1857 के पश्चात प्रशासनिक परिवर्तन Administrative Changes After 1857

1857 के विद्रोह से अंग्रेजों को इस बात का भलीभांति एहसास हो चुका था कि एक सुसंगठित जन विद्रोह कभी भी ब्रिटिश शासन के लिये एक गंभीर चुनौती बन सकता है। इस विद्रोह में प्रशासन एवं जनता के मध्य संपर्क का अभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ। साम्राज्यवादी सरकार को यह अनुभव हो गया कि शासन को जन सामान्य से सम्पर्क बनाये रखकर ही उसे प्रशासन से जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही उन्हें अहसास हुआ कि प्रशासन को भारतीयों की सभ्यता, संस्कारों एवं रीति-रिवाजों से भलीभांति अवगत होना है तो उसके लिये जनता का सहयोग अपरिहार्य है इससे प्रशासन को सुदृढ़ता तो मिलेगी ही, उसे 1857 जैसी घटनाओं को ज्यादा कुशलतापूर्वक हल करने में भी सहायता मिल सकेगी।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में औद्योगिक क्रांति उत्तरोत्तर सघन होती गयी तथा उसका तेजी से प्रसार हुआ। इस अवधि में अमेरिका, जापान तथा यूरोपीय देश नयी औद्योगिक शक्तियों के रूप में उभरे तथा कच्चे माल, विनिर्मित सामान के लिये बाजार तथा पूंजी विनिवेश के लिये उपनिवेशों में इन औद्योगिक शक्तियों के मध्य गलाकाट प्रतियोगिता प्रारंभ हो गयी। तत्कालीन समय में विभिन्न शक्तिशाली राष्ट्रों के मध्य ये कारक ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे। वित एवं विनिर्मित सामान के क्षेत्र में ब्रिटेन की सर्वोच्चता का अंत हो गया। इस समय रेलवे में ब्रिटिश पूंजी का भारी निवेश हुआ तथा ब्रिटेन द्वारा भारत सरकार को ऋण के रूप में प्रचुर मात्रा में धन दिया गया। भारत में इस धन का निवेश मुख्यतः चाय बागानों, कोयला खदानों, जूट मिलों, जहाजरानी, छोटे उद्योगों एवं बैकिंग इत्यादि में किया गया।

इन सभी कारकों ने मिलकर भारत में उपनिवेशवाद का एक नया युग प्रारंभ किया। भारत में उपनिवेशी सरकार का मुख्य लक्ष्य अपनी स्थिति को सुदृढ़ एवं सुरक्षित करना था, जिससे कि वह ब्रिटेन के आर्थिक तथा वाणिज्यिक हितों की रक्षा कर सके तथा विश्व के अन्य भागों में जब भी और जहां भी संभव हो इसका विस्तार कर सके। विभिन्न अंग्रेजी वाइसरायों तथा गवर्नर-जनरलों यथा-लिटन,डफरिन, लैंसडाउन, एल्गिन, कर्जन तथा अन्य सभी ने साम्राज्यवादी नियंत्रण तथा साम्राज्यवादी विचारधारा को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, जिसकी झलक इन प्रशासकों की नीतियों एवं वक्तव्यों से मिलती है। भारत में सरकारी ढांचे एवं सरकारी नीतियों में परिवर्तन का प्रभाव आधुनिक भारत में विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता है।

प्रशासनः केंद्रीय, प्रांतीय एवं स्थानीय

केंद्रीय सरकार

भारत सरकार को बेहतर बनाने के लिये 1858 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारत का शासन कंपनी के हाथों से लेकर क्राउन के अधीन कर दिया गया। कठिन परिस्थितियों में कंपनी प्रशासन की सीमायें 1857 के विद्रोह के समय उजागर हो चुकी थीं; इसके साथ ही कंपनी प्रशासन की जवाबदेही में कमी भी प्रकट हो गयी थी। अधिनियम में प्रावधान किया गया कि अब भारत का प्रशासन ब्रिटिश साम्राज्ञी के नाम से चलाया जायेगा। इस उद्देश्य के लिये डायरेक्टरों की सभा (Court of Directors), तथा अधिकार सभा (BoardofControl) को समाप्त कर दिया गया तथा उनके समस्त अधिकार भारत सचिव (secretary of State for India) को दे दिये गये। भारत सचिव, ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था, इसकी सहायता के लिये 15 सदस्यों की एक सभा भारत परिषद (India Council) की स्थापना की गयी। भारत सचिव, ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था। सभी महत्वपूर्ण कदम भारत सचिव द्वारा ही उठाये जाने थे तथा सभी मसलों पर अंतिम निर्णय उसी को लेना था। भारत परिषद केवल सलाहकारी परिषद थी। (इस प्रकार 1784 में पिट्स इंडिया अधिनियम द्वारा प्रारंभ की गयी द्वैध शासन व्यवस्था का अंत हो गया)। लेकिन इतना होते हुये भी भारत से संबंधित सभी शक्तियां ब्रिटिश संसद में ही निहित थीं।

गवर्नर-जनरल अब चूंकि क्राउन का प्रतिनिधि था, अतः उसे वायसराय कहा जाने लगा। यद्यपि इस उपाधि का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं था न ही ब्रिटिश संसद ने इस उपाधि का कभी प्रयोग किया परंतु जनसाधारण द्वारा इसका उपयोग किया जाने लगा। वायसराय के लिये एक कार्यकारिणी परिषद की नियुक्ति की गयी, जिसके सदस्य विभिन्न विभागों के प्रमुखों के रूप में काम करते थे, साथ ही वे वायसराय के सलाहकार भी थे।

भारत में शासन की समस्त गतिविधियों का केंद्र लंदन का भारत सचिव था तथा सभी प्रशासनिक शक्तियां उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। भारत सचिव की इस विशेष स्थिति के कारण वायसराय का पद उसकी तुलना में कुछ कम महत्व का रह गया तथा आगे चलकर भारतीय जनमानस नीति निर्धारण का प्रमुख अधिकारी भारत सचिव को ही समझने लगे। इसके साथ ही, दूसरी ओर ब्रिटिश उद्योगपतियों, व्यापारियों एवं बैंकरों का भारत की सरकारी नीतियों में प्रभाव बढ़ने लगा। इस  प्रकार भारतीय प्रशासन, 1858 के पूर्ववर्ती वर्षों की तुलना में ज्यादा प्रतिक्रियावादी बन गया ।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 द्वारा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में 5वें सदस्य की नियुक्ति की गयी, जो विधि विशेषज्ञ था। विधि निर्माण हेतु कार्यकारिणी परिषद में 6 से लेकर 12 तक अतिरिक्त सदस्य नियुक्ति किये गये, जिनमें आधे गैर-सरकारी थे। ये गैर-सरकारी सदस्य या तो भारतीय या अंग्रेज ही सकते थे। इस प्रकार परिषद को कोई वास्तविक अधिकार नहीं था तथा उसकी प्रकृति केवल सलाहकारी परिषद की ही थी। इसकी मुख्य दुर्बलतायें निम्नानुसार थीं-

  • यह किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार नहीं कर सकती थी, न ही इसे कोई वित्तीय अधिकार थे। इसे वित्तीय मसलों के लिये सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य था।
  • बजट पर इसका कोई नियंत्रण नहीं था।
  • यह किसी प्रशासनिक कार्य या आदेश पर विरोध प्रकट कर सकती थी।
  • यदि वायसराय किसी कार्य की अनुमति दे भी देता था तो भारत सचिव उसे अस्वीकार कर सकता था।
  • गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में जो भारतीय सदस्य थे, वे केवल महत्वपूर्ण तबकों से संबंधित थे। जैसे-रजवाड़े, जमींदार एवं दीवान इत्यादि। सामान्य भारतीयों का परिषद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था।
  • आपातकालीन परिस्थितियों में वायसराय अध्यादेश (6 माह के लिये वैध) जारी कर सकता था।

परिषद का एक मात्र महत्वपूर्ण कार्य यह था कि इसने धीरे-धीरे सरकारी कार्यप्रणाली का गठन किया तथा एकीकरण किया तथा कुछ हद तक व्यवस्थापिका सभा की महत्ता स्थापित की। किंतु अभी भी भारत में ब्रिटिश सरकार के सभी कार्यों का संचालन भारत सचिव के कार्यालय से ही होता था।

प्रांतीय सरकारः 1861 के भारत परिषद अधिनियम ने मद्रास एवं बंबई को विधायी शक्तियां पुनः दिलायीं, जिन्हें कि 1833 में वापस ले लिया गया था। कालांतर में अन्य प्रांतों में भी विधान परिषदें स्थापित हो गयीं। मद्रास, कलकत्ता एवं बंबई की प्रेसिडेंसियों को अन्य प्रांतों की तुलना में ज्यादा अधिकार एवं शक्तियां प्राप्त थीं। प्रेसिडेंसियों का प्रशासन गवर्नर एवं उसकी तीन सदस्यीय कार्यकारिणी परिषद द्वारा चलाया जाता था, जिनकी नियुक्ति क्राउन द्वारा की जाती थी। जबकि अन्य प्रांतों का प्रशासन लेफ्टिनेंट-गवर्नर या मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) संचालित करते थे, जिनकी नियुक्ति गवर्नर-जनरल द्वारा की जाती थी।

बाद के वर्षों में आर्थिक विकेंद्रीकरण की दिशा में कुछ कदम उठाये गये। लेकिन ये प्रकृति में प्रशासकीय ज्यादा थे तथा इनका मुख्य उद्देश्य व्यय में कमी करना तथा अधिक से अधिक राजस्व वसूल करना था। इनका प्रांतीय स्वायत्तता से कोई सरोकार नहीं था तथा न ही इससे प्रांतीय स्वायत्तता को कोई प्रोत्साहन मिला।

1870 में लार्ड मेयो के प्रस्ताव द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय वित्त को विभाजित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसके अनुसार अब प्रांतीय सरकारों के लिये कुछ निश्चित सेवाओं के प्रशासन यथा- पुलिस, जेल, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सड़कों इत्यादि के लिये केंद्रीय राजस्व से कुछ भाग निश्चित कर दिया गया। अब प्रांतीय सरकारें इन सेवाओं के प्रशासन हेतु अपनी इच्छानुसार धन की मांग कर सकती थीं।

1877 में लार्ड लिटन द्वारा कुछ अन्य क्षेत्रों जैसे भू-राजस्व, सामान्य प्रशासन तथा कानून एवं न्याय का हस्तांतरण प्रांतों को कर दिया गया। इसके अतिरिक्त प्रांतीय सरकारें, प्रान्तों द्वारा वसूल की जाने वाली कुछ मदों जैसे- स्टाम्प शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं आयकर से कुछ निश्चित भाग प्राप्त करती थीं।

1882 में राजस्व के समस्त श्रोतों की तीन भागों में विभाजित कर दिया गया। पहला, सामान्य (केंद्र की जाने वाला), दूसरा, प्रांतीय (राज्यों को जाने वाला) तथा तीसरा, वह जिसका विभाजन केंद्र एवं प्रांत दोनों के मध्य होता था।

किंतु इसके बावजूद भी केंद्रीय सरकार की सर्वोच्चता बनी रही तथा प्रांतों पर उसका पूर्ण नियंत्रण यथावत रहा। जबसे केंद्रीय एवं प्रांतीय सरकारें ब्रिटिश सरकार तथा भारत सचिव के नियंत्रण में आयीं, यह व्यवस्था और अनिवार्य बन गयी।

स्थानीय स्वायत्त संस्थायें: सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया कि नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों को प्रोत्साहन देकर प्रशासन का उअर अधिक विकेंद्रीकरण किया जाये। विचार यह था कि ये स्थानीय विकास विभिन्न स्थानीय मुद्दों जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, जलापूर्ति, सड़क एवं अन्य स्थानीय आवश्यकत के कार्यों का संचालन करें तथा इसके लिये वित्तीय संसाधनों के रूप में स्थानीय कर वसूलें। ऐसे बहुत से कारक थे, जिन्होंने सरकार के लिये यह आवश्यक बना दिया कि वह स्थानीय निकायों के क्षेत्र में सुधार करें तथा इसके लिये आवश्यक कदम उठाये।

प्रथम, अतिशय केंद्रीयकरण के कारण सरकार के सम्मुख जो वित्तीय संकट की समस्या थी, उसे विकेंद्रीकरण द्वारा ही हल किया जा सकता था। दूसरा, यूरोप में स्थानीय संस्थाओं के विकास से यह महसूस किया जाने लगा था कि भारत में भी इनका उन्नयन और विकास किया जाये तभी यूरोप से आर्थिक सम्पर्क में वृद्धि हो सकेगी। तीसरा, राष्ट्रवाद के उफान को स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के विकास से रोकने में मदद मिलेगी। चतुर्थ, ब्रिटिश नीति-निर्धारकों के एक तबके ने महसूस किया कि प्रशासन के कुछ भागों का विकास ब्रिटिश सर्वोच्चता के बिना होना चाहिए, इसी से भारत के तीव्र गति से हो रहे राजनीतिकरण को रोका जा सकेगा। पांचवां, स्थानीय स्तर पर वसूले गये करों का उपयोग स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं द्वारा करने से सरकार के प्रति आलोचना को कम किया जा सकेगा। क्योंकि अभी तक सरकार पर यह आरोप लगाया जाता रहा था कि वह राजस्व का अधिकांश भाग सरकारी सेवकों एवं उच्च वर्ग के लोगों पर ही व्यय करती है तथा स्थानीय विकास की उसने उपेक्षा की है।

स्थानीय प्रशासन के विकास से संबंधित महत्वपूर्ण चरण

1864 से 1868 के मध्य

इस अवधि में पहली बार स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं का निर्माण किया गया किन्तु इसके अधिकांश सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे तथा इनका प्रमुख जिला दंडाधिकारी (District Magistrate) होता था। इस प्रकार, इनका स्वरूप अतिरिक्त कर संग्रहित करने वाली संस्थाओं से कुछ अधिक नहीं था।

1870 का मेयो का प्रस्ताव

भारतीय परिषद अधिनियम 1861 द्वारा वैधानिक विकेंद्रीकरण की नीति प्रारंभ की गयी और मेयो का 1870 का वित्तीय विकेंद्रीकरण का प्रस्ताव उसका प्राकृतिक परिणाम था। इस प्रस्ताव के द्वारा कुछ विभागों जैसे- स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सड़कों इत्यादि का नियंत्रण प्रांतीय सरकारों को दे दिया गया। इसी के फलस्वरूप स्थानीय वित्त की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ। अपने बजट को संतुलित करने के लिये प्रांतीय सरकारों को स्थानीय कर लगाने का अधिकार दिया गया, जबकि शेष धन उन्हें केंद्रीय कोष से प्राप्त होता था। मेयो के इस प्रस्ताव में सुझाव दिया गया कि स्थानीय स्वायत्त शासन को सुदृढ़ बनाया जाये तथा इस उद्देश्य से नगरपालिकाओं को विकसित किया जाये तथा इनमें भारतीयों तथा यूरोपियों का अधिकाधिक सहयोग प्राप्त किया जाये।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये विभिन्न प्रांतीय सरकारों ने कई नगरपालिका अधिनियम बनाए। 1871 में बंगाल जिला बोर्ड उपकार अधिनियम द्वारा बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन प्रारंभ करने का प्रयास किया गया।

इसी प्रकार के अधिनियम मद्रास, पंजाब तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांत (आधुनिक उत्तर-प्रदेश) में भी बनाए गए।

1882 का रिपन का प्रस्ताव: 1882 का लार्ड रिपन का प्रस्ताव स्थानीय स्वायत्त शासन के विकास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। रिपन की सरकार स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के विकास में असमानता को दूर करा चाहती थी। इसीलिए सरकार ने सुझाव दिया कि प्रांतीय सरकारों को स्थानीय संस्थाओं के लिये वित्तीय विकेंद्रीकरण की वही नीति अपनानी चाहिये, जो लार्ड मेयो की सरकार ने प्रारंभ की थी। रिपन के इस प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु निम्नानुसार थेः

  • स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं का विकास किया जाना चाहिये क्योंकि यह लोगों की राजनीतिक एवं लोकप्रिय शिक्षा का साधन है। इससे प्रशासन में सुधार होगा।
  • शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन से संबंधित नीतियों में परिवर्तन व्यवस्था से इन संस्थाओं के लिये राजस्व की आय के स्रोत सुनिश्चित हो सकेंगे।
  • इन संस्थाओं में गैर सरकारी सदस्यों का बहुमत होना चाहिये और यदि सरकारी सदस्य चाहें तो इनके लिये चुनाव भी कराया जा सकता है।
  • इन संस्थाओं का अध्यक्ष गैर-सरकारी सदस्यों में से ही बनाया जाना चाहिए।
  • स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में सरकारी हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए।

लेकिन सरकार को यह अधिकार होगा कि वह इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को संशोधित बना सकेगी तथा निरीक्षण भी कर सकेगी। लेकिन वह इस संबंध में कोई बाध्यकारी दिशा-निर्देश नहीं जारी कर सकती ।

  • कुछ निश्चित मामलों में सरकारी अधिकारियों की अनुमति आवश्यक होगी। जैसे-ऋणों में वृद्धि, नये करों को लागू करना, किसी निर्माण कार्य की लागत का अनुमानित लागत से अधिक होना, नये नियमों एवं उपनियमों का निर्माण तथा नगरपालिका की सम्पति को बेचना या गिरवी रखना इत्यादि।

इस प्रस्ताव के कारण 1883 से 1885 के मध्य अनेक अधिनियम पारित किये गये। इन अधिनियमों से भारत के शहरी स्वायत्त निकायों के संविधान, शक्तियों एवं कार्यप्रणाली में ऐतिहासिक परिवर्तन हुये। लेकिन अभी भी स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं द्वारा स्थानीय शासन का समस्त संचालन करना, एक स्वप्न की तरह था। तत्कालीन समय में जो भी स्थानीय निकाय थे, उनमें अनेक कमियां थीं।

  • सभी जिला बोडाँ और अधिकांश नगरपालिकाओं में निर्वाचित सदस्य अल्पमत में थे।
  • मताधिकार अत्यंत सीमित था।
  • जिला बोर्डों के प्रमुख सरकारी अधिकारी ही होते थे यद्यपि नगपालिकाओं के प्रमुख धीरे-धीरे गैर-सरकारी सदस्य भी बनाये जाने लगे थे।
  • अभी भी सरकार का स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं पर कड़ा नियंत्रण था। वह इन्हें अपनी इच्छा के अनुसार निलंबित कर सकती थी।

नौकरशाही ने लार्ड रिपन के उदार विचारों का ज्यादा समर्थन नहीं किया क्योंकि उसका तर्क था कि भारतीय स्व-शासन के योग्य नहीं हैं। 19वीं शताब्दी का अंतिम दशक, साम्राज्यवाद का काल था तथा इस समय प्रजातीय सर्वश्रेष्ठता की भावना अपने चरमोत्कर्ष पर थी। लार्ड कर्जन के आने से स्वशासन की गति और मंद हो गयी क्योंकि उसने इन संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण और ज्यादा बढ़ा दिया।

विकेंद्रीकरण पर राजकीय आयोग, 1908 Report of the Royal Commission upon decentralization in India, 1908

स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के प्रभावशाली ढंग से कार्य करने में धन के अभाव को सबसे प्रमुख बाधा के रूप में रेखांकित करते हुये, इस आयोग ने निम्न सिफारिशें कीं-

  1. इसने सुझाव दिया कि ग्राम पंचायतों को अधिक शक्तियां प्रदान की जायें। जैसे- छोटे मामलों में न्यायिक अधिकार, ग्रामीण विकास के छोटे कार्यों में खर्च बढ़ाने का अधिकार, ग्राम विद्यालयों का निर्माण, प्रशासन तथा उनका भरण-पोषण, छोटे-छोटे ईधन तथा चारे का संचय इत्यादि।
  2. आयोग ने उप-जिला बोर्डों के महत्व पर विशेष बल दिया और सिफारिश की कि प्रत्येक तालुक या तहसील में उप-जिला बोर्डों का गठन किया जाये तथा इनको ग्रामीण बोर्डों के प्रशासन का मुख्य साधन बनाया जाये। उप-जिला बोर्ड, जिला बोर्डों के अधीन नहीं होने चाहिये तथा जिला बोर्डों एवं उप-जिला बोर्डों का पृथक-पृथक अस्तित्व होना चाहिये। आयोग ने यह भी सिफारिश की कि जिला बोर्डों तथा उप-जिला बोर्डों के लिये आय के पृथक-पृथक स्रोत सुनिश्चित किये जाने चाहिये।
  3. नगरपालिकाओं के संबंध में आयोग ने सिफारिश की कि उनकी कर लगाने की शक्ति पर किसी प्रकार का नियंत्रण न लगाया जाये तथा उन्हें जल-आपूर्ति तथा निकासी की योजनाओं के अतिरिक्त किसी अन्य उद्देश्य के लिये प्रांतीय सहायता नहीं दी जानी चाहिये।
  4. नगरपालिकाओं को प्राथमिक शिक्षा तथा यदि वे चाहें तो मिडिल वर्नाक्यूलर स्कूल की भी जिम्मेदारी उन्हें दी जाये। सरकार को माध्यमिक शिक्षा, अकाल सहायता, अस्पताल, पशु-चिकित्सा तथा अकाल सहायता के कार्य से पूर्णरूपेण मुक्त कर दिया जाये।

1915 के भारत सरकार के प्रस्तावों में राजकीय विकेंद्रीकरण आयोग की सिफारिशों पर सरकारी प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी। प्रस्ताव में नये करों का सुझाव अस्वीकार कर दिया गया और आयोग के सुझाव केवल कागज पर ही रह गये।

मई, 1918 का प्रस्ताव

16 मई 1918 के भारत सरकार के इस प्रस्ताव में 20 अगस्त 1917 की घोषणा के संदर्भ में सभी प्रश्नों की समीक्षा की गयी और कहा गया कि स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं पर कम से कम नियंत्रण हो तथा उन्हें गलतियों से सबक लेने का अवसर प्रदान किया जाये। विकेंद्रीकरण आयोग द्वारा  दिये गये सुझावों को उन्होंने पृष्ठांकित किया तथा कर लगाने के मामले में नगरपालिकाओं को अधिक अधिकार दे दिये गये। ग्राम पंचायतों को केवल स्थानीय संस्थाओं का प्रतीक बनकर ही नहीं रहना चाहिये अपितु इन्हें ग्रामीण जीवन के आधुनिक व सर्वांगीण विकास का प्रयास भी करना चाहिए।

प्रस्ताव में कहा गया कि जहां तक हो सके स्थानीय संस्थाओं को प्रतिनिधि संस्थाओं का स्वरूप दिया जाये तथा किसी भी क्षेत्र में उनका अधिकार वास्तविक हो, नाममात्र का नहीं।

दोहरे शासन की अधीन

1919 के भारत शासन अनिधियम द्वारा स्थानीय स्वायत्त शासन एक हस्तांतरित विषय बन गया, जिसका नियंत्रण लोकप्रिय शक्ति के अधीन हो गया। प्रांतों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के विकास की अनुमति प्रदान कर दी गयी तथा केंद्रीय सरकार ने इस विषय पर प्रांतीय सरकारों को आदेश देने बंद कर दिये। अनुसूचित करों के नियमों के अनुसार, प्रांतीय करों तथा स्थानीय करों की सूची को पृथक कर दिया गया। किंतु वित्त अभी भी आरक्षित विषय था एतएव भारतीय मंत्री इस विषय में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे।

मई 1930 में साइमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के वित्तीय अधिकारों के संबंध में उल्लेख किया किंतु इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया की मद्रास, बंगाल तथा उत्तर-प्रदेश के आलावा कहीं और ग्राम पंचायतों में कोई विशेष प्रगति देखने को नहीं मिली है। आयोग ने यह सुझाव दिया कि इन स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया जाये। आयोग ने अपने कथन की पुष्टि में इंग्लैण्ड का उदाहरण दिया जहां सरकारी नियंत्रण के कारण ये संस्थायें अधिक अच्छा कार्य करने लगी हैं। आयोग के अनुसार, 1919 के सुधारों के पश्चात इन स्थानीय संस्थाओं की स्थिति और बिगड़ गयी है तथा नये करों के आरोपण में इन संस्थाओं के निर्वाचित सदस्य अधिक उत्साह नहीं दिखाते।

1935 का भारत सरकार अधिनियम तथा उसके बादः इस अधिनियम के अनुसार, प्रांतीय स्वशासन के प्रचलन से स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन और गति मिली है। प्रांतीय तथा स्थानीय करों के मध्य जो पृथकीकरण था वह समाप्त हो गया। लोकप्रिय सरकारों द्वारा वित्त का नियंत्रण किया जाता था इसलिये वे इन संस्थाओं को अधिक वित उपलब्ध करा सकती थीं। यद्यपि सभी प्रांतों में स्थानीय संस्थाओं को अधिक कार्यभार दे दिया गया था लेकिन उनकी कर आरोपण की शक्ति न केवल वहीं रही अपितु कम कर दी गयी। उनकी चुंगी बढ़ाने तथा सम्पति एवं व्यवसाय इत्यादि पर करों में वृद्धि करने की शक्तियां कम कर दी गयीं। विकेंद्रीकरण आयोग की सिफारिशों को भी लागू नहीं किया गया। 1947 तक बिना प्रांतीय सरकारों की आज्ञा के बिना स्थानीय संस्थायें नये कर नहीं लगा सकतीं थीं।

स्वतंत्र भारत के संविधान में राज्य सरकारों की निर्देशित किया गया कि वे ग्राम पंचायतों का विकास, प्रभावी स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के रूप मे करें। (अनु. 40)। संविधान के 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन द्वारा सरकार ने शहरी एवं ग्रामीण स्वायत्त संस्थाओं को सुदृढ़ करने तथा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। सरकार की योजना है कि इन संस्थाओं को अधिकाधिक अधिकार सौंपकर स्थानीय स्वशासन को मजबूत बनाया जाये। इससे विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को गति मिलेगी तथा स्थानीय स्तर से ही विकास एवं समृद्धि की प्रक्रिया प्रारंभ हो सकेगी।

सेना में परिवर्तन एवं उसका पुनर्गठन

1857 के पश्चात अंग्रेजों ने सेना का व्यवस्थित पुनर्गठन प्रारंभ किया। दिसम्बर 1888 में लार्ड डफरिन ने इस संबंध में चेतावनी देते हुये कहा कि “अंग्रेजों को तीस वर्ष पहले हुये उस भयानक अनुभव से सबक सीखना चाहिये तथा उसे सदैव याद रखना चाहिए।“

अंग्रेजों द्वारा सेना के पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य 1857 के विद्रोह जैसी किसी घटना की पुनरावृति को रोकना था। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार इस क्षेत्र में विश्व की अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों यथा-रूस, जर्मनी, फ्रांस इत्यादि से भी अपने उपनिवेशों की रक्षा के निमित्त भारतीय सेना का उपयोग करना चाहती थी। सरकार की नीति यह थी कि वह सेना की भारतीय शाखा का उपयोग एशिया एवं अफ्रीका में अपने उपनिवेशों के विस्तार में करेगी तथा सेना की ब्रिटिश शाखा का उपयोग, भारत में अंग्रेजी शासन की पकड़ मजबूत करने तथा उसे स्थायित्व प्रदान करने में किया जायेगा।

सरकार की इस नीति के तहत सेना की भारतीय शाखा पर यूरोपीय शाखा की सर्वोच्चता सुनिश्चित की गयी। इस संबंध में 1859 एवं 1879 में गठित आयोगों ने यह सुझाव दिया कि अंग्रेजी सेना की संख्या कम से कम एक-तिहाई अवश्य होनी चाहिये (1857 से पहले अंग्रेजी सेना की संख्या केवल 14 प्रतिशत थी)। यूरोपीय सैनिकों की संख्या, जो 1857 से पूर्व 45 हजार थी अब बढ़ाकर 65 हजार कर दी गयी तथा भारतीय सैनिकों की संख्या 2 लाख 38 हजार से घटाकर 1 लाख 40 हजार कर दी गयी। बंगाल में यूरोपीय सैनिकों का भारतीय सैनिकों से अनुपात 1:2 रखा गया, जबकि बंबई तथा मद्रास में यह अनुपात 1:3 का सुनिश्चित किया गया। संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों तथा सेना में महत्वपूर्ण विभागों जैसे- तोपखानों, सिगनल्स तथा सशस्त्र बलों में कड़ाई से यूरोपियनों का एकाधिकार स्थापित किया गया। यहां तक कि सन् 1900 तक भारतीय सैनिकों को दी जाने वाली बंदूकें,  यूरोपियनों की तुलना में घटिया किस्म की होती थीं तथा सेना के किसी महत्वपूर्ण विभाग में भारतीयों को कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं सौपा जाता था। यह स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध तक बनी रही। सेना में आफीसर रैंक के पद पर किसी भारतीय को नियुक्त किये जाने की अनुमति नहीं थी तथा 1914 तक सेना का सर्वोच्च पद, जहां कोई भारतीय पहुंचा सकता था वह सूबेदार का था। 1918 के पश्चात ही भारतीयों को सेना में कमीशन (रैंक) दिया जाना प्रारंभ हुआ। 1926 के अंत में भारतीय सैंडहर्स्ट आयोग ने अनुमान लगाया कि 1952 तक सेना का केवल 50 प्रतिशत भारतीयकरण ही हो सकेगा।

संतुलन एवं प्रतिसंतुलन या बांटो एवं राज करो की नीति के अधार पर सेना की भारतीय शाखा का पुनर्गठन किया गया। 1879 के सेना आयोग ने इस बात पर बल दिया कि “सेना में भारतीयों को भारतीयों से संतुलित किया जाये तथा यूरोपियनों की सर्वोच्चता स्थापित की जाये।” सन् 1887 से 1892 तक सेना के कमांडर-इन चीफ (मुख्य सेनापति) रहे लार्ड रार्बट्स के काल में 1880 के समय एक नयी विचारधारा का विकास हुआ। इसके अनुसार, लड़ाकू-जातियों एवं गैर लड़ाकू जातियों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। इससे विशिष्ट समुदायों से सेना को अच्छे फौजी प्राप्त हो सकेंगे। कालांतर में इसी विचारधारा के तहत सिख, गोरखा एवं पठानों को सेना में भर्ती किया गया तथा इनका प्रयोग भारतीयों द्वारा किये जाने वाले विद्रोहों तथा राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिये किया गया। इसके पीछे सरकार की मंशा यह थी कि इससे भारतीयों में प्रजातीय भेदभाव पनपेगा तथा राष्ट्रवादी आंदोलन स्वयंमेव दुर्बल हो जायेगा।

1857 के विद्रोह में वे स्थान, जहां के सैनिकों ने विद्रोहियों का साथ दिया था गैर-लड़ाकू जाति के घोषित कर दिये गये। इन स्थानों में अवध, बिहार, मध्य भारत एवं दक्षिण भारत प्रमुख थे। इससे भी अधिक, सेना की सभी रेजीमेंट्स में जातीय एवं साम्प्रदायिक कंपनियों का गठन किया गया तथा भारतीय शाखा में संतुलन के लिये विभिन्न सामाजिक-जातीय तबकों से युवाओं की सेना में भर्ती किया गया। सैनिकों में साम्प्रदायिक, जातीय, दलित तथा क्षेत्रीय भावनाओं को उभारा गया, जिससे राष्ट्रवाद के विकास को रोका जा सके। भारत सचिव चार्ल्स वुड ने घोषणा विकास किया जाये, जिससे आवश्यकता पड़ने पर सिख, हिन्दू, गोरखा इत्यादि सभी एक-दूसरे पर बिना किसी हिचकिचाहट के गोली चला सकें”।

इसी प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना अंग्रेजी सेना में सम्मिलित कर ली गयी तथा यूरोपीय पदाति एवं घुड़सवार, ब्रिटेन के पदातियों एवं घुड़सवारों में सम्मिलित  कर लिये गये। अंग्रेजी सेना के सैनिक तथा पदाधिकारी, भारत में सेवा करने तथा अनुभव प्राप्त करने के उद्देश्य से नियमित रूप से भारत भेजे जाने लगे। बंबई, मद्रास तथा बंगाल के तोपखाने, शाही तोपखाने एवं शाही इन्जिनीर्स में सम्मिलित कर लिए गये। पंजाब, नेपाल तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की जातियों को अच्छा फौजी मानकर उन्हें बहुसंख्या में सेना में भर्ती किया गया। जिन प्रदेशों के सैनिकों ने विद्रोहों में अधिक भाग लिया था, वहां के लोगों की सेना में भर्ती बंद कर दी गयी।

सेना के इस पुनर्गठन से रक्षा व्यय बहुत अधिक बढ़ गया, जिसका बोझ भारतीय जनता पर डाल दिया गया। यह कार्य वस्तुतः अंग्रेजी लोलुपता के लिये था, भारत की रक्षा के लिये नहीं।

अंततः सेना को समाज एवं देश की मुख्य धारा से बिल्कुल अलग कर देने का प्रयास किया गया, जिससे उनमें देशप्रेम की भावना बिल्कुल जागृत न हो सके। इसके लिये राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं एवं जर्नल्स से उन्हें दूर कर दिया गया तथा सैनिकों को उनकी गतिविधियों तक ही सिमित कर देने के उपाय किए गये।

इस प्रकार ब्रिटिश भारतीय सेना, साम्राज्यवाद की रक्षा करने वाली एक मशीन बनकर रह गयी।

लोक सेवायें

कानून एवं नीति निर्धारक संस्थाओं से भारतीयों को अलग रखने की एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस दिशा में अनेक कदम उठाये गये। वे संस्थायें, जो नीतियां बनाने एवं उन्हें क्रियान्वित करने जैसे कार्यों के लिये उत्तरदायी थीं, उनमें भारतीयों की नियुक्ति लगभग बंद कर दी गयी। साथ ही प्रशासन के महत्वपूर्ण विभागों से भारतीयों को दूर रखा जाने लगा। भारतीय जनपद सेवा (I.C.S.) में भी यूरोपियनों की श्रेष्ठता स्थापित करने के प्रयास किये गये। इन सभी उद्देश्यों के लिये मुख्यतः दो तरीके अपनाये गये।

पहला, यद्यपि 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर के भारतीय सिविल सेवा में सफल होने के पश्चात (प्रथम भारतीय) इन सेवाओं में भारतीयों की सहभागिता बढ़ने लगी थी, किंतु इन सेवाओं में भारतीयों को सफल होने से रोकने के लिये प्रवेश के नियमों में आयोजित की जाती थी तथा इसमें अंग्रेजी माध्यम से ही परीक्षा दी जा सकती थी। इसके विषय में शास्त्रीय यूनानी एवं लैटिन जैसे विषय सम्मिलित थे, जिनका अध्ययन भारतीयों के लिये अत्यंत कठिन था। पुनः, 1859 में परीक्षार्थियों की अधिकतम आयु सीमा 23 वर्ष से घटाकर 22 वर्ष फिर 1878 में 19 वर्ष कर दी  गयी। दूसरा, शासन के सभी महत्वपूर्ण तथा उच्च वेतन वाले पदों पर यूरोपियनों का अधिकार था।

राष्ट्रवादी नेताओं के भारी दबाव के कारण यद्यपि 1918 के पश्चात प्रशासन के भारतीयकरण की प्रक्रिया प्रारंभ तो हो गयी किंतु इसकी गति अभी भी काफी धीमी थी तथा अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर यूरोपियनों का ही अधिकार था। लेकिन धीरे-धीरे भारतीयों को इस बात का आभास होने लगा कि केवल सिविल सेवा का ही भारतीयकरण आवश्यक नहीं है अपितु, शासन की सभी प्रमुख शक्तियां भारतीयों को हस्तांतरित की जानी चाहिये। इसका कारण यह था कि भारतीय सिविल सेवा के कुछ भारतीयों को छोड़कर अधिकांश भारतीय अभी भी साम्राज्यवादी शासकों के पक्ष में ही कार्य करते थे।

भारतीय रियासते

भारतीय रियासतों के साथ अंग्रेजों के संबंध दी चरणीय नीति से निर्देशित थे- पहली, साम्राज्य की रक्षा के लिये उनसे संबंधों की स्थापना एवं उनका उपयोग तथा दूसरा, उन्हें पूर्णतयाः साम्राज्य के अधीन कर लेना (अधीनस्थ संघीय नीति)।

भविष्य में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध होने वाले किसी राजनीतिक आंदोलन के समय इन देशी रियासतों को मध्यस्थ के रूप में प्रयुक्त करने तथा 1857 के विद्रोह के समय इनकी राजभक्ति हेतु इन्हें पुरस्कृत के लिये सरकार ने विलय की नीति त्याग दी। अब नयी नीति शासकों को पदच्युत करने या उन्हें दंड देने की थी न कि उनके राज्य को विलय करने की। इसके साथ ही रियासतों को उनकी क्षेत्रीय अखंडता की गारंटी भी दी गयी तथा घोषणा की गयी कि सरकार रियासतों द्वारा किसी उत्तराधिकारी की गोद लेने के अधिकार का सम्मान करेगी।

1876 में ब्रिटिश संसद ने ‘रायल टाइटल्स' नामक एक अधिनियम पारित किया, जिससे ब्रिटेन की साम्राज्ञी विक्टोरिया ने समस्त ब्रिटिश प्रदेशों तथा देशी रियासतों समेत केसर-ए-हिन्द अथवा “भारत की साम्राज्ञी' की उपाधि धारण कर ली। बाद में लार्ड कर्जन ने स्पष्ट किया कि सभी रजवाड़े अपने-अपने राज्यों (रियासतो) में ब्रिटिश ताज के प्रतिनिधि के रूप में शासन करेंगे। बाद में भी ब्रिटिश सरकार ने राज्यों के अतिरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के अधिकार द्वारा अपनी ‘सर्वोच्च श्रेष्ठता' की नीति को बनाये रखा। सरकार इन राज्यों में अपने रेजिडेंट नियुक्त कर या अधिकारियों की नियुक्ति या बर्खास्तगी संबंधी मामलों में हस्तक्षेप कर अपने हस्तक्षेप करने के अधिकार का पक्षपोषण करती रही।

कालांतर में ब्रिटिश सरकार ने संचार, रेलवे, सड़क, टेलीग्राफ, नहरों, पोस्ट-आफिस आदि का इन राज्यों में आधुनिक ढंग से विकास किया तथा इन माध्यमों द्वारा भी उसे राज्यों में दखल देने का अवसर बराबर मिलता रहा। राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने का सरकार का एक उद्देश्य यह था कि इससे राष्ट्रवाद के उदय एवं लोकतांत्रिक भावनाओं के प्रसार को रोका जा सके। लेकिन इन आधुनिक राजनीतिक आंदोलनों का सकारात्मक पक्ष यह था कि इन प्रयासों से अंग्रेजों ने इन राज्यों में आधुनिक प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया।

प्रशासनिक नीतियां

1857 के पूर्व आधुनिक तरीके से भारत को विकास के पथ पर अग्रसर करने की नीति के विरुद्ध, सरकार ने अब व्यापक प्रतिक्रियावादी नीतियों का अनुसरण प्रारंभ कर दिया। इसके पीछे सरकार का यह मानना था कि भारतीय स्वशासन के लिये उपयुक्त नहीं हैं तथा उनके लिये अंग्रेजों की उपस्थिति अपरिहार्य है।

बांटों एवं राज करो की नीतिः अब अंग्रेजों ने साम्राज्य के विरुद्ध किसी संगठित जन-प्रतिक्रिया को रोकने का दृढ़ निश्चय कर लिया तथा बांटो व राज करो की नीचतापूर्ण नीति प्रारंभ कर दी। इस नीति के तहत उन्होंने शासकों को अपनी प्रजा के विरुद्ध, एक राज्य को दूसरे राज्य के विरुद्ध, एक क्षेत्र को दूसरे क्षेत्र के विरुद्ध तथा हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध उकसाने की नीति अपनायी।

1857 के विद्रोह के पश्चात मुसलमानों के दमन की जो नीति अपनायी गयी थी सरकार ने उसे त्याग दिया तथा निश्चय किया वह मुसलमानों के मध्य एवं उच्च शिक्षित वर्ग का प्रयोग, राष्ट्रवाद के उदय को रोकने में करेगी। अपनी नीति के तहत उसने मुसलमानों को शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया तथा उनके राजनीतिक शोषण की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी। इस कार्य के पीछे उसकी मंशा थी कि इससे शिक्षित भारतीयों के मध्य टकराव पैदा होगा तथा इसका उपयोग वह एक हथियार के रूप में उपनिवेशी शासन के हितों के लिये कर सकेगी।

शिक्षित भारतीयों के प्रति द्वेषः भारत के उभरते मध्यवर्गीय राष्ट्रवादी नेतृत्व ने अंग्रेजों की शोषणकारी प्रशासनिक नीतियों का विश्लेषण किया तथा प्रशासन में भारतीयों की हिस्सेदारी की मांग की। इस समय, जब भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन का शुभारंभ हुआ, (1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना) अंग्रेजों ने इस कदम की उपनिवेशी शासन के विरुद्ध एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया तथा उसने इस राष्ट्रवादी नेतृत्व के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण रवैया अपना लिया। वास्तव में, आधुनिक शिक्षा की वकालत की।

जमींदारों के प्रति दृष्टिकोण

1857 के विद्रोह को कुचलने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के अत्यंत प्रतिक्रियावादी समूह अर्थात भूस्वामियों और जमींदारों के प्रति भी मित्रता का हाथ बढ़ाया। सरकार ने उन्हें अपना भक्त बनाने के लिये कई प्रकार की उपाधियां प्रदान कीं। अनेक जमीदारों को उनकी पुरानी जमीदारियां वापस लौटा दी गयीं। उदाहरणार्थ- अवध राज्य के अधिकांश ताल्लुकदारों की जमीनें उन्हें वापस लौटा दी गयीं। सरकार ने जमीदारों एवं भूस्वामियों को भारतीयों का परम्परागत नेता कहा। उनके सभी विशेषाधिकारों तथा स्वाथों की रक्षा की गयी तथा उन्हें खुश करने के निमित्त सरकार ने किसानों के हितों की बलि चढ़ा दी। वस्तुतः सरकार इस बात से भलीभांति अवगत हो चुकी थी कि जमीदारों का तत्कालीन भारतीय लोगों पर गहरा प्रभाव है, भले ही इसका आधार जमींदारों की शक्ति ही था। सरकार का अनुमान था कि वह इनका प्रयोग कर शिक्षित भारतीयों की मांगों को भलीभांति कुचल सकती है। व्यवहारिक रूप में अंग्रेजों का यह अनुमान सही निकला। उसके प्रयासों से धीरे-धीरे भूस्वामी और जमींदार, उपनिवेशी शासन के भक्त बन गये तथा उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में अंग्रेजों का खुलकर साथ निभाया। इसके पीछे जमींदारों की यह सोच थी कि उनके विशेषाधिकारों एवं स्वार्थों की पूर्ति के लिये ब्रिटिश राज्य का होना आवश्यक है।

सामाजिक सुधारों के प्रति दृष्टिकोण

अंग्रेजों द्वारा भारतीय समाज के प्रतिक्रियावादी तत्वों का समर्थन करने का निर्णय लेने के कारण, सरकार ने सामाजिक सुधारों से अपना समर्थन वापस ले लिया। अंग्रेजों का मानना था इन सुधारों का समर्थन करने के कारण समाज का रुढ़िवादी तबका उसके विरुद्ध हो जायेगा तथा सरकार को अपने क्रोध का निशाना बनायेगा। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने प्रतिक्रियावादी तत्वों को बढ़ावा देने के लिए जातीय एवं सांप्रदायिक चेतना को भी प्रोत्साहित किया।

अविकसित सामाजिक सेवायें: सरकार द्वारा सेना एवं नागरिक प्रशासन पर किये जा रहे भारी व्यय तथा विभिन्न विद्रोहों को कुचलने में संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं भौतिक आधारभूत ढांचे इत्यादि जैसी सामाजिक सेवायें उपेक्षित हो गयीं तथा इन पर किये जाने वाला व्यय अत्यल्प रह गया। जन सामान्य के लाभार्थ किये जाने वाले विकास कार्य लगभग ठप्प हो गये। 

तथा अधिकांश सरकारी योजनायें समाज के उच्च व विशिष्ट वगों के हितों के अनुरूप बनने लगी। प्रशासनिक व्यय का एक बड़ा हिस्सा उच्च वर्गों की सुविधाओं के आस-पास सिमट कर रह गया।

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