठा को उज्ज्वल रखती है, अध्यवसाय (ऐसे अनुराग के साथ जिसे होने का कोई भी राष्ट्र गर्व नहीं कर सकता) ये ही वे उपकरण थे जो बढ़ती हुई महत्त्वाकांक्षा, रोबदार प्रतिभा, असीम साधनों एवं धार्मिक उत्साह की उत्कटता के विरुद्ध थे; किन्तु ये सब एक अजेय मस्तिष्क से संघर्ष करने के लिए यथेष्ट नहीं थे। वस्तुतः प्रताप का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में अनुप्राणित करने वाला है। राजपूतों ने प्रताप से अधिक योग्य सेनापति तथा चतुर राजनीतिज्ञ उत्पन्न किये हैं, पर उससे अधिक साहसी एवं तेजस्वी देशभक्त नेता नहीं उत्पन्न किये। प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने का प्रयत्न किया, पर 1599 ई. में मानसिंह के अधीन एक मुग़ल सेना ने उस पर आक्रमण किया। वीरतापूर्ण प्रतिरोध के बाद अमर सिंह पराजित हुआ। मेवाड़ युद्ध में पराजित हुआ, किन्तु नतमस्तक नहीं हुआ। अस्वस्थता के कारण अकबर मेवाड़ पर और कोई आक्रमण नहीं कर सका।

1569 ई. में रणथम्भोर एवं कालिंजर जीतने के बाद मुगलों ने गुजरात को अधीन किया। गुजरात के तट पर समृद्ध एवं उन्नतिशील बन्दरगाह थे, इसकी व्यापारिक स्थिति आकर्षक थी और इसे एक विशेष आर्थिक सुविधा थी। इसलिए दिल्ली के पूर्ववर्ती शासक इस पर अधिकार करने के लिए लालायित थे। हुमायूँ तक के साथ यही बात थी, किंतु इस पर उसका अधिकार कम समय तक रहा। परन्तु अकबर ने अपने साम्राज्य के हित के लिए इस प्रान्त पर अधिकार करने के महत्व को अवश्य ही समझा होगा। गुजरात के नाममात्र के सुल्तान मुजफ्फर शाह तृतीय के अधीन इसकी विक्षिप्त दशा ने उसे इसके लिए एक सुन्दर अवसर दे दिया। सच तो यह है कि एक स्थानीय दल के नेता इतिमाद खाँ के द्वारा प्रार्थित होने पर अकबर का हस्तक्षेप कुछ अंश तक न्यायोचित था। 1572 ई. में अकबर स्वयं सेना लेकर गुजरात के विरुद्ध चला। माना जाता है कि गुजरात में पहली बार अकबर ने समुद्र देखा था। सभी विरोधी परास्त हुए। कठपुतली सुल्तान को पेंशन दे दी गयी। डेढ़ महीनों तक घेरा डालने के बाद उसने 26 फरवरी, 1573 ई. को सूरत पर अधिकार कर लिया। इस अवसर पर पुतर्गीज उसके सम्पर्क में आये और उससे मित्रता चाहने लगे। परन्तु ज्यों ही वह अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी पहुँचा त्योंही नवविजित प्रांत में विद्रोह आरंभ हो गये, जिनमें उसके कुछ अपने चचेरे भाईयों ने भाग लिया। इस पर अत्यन्त क्रुद्ध होकर अकबर सेना ग्यारह दिनों में छ: सौ मील पार कर शीघ्रता से अहमदाबाद पहुँची। उसने अहमदाबाद के निकट एक युद्ध में 2 सितम्बर, 1573 ई. को विद्रोहियों को पूर्णत: परास्त कर डाला। इस प्रकार गुजरात अकबर के अधिकार में आया तथ अब से उसके साम्राज्य का एक स्थायी अंग बन गया। इसके वित्त तथा राजस्व का पुनर्सगठन टोडरमल ने किया, जिसका काम उस प्रांत में शिहाबुद्दीन अहमद ने 1577 ई. से लेकर 1583 अथवा 1584 ई. तक योग्यतापूर्वक किया। मुख्यत: इस पुनर्गठन से यह साम्राज्य में आमदनी का एक लाभपूर्ण साधन हो गया। डाक्टर स्मिथ लिखता है कि अकबर के इतिहास में गुजरात की विजय एक महत्वपूर्ण घटना है। इसके साधन साम्राज्य के हाथों में आ गये। इसके द्वारा साम्राज्य की समुद्र तक निर्विघ्न पहुँच हो गयी। साम्राज्य पुर्तगीजों के सम्पर्क में आया, जिसका कई दृष्टियों से भारत के इतिहास पर व्यापक पड़ा। परन्तु मुगलों ने सामुद्रिक शक्ति का निर्माण करने का कोई भी प्रयत्न नहीं किया तथा इस दिशा में उनकी अदूरदर्शिता से यूरोपीय व्यापारियों को भारत-प्रवेश में कोई कठिनाई नहीं हुई।

इसके बाद मुगलों ने और अधिक महत्वपूर्ण बंगाल प्रांत को जीता। मुहम्मद आदिल शाह के छ: छोटे तथा तूफानी शासनकाल में सूर सुल्तानों ने बंगाल में अपने को स्वतंत्र कर 1564 ई. तक राज्य किया। इसी समय युवक सुल्तान की हत्या के बाद की अव्यवस्था से लाभ उठाकर दक्षिण बिहार के शासक सुलेमान करानी ने बंगाल पर भी अपना प्रभुत्व फैला दिया। 1572 ई. में अपनी मृत्यु तक सुलेमान विधिवत् अकबर का अधिपत्य मानता रहा तथा उसके साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध रखे। वह अपनी राजधानी गौड़ से टाँडा ले गया तथा उड़ीसा के हिन्दू राज्य पर अधिकार कर लिया। परन्तु उसके पुत्र दाऊद ने, जो तबकात के लेखक के मतानुसार शासनकला कुछ भी नहीं जानता था, शीघ्र ही अपने पिता के विवेकपूर्ण कार्यों को छोड़ दिया। उसने केवल स्वतंत्रता घोषित कर के ही नहीं, बल्कि साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर स्थित जमानिया की चौकी (उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में अवस्थित) पर आक्रमण करके भी बादशाह का क्रोध मोल ले लिया। 1574 ई. में अकबर स्वयं बंगाल के धृष्ट शासक के विरुद्ध सेना लेकर गया तथा वर्षा ऋतु में उसे पटना एवं हाजीपुर से भगा दिया। मुनीम खाँ के अधिकार में बंगाल के आक्रमण का कार्य छोड़कर अकबर फतहपुर सीकरी लौट आया। दाऊद उड़ीसा की ओर भागा। मुग़ल सेना ने उससे 3 मार्च, 1575 ई. को सुवर्णरेखा के पूर्वी तट के निकट तुकरोई नामक स्थान पर पराजित कर दिया। परन्तु पराजित शत्रु के प्रति मुनीम खाँ की अनुचित दयालुता के कारण इस युद्ध का कोई निर्णयात्मक परिणाम न निकला। फलत: एक बार फिर उसने अक्टूबर, 1575 ई. में बंगाल पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न किया। इसके कारण दाऊद के विरुद्ध पुनः आक्रमण की आवश्यकता आ पड़ी। अन्त में राजमहल के निकट युद्ध में जुलाई, 1576 ई. में वह परास्त हुआ और मारा गया। अब से बंगाल मुग़ल-साम्राज्य का स्थायी भाग बन गया। पर शाही सूबेदार मुजफ्फर खाँ तुरबाती की, जिसके कार्य कठोर तथा वचन कष्टकर होते थे, दुर्बल नीति के कारण उस प्रान्त में पुन: उपद्रव हुए। बंगाल के कुछ शक्तिशाली नायक एक लम्बे समय तक बादशाह के प्रभुत्व का विरोध करते रहे। इनमें सर्वप्रमुख थे पूर्वी मध्य ढाका तथा मैमनसिंह का ईसा खाँ, विक्रमपुर का केदार राय, चंद्रद्वीप (बाकरगंज) का कदर्पनारायण तथा सारे का प्रतापादित्य। 1592 ई. में उड़ीसा साम्राज्य में अंतिम रूप में मिला लिया गया।

इसी बीच अकबर को उसके सौतेले भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम की, जो वस्तुत: स्वतंत्र शासक के रूप में काबुल पर शासन करता था, कुटिल प्रवृत्ति के कारण संकटपूर्ण परिस्थिति का सामना करना पड़ा। पूर्वी प्रान्तों के कुछ सरदारों एवं साम्राज्य के दीवान ख्वाजा मंसूर जैसे दरबार के कुछ अन्य असन्तुष्ट अफसरों के साथ मिलकर वह अपने लिए हिन्दुस्तान के राजसिंहासन पर अधिकार करने के मनसूबे बाँध रहा था तथा उसने पंजाब पर आक्रमण तक कर दिया। उसके षड्यंत्रों तथा उपद्रवों को और अधिक तुच्छ समझना अनुचित सोचकर, अकबर 8 फरवरी, 1581 ई. को अपनी राजधानी से अफगानिस्तान की ओर सेना लेकर चल पड़ा, इस सेना में लगभग पचास हजार घुड़सवार, पाँच सौ हाथी तथा विशाल संख्या में पैदल सिपाही थे। बादशाह के आने की सूचना पाकर मिर्जा मुहम्मद हकीम, अपने भाई का बिना कोई विरोध किये पंजाब से काबुल भाग गया। तब 9 अगस्त, 1581 ई. को बादशाह काबुल में प्रविष्ट हुआ। मिर्जा मुहम्मद हकीम पराजित हुआ, पर बादशाह के प्रति भक्ति की शपथ लेने पर उसे पुन: उस प्रान्त का शासक नियुक्त कर दिया गया। अकबर 1581 ई. में दिसम्बर महीने के प्रारम्भिक भाग में दिल्ली लौट आया। काबुल की विजय से अकबर को बहुत शान्ति मिली।

भारत की प्रत्येक सरकार को उत्तर-पश्चिम सीमा की जटिल समस्या से निपटना पड़ता रहा है। इस क्षेत्र का सामरिक एवं आर्थिक महत्व है। अत: भारत के शासक के लिए इस पर कार्यसाधक रूप से नियंत्रण रखना अत्यन्त आवश्यक होता है। हिन्दूकुश पर्वतश्रेणी, जो मध्य एशिया को दक्षिणी अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और भारत से पृथक करती है, हैरात के उत्तर में बहुत कम रुकावट वाली हो जाती है तथा इस भेद्य स्थान से होकर फारस अथवा मध्य एशिया से कोई बाहरी शत्रु आसानी से काबुल की घाटी और भारत में प्रवेश कर सकता है। काबुल के मालिक की हैसियत से मुग़ल बादशाह का कंधार पर अवश्य अधिकार होना चाहिए, अन्यथा उसका राज्य आरक्षित है। उस युग मैं जब काबुल दिल्ली-साम्राज्य का अंग था कधार हम लोगों की सुरक्षा की अनिवार्य रूप से प्रथम पंक्ति थी। कंधार एक महत्वपूर्ण व्यापार-केन्द्र भी था, जहाँ एशिया के विभिन्न भागों से व्यापारी एकत्रित होकर अपनी चीजों का विनिमय करते थे तथा उनमें सम्बन्ध रहने के कारण इस रास्ते से माल भारत से दूसरे एशियाई देशों में पहले से अधिक ले जाया जाता था। और भी, सीमान्त की कलहकारी अफगान जातियाँ, जैसे उजबेग तथा यूसुफजाई, एक अंश तक प्रजातंत्रिक होने एवं स्वतंत्रता में हड़पने से चिपटे रहने के कारण अपनी पैदाइशी पहाड़ियों में बहुत खतरनाक थीं। अपने देश के किलों में, जो सर्वोतम प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं, युद्ध करते हुए वे.......सदैव अपने पार्श्ववर्ती किसी राजतंत्रात्मक राज्य के अधीन लाये जाने के प्रयत्नों का प्रतिरोध करते थे।

मुग़ल-साम्राज्य के प्रति उनका रुख मैत्री का नहीं था, परन्तु अकबर के समान साम्राज्यवादी इस सीमा की कार्यसाधक रीति से रक्षा करने के महत्व को समझने में असफल नहीं हो सकता था। वह उजबेगों के उपद्रवों का शमन करने में समर्थ हुआ, जिनका नेता अब्दुल्ला खाँ मुग़ल बादशाह के प्रति मित्रवत् रहा। वह रोशनियों को भी पराजित करने में समर्थ हुआ। सूसुफजाई भी राजा टोडरमल तथा शाहजादा मुराद के अधीन एक विशाल मुग़ल सेना द्वारा बुरी तरह पराजित हुए। अबुल फजल लिखता है- ये विशाल संख्या में मारे गये तथा बहुतों को तुरान एवं फारस में बेचे जाने के लिए भेज दिया गया। सवाद (स्वात) वाजौर एवं बुनेर के प्रदेश, जिनका जलवायु, फलों तथा सस्ते भोजन में कोई सानी नहीं है, दुष्कर्मियों से साफ हो गया। भगवानदास तथा कासिम खाँ ने, जिन्हें पाँच हजार आदमियों के साथ कश्मीर जीतने के लिए भेजा गया, इसके सुल्तान यूसुफ शाह तथा उसके पुत्र याकूब को 1586 ई. में पराजित कर दिया। तब कश्मीर साम्राज्य में मिला लिया गया। सिंध तथा बलूचिस्तान क्रमशः 1590-1591 ई. तथा 1595 ई. में जीते गये। कधार शान्ति से अकबर के अधिकार में चला आया।

फारसी शासक मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने 1595 ई. में इसे अकबर के प्रतिनिधि शाह बेग को समर्पित कर दिया। इस प्रकार उत्तर-पश्चिम में अकबर की नीति के फलस्वरूप उसके साम्राज्य में महत्वपूर्ण प्रदेश जोड़े गये, उस सीमा पर इसकी स्थिति सुरक्षित बनायी गयी तथा इसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। 1595 ई. तक उसने अपने को, सिंधु के आगे कुबायली इलाके के एक संकीर्ण खंड और कुछ दूसरे क्षेत्रों को छोड़कर, हिमालय से लेकर नर्मदा तक तथा हिन्दुकुश से ब्रह्मपुत्र तक फैले पुए प्रदेश का निर्विरोध शासक बना लिया।

इस प्रकार उत्तरी एवं मध्य भारत पर अपना अधिकार दृढ़ कर अकबर ने दक्कन पर अपनी प्रभुता फैलाने का निर्णय किया। इसमें वह केवल मौर्यों, गुप्तों, खल्जियों तथा तुगलकों के समान पूर्वगामी उत्तरी राजकीय सरकारों की परम्परागत नीति का अनुसरण कर रहा था। उसके दो निश्चित उद्देश्य थे। पहला यह था कि एक अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श से प्रेरित हो वह स्वभावत: दक्कन की सल्तनतों- अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा एवं खानदेश-को अपने अधिपत्य में लाना चाहता था। दूसरे, वह, एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह, दक्कन पर अपने नियंत्रण का उपयोग पुर्तगीजों को समुद्र तक ढकेलने के साधन के रूप में करना चाहता था क्योंकि यद्यपि ऊपरी तौर पर उसका उनके साथ मैत्री का सम्बन्ध था, परन्तु वह उन लोगों को इस देश के आर्थिक साधनों के एक अंश का उपभोग करने तथा इसकी राजनीति में हस्तक्षेप करने देना विवेकपूर्ण नहीं समझता था। इस प्रकार अकबर की दक्कन की नीति मूल तथा दृष्टि में शुद्ध रूप से साम्राज्यवादी थी। यह लेशमात्र भी धार्मिक विचारों से प्रभावित नहीं थी, जैसा कि कुछ अंश तक शाहजहाँ या औरंगजेब के साथ था। अबुल फज़ल ने आइन-ए-अकबरी में लिखा है कि अकबर सुलह-ए-कुल की नीति का प्रसार सम्भवत: दक्षिण में भी करना चाहता था।

दक्कन की सल्तनतें मुग़ल साम्राज्यवाद के प्रवाह से अपनी प्रतिरक्षा करने की स्थिति में नहीं थीं, क्योंकि 1564-1565 ई. में विजयनगर के विरुद्ध कुछ काल तक मिले रहने के कारण आपस में कलह करने के कारण उनकी शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी तथा वे अयोग्यता में डूब गयी थीं। अकबर ने पहले उन सब के दरबारों में 1591 ई. में राजदूत भेजकर दक्कन पर अपने अधिपत्य की विधिपूर्वक स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न किया। पर खानदेश को छोड़कर बाकी सबने उसके संधि-प्रस्ताव के टाल-मटोल करने वाले उत्तर भेजे। कूटनीतिक दूत-मंडलों की असफलता ने उसे शस्त्रों का सहारा लेने को लाचार कर दिया। बैरम खाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम एवं बादशाह के द्वितीय पुत्र शाहजादा मुराद के अधीन एक विशाल सेना अहमदनगर के विरुद्ध भेजी गयी। अहमदनगर इस समय आन्तरिक कलहों के कारण अशक्त पड़ गया था। मुगलों के दोनों सेनापतियों में आपस में अच्छा सम्बन्ध नहीं था। इस कारण मुग़ल सेना के कार्यों में बड़ी बाधा हुई। फिर भी 1595 ई. में अहमदनगर पर घेरा डाल दिया। चाँद बीबी ने, जो बीजापुर के विधवा रानी तथा हुसैन निजाम शाह की पुत्री थी, महान् साहस एवं असाधारण दृढ़ता से नगर की प्रतिरक्षा की। घेरा डालने वालों ने 1596 ई. में चाँद बीबी के साथ संधि की, जिसके अनुसार बरार मुगलों को दे दिया गया तथा अहमदनगर के अल्पवयस्क सुल्तान ने अकबर का अधिपत्य स्वीकार करने का वादा किया। पर मुगलों के चले जाने के बाद चाँद बीबी ने अपना अधिकार त्याग दिया तथा अहमदनगर के एक गुट ने, संधि का उल्लंघन कर और उसकी (चाँद बीबी की) इच्छा एवं परामर्श के विरुद्ध, अगले वर्ष मुगलों को बरार से निकाल भगाने के उद्देश्य से उनके साथ पुनः युद्ध आरम्भ कर डाला। मुगलों ने गोदावरी के किनारे अश्ती के निकट सूपा नामक स्थान पर फरवरी, 1597 ई. में दक्कनियों पर विजय प्राप्त की। अहमदनगर में आन्तरिक कलह फैल गई। चाँद बीबी की हत्या कर दी गयी अथवा उसे विषपान करने को विवश किया गया। अगस्त, 1600 ई. में शाही दल ने बिना किसी कठिनाई के नगर को तहस-नहस कर डाला। परन्तु यह राज्य अंतिम रूप से साम्राज्य में शाहजहाँ के राज्यकाल में मिलाया गया।

खानदेश के एक शासक मियाँ बहादुर शाह ने बादशाही सत्ता की अधीनता मानने से इन्कार कर दिया। 1598 ई. में अबदुल्ला खाँ के मृत्यु के पश्चात् उजबेग आक्रमण के खतरे से मुक्त होकर अकबर जुलाई, 1599 ई. में सेना लेकर दक्षिण की ओर रवाना हुआ। उसने शीघ्र खानदेश की राजधानी बुरहानपुर पर अधिकार कर लिया तथा आसानी से असीरगढ़ के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह दुर्ग इतना मजबूत सुदृढ़ था कि इससे अधिक सुदृढ़ अथवा इससे अधिक तोपों, युद्ध सामग्री के भंडारों एवं खाद्यान्नों से सम्पन्न दुर्ग की कल्पना करना असम्भव था। घिरी हुई सेना ने, जो भयानक महामारी फैलने के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गयी थी क्योंकि इसमें बहुत का नाश हो चुका था, छः महीनों तक दुर्ग की रक्षा की। अब अकबर ने शीघ्रता से अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए चतुर साधनों का सहारा लिया। अधिक समय तक घेरा डाले रहने की उसकी इच्छा नहीं थी, क्योंकि उसके पुत्र सलीम ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। अत: बादशाह ने मियाँ बहादुर शाह को, उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा की प्रतिज्ञा कर, संधि के विषय में बातचीत करने के निमित्त अपने खेमे में आने के लिए प्रलोभित कर दिया, परन्तु उसे वहीं रोक लिया तथा संरक्षक सेना को दुर्ग के समर्पित करने का आदेश देते हुए पत्र लिखने को विवश किया। फिर भी सेना प्रतिरोध करती ही रही। ऐसी स्थिति में अकबर ने दिल खोल कर खानदेश के अधिकारियों में रुपये बाँटे और प्रकार असीरगढ़ के द्वार सोने की कुजियों द्वारा खोले गये। यह अकबर की अन्तिम विजय थी

अकबर ने नवविजित प्रदेशों को अहमदनगर, बरार तथा खानदेश नामक तीन सूबों में संगठित किया। उसने शाहजादा दानियाल को दक्षिणी एवं पश्चिमी भारत का अर्थात् मालवा एवं गुजरात सहित दक्कन के तीनों सूबों का राजप्रतिनिधि नियुक्त किया। इतना काम कर वह विद्रोही सलीम को ठीक करने के लिए मई, 1601 ई. आगरे में लौट आया। अकबर के दक्कन के आक्रमण के फलस्वरूप मुग़ल सीमा नर्मदा से बढ़कर कृष्णा नदी की ऊपरी घाटियों तक (जहाँ उसका नाम भीमा है) पहुँच गयी। पर इस प्रदेश को राज्य में मिलाने का काम केवल के लिए था। नया प्रदेश इतना बड़ा था कि इस पर कार्यसाधक रूप से करने की कौन कहे, यह पूर्ण रूप से जीता तक नहीं जा सकता था। चारों ओर-विशेषकर दक्षिण एवं पश्चिम में-पुराने राजवंश के स्थानीय पदाधिकारियों ने विजेता की आज्ञा मानना अस्वीकार कर दिया अथवा अपनी प्रधानता की स्थापना को छिपाने के लिए कठपुतले राजा खड़े करने लगे। बीजापुर तथा गोलकुडा के सुल्तानों ने अपने पराजित पड़ोसियों के निकटवर्ती जिलों को दबा लिया।

अकबर के अन्तिम दिन शोक एवं दु:खपूर्वक कटे। राजसिंहासन पर अधिकार जमाने के लिए आतुर होकर सलीम इलाहाबाह में स्वतंत्र बादशाह बन बैठा तथा अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुर्तगीजों के साथ षड्यंत्र करने लगा। 1602 ई. में उसने बादशाह के एक घनिष्ठ मित्र अबुल फजल को दक्कन से लौटते समय मरवा कर, अपने पिता की भावनाओं पर और भी चोट पहुँचायी। 1603 ई. में सुल्ताना सलीमा बेगम की मध्यस्थता से पिता-पुत्र में कुछ समय के लिए मेल हो गया। पर सलीम फिर इलाहाबाद गया और अत्यन्त अनुचित ढंग से कार्य करने लगा। इस बीच में खाने-आजम, राजा मानसिंह तथा दरबार के कुछ अन्य सरदार सलीम के पुत्र खुसरो को सिंहासन पर बैठाने का जाल रचने लगे। पर अन्य सरदारों के विरोध के कारण उनकी योजना असफल हो गयी। अकबर के अन्य पुत्र पहले ही मर चुके थे। सभी प्रतिद्वन्द्वी दावेदारों के हटने के बाद अकबर का एकमात्र जीवित पुत्र सलीम अपने पिता से मिल गया। अकबर ने उसके साथ एक चिड़चिड़े बच्चे जैसा व्यवहार किया, उसे कसकर डाँटा तथा नवम्बर, 1604 में क्षमा करने के पहले कुछ समय तक बंदी बना लिया। पर अकबर का अन्त निकट आ रहा था। 1605 ई. की शरद-ऋतु में उस पर भयंकर संग्रहणी अथवा अतिसार का आक्रमण हुआ तथा 17 अक्टूबर को उसकी मृत्यु हो गयी।

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