दिल्ली सल्तनत Delhi Sultanate

दिल्ली सल्तनत  (1206ई.-1526 ई.)

गुलाम वंश (1206-1290 ई.)

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.)

  • तराइन के द्वितीय युद्ध में विजय के उपरांत मुहम्मद गौरी गजनी लौट गया और भारत का राजकाज अपने विश्वस्त गुलाम गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप दिया गया।
  • भारत में तुर्की शासन की स्थापना 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने की थी। यह गुलाम वंश का था। 1206 से 1290 ई. के मध्य दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गुलाम वंश के संतानों के नाम से विख्यात हुए।
  • गुलाम वंश को मामलूक वंश के नाम से भी जाना जाता है। ‘मामलूक’ शब्द से अभिप्राय स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न हुए दास से है।
  • मिन्हाजुद्दीन सिराज ने कुतुबुद्दीन ऐबक को एक वीर एवं उदार ह्रदय का सुल्तान बताया है। उसकी असीम उदारता के लिए उसे ‘लाखबख्श’ कहा जाता था।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक नेदिल्ली में ‘कुव्वत उल-इस्लाम’ और अजमेर में ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ नमक नस्जिदों का निर्माण कराया था।
  • ऐबक ने सूफी संत ‘ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी’ के नाम पर दिल्ली में कुतुबमीनार की नींव डाली, जिसे इल्तुतमिश ने पूरा किया।
  • ऐबक ने साम्राज्य विस्तार से अधिक ध्यान राज्य के सुदृढ़ीकरण पर दिया। उसने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया था।
  • 1210 ई. में घोड़े से गिरकर ऐबक की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसका अयोग्य पुत्र आरामशाह सुल्तान बना। किन्तु इल्तुतमिश ने उसे युद्ध में पराजित कर मर डाला और स्वयं सुल्तान बन गया।

इल्तुतमिश (1210-1236 ई.)

  • इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। यह कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद था।
  • इल्तुतमिश ने राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित किया।
  • इल्तुतमिश ने ‘तुर्कन-ए-चिहलगानी’ (चालीसा दल) नाम से, चालीस गुलाम सरदारों के एक गुप्त संगठन का गठन किया।
  • इल्तुतमिश ने चांदी का ‘टंका’ और तांबे का ‘जीतल’ नामक सिक्का चलाया।
  • इल्तुतमिश ने 1229 ई. में बगदाद खलीफा से अधिकार प्राप्त किया। उसने इस संस्था का प्रयोग भारतीय समाज की सामंतवादी व्यवस्था को समाप्त करने तथा राज्य के भागों को केंद्र के साथ जोड़ने के साधन के रूप में प्रारंभ किया।
  • इल्तुतमिश ने 1231-1232 ई. में कुतुबमीनार ने निर्माण का कार्य पूरा करवाया।
  • इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उसके पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज को तुर्की के अमीरों ने सुल्तान बनाया, लेकिन वह मुश्किल से 7 महीने ही शासन कर पाया।

रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.)

  • रुकुनुद्दीन के समय वास्तविक सत्ता उसकी मां शाहतुर्कान के हाथों में थी, जो एक अति महत्वाकांक्षी महिला थी। इसलिए दिल्ली की जनता ने रुकुनुद्दीन को अपदस्थ करके रजिया को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया।
  • रजिया दिल्ली सल्तनत की प्रथम महिला और अंतिम महिला सुल्तान थी।
  • रजिया सुल्तान दिल्ली के 23 सुल्तानों में से एक मात्र सुल्तान थी, जिसने जनता के समर्थन से गद्दी प्राप्त की थी।
  • रजिया ने एक अबीसीनियन मलिक याकूत को अमीर-ए-आखूर (अश्वशाला का प्रधान) नियुक्त किया।
  • रजिया के काल से राजतंत्र और तुर्क सरदारों के बीच संघर्ष प्रारंभ हुआ।
  • 1240 ई. में अमीरों ने रजिया के भाई बहरामशाह को दिल्ली के तख़्त पर बैठाया। बहरामशाह ने रजिया को युद्ध में परास्त कर उसकी हत्या कर दी।
  • बहरामशाह ने 1240 से 1242 ई. तक शासन किया। उसके बाद अलाउद्दीन शाह ने 1242 से 1246 ई. तक शासन किया।
  • इन दोनों के काल में समस्त शक्ति चालीसा दल के हाथों में थी, सुल्तान नाममात्र के लिए ही था।

नसिरुद्दीन महमूद (1246 से 1226 ई.)

  • नसिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में समस्त शक्ति बलबन के हाथों में थी। 1249 ई. में उसने बलबन को उलूग खां की उपाधि दी।
  • इसके शासनकाल में भारतीय मुसलमानों का एक अलग दल बन गया, जो बलबन का विरोधी था। इमादुद्दीन रिहान इस दल का नेता था।
  • 1265 ई, में नसिरुद्दीन की मृत्यु के बाद बलबन ने स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया।
  • तबाकत-ए-नासिरी का लेखक मिन्हाज सिराज नसिरुद्दीन के शासन काल में दिल्ली का मुख्य काजी था।

बलबन (1265 ई. से 1285 ई.)

  • बलबन दिल्ली का पहला शासक था, जिसने सुल्तान के पद और अधिकारों के बारे में विस्तृत रूप से विचार प्रकट किये।
  • बलबन स्वयं को पौराणिक तुर्की वीर नायक ‘अफरासियाब’ का वंशज मानता था।
  • बलबन ने नौरोज, सिजरा और पैबोस प्रथा की शुरुआत की।
  • बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा गठित चालीसा दल को समाप्त कर दिया।
  • बलबन के राज्य सिद्धांत की दो प्रमुख विशेषताएं थीं-प्रथम, सुल्तान का पद ईश्वर द्वारा प्रदान किया होता है। द्वितीय सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है।
  • बलबन का कथन है की, “मैं जब भी किसी भी निम्न परिवार के व्यक्ति को देखता हूं तो मेरे शारीर की शिराएं क्रोध से उत्तेजित हो जाती हैं।“
  • बलबन ने सुल्तान की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए रक्त और लौह की नीति अपनायी।
  • बलबन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कैकुबाद उसका उत्तराधिकारी बना, जो अत्यंत विलासप्रिय था।
  • अमीरों के एक गुट के नेता जलालुद्दीन ने कैकुबाद की हत्या करके स्वयं राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश का अंत हो गया।

खिलजी वंश (1290 ई. से 1320 ई.)

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290 ई. से 1296 ई.) 

  • जलालुद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत में एक नवीन राजवंश, खिलजी वंश की स्थापना की।
  • खिलजी वंश की स्थापना ‘खिलजी क्रांति’ के नाम से प्रसिद्द है।
  • जलालुद्दीन खिलजी ने कैकुबाद द्वारा बनवाए गए किलोखरी महल में अपना राज्याभिषेक करवाया।
  • मुसलमानों का दक्षिण भारत का प्रथम आक्रमण जलालुद्दीन के शासनकाल में देवगिरी के शासक रामचंद्र देव पर हुआ। इस आक्रमण का नेतृत्व अलाउद्दीन खिलजी ने किया था।
  • जलालुद्दीन ने भारतीय हिन्दू समाज के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया।
  • इसके शासनकाल में लगभग दो हजार मंगोल इस्लाम धर्म स्वीकार के दिल्ली के निकट बस गए।
  • जलालुद्दीन का भतीजा अलाउद्दीन इसकी छलपूर्वक हत्या कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

अलाउद्दीन खिलजी (1296 ई. से 1316 ई.)

  • अलाउद्दीन खिलजी एक साम्राज्यवादी शासक था। इसने ‘सिकंदर द्वितीय’ की उपाधि धारण की थी।
  • अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धांत तीन मुख्य बातों पर आधारित था- निरंकुश्वाद, साम्राज्यवाद और धर्म और राजनीति का पृथक्करण।
  • इसके शासन काल में शराब और भांग जैसे मादक पदार्थों का सेवन तथा जुआ खेलना बंद करा दिया गया था।
  • अलाउद्दीन सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने भूमि की पैमाइश कराकर राजस्व वसूल करना आरंभ कर दिया।
  • अलाउद्दीन के केंद्र के अधीन एक बड़ी और स्थायी सेना रखी तथा उसे नकद वेतन दिया। ऐसा करने वाला वह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था।
  • अलाउद्दीन ने 1304 ई. में ‘सीरी’ को अपनी राजधानी बनाकर किलेबंदी की।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने खलीफा की सत्ता को अविकार किया किन्तु प्रशासन में उनके हस्तेक्षप के नहीं माना।
  • अलाउद्दीन सल्तनतकाल में आर्थिक सुधारों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। अलाउद्दीन के बाजार नियंत्रण का उद्देश्य राजकोष पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना सैनिक आवश्यकताओं को पूरा करना था।
  • अलाउद्दीन ने उपज का 50 प्रतिशत भूमिकर (खराज) के रूप में निश्चित किया।
  • अलाउद्दीन ने सैनिक सुधारों के लिए दाग या घोड़ो पर निशान लगाने और विस्तृत सूची पत्रों की तैयारी के लिए हुलिया प्रथा प्रचलित की।
  • अलाउद्दीन ने जैसलमेर और गुजरात (1298 ई.) रणथम्बौर (1310 ई.), चित्तौड़ (1303 ई.), मालवा (1305 ई.) सिवाना (1308 ई.) और जालौर (1311 ई.) आक्रमण करके जीता।
  • अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत के राज्यों देवगिरी (1307 ई.), तेलंगाना (1309 ई.) और होयसल (1311 ई.) पर आक्रमण करके उनको अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया।
  • अलाउद्दीन ने अमीर खुसरो तथा अमर हसन देहलवी को संरंक्षण प्रदान किया।
  • अलाउद्दीन ने अली दरवाजा का निर्माण कराया जिसे प्रारंभिक तुर्की कला का श्रेष्ठ नमूना माना गया है।

मुबारक शाह खिलजी (1316 ई. – 1320 ई.)

  • मुबारक शाह खिलजी ने खुतबा व सिक्कों पर से खलीफा का नाम हटा दिया एवं स्वयं को खलीफा घोषित किया।
  • इसने अलाउद्दीन खिलजी द्वारा शुरू किये गए आर्थिक सुधारों को समाप्त कर दिया तथा जागीर व्यवस्था को पुनर्जीवित किया।
  • खुसरो शाह 1320 ई. में मुबारक खिलजी की हत्या करके दिल्ली का सुल्तान बन गया। वह हिन्दू धर्म से परिवर्तित मुसलमान था। इसने पैगम्बर के सेनापति की उपाधि धारण की।
  • खुसरो शाह को संत निजामुद्दीन औलिया का नैतिक समर्थन प्राप्त था।

तुगलक वंश 1320 ई. – 1411 ई.

गयासुद्दीन तुगलक (1320 ई. से 1325 ई.)

  • दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश की स्थापना 1320 ई. में गयासुद्दीन तुगलक ने की थी।
  • वह मुबारक शाह खिलजी के शासन काल में उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत का गवर्नर था।
  • किसानों की स्थिति में सुधार करना और कृषि योग्य भूमि में वृद्धि करना उसके दो मुख्य उद्देश्य थे। उसने भू-राजस्व की दर को 1/3 किया तथा सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण करवाया।
  • गयासुद्दीन तुगलक का संत निजामुद्दीन औलिया से मनमुटाव हो गया था। निजामुद्दीन औलिया ने गयासुद्दीन के बारे में कहा था-‘दिल्ली अभी दूर है।“
  • गयासुद्दीन ने लगभग सम्पूर्ण भारत को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया था।

मुहम्मद बिन तुगलक (1325 ई. से 1351 ई.)

  • 1325 में गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना।
  • इसका मूल नाम जूना खां था। इसे गयासुद्दीन तुगलक ने उलूग खां की उपाधि दी थी।
  •  एडवर्ड थॉमस ने इसे सिक्के बनाने वालों का सुल्तान तथा धनवानों का राजकुमार कहा है।
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने जैन आचार्य जिन प्रभा सुरी को संरक्षण प्रदान किया।
  • वह दिल्ली का पहला ऐसा सुल्तान था जो हिन्दुओं के त्यौहारों मुख्यतः होली में भाग लेता था।
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने 1347 ई. में राजधानी दिल्ली से देवगिरी (दौलताबाद) ले गया तथा वहां जहांपनाह नगर की स्थापना की।
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने अफ़्रीकी यात्री इब्न-बतूता को दिल्ली का काजी नियुक्त किया।
  • इब्न-बतूता ने मुहम्मद बिन तुगलक काल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में किया है।
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोल शासक कुबले खां द्वारा चलाई गई सांकेतिक मुद्रा से प्रेरित होकर 1330 ई. में सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया।
  • मुहम्मद बिन तुगलक इल्तुतमिश के बाद दूसरा सुल्तान था, जिसने खलीफा से मान्यता प्राप्त की।
  • मुहम्मद बिन तुगलक भी अलाउद्दीन खिलजी की तरह साम्राज्यवादी था।
  • मुहम्मद बिन तुगलक का राज्य दिल्ली के सुल्तानों में सबसे बड़ा था। उसने मिस्र और चीन के साथ राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये।
  • 1347 ई. में प्लेग के प्रकोप से बचने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने कन्नौज के निकट ‘स्वर्गद्वारी’ नामक स्थान पर शरण ली।
  • 1351 ई. में सिंध के विद्रोह को दबाने के क्रम में मुहम्मद बिन तुगलक की मौत हो गयी।

फिरोज शाह तुगलक (1356-1388 ई.)

  • मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका चचेरा भाई फिरोज शाह तुगलक दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
  • प्रशासन के मामले में फिरोज का दृष्टिकोण सस्ती लोकप्रियता हासिल करना था। उसने दण्ड संहिता को संशोधित करके दण्डों को अधिक मानवीय बनाया  तथा सुल्तान को भेंट देने की प्रथा को समाप्त कर दिया।
  • उसने कर प्रणाली को धार्मिक स्वरूप प्रदान किया। उसने पहले से प्रचलित कम से कम 23 करों को समाप्त कर दिया और इस्लामी शरीयत कानून द्वारा अनुमति प्राप्त केवल चार करों-खराज, जकात, जजिया और खम्स को आरोपित किया।
  • फिरोज ने बंग्स्ल सुर सिंध में सैनिक अभियान किया जिसमे वह असफल रहा।
  • फिरोज तुगलक पहला सुल्तान था, जिसने राज्य की आमदनी का ब्यौरा तैयार करवाया।
  • फिरोज तुगलक का आदर्श वाक्य था- ‘खजाना बड़ा होने से अच्छा है लोगों का कल्याण। दुःखी हृदयों से अच्छा का खाली खजाना।“
  • फिरोज ने कर्मचारियों को कार्यके बदले में जागीरें दीं। उसने जागीरदारी प्रथा और भूमि को ठेके पर दिया जाना शुरू किया।
  • फिरोज तुगलक ऐसा सुल्तान था, जिसने सार्वजानिक निर्माण कार्य को प्रमुखता दी।
  • उसने पांच बड़ी नहरों का निर्माण करवाया तथा ‘दीवान-ए-खैरात’ नमक विभाग को प्रमुखता दी। जो अनाथ मुस्लिम स्त्रियों तथा विधवाओं को सहायता प्रदान करता था।
  •  मुस्लिम बेरोजगारों के लिए उसने ‘दफ्तर-ए-रोजगार’ नामक विभाग की स्थापना की।
  • फिरोज ने फतेहाबाद, हिसार, फिरोजपुर, जौनपुर तथा फिरोजाबाद की स्थापना की।
  • फिरोज तुगलक दिल्ली के सुल्तानों में पहला सुल्तान था, जिसने इस्लाम के कनोंओं और उलेमा वर्ग को राज्य शासन में प्रधानता दी।
  • फिरोज ने हिन्दू ब्राह्मणों पर भी जजिया कर आरोपित किया।
  • डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार, “फिरोज इस युग का सबसे महँ धर्मान्ध और इस क्षेत्र में सिकंदर लोदी तथा औरंगजेब का अनुज था।“
  • हेनरी इलियट तथा एलिफिंस्टन ने फिरोज को ‘सल्तनत युग का अकबर’ कहा है।
  • फिरोज को मध्यकालीन भारत का पहला ‘कल्याणकारी निरंकुश शासक’ कहा जाता है।
  • फिरोज तुगलक की 1338 ई. में मृत्यु में के बाद तुगलक वंश तथा दिल्ली सल्तनत का पतन आरंभ हो गया।
  • तुगलक वंश के पतन का मुख्य कारण फिरोजशाह के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता थी।
  • तुगलक वंश का अंतिम शासक नसिरुद्दीन महमूद शाह था। 1398 ई. में इसके शासन काल में मंगोल शासक तैमूर लंग का आक्रमण हुआ।

सैय्यद वंश (1414-1451 ई.)

खिज्र खां (1414-1421 ई.)

  • 1413-1414 ई. के बीच दौलत खां लोदी दिल्ली का सुल्तान बना, परन्तु खिज्र खां ने उसे पराजित कर एक नवीन राजवंश, सैय्यद वंश की नींव डाली।
  • खिज्र खां ने मंगोल आक्रमणकारी तैमूर लंग को सहयोग प्रदान किया था और उसकी सेवाओं के बदले तैमूर ने उसे लाहौर, मुल्तान एवं दिपालपुर की सूबेदारी प्रदान की।
  • खिज्र खां ने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की। वह ‘रैयत-ए-आला’ की उपाधि से संतुष्ट रहा।

मुबारक शाह (1421-1434 ई.)

  • मुबारक शाह ने मुबारकपुर नामक नगर की स्थापना की।
  • इसके शासनकाल में शेख अहमद सरहिन्दी ने ‘तारीख-ए-मुबारकशाही’ नामक पुस्तक की रचना की।
  • इसके  बाद (1435-45 ई.) तक मुहम्मद शाह और (1445-51 ई.) तक अलाउद्दीन आलम शाह ने शासन किया।
  • अलाउद्दीन आलमशाह सैय्यद वंश का अंतिम शासक था।

लोदी वंश (1451-1526 ई.)

बहलोल लोदी

  • बहलोल लोदी ने अंतिम सैय्यद शासक आलमशाह को अपदस्थ कर लोदी वंश की स्थापना की।
  • बहलोल लोदी की मुख्य सफलता जौनपुर (1484 ई.) राज्य को दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित करने की थी।
  • उसने बहलोली सिक्के जारी किये, जो अकबर से पहले तक उत्तरी भारत में विनिमय के मुख्य साधन बने रहे।
  • अब्बास खां शेरवानी कहता है कि, “बहलोल लोदी द्वारा दिल्ली की सत्ता हस्तगत करने पर अफगान टिड्डी के झुण्ड की तरह भारत की और चल पड़े।“

सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.)

  • बहलोल लोदी के उपरांत सिकंदर लोदी दिल्ली का सुल्तान बना, जो लोदी वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक सिद्ध हुआ।
  • सिकंदर लोदी ने 1504 ई. में आगरा नगर की स्थापना की तथा 1506 ई. में इसे अपनी राजधानी बनाया।
  • उसने नाप के लिए एक पैमाना ‘गज-ए-सिंदरी’ प्रारंभ किया तथा हिन्दुओं पर जजिया कर आरोपित किया।
  • सिकन्दर लोदी ने मुहर्रम और ताजिया निकालना बंद करा दिया। मस्जिदों को सरकारी संस्थाओं का रूप प्रदान करके उन्हें शिक्षा का केंद्र बनाने का प्रयत्न किया।
  • सिकंदर लोदी के अनुसार, “यदि मैं अपने एक गुलाम को भी पालकी में बैठा दूं तो मेरे आदेश पर मेरे सभी सरदार उसे अपने कन्धों पर बैठा कर ले जायेंगे।“
  • सिकंदर लोदी ने एक आयुर्वेदिक ग्रंथ का फारसी में अनुवाद करवाया, जिसका नाम ‘फरहंग-ए-सिकंदरी’ रखा गया।
  • सिकंदर लोदी गुलरूखी के उपनाम से फारसी में कविताएं लिखता था।

इब्राहिम  लोदी (1517-1526 ई.)

  • सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिम  लोदी दिल्ली का सुल्तान बना।
  • इसके शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का पतन प्रारंभ हो गया। सभी राज्यों के गवर्नर स्वतंत्र शासकों जैसा व्यवहार करने लगे।
  • 1517-1518 ई. में इब्राहिम लोदी व राणा सांगा के बीच ‘घाटोली का युद्ध’ हुआ, जिसमे लोदियों को पराजित होना पड़ा।
  • 1526 ई. में पानीपत के मैदान में इब्राहिम  लोदी और बाबर के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमे इब्राहिम लोदी की हार हुई।
  • इसे पानीपत के प्रथम युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। लोदियों के साथ-साथ दिल्ली सल्तनत का पतन हो गया।
  • इतिहासकार निमायमतुल्ला के अनुसार, “इब्राहिम  लोदी के अतिरिक्त दिल्ली का कोई भी सुल्तान युद्ध में नहीं मारा गया।“
प्रमुख सरदार और सम्बंधित राजवंश
व्यक्ति राजवंश व्यक्ति राजवंश
मलिक काफूर खिलजी राजवंश हिसामुद्दीन इवाज तुगलक वंश
महमूद गवां बहमनी मलिक अम्बर अहमदनगर
मीर जुमला गोलकुंडा मदन्ना अकन्ना गोलकुंडा
मुरारी पंडित बीजापुर अफजल खां बीजापुर
कुमार कंपा विजयनगर रदौला खां विजय नगर
जयसिंह सिद्धराज मुग़ल राजवंश बीरबल मुग़ल राजवंश

 

राज्य राजधानी राजवंश संस्थापक
खानदेश बहुरहानपुर फारुकी वंश मलिक रजा
बरार एलिचाघुर इमादशाही फ़तेहउल्ला इमादशाही
बीजापुर नौरसपुर आदिलशाही युसूफ आदिल खां
अहमदपुर अहमदनगर निजामशाही मलिक अहमद
गोलकुण्डा गोलकुण्डा क़ुतुबशाही कुलीकृत बशाह
बीदर बीदर बरीदशाही अमीर अली बरीद

 

प्रशासन व्यवस्था

  • दिल्ली सल्तनत एक धर्म प्रधान राज्य था, जिसमें पुरे मुस्लिम जगत का सर्वोच्च था।
  • सल्तनत शासन में उत्तराधिकार को कोई निश्चित सिद्धांत नहीं था।
  • केन्द्रीय शासन का प्रधान सुल्तान था। नाह राज्य का सर्वोच्च न्यायधीश, कानून का सूत्रधार और सेवाओं का प्रधान सेनापति था।
  • सुल्तान के कार्यों में सहयता प्रदान करने के लिए मंत्रियों की व्यवस्था की, जो अपने-अपने विभागों के प्रभारी होते थे, किन्तु उनकी नीति सदैव सुल्तान द्वारा निर्धारित व शासित होती थी।
  • राजकीय शक्ति का व्यवहारिक नियंत्रण रखने हेतु केवन दो ही करक थे- अमीर  तथा उलेमा।
  • अमीर वर्ग में विदेशी मूल के लोग थे, जो दो समूहों में बनते थे- तुर्कीदास और गैर तुर्की, जिन्हें ‘ताजिक’ कहा जाता था।
  • इस्लामी धर्माचार्यों तथा शरीयत कानून के रुढ़िवादी व्याख्याकारों को उलेमा कहा जाता था।
  • बरनी के अनुसार सल्तनत के 4 स्तंभ दीवान-ए-विजारत, दीवान-ए-आरिज या अर्ज, दीवान-ए-मंशा और दीवान-ए-रसालत थे।
  • सल्तनत का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था, उसके कार्यकाल को दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग) कहा जाता था।
  • दीवान-ए-इंशा पत्र व्यवहार का शाही कार्यालय था, जिसका संचालन दबीर द्वारा किया जाता था।
  • दीवान-ए-रसालत का प्रधान विदेश मंत्री था। इसका कार्य विदेशी वार्ता और कूटनीतिक संबंधों की देखभाल करना था।
  • प्रान्तों के गवर्नर या इकता के प्रधान को वाली, नाजिम, नायब, मुक्ति या इक्तादार कहा जाता था।
  • 14वीं सदी में सल्तनत के विस्तार के कारण प्रान्तों को जिलों में बांट दिया गया था, जिन्हें ‘शिक’ कहा जाता था। शिक का प्रधान ‘शिकदार’ कहा जाता था।
  • शिकों को परगने में बनता गया था। प्रत्येक में आमिल एवं मुंसिफ नामक अधिकारी होते थे। आमिल मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तथा मुंसिफ राजस्व विभाग का प्रधान होता था।
  • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम के मुख्य अधिकारी थे- खुत, चौधरी, मुकद्दम और पटवारी।

न्याय और दण्ड व्यवस्था

  • न्याय व्यस्था के प्रमुख स्रोत- कुरान, हदीस, इजमा तथा अयास थे।
  • सुल्तान काजियों और मुफ्तियों की सहायता से न्याय का कार्य देखता था। काजी एवं मुफ़्ती का पद वंशानुगत होत्र था।
  • इस्लामी कानूनों की व्यवस्था करने वाले विधिवेत्ता ‘मुजतहिन्द’ कहे जाते थे।
  • फौजदारी कानून हिन्दू एवं मुसलमानों दोनों के लिए बराबर था।
  • प्रान्तों के इक्तादार न्याय का कार्य संभालते थे।
  • राज्य का सबसे बड़ा न्यायधीश सुल्तान होता था, जिसका निर्णय अंतिम होता था। वह धार्मिक मामलों में सद-उस-सुदूर से सलाह लेता था।

आर्थिक व्यवस्था

  • आर्थिक दृष्टि से सल्तनत राज्य समृद्ध था। कृषि और व्यापार दोनों उन्नत अवस्था में थे।
  • इस काल का मुख्य व्यवसाय बुनाई, रंगाई, धातु कार्य, चीनी व्यवसाय, कागज व्यवसाय आदि था।
  • आयात की प्रमुख वस्तु घोड़े और खच्चर थे।
  • निर्यात की वस्तुओं में कृषि सम्बन्धी वस्तुएं, वस्त्र, अफीम और नील शामिल थे।
  • सल्तनत काल में पांच मुख्य कर थे- 1. उश्र 2. खराज 3. खम्स 4. जकात और 5. जजिया।
  • उश्र मुसलमानों से लिया जाने वाला भूमि कर था, जो 5 से 10 प्रतिशत होता था।
  • लूट, खानों अथवा भूमि में गड़े हुए खजानों से प्राप्त धन, जिसके 1/5 भाग पर राज्य का अधिकार होता था, खम्स कहा जाता था।
  • जकात मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था। यह 2 से 2½ प्रतिशत तक होता था।
  • जजिया गैर मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था। स्त्रियाँ, बच्चे, भिखारी, पुजारी, साधु, आदि इस कर सर मुक्त थे।

सामाजिक जीवन

  • समाज का सबसे सम्मानित वर्ग विदेशी मुसलमानों का था, जो हिन्दू से मुस्लमान बने थे।
  • स्त्रियों का अपने पतियों अथवा अंत सम्बन्धियों पर निर्भर रहना हिन्दुओं था मुसलमानों दोनों के सामाजिक जीवन की विशेषता थी।
  • पर्दा प्रथा का प्रचलन बढ़ गया था। विवाह कम उम्र में होता था।
  • उच्च वर्ग की स्त्रियों को शिक्षा का अवसर मिलता था।
  • राजपूतों की स्त्रियों में जौहर प्रथा का प्रचलन था।
  • इस काल में हिन्दू स्मृतिकारों ने ब्राह्मणों का समाज में ऊंचा स्थान जारी रखा।
  • शूद्रों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इस काल में शूद्रों का परम कर्तव्य था दूसरी जातियों की सेवा करना।
  • इस काल में दास प्रथा थी। अलाउद्दीन के पास पचास हजार दास थे जबकि फिरोज तुगलक के समय दासों की संख्या दो लाख तक पहुँच गयी।
  • सल्तनत काल में मुस्लिम समाज नस्ल और जातिगत वर्गों में विभाजित रहा।

 

पुस्तक लेखक पुस्तक लेखक
किताब-उल-हिन्द अलबरूनी तारीख-ए-यामिनी उतबी
ताज-उल-मासिर हसन निजामी तबकोत दासिरी मिन्हाजुसिराज
किरान उस सादेन अमीर खुसरो तुगलक नामा अमीर खुसरो
तारीख-ए-फिरोजशाही जियाउद्दीन बरनी तारीख-ए-मुबारकशाही यहियाबिन अहमद सरहिन्दी
पृथ्वीराज रासो चंद बरदाई राज-तरंगिणी कल्हण
बाबरनामा बाबर हुमायूंनामा गुलबदन बेगम
कानून-ए-हुमायूंनी खोंदमीर तारीख-ए-शेरशाही अब्बास खां सरावनी
अकबरनामा अबुल फज़ल मुंतखाब-उल-तवारीख अब्दुल कादिर बदायूंनी

सिख गुरु

गुरु नानक सिख मत के समर्थक
गुरु अंग गुरुमुखी लिपि का प्रचार प्रसार
गुरु अमर दास लंगर की परिपाटी को जनप्रिय बनाया
गुरु रामदास अमृतसर का निर्माण, आदि ग्रन्थ की रचना की
गुरु गोविन्द सिंह अंतिम गुरु : खालसा का निर्माण

विजयनगर साम्राज्य

  • विजयनगर की स्थापना हरिहर एवं बुक्का ने की।
  • प्रथम वंश का नाम संगम वंश था।
  • मदुरै की स्थापना विजय बुक्का के पुत्र कुमार सम्मन ने की।
  • बुक्का प्रथम ने विद प्रतिष्ठापक की उपाधि धारण की।
  • देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर बांध बनवाया था।
  • निकोलो कोंटी नामक इतालवी यात्री देवराय प्रथम के समय में आया था।
  • देवराय द्वितीय के समय फारसी राजदूत अब्दुर्रज्जाक आया था।
  • विरूपाक्ष द्वितीय संगम वंश का अंतिम शासक था।
  • सालुव वंश की स्थापना नरसिंह सालुव ने की थी।
  • तुलव वंश की स्थापना वीर नरसिंह ने की थी।
  • कृष्ण देवराय इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था।
  • इसने विट्ठलस्वामी मंदिर बनवाया, अमुक्तमाल्यद नमक पुस्तक लिखी जिसकी विषय-वस्तु प्रशासनिक नियम थे।
  • कृष्ण देवराय ने आन्ध्र भोज की उपाधि धारण की।
  • अरावीड वंश इस साम्राज्य का अंतिम वंश था।

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